Difference between revisions of "Lu Xun Complete Works/zh-de/Fan ainong"
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| − | = 范爱农 | + | = Fan Ainong (范爱农) = |
| − | {| class="wikitable" style="width:100%" | + | '''Lu Xun (鲁迅, Lǔ Xùn, 1881–1936)''' |
| − | ! style="width:50%" | | + | |
| − | ! style="width:50%" | Deutsch | + | ---- |
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| + | ! style="width: 50%; background-color: #cc0000; color: white;" | 中文(原文) | ||
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| − | | 诗 | + | | style="vertical-align: top; padding: 15px;" | |
| − | | Gedichte | + | 诗 |
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| + | 自题小像 | ||
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| + | 灵台无计逃神矢,风雨如磐黯故园。 | ||
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| + | 寄意寒星荃不察,我以我血荐轩辕。 | ||
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| + | 哀诗三首(悼范爱农) | ||
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| + | 风雨飘摇日,余怀范爱农。 | ||
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| + | 华颠萎寥落,白眼看鸡虫。 | ||
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| + | 世味秋荼苦,人间直道穷。 | ||
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| + | 奈何三月别,竟尔失畸躬! | ||
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| + | 其二 | ||
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| + | 海草国门碧,多年老异乡。 | ||
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| + | 狐狸方去穴,桃偶已登场。 | ||
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| + | 故里寒云黑,炎天凛夜长。 | ||
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| + | 独沉清冷水,能否涤愁肠? | ||
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| + | 其三 | ||
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| + | 把酒论当世,先生小酒人。 | ||
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| + | 此别成终古,从兹绝绪言。 | ||
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| + | 故人云散尽,我亦等轻尘! | ||
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| + | 广平谨案:以上录自《新苗》第十三册,上遂先生《怀旧》中。后《宇宙风》第六十七期,知堂先生的《关于范爱农》所录诗三首,题云《哀范君三章》,其中有数字略异:如第一首竟作遽;第二首已作尽,寒作彤,黑作恶,冷作冽,涤作洗;第三首茗艼作酩酊,成终作终成。而第三首本已登于《集外集》,但因“此别……”二句不同,故仍重载。《关于范爱农》文中云:“题目下原署真姓名,涂改为黄棘二字。稿后附书四行,其文云: | ||
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| + | ‘我于爱农之死为之不怡累日,至今未能释然。昨忽成诗三章,随手写之,而忽将鸡虫做入,真是奇绝妙绝,辟历一声。……今录上,希大鉴定家鉴定,如不恶乃可登诸《民兴》也。天下虽未必仰望已久,然我亦岂能已于言乎。二十三日,树又言。’” | ||
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| + | 赠邬其山 | ||
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| + | 廿年居上海,每日见中华。 | ||
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| + | 有病不求药,无聊才读书。 | ||
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| + | 一阔脸就变,所砍头渐多。 | ||
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| + | 忽而又下野,南无阿弥陀。 | ||
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| + | 大江日夜向东流,聚义群雄又远游。 | ||
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| + | 六代绮罗成旧梦,石头城上月如钩。 | ||
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| + | 其二 | ||
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| + | 雨花台边埋断戟,莫愁湖里余微波。 | ||
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| + | 扶桑正是秋光好,枫叶如丹照嫩寒。 | ||
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| + | 却折垂杨送归客,心随东棹忆华年。 | ||
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| + | 无题 | ||
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| + | 偶成 | ||
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| + | 文章如土欲何之,翘首东云惹梦思。 | ||
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| + | 赠蓬子 | ||
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| + | 蓦地飞仙降碧空,云车双辆挈灵童。 | ||
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| + | 可怜蓬子非天子,逃去逃来吸北风。 | ||
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| + | 一二八战后作 | ||
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| + | 战云暂敛残春在,重炮清歌两寂然。 | ||
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| + | 我亦无诗送归棹,但从心底祝平安。 | ||
