Difference between revisions of "Lu Xun Complete Works/hi/Shizhong"
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| − | = | + | = विनाश [अनुवाद] (毁灭) = |
'''लू शुन (鲁迅, Lǔ Xùn, 1881–1936)''' | '''लू शुन (鲁迅, Lǔ Xùn, 1881–1936)''' | ||
| − | चीनी से हिंदी में अनुवाद। | + | चीनी से हिंदी में अनुवाद। मूल पाठ: ए. फ़ादेयेव (法捷耶夫), ''विनाश'' (毁灭), लू शुन द्वारा चीनी में अनूदित। |
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| − | ''यह | + | '''अध्याय छह: खदान के लोग''' |
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| + | धुएँ के कारण कमरा नीलापन लिए भूरा और दमघोंटू हो गया था। पर्याप्त बेंचें नहीं थीं। किसान और छापामार योद्धा गलियारे में ठुँसे हुए, दरवाज़े पर धक्का-मुक्की करते, लेविंसन (莱奋生) की गर्दन के ठीक पीछे साँसें छोड़ रहे थे। | ||
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| + | "शुरू करें, यूसेफ़ आब्रामोविच (约瑟夫·亚伯拉弥支)," लूबोव (略勃支) ने असंतुष्ट भाव से कहा। वह न स्वयं से संतुष्ट था, न कमांडर से। सभी बातें इस बिंदु तक पहुँचकर पूर्णतः ऊबाऊ और कष्टकर प्रतीत हो रही थीं। | ||
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| + | मोरोश्का (木罗式加) ने दरवाज़े तक रास्ता बनाया, अपना उदास और क्रूर मुख दिखाते हुए, और तूपोव (图皤夫) के बगल में खड़ा हो गया। | ||
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| + | लेविंसन ने गंभीरतापूर्वक समझाया कि वह किसानों को उनके काम से नहीं हटाता यदि उसे यह न लगता कि यह मामला किसानों और छापामार दस्ते दोनों से संबंधित है, और यदि समूह में इतने स्थानीय लोग न होते। | ||
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| + | "जैसा सब तय करें, वैसा हो," उसने भारी स्वर में निष्कर्ष निकाला, किसानों की धीमी लय की नक़ल करते हुए। वह धीरे-धीरे बेंच पर बैठ गया, मुड़ा, और अचानक एक छोटा, नगण्य व्यक्ति बन गया, सभा को अंधेरे में छोड़कर कि वे स्वयं विचार-विमर्श करें, जबकि वह दीपक की बत्ती की भाँति मद्धम हो गया। | ||
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| + | पहले बहुत से लोग एक साथ बोले, अराजक अव्यवस्था में, बिना किसी निष्कर्ष पर पहुँचे। फिर अन्य लोग समर्थन करने लगे, और सभा एकदम जीवंत हो उठी। कई मिनटों तक एक भी वाक्य अलग-अलग पहचानना असंभव था। बोलने वाले मुख्यतः किसान थे; छापामार शांत और स्थिर प्रतीक्षा कर रहे थे। | ||
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| + | "यह भी ठीक नहीं है," सदा असंतुष्ट, काई-जैसे सफ़ेद बालों वाले वृद्ध ओस्ताफ़ेई (遏斯泰菲) ने कठोरता से ऊँची आवाज़ में कहा। "पहले, निकोलस (米古拉式加) के ज़माने में, जो लड़का ऐसा कुछ करता उसे गाँव की गलियों में पीट-पीटकर घुमाते। चुराई हुई चीज़ गले में लटकाते, बर्तन बजाते, और गली-गली घुमाते..." वह अपनी सूखी उंगलियाँ हिला रहा था जैसे कोई स्कूल का प्रधानाध्यापक, मानो किसी को डराना चाहता हो। | ||
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| + | "छोड़ो अपने निकोलस को!..." कूबड़ वाले काने ने चिल्लाया जो जापानियों की बात कर रहा था। वह हाव-भाव करने का प्रयत्न कर रहा था, किंतु जगह इतनी तंग थी कि वह और भी क्रुद्ध हो गया। "हमेशा अपना निकोलस!... वो ज़माना गया!... गया, और लौटेगा नहीं!..." | ||
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| + | "निकोलस हो या न हो, ये काम करना ग़लत है," बूढ़े ने बिना पीछे हटे दोहराया। "इसी प्रकार खेती होती है जो सबका पेट भरती है। किंतु चोरों को पालना, यह हमारा काम नहीं।" | ||
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| + | "कौन कहता है कि चोरों को पालना है? कोई चोर का साथी नहीं बनेगा। चोरों की बात करते हो, पता नहीं तुम ख़ुद तो नहीं पाल रहे!" काने ने बूढ़े के बेटे का संकेत दिया जो दस वर्ष पहले कहीं भाग गया था। "यहाँ दो तरह की तौल चाहिए! इस जवान ने छह वर्ष लड़ाई की है... और एक तरबूज़ चखने से बेकार हो गया?..." | ||
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| + | "पर चुराना क्यों?..." किसी ने आश्चर्य से कहा। "हे भगवान, इसमें क्या बड़ी बात है?... अगर हमारे पास आता, तो एक पूरा थैला भर देता। ले, ले: हम मवेशी नहीं पाल रहे; किसी अच्छे आदमी को देना, इसमें क्या बुराई?..." | ||
