Lu Xun Complete Works/hi/Gushi Xinbian
पुरानी कथाएँ नए ढंग से (故事新编)
लू शुन (鲁迅, Lǔ Xùn, 1881–1936)
चीनी से हिंदी में अनुवाद।
प्राक्कथन
यह अत्यंत लघु संग्रह, लिखना आरंभ करने से लेकर अंतिम संकलन तक, एक ऐसे काल-खंड में फैला है जिसे निश्चित ही बहुत दीर्घ कहा जा सकता है: पूरे तेरह वर्ष।
प्रथम कथा बू झोउ पर्वत की मरम्मत (补天) 1922 के शीत ऋतु में लिखी गई। मैंने बू झोउ चुना और इसमें कांतिदेवी द्वारा आकाश की मरम्मत (女娲补天) की मिथक-कथा को नए ढंग से गढ़ा, उसमें आधुनिक व्यंग्य पिरोया। इसके बाद दस से अधिक वर्ष व्यतीत हो गए, और अन्य कथाएँ 1934-35 में जुड़ीं।
इन कथाओं को मैंने "पुरानी कथाओं का नवीन संस्करण" कहा है। इसमें मिथक, जनश्रुति और ऐतिहासिक आख्यान हैं — प्राचीन चीन के पात्र आधुनिक परिस्थितियों में। कुछ लोग कहेंगे कि इससे प्राचीन कथाओं की गरिमा भंग होती है। मैं कहूँगा: यदि प्राचीन कथाएँ इतनी दुर्बल हों कि एक लेखक की कलम से भंग हो जाएँ, तो शायद उनमें इतनी गरिमा थी ही नहीं जितनी माना जाता है।
बू झोउ पर्वत की मरम्मत (补天)
आदिकाल में, पृथ्वी अभी युवा थी। देवी न्वीवा (女娲) ने पीली मिट्टी से मानव गढ़े, उनमें प्राण फूँके, और वे हँसते-रोते-चिल्लाते जीवित हो गए। वह थक गई, तो रस्सी मिट्टी में डुबोकर झटके मारने लगी — जो बूँदें गिरीं, वे भी मानव बन गए। इस प्रकार संसार मनुष्यों से भर गया।
किंतु एक दिन आकाश में दरार पड़ गई। जल भूमि पर उमड़ आया, अग्नि भड़क उठी, विनाश सर्वत्र। देवी न्वीवा ने रंगीन प्रस्तर पिघलाकर आकाश की दरार भरी, विशाल कछुए के चार पैर काटकर आकाश के चारों स्तंभ बनाए, काली ड्रैगन वधकर मध्य प्रदेश को बचाया, सरकंडे की राख से बाढ़ रोकी।
किंतु जब सब समाप्त हुआ, मानव पहले से ही अपनी छोटी दुनिया में व्यस्त — क्षुद्र झगड़ों, ईर्ष्या, स्वार्थ में लिप्त। देवी ने जो किया, उन्होंने न देखा, न जाना, न कृतज्ञता व्यक्त की। वे अपने "नैतिकता" के नियम बना चुके थे — कपड़ों से शरीर ढकना, "शिष्टता" का आडंबर — और देवी के नग्न शरीर पर उँगलियाँ उठाने लगे, उसे "अनैतिक" कहा।
प्रथम शिक्षक को छोड़कर भागना (奔月)
शिकारी होउ ई (后羿), जिसने नौ सूर्यों को तीर से गिराया था, अब रोज़मर्रा के जीवन में फँसा था। प्रत्येक शाम पत्नी चांग ई (嫦娥) पूछती: "आज रात के भोजन में क्या है?" और प्रत्येक शाम वह कहता: "कौवा।" क्योंकि अब शिकार बचा ही नहीं — सब जानवर उसके तीरों से समाप्त हो चुके।
चांग ई ऊब चुकी थीं। एक रात, जब होउ ई शिकार पर गया, उन्होंने अमरत्व की औषधि — जो पश्चिमी माता रानी (西王母) से मिली थी — अकेली पी ली और चंद्रमा तक उड़ गईं। होउ ई लौटा — घर ख़ाली। ऊपर देखा — चंद्रमा में पत्नी की छाया।
