Difference between revisions of "Lu Xun Complete Works/zh-ja/Wuchang"
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<div style="background-color: #003399; color: white; padding: 12px 15px; margin: 0 0 20px 0; border-radius: 4px; font-size: 1.1em;"> | <div style="background-color: #003399; color: white; padding: 12px 15px; margin: 0 0 20px 0; border-radius: 4px; font-size: 1.1em;"> | ||
| − | <span style="font-weight: bold;"> | + | <span style="font-weight: bold;">Languages:</span> [[Lu_Xun_Complete_Works/zh/Wuchang|<span style="color: #FFD700;">ZH</span>]] · [[Lu_Xun_Complete_Works/en/Wuchang|<span style="color: #FFD700;">EN</span>]] · [[Lu_Xun_Complete_Works/de/Wuchang|<span style="color: #FFD700;">DE</span>]] · [[Lu_Xun_Complete_Works/fr/Wuchang|<span style="color: #FFD700;">FR</span>]] · [[Lu_Xun_Complete_Works/es/Wuchang|<span style="color: #FFD700;">ES</span>]] · [[Lu_Xun_Complete_Works/it/Wuchang|<span style="color: #FFD700;">IT</span>]] · [[Lu_Xun_Complete_Works/ru/Wuchang|<span style="color: #FFD700;">RU</span>]] · [[Lu_Xun_Complete_Works/ar/Wuchang|<span style="color: #FFD700;">AR</span>]] · [[Lu_Xun_Complete_Works/hi/Wuchang|<span style="color: #FFD700;">HI</span>]] · [[Lu_Xun_Complete_Works/ja/Wuchang|<span style="color: #FFD700;">JA</span>]]<br/> |
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</div> | </div> | ||
| − | = | + | = 无常 / 無常 = |
| − | ''' | + | '''魯迅 (鲁迅, ルーシュン, 1881-1936)''' |
| + | |||
| + | 中日対照翻訳。 | ||
---- | ---- | ||
| − | {| class="wikitable" style="width: 100% | + | === 第1節 === |
| − | ! style="width: 50%; background-color: # | + | |
| − | ! style="width: 50%; background-color: # | + | {| class="wikitable" style="width:100%" |
| + | |- | ||
| + | ! style="width:50%; background-color:#f0f0f0;" | 中文 | ||
| + | ! style="width:50%; background-color:#f0f0f0;" | 日本語 | ||
|- | |- | ||
| − | | style="vertical-align: top; padding: | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | |
【一九一八年】 | 【一九一八年】 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
| − | |||
【梦】 | 【梦】 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 很多的梦,趁黄昏起哄。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 前梦才挤却大前梦时,后梦又赶走了前梦。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 【一九一八年】 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 去的前梦黑如墨,在的后梦墨一般黑; | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 去的在的仿佛都说,“看我真好颜色;” | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 【夢】 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 颜色许好,暗里不知; | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 而且不知道,说话的是谁? | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | ○ ○ ○ | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 暗里不知,身热头痛。