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| + | किसानों की आवाज़ों में कोई कटुता नहीं थी। अधिकांश सहमत थे: पुराने नियम अब काम नहीं करते; कुछ विशेष चाहिए। | ||
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| + | "वे ख़ुद तय कर लें, अध्यक्ष के साथ!" किसी ने चिल्लाया। "इस मामले में हमारा कोई कहना नहीं..." | ||
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| + | लेविंसन फिर खड़ा हुआ और मेज़ पर हाथ मारा। | ||
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| + | "साथियो, बारी-बारी से बोलें तो बेहतर," उसने शांत किंतु स्पष्ट स्वर में कहा, ताकि सब सुन सकें। "सब एक साथ बोलेंगे तो कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा। लेकिन मोरोश्का कहाँ है?... यहाँ आओ..." उसने गंभीर मुख दिखाया और जारी रखा; सबकी आँखें उस ओर घूम गईं जहाँ संदेशवाहक खड़ा था। | ||
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| + | "मैंने तो इसे यहीं देखा था..." मोरोश्का ने अस्पष्ट रूप से कहा। | ||
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| + | "चलो, चलो!..." तूपोव ने उसे धक्का दिया। | ||
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| + | मोरोश्का हिचकिचाया। लेविंसन आगे बढ़ा और, सँड़सी की भाँति, अपनी स्थिर दृष्टि से उसे भीड़ में से खींच निकाला। | ||
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| + | संदेशवाहक किसी को नहीं देख रहा था; सिर झुकाए मेज़ की ओर चला। पसीना बह रहा था और हाथ काँप रहे थे। सैकड़ों जिज्ञासु दृष्टियाँ उस पर महसूस कर रहा था। आँखें उठाना चाहा, किंतु तुरंत गांकारेंको (刚卡连珂) का सन-जैसी कठोर दाढ़ी वाला चेहरा दिखा। नीलामकार उसे कठोरता और करुणा से देख रहा था। मोरोश्का और नहीं सह सका और खिड़की की ओर शून्य में दृष्टि गड़ा दी। | ||
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| + | "तो, विचार-विमर्श करें," लेविंसन ने पहले की तरह शांत, किंतु इस ढंग से कहा कि बाहर वाले भी सुन सकें। "कोई बोलना चाहता है?... चलो, दादा, कुछ कहना है?..." | ||
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| + | "यहाँ क्या कहना है?" बूढ़े ओस्ताफ़ेई ने संकोच से कहा। "हम तो बस... आपस में बात कर रहे थे..." | ||
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| + | "इतना सीधा-सा मामला, ख़ुद तय कर लो!" किसानों ने फिर चिल्लाया। | ||
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| + | "तो, दादा, मुझे बोलने दो..." अचानक तूपोव ने दबी हुई शक्ति से कहा, और न जाने क्यों, बूढ़े ओस्ताफ़ेई को देखते हुए, भूलवश लेविंसन को भी "दादा" कह बैठा। | ||
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| + | तूपोव की आवाज़ में एक अवर्णनीय अधिकार था जिसने सभी सिरों को उसकी ओर मोड़ दिया। वह मेज़ के पास आया और मोरोश्का के बगल में खड़ा हो गया, अपने बड़े, मज़बूत शरीर से उसे ढँकते हुए, लेविंसन को छिपाते हुए। | ||
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| + | "हम तय करें?... चिंता मत करो!..." उसने सीना ताने, भावुक क्रोध से शब्द खींचते हुए कहा। "तो हम ही तय करते हैं!..." अचानक मोरोश्का की ओर झुका और उस पर जलती दृष्टि गड़ा दी। "तू हमारा है, बोल, मोरोश्का?... एक खनिक?" उसने तनावपूर्ण, तीखे स्वर में पूछा। "गंदा ख़ून... सुचान (苏羌) की धातु!... हमारा नहीं बनना चाहता? मसखरापन करना है? खनिकों को बदनाम करना है? तो ठीक!..." उसकी आवाज़, कठोर और गूँजते कोयले की तरह, इस्पात-सा भारी स्वर फेंकती, सन्नाटे में गिरती। | ||
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| + | मोरोश्का, चादर की तरह सफ़ेद, उसकी आँखों में एकटक देख रहा था, हृदय ऐसे डोल रहा था मानो गोली लगी हो। | ||
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| + | "ठीक है!..." तूपोव ने दोहराया... "तो उपद्रव मचा!... देख, हमारे बिना क्या करेगा!... रही बात हमारी... इस लड़के को निकालना है!..." उसने लेविंसन से दृढ़ता से कहा। | ||