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| + | 教授杂咏三首 | ||
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| + | 作法不自毙,悠然过四十。 | ||
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| + | 何妨赌肥头,抵当辩证法。 | ||
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| + | 其二 | ||
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| + | 可怜织女星,化为马郎妇。 | ||
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| + | 乌鹊疑不来,迢迢牛奶路。 | ||
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| + | 其三 | ||
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| + | 鸡汤代猪肉,北新遂掩门。 | ||
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| + | 所闻 | ||
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| + | 华灯照宴敞豪门,娇女严装侍玉樽。 | ||
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| + | 忽忆情亲焦土下,佯看罗袜掩啼痕。 | ||
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| + | 无题 | ||
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| + | 故乡黯黯锁玄云,遥夜迢迢隔上春。 | ||
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| + | 其二 | ||
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| + | 皓齿吴娃唱柳枝,酒阑人静暮春时。 | ||
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| + | 答客诮 | ||
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| + | 无情未必真豪杰,怜子如何不丈夫。 | ||
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| + | 知否兴风狂啸者,回眸时看小於菟。 | ||
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| + | 赠画师 | ||
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| + | 风生白下千林暗,雾塞苍天百卉殚。 | ||
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| + | 愿乞画家新意匠,只研朱墨作春山。 | ||
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| + | 题呐喊 | ||
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| + | 弄文罹文网,抗世违世情。 | ||
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| + | 积毁可销骨,空留纸上声。 | ||
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| + | 悼杨铨 | ||
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| + | 岂有豪情似旧时,花开花落两由之。 | ||
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| + | 无题 | ||
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| + | 禹域多飞将,蜗庐剩逸民。 | ||
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| + | 夜邀潭底影,玄酒颂皇仁。 | ||
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| + | 一枝清采妥湘灵,九畹贞风慰独醒。 | ||
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| + | 无奈终输萧艾密,却成迁客播芳馨。 | ||
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| + | 其三 | ||
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| + | 烟水寻常事,荒村一钓徒。 | ||
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| + | 报载患脑炎戏作 | ||
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| + | 横眉岂夺蛾眉冶,不料仍违众女心。 | ||
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| + | 诅咒而今翻异样,无如臣脑故如冰。 | ||
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| + | 无题 | ||
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| + | 万家墨面没蒿莱,敢有歌吟动地哀。 | ||
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| + | 心事浩茫连广宇,于无声处听惊雷。 | ||
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| + | 秋夜有感 | ||
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| + | 绮罗幕后送飞光,柏栗丛边作道场。 | ||
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| + | 望帝终教芳草变,迷阳聊饰大田荒。 | ||
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| + | 何来酪果供千佛,难得莲花似六郎。 | ||
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| + | 中夜鸡鸣风雨集,起然烟卷觉新凉。 | ||
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| + | 亥年残秋偶作 | ||
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| + | 曾惊秋肃临天下,敢遣春温上笔端。 | ||
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| + | 尘海苍茫沉百感,金风萧瑟走千官。 | ||
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| + | 老归大泽菰蒲尽,梦坠空云齿发寒。 | ||
| + | |||
| + | |||
| + | |||
| + | 竦听荒鸡偏阒寂,起看星斗正阑干。 | ||
| + | | style="vertical-align: top; padding: 15px;" | | ||
| + | Gedichte | ||
| + | |||
| + | Selbstbildnis | ||
| + | |||