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 你来你来!明白的梦。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 多くの夢が、黄昏に乗じて騒ぎ立てる。 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | (《新青年》第四卷第五号。) | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 【爱之神】 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 一个小娃子,展开翅子在空中, | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 一手搭箭,一手张弓, | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 前の夢が大前の夢を押しのけたばかりなのに、後の夢がまた前の夢を追い払った。 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 不知怎么一下,一箭射着前胸。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | “小娃子先生,谢你胡乱栽培! | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 但得告诉我!我应该爱谁?” | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 娃子着慌,摇头说:“唉! | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 去った前の夢は墨のように黒く、今の後の夢も墨のように黒い。 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 你是还有心胸的人,竟也说这宗话。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 你应该爱谁,我怎么知道。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 总之我的箭是放过了! | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 你要是爱谁,便没命的去爱他; | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 去ったのも今のも、どちらも言うようだ、「私の色の美しさを見よ。」 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 你要是谁也不爱,也可以没命的去自己死掉。” | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | (《新青年》第四卷第五号。) | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 【桃花】 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 色は美しいかもしれぬが、暗がりの中では知れない。 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 春雨过了,太阳又很好,随便走到园中。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 桃花开在园西,李花开在园东。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 我说,“好极了!桃花红,李花白。” | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | しかも知れない、話しているのが誰なのかも。 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | (没说,桃花不及李花白。) | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 桃花可是生了气,满面涨作“杨妃红”。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 好小子!真了得!竟能气红了面孔。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | ○ ○ ○ | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 我的话可并没得罪你,你怎的便涨红了面孔! | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 唉!花有花道理。我不懂。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | (《新青年》第四卷第五号。) | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 暗がりの中で知れず、体は熱く頭は痛む。 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 【他们的花园】 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 小娃子,卷螺发, | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 银黄面庞上还有微红,——看他意思是正要活。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 走出破大门,望见邻家: | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 来い、来い!