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| + | "देखेंगे... ज़रा सँभलो, ख़राब मत करो!" दस्ते से किसी ने चिल्लाया। | ||
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| + | "क्या?" तूपोव ने क्रुद्ध होकर एक कदम आगे बढ़ाकर पूछा। | ||
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| + | "हे भगवान, बस करो..." एक कोने से किसी बूढ़े की नाक से निकली डरी हुई आवाज़ आई। | ||
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| + | लेविंसन ने पीछे से उसकी आस्तीन खींची। | ||
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| + | "तूपोव... तूपोव..." उसने धीमे स्वर में बुलाया। "थोड़ा किनारे हो जाओ, लोग दिख नहीं रहे..." | ||
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| + | तूपोव ने अपना अंतिम तीर छोड़ दिया था; कमांडर को देखा, चकित होकर लड़खड़ाया, और शांत हो गया। | ||
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| + | "किंतु हमें इस मूर्ख को क्यों निकालना है?" अचानक गांकारेंको ने अपना धूप में पके कुंडलों वाला सिर भीड़ से ऊपर उठाते हुए कहा। "मैं उसका बचाव नहीं करता, क्योंकि कोई व्यक्ति बिना ठिकाने के नहीं चल सकता, और उसने कुछ ग़लत किया; इसके अतिरिक्त, मैं उससे प्रतिदिन बहस करता हूँ... किंतु वह, सच कहें, एक ऐसा लड़का है जो लड़ना जानता है, और इसे नकारना नहीं चाहिए। हम उसूरी (乌苏里) के मोर्चे पर उसके साथ अग्रिम दस्ते में रहे। वह हमारा साथी है: कभी जासूसी नहीं करेगा, कभी धोखा नहीं देगा..." | ||
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| + | "साथी..." तूपोव ने पीड़ा से बीच में टोका। "और हम उसके साथी नहीं?... एक ही खदान में खोदा... लगभग तीन महीने एक ही कोट के नीचे सोए!... और अब वह बदबूदार शैतान" — उसे अचानक चिपचिपे छिशी (企什) की याद आई —, "हमें सबक सिखाना चाहता है!..." | ||
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| + | "यही मैं भी कहता हूँ," गांकारेंको ने तूपोव पर संदेहास्पद दृष्टि डालते हुए जारी रखा (उसे लगा कि गालियाँ उसके लिए थीं)। "ऐसे छोड़ नहीं सकते। किंतु तुरंत निकालना भी काम नहीं करेगा: हम अपने आप को नष्ट कर लेंगे। मेरा मत यह है: उसी से पूछो!..." उसने हवा में हथेली से वार किया, मानो अपना मत अन्य व्यर्थ मतों से अलग कर रहा हो। | ||
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| + | "सही!... वह बोले!... अगर पछतावा है, वह ख़ुद कहेगा..." | ||
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| + | तूपोव ने अपनी जगह लौटने का प्रयास किया, किंतु गलियारे के बीच में रुक गया, मोरोश्का को एकटक देखता, मानो उसे जाँच रहा हो। मोरोश्का उसे बिना इच्छा के देख रहा था, पसीने से भीगी उंगलियों से अपनी कमीज़ के बटन कुरेदता हुआ। | ||
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| + | "बोलो, अपनी बात कहो, बोलो!..." | ||
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| + | मोरोश्का ने लेविंसन की ओर तिरछी दृष्टि डाली। | ||
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| + | "हाँ, मैं..." उसने धीमे स्वर में शुरू किया, किंतु शब्द नहीं मिले और चुप हो गया। | ||
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| + | "बोलो, बोलो!" सबने उत्साहित करते हुए चिल्लाया। | ||
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| + | "हाँ, मैं... मैंने किया..." फिर आवश्यक शब्द नहीं मिले और वह लूबोव की ओर मुड़ा... "वो तरबूज़... अगर मुझे पता होता कि ग़लत है... या मैंने बुरी नीयत से किया?... यहाँ बच्चे ऐसे ही हैं... सब जानते हैं, मैं भी ऐसा था... और जैसा तूपोव कहता है, मैं अपने सभी साथियों को... सच है, भाइयो!..." अचानक उसके सीने में कुछ फूट पड़ा; उसने छाती पकड़ी, पूरे शरीर से आगे झुका, और दोनों आँखों से गरम, नम प्रकाश फूटा... "अपने साथियों के लिए ख़ून की आख़िरी बूँद तक दे दूँगा। ऐसे... ऐसे, और ऊपर से तुम्हें बदनाम करूँ?... या क्या?!..." | ||
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| + | बाहर से अन्य ध्वनियाँ आ रही थीं: श्नाइडेगन (式尼德庚) गाँव में कुत्ते भौंक रहे थे, लड़कियाँ गा रही थीं, पादरी के पड़ोसी से पिसाई-जैसी लयबद्ध, भारी ठक-ठक आ रही थी। घाट से, शब्द घसीटती आवाज़ें: "ओ, खींचो!" | ||