| + | Dem Geist ist es unmoeglich, den goettlichen Pfeilen zu entkommen; Wind und Regen verduestern gleich Felsengewicht die alte Heimat. | ||
| + | Den kalten Sternen vertraue ich meine Gedanken an, doch das Kraut der Treue bemerkt es nicht; mit meinem Blut weihe ich mich dem Gelben Kaiser Xuanyuan. | ||
| + | |||
| + | Drei Klagegedichte (In Trauer um Fan Ainong) | ||
| + | |||
| + | I. | ||
| + | In Tagen, da Wind und Regen toben, gedenke ich Fan Ainongs. | ||
| + | Sein greises Haupt welkte einsam dahin; mit weissem Blick sah er auf Huhn und Wurm. | ||
| + | Der Geschmack der Welt ist bitter wie Herbstdisteln; der gerade Weg der Menschen fuehrt ins Elend. | ||
| + | Warum nur drei Monde getrennt, und schon hast du deine sonderbare Gestalt verloren! | ||
| + | |||
| + | II. | ||
| + | Am Meerestor wuchert Seegras, gruen; viele Jahre lebte er fremd in der Ferne. | ||
| + | Kaum waren die Fuechse aus ihrem Bau, betraten schon Holzpuppen die Buehne. | ||
| + | In der alten Heimat schwarze, kalte Wolken; in gluehender Hitze frostlange Naechte. | ||
| + | Allein versank er im kuehlen Wasser - konnte dies wohl seinen Kummer reinwaschen? | ||
| + | |||
| + | III. | ||
| + | Beim Wein ueber die heutige Welt disputierend, war der Herr ein leichter Trinker. | ||
| + | Die grosse Welt taumelt noch in Rausch; in sanfter Trunkenheit sank er selbst dahin. | ||
| + | Dieser Abschied ward zum ewigen; von nun an verstummt jedes Wort. | ||
| + | Die alten Freunde zerstreut wie Wolken - auch ich bin nur leichter Staub! | ||
| + | |||
| + | Fuer Wu Qishan | ||
| + | |||
| + | Zwanzig Jahre in Shanghai lebend, sah er taeglich China. | ||
| + | Krank, und suchte keine Arznei; gelangweilt, da las er erst Buecher. | ||
| + | Kaum ein wenig Macht, schon aendert sich das Gesicht; die abgeschlagenen Koepfe werden mehr. | ||
| + | Ploetzlich wieder Ruecktritt vom Amt - Namo Amitabha! | ||
| + | |||
| + | Ohne Titel I. | ||
| + | Tag und Nacht stroemt der grosse Fluss gen Osten; die versammelten Helden ziehen wieder in die Ferne. | ||
| + | Sechs Dynastien praechtiger Seide - ein alter Traum; ueber der Steinstadt haengt der Mond wie ein Haken. | ||
| + | |||
| + | Ohne Titel II. | ||
| + | Am Yuhuatai liegen zerbrochene Hellebarden; im Mochou-See verbleibt nur eine schwache Welle. | ||
| + | Die schoene Frau, die ich ersehne, ist nicht zu sehen; heimkehrend singe ich ein weites Lied. | ||
| + | |||
| + | Zum Abschied fuer Masuda Wataru | ||
| + | In Fuso ist schoener Herbst, Ahornblaetter rot wie Zinnober leuchten in kuehler Frische. | ||
| + | Doch ich breche eine Trauerweide zum Abschied; mein Herz folgt dem Kahn gen Osten. | ||
| + | |||
| + | Ohne Titel | ||
| + | Blut traenkt die Zentralebene und naehrt kraeftiges Gras; Frost erstarrt das weite Land, doch Fruehling blueht. | ||
| + | So viele Helden scheitern, der Ratgeber krank; Traenen am Grab des Kaisers, Kraehen im Abenddunst. | ||
| + | |||
| + | Gelegenheitsgedicht | ||
| + | Schriften wie Erde - wohin fuehren sie? Zum oestlichen Himmel blickend, wecken sie Traumgedanken. | ||
| + | Wie schade, dass der duftende Hain verarmt; Fruehlingsorchideen und Herbstchrysanthemen bluehen nicht zur gleichen Zeit. | ||
| + | |||
| + | Fuer Pengzi | ||
| + | Ploetzlich steigt eine Unsterbliche vom azurnen Himmel; ein Wolkenwagen fuehrt das Geisterkind. | ||
| + | Armer Pengzi, kein Himmelssohn; er flieht hin und her und schlueckt den Nordwind. | ||
| + | |||
| + | Nach der Schlacht vom 28. Januar | ||
| + | Kriegswolken weichen voruebergehend, ein Rest von Fruehling; schwere Geschuetze und klare Gesaenge - beide verstummt. | ||
| + | Auch ich habe kein Abschiedsgedicht; nur aus tiefstem Herzen wuensche ich Frieden. | ||
| + | |||
| + | Drei Spottverse auf Professoren | ||
| + | I. Wer das Gesetz macht, faellt nicht selbst darunter; gemuetlich lebt er ueber vierzig. | ||
| + | II. Arm, die Weberin am Stern, wurde zur Frau eines Pferdeknechts. Die Elstern kommen wohl nicht; endlos die Milchstrasse. | ||
