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| + | # [[#चीन और जर्मनी में पुस्तक-दहन की समानताएँ और भिन्नताएँ|पुस्तक-दहन की समानताएँ]] | ||
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| + | # [[#प्राक्कथन की मुक्ति|प्राक्कथन की मुक्ति]] | ||
| + | # [[#एक और अग्नि-चोर|एक और अग्नि-चोर]] | ||
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Latest revision as of 00:31, 10 April 2026
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वायु और चंद्रमा पर अर्ध-वार्ताएँ (准风月谈)
लू शुन (鲁迅, 1881-1936)
चीनी से हिंदी में अनुवाद।
विषय-सूची
- प्राक्कथन
- रात्रि की प्रशंसा
- धकेलना
- द्वितीय विदूषक की कला
- आकस्मिक छंद
- चमगादड़ों पर
- "गोरे की तलाशी"
- "मनोरंजन से जीवनयापन"
- चीन और जर्मनी में राष्ट्रीय सार संरक्षण
- पुस्तक-दहन की समानताएँ
- "पतित जनता" पर
- प्राक्कथन की मुक्ति
- एक और अग्नि-चोर
- ज्ञान का अधिशेष
- कविता और भविष्यवाणी
- "धकेलना" पर और
- पुराने हिसाब
प्राक्कथन
इन निबंधों को "वायु और चंद्रमा" कहने का कारण है। उस समय शंघाई के एक फ़्रांसीसी अख़बार में, जहाँ मेरे लेख प्रकाशित होते, संपादक ने मुझे चेतावनी दी कि राजनीतिक लेख न लिखूँ। तो मैंने "वायु और चंद्रमा" — अर्थात् निर्दोष, प्रकृति-संबंधी विषय — पर लिखना स्वीकार किया। किंतु "वायु और चंद्रमा" की चर्चा करते-करते भी, कलम अनायास उन बातों पर पहुँच जाती जो "वायु और चंद्रमा" नहीं थीं। इसीलिए इसका नाम "अर्ध-वार्ताएँ" — न पूर्ण "वायु-चंद्रमा", न पूर्ण राजनीति।
रात्रि की प्रशंसा
रात वह समय है जब प्रत्येक वस्तु अपना वास्तविक रूप प्रकट करती है। दिन में मुखौटे होते हैं; रात में वे उतर जाते। दिन में लोग भव्य वेशभूषा पहनते, शिष्ट मुद्राएँ धारण करते; रात को सब उतार फेंकते हैं। चोर रात में चोरी करता; प्रेमी रात में मिलते; क्रांतिकारी रात में योजना बनाते। रात अंधेरे की नहीं, सत्य की होती है।
अंधेरे से डरने वाले वही हैं जो प्रकाश में अपना असली रूप छुपाते हैं। जो सच्चे हैं, उन्हें रात से भय क्यों?
धकेलना
"धकेलना" और "खींचना" — ये दो शब्द चीनी साहित्य-आलोचना में बहुत प्रचलित हैं। जिआ दाओ (贾岛) कवि, जो "भिक्षु चंद्र-द्वार धकेलता" या "भिक्षु चंद्र-द्वार खींचता" — इन दो पंक्तियों में से किसे चुने, इस पर इतना विचार कर रहा था कि गधे पर सवार हवा में हाथ हिलाता चला जा रहा था, और हान यू (韩愈) की पालकी से टकरा गया। हान यू ने पूछा: "क्या हुआ?" जिआ दाओ ने बताया। हान यू ने कहा: "धकेलना अच्छा है।"
किंतु क्या वास्तव में "धकेलना" सदैव "खींचने" से श्रेष्ठ है? यह परिस्थिति पर निर्भर करता है। गहरी रात में मंदिर का द्वार — "धकेलना" अधिक स्वाभाविक, क्योंकि अंदर से बंद नहीं। किंतु शहर का द्वार — "खींचना" स्वाभाविक, क्योंकि बाहर से खुलता है।
साहित्य में भी ऐसा ही है। कभी ज़बरदस्ती "धकेलना" पड़ता है — पाठक को झकझोरना, जगाना; कभी धीरे-से "खींचना" — हृदय तक ले जाना। दोनों की अपनी जगह।
द्वितीय विदूषक की कला
पारंपरिक चीनी ओपेरा में, प्रमुख विदूषक (丑) के अतिरिक्त एक "द्वितीय विदूषक" भी होता है जो प्रमुख विदूषक की सहायता करता, उसकी विदूषकता को और प्रभावी बनाता। यह कला — दूसरे को चमकाने की कला — राजनीति में भी प्रचलित है। अनेक बुद्धिजीवी सत्ता के "द्वितीय विदूषक" बन जाते — उनके अत्याचारों को सौंदर्यशास्त्र और दर्शन के आवरण में ढकते, उन्हें वैध ठहराते।
चमगादड़ों पर
चमगादड़ — न पक्षी न स्तनपायी — दोनों दुनियाओं में। जब पक्षी कहें तो कहे: "मेरे पंख देखो।" जब स्तनपायी कहें तो कहे: "मेरे दाँत देखो।" ऐसे अनेक बुद्धिजीवी हैं — जब सरकार शक्तिशाली, तो सरकार के पक्ष में; जब विपक्ष उठे, तो विपक्ष के। सदैव बीच में, सदैव विजेता की ओर, सदैव सुरक्षित। किंतु अंततः किसी का भी सम्मान नहीं पाते।
"गोरे की तलाशी"
शंघाई की अंतरराष्ट्रीय बस्ती में एक विचित्र नियम: चीनी व्यक्ति की तलाशी होती, किंतु गोरे (श्वेत) व्यक्ति की नहीं। कुछ चीनी बुद्धिजीवी इसे "विदेशियों की सभ्यता" का प्रमाण मानते। किंतु वास्तव में यह विशेषाधिकार है, सभ्यता नहीं। यदि सचमुच सभ्य हों, तो किसी की भी तलाशी न लें।
(1933.)