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| + | "किंतु मैं अपने आप को कैसे दंडित करूँ?..." मोरोश्का ने पीड़ा से, किंतु पहले से अधिक दृढ़ और कम ईमानदारी से जारी रखा। "मैं केवल शपथ ले सकता हूँ... खनिक की शपथ... जो टूटती नहीं... फिर कभी कोई बुरा काम नहीं करूँगा..." | ||
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| + | "और अगर नहीं निभा?" लेविंसन ने ध्यान से पूछा। | ||
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| + | "अगर नहीं निभा..." मोरोश्का किसानों के सामने शर्मिंदा हुआ, मुँह सिकोड़ते हुए। | ||
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| + | "किंतु अगर नहीं कर सका?..." | ||
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| + | "तो... जो चाहो करो... गोली मार दो..." | ||
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| + | "ठीक, तेरी जान!" तूपोव ने कठोरता से कहा, किंतु उसकी आँखों में अब क्रोध नहीं था, केवल एक स्नेहपूर्ण, मज़ाकिया चमक। | ||
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| + | "ख़त्म करो!... बस हो गया!" बेंचों से लोग चिल्लाए। | ||
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| + | "बस हो गया, आख़िरकार!" किसान, इस बात से प्रसन्न कि वह कष्टकर सभा शीघ्र समाप्त हो। "एक छोटी-सी बात पर इतनी बातें!..." | ||
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| + | "तो, इस प्रकार तय हुआ?... कोई अन्य प्रस्ताव?..." | ||
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| + | "सभा बंद करो, शाप दो!..." छापामार योद्धा, पहले के तनाव से प्रसन्न मनोदशा में आकर, सब एक साथ चिल्लाए। "कितनी थकान!... और कैसी भीषण भूख... आँतें लोहे की तरह मुड़ रही हैं!..." | ||
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| + | "नहीं, रुको," लेविंसन ने शांति से हाथ उठाकर कहा, आँखें सिकोड़ते हुए। | ||
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| + | "यह मामला सुलझ गया। अब दूसरा है..." | ||
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| + | "और क्या?!" | ||
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| + | "मुझे लगता है कि यह प्रस्ताव पारित करना आवश्यक है..." उसने चारों ओर देखा... "यहाँ कोई सचिव नहीं है?..." अचानक मधुर और मृदु मुस्कान दी। "छिशी, आकर लिखो... प्रस्ताव यह है: सैन्य सेवा से बाहर के खाली समय में, आवारा कुत्तों का पीछा नहीं किया जाएगा, बल्कि किसानों की कुछ सहायता की जाएगी..." उसने विश्वास के स्वर में कहा, मानो वह स्वयं विश्वास करता हो कि कोई किसानों की सहायता करेगा। | ||
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| + | "नहीं, हमें यह नहीं चाहिए!" किसानों में से किसी ने कहा। | ||
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| + | लेविंसन ने सोचा: "ठीक लगाया!" | ||
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| + | "चुप... चुप!..." अन्य किसानों ने टोका। "सुनो। करने दो। हाथ घिसेंगे नहीं!..." | ||
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| + | "लूबोव की विशेष सहायता..." | ||
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| + | "विशेष क्यों?" किसानों ने चिल्लाया। "वह कौन-सा बड़ा आदमी है? अध्यक्ष होना कोई बड़ी बात नहीं, कोई भी बन सकता है!..." | ||
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| + | "सभा बंद!... बिना आपत्ति!... लिख लो!..." छापामार अपनी जगहों से उठे, कमांडर की बात सुनना बंद किया और शोर मचाते हुए कमरे से बाहर निकले। | ||
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| + | '''अध्याय सात: लेविंसन''' | ||
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| + | लेविंसन का दस्ता पाँच सप्ताह से बिना कुछ किए, एक ही स्थान पर डेरा डाले था। घोड़े, गाड़ियाँ और रसद बढ़ गई थी। लोग बहुत अधिक सोते, संतरी भी। चिंताजनक सूचनाएँ उस आलसी शरीर को हिला नहीं पाती थीं। किंतु जब स्पष्ट हो गया कि जापानियों ने क्रीलोव्का (基里洛夫卡) छोड़ दिया है और सैकड़ों वर्स्ट की दूरी में कोई शत्रु नहीं मिला, तो उसने अपनी ही सावधानी पर हँसी। | ||