| + | III. Die Welt hat Literatur, Maedchen volle Hueften. Huehnerbruehe statt Schweinefleisch - Beixin schloss die Tueren. | ||
| + | |||
| + | Was ich hoerte | ||
| + | Strahlendes Licht erhellt das Bankett; geschmueckte Maedchen bedienen den Jadebecher. | ||
| + | Ploetzlich erinnert sie sich an Verwandte unter verbrannter Erde; sie verbirgt die Traenenspuren. | ||
| + | |||
| + | Ohne Titel | ||
| + | I. Die alte Heimat dunkel unter schwarzen Wolken; durch die ferne Nacht getrennt vom Fruehling. Am Jahresende greift man zum Weinbecher und isst Kugelfisch. | ||
| + | II. Weisszaehnige Wu-Maedchen singen Weidenzweiglied; nach dem Wein, alles still. Alte Traeume jagen den Rausch davon; allein vor dem Lampenschatten denke ich an den Kuckuck. | ||
| + | |||
| + | Antwort auf einen tadelnden Gast | ||
| + | Ohne Gefuehl heisst nicht wahrer Held; wer sein Kind liebt, ist kein geringerer Mann. | ||
| + | Der Sturmentfacher wendet sich um und betrachtet den kleinen Tiger. | ||
| + | |||
| + | Fuer einen Maler | ||
| + | Wind erhebt sich, tausend Waelder verdunkeln sich; Nebel versperrt den Himmel, hundert Blueten vergehen. | ||
| + | Nur mit Zinnoberrot und Tusche male er einen Fruehlingsberg. | ||
| + | |||
| + | Inschrift zu Nahan | ||
| + | Wer mit Worten spielt, geraet ins Netz der Worte; wer der Welt trotzt, verstoesst gegen ihren Lauf. | ||
| + | Angehaeufter Hass kann Gebeine zersetzen; es bleibt nur der Klang auf dem Papier. | ||
| + | |||
| + | Klage um Yang Quan | ||
| + | Wo ist die Leidenschaft von einst? Blumen bluehen, Blumen fallen - beides geschehe. | ||
| + | Traenen im Regen Jiangnans, erneut um den gefallenen Helden zu weinen. | ||
| + | |||
| + | Ohne Titel | ||
| + | I. Im Reiche Yus viele fliegende Generaele; in der Schneckenbehausung nur Eremiten. Nachts den Schatten am Teichgrund einladend; mit reinem Wasser die kaiserliche Gnade preisend. | ||
| + | II. Ein Zweig edler Eleganz beschwichtigt die Xiang-Nymphe; neun Felder treuer Tugend troesten den einsam Wachenden. Gegen die Fuelle von Beifuss hilft nichts; der Verbannte verbreitet so seinen Duft. | ||
| + | III. Rauch und Wasser - alltaeglich; im oeden Dorf ein einsamer Angler. Tief in der Nacht erwacht er aus dem Rausch; nirgends Binsen und Schilf. | ||
| + | |||
| + | Gehirnentzuendung - ein Scherz | ||
| + | Meine zornigen Brauen rauben nicht den Reiz; doch ich verstosse gegen den Geschmack der Damen. Ihr Fluch klingt anders; mein Gehirn bleibt kalt wie Eis. | ||
| + | |||
| + | Ohne Titel | ||
| + | Zehntausend Haeuser verduestert im Unkraut; wer wagt erderschuetternde Klagelieder? | ||
| + | Gedanken verbinden sich mit dem Kosmos; in der Stille hoert man den Donner. | ||
| + | |||
| + | Empfindungen in einer Herbstnacht | ||
| + | Hinter bestickten Vorhaengen entschwindet das Licht; am Rand von Zypressen eine Zeremonie. Der trauernde Kaiser laesst die Graeser welken; Dornen schmuecken die Brache. Woher Milchfruechte fuer tausend Buddhas? Um Mitternacht kraehen Haehne; ich zuende eine Zigarette an und spuere die Kuehle. | ||
| + | |||
| + | Im Spaetherbst des Jahres des Schweins | ||
| + | Einst erschrak ich, als der strenge Herbst die Welt erfasste; wie koennte ich Fruehlingswaerme an die Feder bringen? Im Staubmeer versinken hundert Empfindungen; im Herbstwind eilen tausend Beamte. Alt kehre ich zum Sumpf zurueck, Binsen verbraucht; im Traum falle ich durch leere Wolken. Gespannt lausche ich dem Hahnenschrei - alles still; die Sterne stehen klar am Horizont. | ||
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Latest revision as of 05:09, 24 April 2026
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Fan Ainong (范爱农)
Lu Xun (鲁迅, Lǔ Xùn, 1881–1936)
| 中文(原文) | Deutsch |
|---|---|
|
诗
自题小像
灵台无计逃神矢,风雨如磐黯故园。
寄意寒星荃不察,我以我血荐轩辕。
哀诗三首(悼范爱农)
风雨飘摇日,余怀范爱农。
华颠萎寥落,白眼看鸡虫。
世味秋荼苦,人间直道穷。
奈何三月别,竟尔失畸躬!