तलवार गढ़ना (铸剑)
मेई जियानची (眉间尺) — जिसके पिता को राजा ने एक दिव्य तलवार गढ़ने के बाद मार डाला — प्रतिशोध की ज्वाला लेकर बड़ा हुआ। उसके पिता ने दो तलवारें गढ़ी थीं: एक राजा को दी, एक छुपा दी — पुत्र के लिए। मेई जियानची ने वह तलवार ली और राजा को मारने निकला।
मार्ग में एक रहस्यमय काले-वस्त्रधारी अजनबी मिला। "तुम्हारे चेहरे पर दो चीज़ें दिखती हैं," उसने कहा, "दया और संकोच। इनसे तलवार नहीं चलती। मुझे अपना सिर और तलवार दो — मैं राजा का वध करूँगा।"
मेई जियानची ने एक क्षण सोचा, और अपना सिर काट दिया। अजनबी ने सिर और तलवार ली, राजदरबार में गया, और राजा के सामने उबलते कड़ाहे में सिर डाला — "देखिए, यह नृत्य करता है।" राजा झुककर देखने लगा — अजनबी ने तलवार से राजा का सिर भी कड़ाहे में गिरा दिया, फिर अपना भी। तीन सिर कड़ाहे में लड़ने लगे। अंततः राजा का सिर हारा।
अनाज विरोधी (非攻)
मोज़ी (墨子) ने सुना कि चू राज्य (楚国) सोंग राज्य (宋国) पर आक्रमण करने वाला है। दस दिन-रात चलकर चू की राजधानी पहुँचे। वहाँ गोंगशू बान (公输般) — प्रसिद्ध शिल्पी जिसने आक्रमण के लिए सीढ़ी-यंत्र बनाया — से मिले।
मोज़ी ने मेज़ पर पट्टी से नगर-दीवार और सीढ़ी-यंत्र की प्रतिकृति बनाई। गोंगशू बान ने नौ बार आक्रमण किया; मोज़ी ने नौ बार रक्षा की। गोंगशू बान के सब उपकरण समाप्त; मोज़ी के रक्षा-साधन अभी शेष।
चू राजा ने आक्रमण रद्द किया। मोज़ी लौटे — दस दिन-रात फिर पैदल। सोंग राज्य पहुँचे तो बारिश में भीग गए। नगर-द्वार पर शरण माँगी — द्वारपाल ने अंदर नहीं आने दिया।
जिस राज्य को बचाया, उसी ने प्रवेश नहीं दिया। मोज़ी बारिश में भीगते खड़े रहे।
मृत्यु से प्रस्थान (起死)
झुआंगज़ी (庄子) मार्ग पर चल रहे थे। किनारे पर एक खोपड़ी पड़ी दिखी। उन्होंने छड़ी से ठोका और पूछा: "महोदय, आपने जीवन के सिद्धांत खो दिए इसलिए मर गए? या राज्य के पतन में मरे? या कुल्हाड़ी से? या ठंड से? या बुढ़ापे से?"
रात को खोपड़ी स्वप्न में आई और बोली: "मृत्यु में सुख है — न राजा, न प्रजा, न ऋतु-चक्र। स्वर्ग-पृथ्वी को अपना वसंत-शरद मानता हूँ। राजा का सुख भी इसके आगे फीका।"
झुआंगज़ी ने कहा: "चाहो तो जीवित कर दूँ।"
खोपड़ी ने कहा: "नहीं! जीवन का कष्ट कौन सहना चाहे?"
किंतु लू शुन की कथा में, झुआंगज़ी ने जीवन-देवता से खोपड़ी को जीवित करा दिया। जीवित होते ही वह व्यक्ति चिल्लाने लगा: "मेरे कपड़े कहाँ? मेरा सामान कहाँ?" और झुआंगज़ी पर चोर का आरोप लगाने लगा। पुलिस बुला दी।
दार्शनिक ने मृत को जीवित किया — और मृत ने दार्शनिक को चोर बताया। यही मानव स्वभाव है।
(1922–1935.)