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| + | किंतु स्तेत्सिंस्की (斯捷兹因斯基) के अतिरिक्त, किसी को लेविंसन की दुविधाओं का ज्ञान नहीं था। वह अपने विचार किसी से साझा नहीं करता, केवल "हाँ" या "नहीं" में उत्तर देता। इस प्रकार वह सबको एक विशेष रूप से सही व्यक्ति लगता, विशेषकर युवा बाक्रानोव (巴克拉诺夫) को, जो हर बात में उसकी नक़ल करता। | ||
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| + | जब से उसे कमांडर चुना गया, कोई उसे किसी अन्य भूमिका में कल्पना नहीं कर सकता था। यदि वह बताता कि बचपन में अपने पिता को पुराने कपड़े बेचने में कैसे सहायता करता था, कि उसके पिता ने मरते दम तक धन कमाने का प्रयत्न किया किंतु चूहों से डरता था और बेसुरा वायलिन बजाता था, तो सब सोचते कि वह मज़ाक कर रहा है। किंतु लेविंसन कभी ऐसी बातें नहीं बताता था। | ||
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| + | (1927–1929। लू शुन का अनुवाद।) | ||
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Revision as of 22:59, 9 April 2026
विनाश [अनुवाद] (毁灭)
लू शुन (鲁迅, Lǔ Xùn, 1881–1936)
चीनी से हिंदी में अनुवाद। मूल पाठ: ए. फ़ादेयेव (法捷耶夫), विनाश (毁灭), लू शुन द्वारा चीनी में अनूदित।
अध्याय छह: खदान के लोग
धुएँ के कारण कमरा नीलापन लिए भूरा और दमघोंटू हो गया था। पर्याप्त बेंचें नहीं थीं। किसान और छापामार योद्धा गलियारे में ठुँसे हुए, दरवाज़े पर धक्का-मुक्की करते, लेविंसन (莱奋生) की गर्दन के ठीक पीछे साँसें छोड़ रहे थे।
"शुरू करें, यूसेफ़ आब्रामोविच (约瑟夫·亚伯拉弥支)," लूबोव (略勃支) ने असंतुष्ट भाव से कहा। वह न स्वयं से संतुष्ट था, न कमांडर से। सभी बातें इस बिंदु तक पहुँचकर पूर्णतः ऊबाऊ और कष्टकर प्रतीत हो रही थीं।
मोरोश्का (木罗式加) ने दरवाज़े तक रास्ता बनाया, अपना उदास और क्रूर मुख दिखाते हुए, और तूपोव (图皤夫) के बगल में खड़ा हो गया।
लेविंसन ने गंभीरतापूर्वक समझाया कि वह किसानों को उनके काम से नहीं हटाता यदि उसे यह न लगता कि यह मामला किसानों और छापामार दस्ते दोनों से संबंधित है, और यदि समूह में इतने स्थानीय लोग न होते।
"जैसा सब तय करें, वैसा हो," उसने भारी स्वर में निष्कर्ष निकाला, किसानों की धीमी लय की नक़ल करते हुए। वह धीरे-धीरे बेंच पर बैठ गया, मुड़ा, और अचानक एक छोटा, नगण्य व्यक्ति बन गया, सभा को अंधेरे में छोड़कर कि वे स्वयं विचार-विमर्श करें, जबकि वह दीपक की बत्ती की भाँति मद्धम हो गया।
पहले बहुत से लोग एक साथ बोले, अराजक अव्यवस्था में, बिना किसी निष्कर्ष पर पहुँचे। फिर अन्य लोग समर्थन करने लगे, और सभा एकदम जीवंत हो उठी। कई मिनटों तक एक भी वाक्य अलग-अलग पहचानना असंभव था। बोलने वाले मुख्यतः किसान थे; छापामार शांत और स्थिर प्रतीक्षा कर रहे थे।
"यह भी ठीक नहीं है," सदा असंतुष्ट, काई-जैसे सफ़ेद बालों वाले वृद्ध ओस्ताफ़ेई (遏斯泰菲) ने कठोरता से ऊँची आवाज़ में कहा। "पहले, निकोलस (米古拉式加) के ज़माने में, जो लड़का ऐसा कुछ करता उसे गाँव की गलियों में पीट-पीटकर घुमाते। चुराई हुई चीज़ गले में लटकाते, बर्तन बजाते, और गली-गली घुमाते..." वह अपनी सूखी उंगलियाँ हिला रहा था जैसे कोई स्कूल का प्रधानाध्यापक, मानो किसी को डराना चाहता हो।
"छोड़ो अपने निकोलस को!..." कूबड़ वाले काने ने चिल्लाया जो जापानियों की बात कर रहा था। वह हाव-भाव करने का प्रयत्न कर रहा था, किंतु जगह इतनी तंग थी कि वह और भी क्रुद्ध हो गया। "हमेशा अपना निकोलस!... वो ज़माना गया!... गया, और लौटेगा नहीं!..."
"निकोलस हो या न हो, ये काम करना ग़लत है," बूढ़े ने बिना पीछे हटे दोहराया। "इसी प्रकार खेती होती है जो सबका पेट भरती है। किंतु चोरों को पालना, यह हमारा काम नहीं।"
"कौन कहता है कि चोरों को पालना है? कोई चोर का साथी नहीं बनेगा। चोरों की बात करते हो, पता नहीं तुम ख़ुद तो नहीं पाल रहे!" काने ने बूढ़े के बेटे का संकेत दिया जो दस वर्ष पहले कहीं भाग गया था। "यहाँ दो तरह की तौल चाहिए! इस जवान ने छह वर्ष लड़ाई की है... और एक तरबूज़ चखने से बेकार हो गया?..."