明らかなる夢よ。 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 他们大花园里,有许多好花。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 用尽小心机,得了一朵百合; | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 又白又光明,像才下的雪。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 好生拿了回家,映着面庞,分外添出血色。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | (『新青年』第四巻第五号。) | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 苍蝇绕花飞鸣,乱在一屋子里—— | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | “偏爱这不干净花,是胡涂孩子!” | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 忙看百合花,却已有几点蝇矢。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 【愛の神】 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 看不得;舍不得。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 瞪眼望天空,他更无话可说。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 说不出话,想起邻家: | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 他们大花园里,有许多好花。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 一人の小さな子供が、翼を広げて空中に、 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | (《新青年》第五卷第一号。) | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 【人与时】 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 一人说,将来胜过现在。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 一人说,现在远不及从前。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 一人说,什么? | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 一手に矢をつがえ、一手に弓を引く。 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 时道,你们都侮辱我的现在。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 从前好的,自己回去。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 将来好的,跟我前去。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 这说什么的, | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 我不知你说什么。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | どうしたわけか、一矢が胸に射ささった。 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | (《新青年》第五卷第一号。) | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 【渡河与引路】 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 玄同兄: | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 两日前看见《新青年》五卷二号通信里面,兄有唐俟也不反对Esperanto,以及可以一齐讨论的话;我于Esperanto固不反对,但也不愿讨论;因为我的赞成Esperanto的理由,十分简单,还不能开口讨论。 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 「小さなお方、でたらめなお導きに感謝いたします! | ||
| − | + | しかしお教えください!私は誰を愛すべきでしょう?」 | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| + | 要问赞成的理由,便只是依我看来,人类将来总当有一种共同的言语;所以赞成Esperanto。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 子供は慌てて、首を振って言った。「ああ! | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 至于将来通用的是否Esperanto,却无从断定。大约或者便从Esperanto改良,更加圆满;或者别有一种更好的出现;都未可知。但现在既是只有这Esperanto,便只能先学这Esperanto。现在不过草创时代,正如未有汽船,便只好先坐独木小舟;倘使因为豫料将来当有汽船,便不造独木小舟,或不坐独木小舟,那便连汽船也不会发明,人类也不能渡水了。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | あなたはまだ心胸のある人なのに、こんなことを言うとは。 | ||