其二
海草国门碧,多年老异乡。
狐狸方去穴,桃偶已登场。
故里寒云黑,炎天凛夜长。
独沉清冷水,能否涤愁肠?
其三
把酒论当世,先生小酒人。
大圜犹茗艼,微醉自沉沦。
此别成终古,从兹绝绪言。
故人云散尽,我亦等轻尘!
广平谨案:以上录自《新苗》第十三册,上遂先生《怀旧》中。后《宇宙风》第六十七期,知堂先生的《关于范爱农》所录诗三首,题云《哀范君三章》,其中有数字略异:如第一首竟作遽;第二首已作尽,寒作彤,黑作恶,冷作冽,涤作洗;第三首茗艼作酩酊,成终作终成。而第三首本已登于《集外集》,但因“此别……”二句不同,故仍重载。《关于范爱农》文中云:“题目下原署真姓名,涂改为黄棘二字。稿后附书四行,其文云:
‘我于爱农之死为之不怡累日,至今未能释然。昨忽成诗三章,随手写之,而忽将鸡虫做入,真是奇绝妙绝,辟历一声。……今录上,希大鉴定家鉴定,如不恶乃可登诸《民兴》也。天下虽未必仰望已久,然我亦岂能已于言乎。二十三日,树又言。’”
赠邬其山
廿年居上海,每日见中华。
有病不求药,无聊才读书。
一阔脸就变,所砍头渐多。
忽而又下野,南无阿弥陀。
无题
大江日夜向东流,聚义群雄又远游。
六代绮罗成旧梦,石头城上月如钩。
其二
雨花台边埋断戟,莫愁湖里余微波。
所思美人不可见,归忆江天发浩歌。
送增田涉君归国
扶桑正是秋光好,枫叶如丹照嫩寒。
却折垂杨送归客,心随东棹忆华年。
无题
血沃中原肥劲草,寒凝大地发春华。
英雄多故谋夫病,泪洒崇陵噪暮鸦。
偶成
文章如土欲何之,翘首东云惹梦思。
所恨芳林寥落甚,春兰秋菊不同时。
赠蓬子
蓦地飞仙降碧空,云车双辆挈灵童。
可怜蓬子非天子,逃去逃来吸北风。
一二八战后作
战云暂敛残春在,重炮清歌两寂然。
我亦无诗送归棹,但从心底祝平安。
教授杂咏三首
作法不自毙,悠然过四十。
何妨赌肥头,抵当辩证法。
其二
可怜织女星,化为马郎妇。
乌鹊疑不来,迢迢牛奶路。
其三
世界有文学,少女多丰臀。
鸡汤代猪肉,北新遂掩门。
所闻
华灯照宴敞豪门,娇女严装侍玉樽。
忽忆情亲焦土下,佯看罗袜掩啼痕。
无题
故乡黯黯锁玄云,遥夜迢迢隔上春。
岁暮何堪再惆怅,且持卮酒食河豚。
其二
皓齿吴娃唱柳枝,酒阑人静暮春时。
无端旧梦驱残醉,独对灯阴忆子规。
答客诮
无情未必真豪杰,怜子如何不丈夫。
知否兴风狂啸者,回眸时看小於菟。
赠画师
风生白下千林暗,雾塞苍天百卉殚。
愿乞画家新意匠,只研朱墨作春山。
题呐喊
弄文罹文网,抗世违世情。
积毁可销骨,空留纸上声。
悼杨铨
岂有豪情似旧时,花开花落两由之。
何期泪洒江南雨,又为斯民哭健儿。
无题
禹域多飞将,蜗庐剩逸民。
夜邀潭底影,玄酒颂皇仁。
其二
一枝清采妥湘灵,九畹贞风慰独醒。
无奈终输萧艾密,却成迁客播芳馨。
其三
烟水寻常事,荒村一钓徒。
深宵沉醉起,无处觅菰蒲。
报载患脑炎戏作
横眉岂夺蛾眉冶,不料仍违众女心。
诅咒而今翻异样,无如臣脑故如冰。
无题
万家墨面没蒿莱,敢有歌吟动地哀。
心事浩茫连广宇,于无声处听惊雷。
秋夜有感
绮罗幕后送飞光,柏栗丛边作道场。
望帝终教芳草变,迷阳聊饰大田荒。
何来酪果供千佛,难得莲花似六郎。
中夜鸡鸣风雨集,起然烟卷觉新凉。
亥年残秋偶作
曾惊秋肃临天下,敢遣春温上笔端。
尘海苍茫沉百感,金风萧瑟走千官。
老归大泽菰蒲尽,梦坠空云齿发寒。
竦听荒鸡偏阒寂,起看星斗正阑干。 |
Gedichte Selbstbildnis Dem Geist ist es unmoeglich, den goettlichen Pfeilen zu entkommen; Wind und Regen verduestern gleich Felsengewicht die alte Heimat. Den kalten Sternen vertraue ich meine Gedanken an, doch das Kraut der Treue bemerkt es nicht; mit meinem Blut weihe ich mich dem Gelben Kaiser Xuanyuan. Drei Klagegedichte (In Trauer um Fan Ainong) I. In Tagen, da Wind und Regen toben, gedenke ich Fan Ainongs. Sein greises Haupt welkte einsam dahin; mit weissem Blick sah er auf Huhn und Wurm. Der Geschmack der Welt ist bitter wie Herbstdisteln; der gerade Weg der Menschen fuehrt ins Elend. Warum nur drei Monde getrennt, und schon hast du deine sonderbare Gestalt verloren! II. Am Meerestor wuchert Seegras, gruen; viele Jahre lebte er fremd in der Ferne. Kaum waren die Fuechse aus ihrem Bau, betraten schon Holzpuppen die Buehne. In der alten Heimat schwarze, kalte Wolken; in gluehender Hitze frostlange Naechte. Allein versank er im kuehlen Wasser - konnte dies wohl seinen Kummer reinwaschen? III. Beim Wein ueber die heutige Welt disputierend, war der Herr ein leichter Trinker. Die grosse Welt taumelt noch in Rausch; in sanfter Trunkenheit sank er selbst dahin. Dieser Abschied