"पर चुराना क्यों?..." किसी ने आश्चर्य से कहा। "हे भगवान, इसमें क्या बड़ी बात है?... अगर हमारे पास आता, तो एक पूरा थैला भर देता। ले, ले: हम मवेशी नहीं पाल रहे; किसी अच्छे आदमी को देना, इसमें क्या बुराई?..."
किसानों की आवाज़ों में कोई कटुता नहीं थी। अधिकांश सहमत थे: पुराने नियम अब काम नहीं करते; कुछ विशेष चाहिए।
"वे ख़ुद तय कर लें, अध्यक्ष के साथ!" किसी ने चिल्लाया। "इस मामले में हमारा कोई कहना नहीं..."
लेविंसन फिर खड़ा हुआ और मेज़ पर हाथ मारा।
"साथियो, बारी-बारी से बोलें तो बेहतर," उसने शांत किंतु स्पष्ट स्वर में कहा, ताकि सब सुन सकें। "सब एक साथ बोलेंगे तो कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा। लेकिन मोरोश्का कहाँ है?... यहाँ आओ..." उसने गंभीर मुख दिखाया और जारी रखा; सबकी आँखें उस ओर घूम गईं जहाँ संदेशवाहक खड़ा था।
"मैंने तो इसे यहीं देखा था..." मोरोश्का ने अस्पष्ट रूप से कहा।
"चलो, चलो!..." तूपोव ने उसे धक्का दिया।
मोरोश्का हिचकिचाया। लेविंसन आगे बढ़ा और, सँड़सी की भाँति, अपनी स्थिर दृष्टि से उसे भीड़ में से खींच निकाला।
संदेशवाहक किसी को नहीं देख रहा था; सिर झुकाए मेज़ की ओर चला। पसीना बह रहा था और हाथ काँप रहे थे। सैकड़ों जिज्ञासु दृष्टियाँ उस पर महसूस कर रहा था। आँखें उठाना चाहा, किंतु तुरंत गांकारेंको (刚卡连珂) का सन-जैसी कठोर दाढ़ी वाला चेहरा दिखा। नीलामकार उसे कठोरता और करुणा से देख रहा था। मोरोश्का और नहीं सह सका और खिड़की की ओर शून्य में दृष्टि गड़ा दी।
"तो, विचार-विमर्श करें," लेविंसन ने पहले की तरह शांत, किंतु इस ढंग से कहा कि बाहर वाले भी सुन सकें। "कोई बोलना चाहता है?... चलो, दादा, कुछ कहना है?..."
"यहाँ क्या कहना है?" बूढ़े ओस्ताफ़ेई ने संकोच से कहा। "हम तो बस... आपस में बात कर रहे थे..."
"इतना सीधा-सा मामला, ख़ुद तय कर लो!" किसानों ने फिर चिल्लाया।
"तो, दादा, मुझे बोलने दो..." अचानक तूपोव ने दबी हुई शक्ति से कहा, और न जाने क्यों, बूढ़े ओस्ताफ़ेई को देखते हुए, भूलवश लेविंसन को भी "दादा" कह बैठा।
तूपोव की आवाज़ में एक अवर्णनीय अधिकार था जिसने सभी सिरों को उसकी ओर मोड़ दिया। वह मेज़ के पास आया और मोरोश्का के बगल में खड़ा हो गया, अपने बड़े, मज़बूत शरीर से उसे ढँकते हुए, लेविंसन को छिपाते हुए।
"हम तय करें?... चिंता मत करो!..." उसने सीना ताने, भावुक क्रोध से शब्द खींचते हुए कहा। "तो हम ही तय करते हैं!..." अचानक मोरोश्का की ओर झुका और उस पर जलती दृष्टि गड़ा दी। "तू हमारा है, बोल, मोरोश्का?... एक खनिक?" उसने तनावपूर्ण, तीखे स्वर में पूछा। "गंदा ख़ून... सुचान (苏羌) की धातु!... हमारा नहीं बनना चाहता? मसखरापन करना है? खनिकों को बदनाम करना है? तो ठीक!..." उसकी आवाज़, कठोर और गूँजते कोयले की तरह, इस्पात-सा भारी स्वर फेंकती, सन्नाटे में गिरती।
मोरोश्का, चादर की तरह सफ़ेद, उसकी आँखों में एकटक देख रहा था, हृदय ऐसे डोल रहा था मानो गोली लगी हो।
"ठीक है!..." तूपोव ने दोहराया... "तो उपद्रव मचा!... देख, हमारे बिना क्या करेगा!... रही बात हमारी... इस लड़के को निकालना है!..." उसने लेविंसन से दृढ़ता से कहा।
"देखेंगे... ज़रा सँभलो, ख़राब मत करो!" दस्ते से किसी ने चिल्लाया।
"क्या?" तूपोव ने क्रुद्ध होकर एक कदम आगे बढ़ाकर पूछा।
"हे भगवान, बस करो..." एक कोने से किसी बूढ़े की नाक से निकली डरी हुई आवाज़ आई।
लेविंसन ने पीछे से उसकी आस्तीन खींची।
"तूपोव... तूपोव..." उसने धीमे स्वर में बुलाया। "थोड़ा किनारे हो जाओ, लोग दिख नहीं रहे..."