| − | + | あなたが誰を愛すべきかなど、私にわかるはずがない。 | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | とにかく私の矢は放ったのだ! | |
| − | + | あなたが誰かを愛したいなら、命がけで愛しなさい。 | |
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 然问将来何以必有一种人类共通的言语,却不能拿出确凿证据。说将来必不能有的,也是如此。所以全无讨论的必要;只能各依自己所信的做去就是了。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | あなたが誰も愛さないなら、命がけで自分で死ぬがよい。」 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 但我还有一个意见,以为学Esperanto是一件事,学Esperanto的精神,又是一件事。——白话文学也是如此。——倘若思想照旧,便仍然换牌不换货;才从“四目仓圣”面前爬起,又向“柴明华先师”脚下跪倒;无非反对人类进步的时候,从前是说no,现在是说ne;从前写作“咈哉”,现在写作“不行”罢了。所以我的意见,以为灌输正当的学术文艺,改良思想,是第一事;讨论Esperanto,尚在其次,至于辩难驳诘,更可一笔勾消。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | (『新青年』第四巻第五号。) | ||
| − | + | 【桃花】 | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | 春雨が過ぎて、太陽がまたとても好い。ぶらぶらと庭に歩いて行った。 | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | 桃の花は庭の西に咲き、李の花は庭の東に咲いている。 | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | 私は言った。「素晴らしい!桃の花は紅く、李の花は白い。」 | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| + | 《新青年》里的通信,现在颇觉发达。读者也都喜看。但据我个人意见,以为还可酌减;只须将诚恳切实的讨论,按期登载;其他不负责任的随口批评,没有常识的问难;至多只要答他一回,此后便不必多说,省出纸墨,移作别用。例如见鬼,求仙,打脸之类,明明白白全是毫无常识的事情,《新青年》却还和他们反复辩论,对他们说“二五得一十”的道理,这功夫岂不可惜,这事业岂不可怜。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | (桃の花が李の花ほど白くないとは言わなかった。) | ||
| − | + | ところが桃の花が怒ったらしく、顔中を「楊妃紅」に染め上げた。 | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | いい度胸だ!たいしたものだ!怒って顔を紅くするとは。 | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| + | 我看《新青年》的内容,大略不外两类:一是觉得空气闭塞污浊,吸这空气的人,将要完结了;便不免皱一皱眉,说一声“唉”。希望同感的人,因此也都注意,开辟一条活路。假如有人说这脸色声音,没有妓女的眉眼一般好看,唱小调一般好听,那是极确的真话;我们不必和他分辩,说是皱眉叹气,更为好看。和他分辩,我们就错了。一是觉得历来所走的路,万分危险,而且将到尽头;于是凭着良心,切实寻觅,看见别一条平坦有希望的路,便大叫一声说:“这边走好。”希望同感的人,因此转身,脱了危险,容易进步。假如有人偏向别处走,再劝一番,固无不可;但若仍旧不信,便不必拚命去拉,各走自己的路。因为拉得打架,不独于他无益,连自己和同感的人,也都耽搁了工夫。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 私の言葉は別にお前に失礼をしたわけではない。どうして顔を赤くするのだ! | ||
| − | + | ああ!花には花の道理がある。私にはわからぬ。 | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | (『新青年』第四巻第五号。) | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | 【彼らの花園】 | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | 小さな子供、巻き毛で、 | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | 銀黄色の顔にはまだほんのり紅みがある——見たところまさに生きようとしている。 | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | 壊れた大門を出て、隣家を眺めると、 | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| + | 耶稣说,见车要翻了,扶他一下。Nietzsche说,见车要翻了,推他一下。我自然是赞成耶稣的话;但以为倘若不愿你扶,便不必硬扶,听他罢了。此后能够不翻,固然很好,倘若终于翻倒,然后再来切切实实的帮他抬。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 彼らの大きな花園に、たくさんの美しい花がある。 | ||
| − | + | 小さな知恵を絞って、百合の花を一輪手に入れた。 | |
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| + | 老兄,硬扶比抬更为费力,更难见效。翻后再抬比将翻便扶,于他们更为有益。 | ||
