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समाधियाँ (坟)
लू शुन (鲁迅, Lǔ Xùn, 1881–1936)
चीनी से हिंदी में अनुवाद।
खंड 1
[पिता]
म. सोरोकोव
गाँव के किनारे धूसर-हरी झाड़ियों के पीछे सूर्य मुश्किल से झिलमिला रहा था। गाँव से कुछ दूर वह नौका-पार था जो मुझे दोन नदी के उस पार ले जाने वाला था। मैं गीली रेत पर चल रहा था, जिससे भीगी-सड़ी लकड़ी जैसी गंध उठ रही थी। पगडंडी झाड़ियों में ख़रगोश के उलझे पदचिह्नों-सी बलखाती थी। फूला हुआ सिंदूरी सूर्य गाँव के उस पार कब्रिस्तान के पीछे डूब चुका था। मेरी पीठ पीछे, सूखी झाड़ी में से, विशाल धूसर गोधूलि धीरे-धीरे रेंग रही थी।
नौका किनारे बँधी थी; उसके नीचे हल्के बैंगनी रंग का जल चमक रहा था। चप्पू धीरे-धीरे हिल रहा था, और चप्पू-खूँटी चरमरा रही थी।
नाविक काई-ढके तले को खुरच रहा था, पानी बाहर उलीच रहा था। सिर उठाया, पीली तिरछी आँखों से घूरा, और बुरे मिज़ाज से, लगभग डाँटते हुए बोला:
"पार जाना है? चलो अभी। अभी निकलता हूँ।"
"क्या हम दोनों ही चल सकते हैं?"
"और कौन आएगा? कोई नहीं दिखता। चलो।"
मैं नाव में बैठा। नाविक ने रस्सी खोली, चप्पू पानी में डाला। नाव एक बार हिचकी खाकर किनारे से अलग हुई और धीरे-धीरे धारा में बहने लगी।
"तुम शहर से आए हो?" नाविक ने पूछा, बिना मेरी ओर देखे।
"हाँ।"
"शहर में अच्छा रहता होगा। यहाँ तो..." उसने सिर हिलाया।
चारों ओर शांति थी। केवल चप्पू का पानी काटना और दूर कहीं एक कुत्ते का भौंकना सुनाई देता।
"मेरा एक बेटा था," नाविक ने अचानक कहा। "युद्ध में गया। लौटा नहीं।"
मैं चुप रहा। क्या कहता?
"बीस वर्ष का था। गेहूँ जैसे बाल, माँ जैसी आँखें। उसकी माँ रोते-रोते अंधी हो गई। फिर वह भी मर गई।"
नाव दूसरे किनारे पहुँच गई। मैं उतरा। नाविक ने मेरी ओर देखा — पहली बार सीधे — और उसकी पीली आँखों में कुछ चमका, शायद आँसू, शायद सूर्य का अंतिम प्रतिबिंब।
"जाओ," उसने कहा। "भगवान तुम्हें सुरक्षित रखे।"
मैं चला गया। पीछे मुड़कर देखा — वह अभी भी वहीं खड़ा था, चप्पू पानी में, नाव किनारे से बँधी, गोधूलि में एक अकेली आकृति।
खंड 2
[विज्ञान का अध्ययन: इतिहास]
विज्ञान की इतिहास-विधि (科学史教篇) — चीन में विज्ञान का इतिहास और उसका शिक्षा में स्थान। प्राचीन काल से वर्तमान तक — बेबीलोन, मिस्र, ग्रीस, अरब — विज्ञान कैसे विकसित हुआ, यह इतिहास बताता है। ग्रीक दर्शन ने प्रकृति पर प्रश्न उठाए; अरबों ने गणित और खगोल-विज्ञान में योगदान दिया; यूरोप के पुनर्जागरण ने प्रायोगिक विधि का जन्म दिया।
खंड 3
[सांस्कृतिक विचलन]
मानव इतिहास का चरित्र (人之历史) — डार्विन, हक्सले, हेकेल की विकासवाद-धारा। जीवन की उत्पत्ति और मानव विकास। नीत्शे का अतिमानव सिद्धांत — "ईश्वर मर गया" — और शोपेनहावर की इच्छा-दर्शन। बायरन की स्वतंत्रता-काव्य और शेली का आदर्शवाद। इन सभी ने चीन के बौद्धिक जागरण को प्रभावित किया।
खंड 4
[नैतिक शक्ति का सिद्धांत]
मारा काव्य-शक्ति का सिद्धांत (摩罗诗力说) — "मारा" (शैतानी) कवियों पर। बायरन, शेली, पुश्किन, लेर्मोन्तोव, मित्स्केविच, स्लोवात्स्की, क्रासिंस्की, पेतोफ़ी — ये सब "मारा कवि" थे, विद्रोही, प्रचलित व्यवस्था के विरुद्ध, स्वतंत्रता और न्याय के गायक। लू शुन ने तर्क दिया कि चीन को भी ऐसे विद्रोही कवियों की आवश्यकता है — ऐसी आवाज़ें जो मौन समाज में गूँजें और सोई हुई आत्माओं को जगाएँ।
(1903–1925.)