तूपोव ने अपना अंतिम तीर छोड़ दिया था; कमांडर को देखा, चकित होकर लड़खड़ाया, और शांत हो गया।
"किंतु हमें इस मूर्ख को क्यों निकालना है?" अचानक गांकारेंको ने अपना धूप में पके कुंडलों वाला सिर भीड़ से ऊपर उठाते हुए कहा। "मैं उसका बचाव नहीं करता, क्योंकि कोई व्यक्ति बिना ठिकाने के नहीं चल सकता, और उसने कुछ ग़लत किया; इसके अतिरिक्त, मैं उससे प्रतिदिन बहस करता हूँ... किंतु वह, सच कहें, एक ऐसा लड़का है जो लड़ना जानता है, और इसे नकारना नहीं चाहिए। हम उसूरी (乌苏里) के मोर्चे पर उसके साथ अग्रिम दस्ते में रहे। वह हमारा साथी है: कभी जासूसी नहीं करेगा, कभी धोखा नहीं देगा..."
"साथी..." तूपोव ने पीड़ा से बीच में टोका। "और हम उसके साथी नहीं?... एक ही खदान में खोदा... लगभग तीन महीने एक ही कोट के नीचे सोए!... और अब वह बदबूदार शैतान" — उसे अचानक चिपचिपे छिशी (企什) की याद आई —, "हमें सबक सिखाना चाहता है!..."
"यही मैं भी कहता हूँ," गांकारेंको ने तूपोव पर संदेहास्पद दृष्टि डालते हुए जारी रखा (उसे लगा कि गालियाँ उसके लिए थीं)। "ऐसे छोड़ नहीं सकते। किंतु तुरंत निकालना भी काम नहीं करेगा: हम अपने आप को नष्ट कर लेंगे। मेरा मत यह है: उसी से पूछो!..." उसने हवा में हथेली से वार किया, मानो अपना मत अन्य व्यर्थ मतों से अलग कर रहा हो।
"सही!... वह बोले!... अगर पछतावा है, वह ख़ुद कहेगा..."
तूपोव ने अपनी जगह लौटने का प्रयास किया, किंतु गलियारे के बीच में रुक गया, मोरोश्का को एकटक देखता, मानो उसे जाँच रहा हो। मोरोश्का उसे बिना इच्छा के देख रहा था, पसीने से भीगी उंगलियों से अपनी कमीज़ के बटन कुरेदता हुआ।
"बोलो, अपनी बात कहो, बोलो!..."
मोरोश्का ने लेविंसन की ओर तिरछी दृष्टि डाली।
"हाँ, मैं..." उसने धीमे स्वर में शुरू किया, किंतु शब्द नहीं मिले और चुप हो गया।
"बोलो, बोलो!" सबने उत्साहित करते हुए चिल्लाया।
"हाँ, मैं... मैंने किया..." फिर आवश्यक शब्द नहीं मिले और वह लूबोव की ओर मुड़ा... "वो तरबूज़... अगर मुझे पता होता कि ग़लत है... या मैंने बुरी नीयत से किया?... यहाँ बच्चे ऐसे ही हैं... सब जानते हैं, मैं भी ऐसा था... और जैसा तूपोव कहता है, मैं अपने सभी साथियों को... सच है, भाइयो!..." अचानक उसके सीने में कुछ फूट पड़ा; उसने छाती पकड़ी, पूरे शरीर से आगे झुका, और दोनों आँखों से गरम, नम प्रकाश फूटा... "अपने साथियों के लिए ख़ून की आख़िरी बूँद तक दे दूँगा। ऐसे... ऐसे, और ऊपर से तुम्हें बदनाम करूँ?... या क्या?!..."
बाहर से अन्य ध्वनियाँ आ रही थीं: श्नाइडेगन (式尼德庚) गाँव में कुत्ते भौंक रहे थे, लड़कियाँ गा रही थीं, पादरी के पड़ोसी से पिसाई-जैसी लयबद्ध, भारी ठक-ठक आ रही थी। घाट से, शब्द घसीटती आवाज़ें: "ओ, खींचो!"