ward zum ewigen; von nun an verstummt jedes Wort. Die alten Freunde zerstreut wie Wolken - auch ich bin nur leichter Staub! Fuer Wu Qishan Zwanzig Jahre in Shanghai lebend, sah er taeglich China. Krank, und suchte keine Arznei; gelangweilt, da las er erst Buecher. Kaum ein wenig Macht, schon aendert sich das Gesicht; die abgeschlagenen Koepfe werden mehr. Ploetzlich wieder Ruecktritt vom Amt - Namo Amitabha! Ohne Titel I. Tag und Nacht stroemt der grosse Fluss gen Osten; die versammelten Helden ziehen wieder in die Ferne. Sechs Dynastien praechtiger Seide - ein alter Traum; ueber der Steinstadt haengt der Mond wie ein Haken. Ohne Titel II. Am Yuhuatai liegen zerbrochene Hellebarden; im Mochou-See verbleibt nur eine schwache Welle. Die schoene Frau, die ich ersehne, ist nicht zu sehen; heimkehrend singe ich ein weites Lied. Zum Abschied fuer Masuda Wataru In Fuso ist schoener Herbst, Ahornblaetter rot wie Zinnober leuchten in kuehler Frische. Doch ich breche eine Trauerweide zum Abschied; mein Herz folgt dem Kahn gen Osten. Ohne Titel Blut traenkt die Zentralebene und naehrt kraeftiges Gras; Frost erstarrt das weite Land, doch Fruehling blueht. So viele Helden scheitern, der Ratgeber krank; Traenen am Grab des Kaisers, Kraehen im Abenddunst. Gelegenheitsgedicht Schriften wie Erde - wohin fuehren sie? Zum oestlichen Himmel blickend, wecken sie Traumgedanken. Wie schade, dass der duftende Hain verarmt; Fruehlingsorchideen und Herbstchrysanthemen bluehen nicht zur gleichen Zeit. Fuer Pengzi Ploetzlich steigt eine Unsterbliche vom azurnen Himmel; ein Wolkenwagen fuehrt das Geisterkind. Armer Pengzi, kein Himmelssohn; er flieht hin und her und schlueckt den Nordwind. Nach der Schlacht vom 28. Januar Kriegswolken weichen voruebergehend, ein Rest von Fruehling; schwere Geschuetze und klare Gesaenge - beide verstummt. Auch ich habe kein Abschiedsgedicht; nur aus tiefstem Herzen wuensche ich Frieden. Drei Spottverse auf Professoren I. Wer das Gesetz macht, faellt nicht selbst darunter; gemuetlich lebt er ueber vierzig. II. Arm, die Weberin am Stern, wurde zur Frau eines Pferdeknechts. Die Elstern kommen wohl nicht; endlos die Milchstrasse. III. Die Welt hat Literatur, Maedchen volle Hueften. Huehnerbruehe statt Schweinefleisch - Beixin schloss die Tueren. Was ich hoerte Strahlendes Licht erhellt das Bankett; geschmueckte Maedchen bedienen den Jadebecher. Ploetzlich erinnert sie sich an Verwandte unter verbrannter Erde; sie verbirgt die Traenenspuren. Ohne Titel I. Die alte Heimat dunkel unter schwarzen Wolken; durch die ferne Nacht getrennt vom Fruehling. Am Jahresende