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| + | 白くて光り輝いて、降りたての雪のよう。 | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 唐俟。十一月四日。 | ||
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| − | + | (《新青年》第五卷第五号。) | |
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| − | + | 【】 | |
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| − | + | 【第五卷】 | |
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| − | + | 【声无哀乐论】 | |
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| − | + | 有秦客问于东野主人曰:“闻之前论曰:治世之音安以乐,亡国之音哀以思。夫治乱在政,而音声应之。故哀思之情,表于金石。安乐之象,形于管弦也。又仲尼闻韶,识虞舜之德;季札听弦,识 黄本作知 众国之风。斯已然之事,先贤所不疑也。今子独以为声无哀乐,其理何居?若有嘉讯 各本讯下有今字 ,请闻其说。”主人应之曰:“斯义久滞,莫肯拯救。故令 各本作念。二张本有注云或作令 历世,滥于名实。今蒙启导,将言其一隅焉。夫天地合德,万物资 各本讹贵 生。寒暑代往,五行以成 各本成下有故字。旧校亦加。案:无者为长 。章为五色,发为五音。音声之作,其犹臭味在于天地之间。其善与不善,虽遭 各本遭下有遇字 浊乱,其体自若,而无 各本作不 变也。岂以爱憎易操,哀乐改度哉?及宫商集比 各本讹化 ,声音克谐。此人心至愿,情欲之所钟。古人知情不可恣,欲不可极,故 各本字夺。旧校亦删 因其所用每为之节。使哀不至伤,乐不至淫。因事与名,物有其号。哭谓之哀,歌谓之乐 各本以上十六字夺。旧校亦删 。斯其大较也。然乐云乐云,钟鼓云乎哉?哀云哀云,哭泣云乎哉?因兹而言,玉帛非礼敬之实,歌舞 字从旧校。案当作哭 非悲哀 疑当作哀乐 之主也。何以明之?夫殊方异俗,歌哭 《世说新语·文学篇》注引作笑 不同;使错而用之,或闻哭而欢,或听歌而戚 各本作感 。然其 各本作而 哀乐之怀 各本作情 均也。今用均同 原钞字夺。黄汪程本同。今据《世说》注引补,二张本作一 之情,而发万殊之声,斯非音声之无常哉 《世说》注引作乎 ?然声音和比,感人之最深者也。劳者歌其事,乐者舞其功。夫内有悲痛之心,则激哀切之言 各本作切哀,又夺之字 。言比成诗,声比成音。杂而咏之,聚而听之。心动于和声,情感于苦言。嗟叹未绝,而泣涕流涟矣。夫哀心藏于 黄汪程本于下有苦心二字。旧校亦加。二张本又于心下加之字,盖俱不当有 内,遇和声而后发;和声无象,而哀心有主。夫以有主之哀心,因乎无象之和声而后发 各本三字无。旧校亦删。案:而上当夺一字,删之甚非 ,其所觉悟,唯哀而已。岂复知吹万不同,而使其自已哉。风俗之流,遂成其政,是故国史明政教之得失,审国风之盛衰,吟咏情性,以讽其上。故曰:亡国之音哀以思也。夫喜怒哀乐,爱憎惭惧,凡此八者,生民所以接物传情,区别有属,而不可溢者也。夫味以甘苦为称,今以甲贤而心爱,以乙愚而情憎。则爱憎宜属我,而贤愚宜属彼也。可以我爱而谓之爱人,我憎则 各本作而 谓之憎人?所喜则谓之喜味,所怒则谓之怒味哉?由此言之,则外内 张燮本作内外 殊用,彼我异名。声音自当,以善恶为主,则无关于哀乐。哀乐 原钞二字夺。据各本及旧校加 自当,以情感而后发 各本无此三字。旧校亦删 ,则无系于声音。名实俱去,则尽然可见矣。且季子在鲁,采诗观礼,以别风雅。岂徒任声以决臧否哉?又仲尼闻韶,叹其一致,是以咨嗟,何必因声以知虞舜之德,然后叹美邪?今粗明其一端,亦可思过 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 大事に持ち帰り、顔に映すと、一段と血の色が増した。 | ||
| − | + | 蠅が花の周りを飛び鳴き、部屋中に乱れ回る—— | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | 「こんな不潔な花ばかり好むとは、馬鹿な子供だ!」 | |
| − | + | 急いで百合の花を見ると、もう蠅の糞が何点かついていた。 | |
| − | + | 見ていられない。捨てるに忍びない。 | |
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| − | |||
| − | + | 目を見開いて空を仰ぎ、彼にはもう言うべき言葉がなかった。 | |
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| − | + | 言葉が出ず、隣家のことを思い出す。 | |
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| − | + | 彼らの大きな花園に、たくさんの美しい花がある。 | |
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| − | + | (『新青年』第五巻第一号。) | |
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| − | + | 【人と時】 | |
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| − | + | 一人が言った。将来は現在に勝る。 | |
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| − | + | 一人が言った。現在は昔に遠く及ばない。 | |
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| − | + | 一人が言った。何だと? | |