"किंतु मैं अपने आप को कैसे दंडित करूँ?..." मोरोश्का ने पीड़ा से, किंतु पहले से अधिक दृढ़ और कम ईमानदारी से जारी रखा। "मैं केवल शपथ ले सकता हूँ... खनिक की शपथ... जो टूटती नहीं... फिर कभी कोई बुरा काम नहीं करूँगा..."
"और अगर नहीं निभा?" लेविंसन ने ध्यान से पूछा।
"अगर नहीं निभा..." मोरोश्का किसानों के सामने शर्मिंदा हुआ, मुँह सिकोड़ते हुए।
"किंतु अगर नहीं कर सका?..."
"तो... जो चाहो करो... गोली मार दो..."
"ठीक, तेरी जान!" तूपोव ने कठोरता से कहा, किंतु उसकी आँखों में अब क्रोध नहीं था, केवल एक स्नेहपूर्ण, मज़ाकिया चमक।
"ख़त्म करो!... बस हो गया!" बेंचों से लोग चिल्लाए।
"बस हो गया, आख़िरकार!" किसान, इस बात से प्रसन्न कि वह कष्टकर सभा शीघ्र समाप्त हो। "एक छोटी-सी बात पर इतनी बातें!..."
"तो, इस प्रकार तय हुआ?... कोई अन्य प्रस्ताव?..."
"सभा बंद करो, शाप दो!..." छापामार योद्धा, पहले के तनाव से प्रसन्न मनोदशा में आकर, सब एक साथ चिल्लाए। "कितनी थकान!... और कैसी भीषण भूख... आँतें लोहे की तरह मुड़ रही हैं!..."
"नहीं, रुको," लेविंसन ने शांति से हाथ उठाकर कहा, आँखें सिकोड़ते हुए।
"यह मामला सुलझ गया। अब दूसरा है..."
"और क्या?!"
"मुझे लगता है कि यह प्रस्ताव पारित करना आवश्यक है..." उसने चारों ओर देखा... "यहाँ कोई सचिव नहीं है?..." अचानक मधुर और मृदु मुस्कान दी। "छिशी, आकर लिखो... प्रस्ताव यह है: सैन्य सेवा से बाहर के खाली समय में, आवारा कुत्तों का पीछा नहीं किया जाएगा, बल्कि किसानों की कुछ सहायता की जाएगी..." उसने विश्वास के स्वर में कहा, मानो वह स्वयं विश्वास करता हो कि कोई किसानों की सहायता करेगा।
"नहीं, हमें यह नहीं चाहिए!" किसानों में से किसी ने कहा।
लेविंसन ने सोचा: "ठीक लगाया!"
"चुप... चुप!..." अन्य किसानों ने टोका। "सुनो। करने दो। हाथ घिसेंगे नहीं!..."
"लूबोव की विशेष सहायता..."
"विशेष क्यों?" किसानों ने चिल्लाया। "वह कौन-सा बड़ा आदमी है? अध्यक्ष होना कोई बड़ी बात नहीं, कोई भी बन सकता है!..."
"सभा बंद!... बिना आपत्ति!... लिख लो!..." छापामार अपनी जगहों से उठे, कमांडर की बात सुनना बंद किया और शोर मचाते हुए कमरे से बाहर निकले।
अध्याय सात: लेविंसन
लेविंसन का दस्ता पाँच सप्ताह से बिना कुछ किए, एक ही स्थान पर डेरा डाले था। घोड़े, गाड़ियाँ और रसद बढ़ गई थी। लोग बहुत अधिक सोते, संतरी भी। चिंताजनक सूचनाएँ उस आलसी शरीर को हिला नहीं पाती थीं। किंतु जब स्पष्ट हो गया कि जापानियों ने क्रीलोव्का (基里洛夫卡) छोड़ दिया है और सैकड़ों वर्स्ट की दूरी में कोई शत्रु नहीं मिला, तो उसने अपनी ही सावधानी पर हँसी।
किंतु स्तेत्सिंस्की (斯捷兹因斯基) के अतिरिक्त, किसी को लेविंसन की दुविधाओं का ज्ञान नहीं था। वह अपने विचार किसी से साझा नहीं करता, केवल "हाँ" या "नहीं" में उत्तर देता। इस प्रकार वह सबको एक विशेष रूप से सही व्यक्ति लगता, विशेषकर युवा बाक्रानोव (巴克拉诺夫) को, जो हर बात में उसकी नक़ल करता।
जब से उसे कमांडर चुना गया, कोई उसे किसी अन्य भूमिका में कल्पना नहीं कर सकता था। यदि वह बताता कि बचपन में अपने पिता को पुराने कपड़े बेचने में कैसे सहायता करता था, कि उसके पिता ने मरते दम तक धन कमाने का प्रयत्न किया किंतु चूहों से डरता था और बेसुरा वायलिन बजाता था, तो सब सोचते कि वह मज़ाक कर रहा है। किंतु लेविंसन कभी ऐसी बातें नहीं बताता था।
(1927–1929। लू शुन का अनुवाद।)