greift man zum Weinbecher und isst Kugelfisch. II. Weisszaehnige Wu-Maedchen singen Weidenzweiglied; nach dem Wein, alles still. Alte Traeume jagen den Rausch davon; allein vor dem Lampenschatten denke ich an den Kuckuck. Antwort auf einen tadelnden Gast Ohne Gefuehl heisst nicht wahrer Held; wer sein Kind liebt, ist kein geringerer Mann. Der Sturmentfacher wendet sich um und betrachtet den kleinen Tiger. Fuer einen Maler Wind erhebt sich, tausend Waelder verdunkeln sich; Nebel versperrt den Himmel, hundert Blueten vergehen. Nur mit Zinnoberrot und Tusche male er einen Fruehlingsberg. Inschrift zu Nahan Wer mit Worten spielt, geraet ins Netz der Worte; wer der Welt trotzt, verstoesst gegen ihren Lauf. Angehaeufter Hass kann Gebeine zersetzen; es bleibt nur der Klang auf dem Papier. Klage um Yang Quan Wo ist die Leidenschaft von einst? Blumen bluehen, Blumen fallen - beides geschehe. Traenen im Regen Jiangnans, erneut um den gefallenen Helden zu weinen. Ohne Titel I. Im Reiche Yus viele fliegende Generaele; in der Schneckenbehausung nur Eremiten. Nachts den Schatten am Teichgrund einladend; mit reinem Wasser die kaiserliche Gnade preisend. II. Ein Zweig edler Eleganz beschwichtigt die Xiang-Nymphe; neun Felder treuer Tugend troesten den einsam Wachenden. Gegen die Fuelle von Beifuss hilft nichts; der Verbannte verbreitet so seinen Duft. III. Rauch und Wasser - alltaeglich; im oeden Dorf ein einsamer Angler. Tief in der Nacht erwacht er aus dem Rausch; nirgends Binsen und Schilf. Gehirnentzuendung - ein Scherz Meine zornigen Brauen rauben nicht den Reiz; doch ich verstosse gegen den Geschmack der Damen. Ihr Fluch klingt anders; mein Gehirn bleibt kalt wie Eis. Ohne Titel Zehntausend Haeuser verduestert im Unkraut; wer wagt erderschuetternde Klagelieder? Gedanken verbinden sich mit dem Kosmos; in der Stille hoert man den Donner. Empfindungen in einer Herbstnacht Hinter bestickten Vorhaengen entschwindet das Licht; am Rand von Zypressen eine Zeremonie. Der trauernde Kaiser laesst die Graeser welken; Dornen schmuecken die Brache. Woher Milchfruechte fuer tausend Buddhas? Um Mitternacht kraehen Haehne; ich zuende eine Zigarette an und spuere die Kuehle. Im Spaetherbst des Jahres des Schweins Einst erschrak ich, als der strenge Herbst die Welt erfasste; wie koennte ich Fruehlingswaerme an die Feder bringen? Im Staubmeer versinken hundert Empfindungen; im Herbstwind eilen tausend Beamte. Alt kehre ich zum Sumpf zurueck, Binsen verbraucht; im Traum falle ich durch leere Wolken. Gespannt lausche ich dem Hahnenschrei - alles still; die Sterne stehen klar am Horizont. |