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| − | + | 時が言った。お前たちはみな私の現在を侮辱している。 | |
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| − | + | 昔が良いなら、自分で帰れ。 | |
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| − | + | 将来が良いなら、私について前へ来い。 | |
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| − | + | この何だと言った者よ、 | |
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| − | + | お前が何を言っているのか、私にはわからぬ。 | |
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| − | + | (『新青年』第五巻第一号。) | |
| − | + | 【渡河と道案内】 | |
| − | + | 玄同兄: | |
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| − | + | 二日前、『新青年』五巻二号の通信欄で、兄が唐俟もエスペラントに反対しないこと、合わせて議論してもよいという話を見ました。私はエスペラントにもとより反対しませんが、しかし議論したくもありません。というのも、私がエスペラントに賛成する理由はきわめて簡単で、まだ口を開いて議論するほどのものではないからです。 | |
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| − | + | 賛成の理由を問われれば、ただこういうことです。私が見るところ、人類は将来きっと何かの共通の言語を持つべきである。だからエスペラントに賛成するのです。 | |
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| − | + | 将来通用するのがエスペラントかどうかは、むろん断定できません。おそらくエスペラントを改良して、より完全なものにするか、あるいは別にもっと良いものが出現するか、まだわかりません。しかし現在これしかない以上、まずこのエスペラントを学ぶしかないのです。今はまだ草創の時代で、汽船がまだなければ丸木舟に乗るしかないのと同じです。もし将来汽船ができるはずだからといって、丸木舟を造らなかったり乗らなかったりすれば、汽船も発明されず、人類は水を渡ることができなくなるでしょう。 | |
| − | |||
| − | |||
| − | + | しかし将来なぜ必ず人類共通の言語があるかと問われれば、確たる証拠は出せません。将来必ずありえないと言う者もまた同様です。だから議論の必要はまったくなく、各自が信じるところに従って行うだけです。 | |
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| − | + | しかし私にはもう一つ意見があります。エスペラントを学ぶのは一つのことであり、エスペラントの精神を学ぶのは、また別のことだと思うのです。——白話文学もまた同様です。——もし思想が旧態のままならば、やはり看板を変えて中身を変えないのと同じです。ようやく「四目蒼聖」の前から這い上がったかと思えば、また「柴明華先師」の足元に跪くのです。人類の進歩に反対する時、以前はnoと言い、今はneと言うだけ。以前は「咈哉」と書き、今は「不行」と書くだけのことです。だから私の意見では、正当な学術文芸を注入し、思想を改良するのが第一であり、エスペラントの議論はそれに次ぐもので、弁駁に至ってはまったく不要です。 | |
| − | + | |- | |
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| + | 半矣。” | ||
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| − | + | 秦客难曰:“八方异俗,歌哭万殊,然其哀乐之情,不得不见也。夫心动于中,而声出于心。虽托之于他音,寄之于余声,善听察者,要自觉之不使得过也。昔伯牙理琴,而钟子知其所至 各本作志 ;隶人击磬,而子产识其心哀;鲁人晨哭,而颜渊察 各本作审 其生离;夫数子者,岂复假智于常音,借验于曲度哉?心戚者则形为之动,情悲者则声为之哀。此自然相应,不可得逃。唯神明者能精之耳。夫能者不以声众为难,不能者不以声寡为易。今不可以未遇善听,而谓之声无可察之理;见方俗之多变,而谓声音无哀乐也。又云:贤不宜言爱,愚不宜言憎。然则有贤然后爱生,有愚然后憎起 各本作成 ,但不当其共 各本二字倒 名耳。哀乐之作,亦有由而然。此为声使我哀,音使我乐也。苟哀乐由声,更为有实,何得名实俱去邪?又云:季札 原作体,因札讹礼,礼又为礼而讹也,今正各本作子 采诗观礼,以别风雅;仲尼叹韶音之一致,是以咨嗟;是何言与?且师襄奏 黄汪二张本讹奉。下诸奏字同。程本不误 操,而仲尼睹文王之容;师涓进曲,而子野识亡国之音。宁复讲诗而后下言,习礼然后立评哉?斯皆神妙独见,不待留闻积日,而已综 原钞作终。据各本及旧校改 其吉凶矣。是以前史以为美谈。今子以区区之近知,齐所见而为限;无乃诬前贤之识微,负夫子之妙察邪?” | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 『新青年』の通信欄は、近頃だいぶ発達してきたようです。読者も好んで読みます。しかし私の個人的な意見では、もう少し減らしてもよいと思います。誠実で切実な議論だけを毎号掲載すればよい。その他の無責任な口先だけの批評や、常識のない問難には、せいぜい一度だけ答えればよく、それ以後は多くを語る必要はなく、紙とインクを節約して他に回すべきです。たとえば幽霊を見たとか、仙人を求めるとか、顔を打つとかいった類は、明々白々、まったく常識のないことなのに、『新青年』はなおも彼らと反復して論じ、「二五は十である」という道理を説いている。この手間は惜しくないか、この事業は哀れではないか。 | ||
| − | + | 私の見るところ、『新青年』の内容は大略二類に出ない。一つは、空気が閉塞し汚濁していて、この空気を吸う人間はもうおしまいだと感じ、眉を顰めて「ああ」と一声嘆かずにはいられない。同感の人々がこれによって注意を払い、活路を切り開くことを望むのだ。もし誰かが、この顔色と声は、妓女の秋波のようには美しくなく、小唄のようには美しく聞こえないと言うなら、それはまったく正しい。我々は彼と弁論する必要はない。眉を顰めてため息をつくほうがもっと美しいなどと言えば、こちらが間違いだ。もう一つは、これまで歩んできた道がきわめて危険で、しかももう行き止まりに近いと感じ、良心に従って切実に探し求め、別の平坦で希望のある道を見つけたら、大声で「こちらに行くのがよい」と叫ぶことだ。同感の人々がこれによって身を翻し、危険を脱して進歩しやすくなることを望むのだ。もし誰かが別の方向に行こうとするなら、もう一度勧めるのも構わないが、それでも信じなければ、命がけで引き止める必要はなく、各自が自分の道を行けばよい。引き止めて喧嘩になっては、彼に益がないだけでなく、自分も同感の人々も時間を無駄にするのだから。 | |
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| − | |||
| − | + | イエスは言った。車が転覆しそうなのを見たら、支えてやれ。ニーチェは言った。車が転覆しそうなのを見たら、押してやれ。私はもちろんイエスの言葉に賛成する。しかし思うに、もし支えてもらいたくないなら、無理に支える必要はない。放っておけばよい。その後転覆しなければもちろん結構だし、もし結局ひっくり返ったなら、その時こそ切実に手を貸して起こしてやればよいのだ。 | |
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| − | + | 兄よ、無理に支えるのは起こすよりも骨が折れ、効果も見えにくい。ひっくり返ってから起こすほうが、転覆しかけた時に支えるよりも、彼らにとってより有益なのだ。 | |
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| − | + | 唐俟。十一月四日。 | |
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| − | + | (『新青年』第五巻第五号。) | |
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【】 | 【】 | ||
| − | + | 【第五巻】 | |
| − | + | 【声は哀楽なきの論】 | |
| − | + | 秦の客、東野の主人に問うて曰く、「之を前論に聞けば曰く、治世の音は安にして楽しく、亡国の音は哀にして思う、と。それ治乱は政にあり、而して音声之に応ず。故に哀思の情は金石に表れ、安楽の象は管弦に形る、と。又た仲尼、韶を聞き、虞舜の徳を識り、季札、弦を聴きて、衆国の風を識る。斯れ已然の事にして、先賢の疑わざる所なり。今、子独り以為えらく声に哀楽なしと。其の理は何くにか居る?若し嘉訊あらば、請う其の説を聞かん。」主人之に応じて曰く、「斯の義久しく滞りて、肯えて拯救する莫し。故に歴世をして名実に濫せしむ。今啓導を蒙り、将に其の一隅を言わんとす。それ天地徳を合わせ、万物生を資く。寒暑代わり往き、五行以て成る。章を五色と為し、発して五音と為す。音声の作、其れ猶お臭味の天地の間に在るがごとし。其の善と不善と、浊乱に遭うと雖も、其の体は自若にして変ずること無きなり。豈に愛憎を以て操を易え、哀楽もて度を改めんや?宮商の集比に及び、声音克く諧う。此れ人心の至願にして、情欲の鋳る所なり。古人、情の恣にすべからざるを知り、欲の極むべからざるを知る。故に其の用うる所に因りて毎に之が節を為す。哀をして傷に至らしめず、楽をして淫に至らしめず。事に因りて名を与え、物に其の号あり。哭、之を哀と謂い、歌、之を楽と謂う。斯れ其の大較なり。然れども楽と云い楽と云う、鍾鼓云うか哉?哀と云い哀と云う、哭泣云うか哉?兹に因りて言えば、玉帛は礼敬の実にあらず、歌舞は悲哀の主にあらざるなり。何を以て之を明らかにせん?それ殊方異俗にして、歌哭同じからず。錯りて之を用いしめば、或いは哭を聞きて歓び、或いは歌を聴きて戚しむ。然れども其の哀楽の懐は均しきなり。今均同の情を用いて、万殊の声を発す。斯れ音声の常なきにあらざらんや?然れども声音の和比は、人を感ぜしむるの最も深き者なり。労する者は其の事を歌い、楽しむ者は其の功を舞う。それ内に悲痛の心あれば、則ち激しく哀切の言を発す。言比して詩を成し、声比して音を成す。雑えて之を詠じ、聚めて之を聴く。心は和声に動き、情は苦言に感ず。嗟嘆未だ絶えざるに、泣涕流涟す。それ哀心は内に蔵し、和声に遇いて後に発す。和声に象なくして、哀心に主あり。それ主ある哀心を以て、象なき和声に因りて後に発すれば、其の覚悟する所は、唯だ哀のみ。豈に復た吹万の同じからざるを知りて、其をして自ら已ましめんや。風俗の流れ、遂に其の政を成す。是の故に国史は政教の得失を明らかにし、国風の盛衰を審らかにし、情性を吟詠して、以て其の上を諷す。故に曰く、亡国の音は哀にして思う、と。それ喜怒哀楽、愛憎慚懼、凡そ此の八者は、生民の以て物に接し情を伝うる所にして、区別に属あり、而して溢すべからざる者なり。それ味は甘苦を以て称と為す。今、甲の賢なるを以て心に愛し、乙の愚なるを以て情に憎む。則ち愛憎は宜しく我に属すべく、而して賢愚は宜しく彼に属すべきなり。我が愛を以て之を愛人と謂い、我が憎を以て之を憎人と謂うべけんや?喜ぶ所を以て之を喜味と謂い、怒る所を以て之を怒味と謂うべけんや?此に由りて之を言えば、則ち外内用を殊にし、彼我名を異にす。声音は自ら当に善悪を以て主と為すべく、則ち哀楽に関わり無し。哀楽は自ら当に情感ありて後に発すべく、則ち声音に系り無し。名実俱に去れば、則ち尽然として見るべし。且つ季子の魯に在りしは、詩を采り礼を観て、以て風雅を別ちしなり。豈に徒だ声に任せて以て臧否を決せんや?又た仲尼の韶を聞きしは、其の一致を嘆じしなり。是を以て咨嗟す。何ぞ必ずしも声に因りて虞舜の徳を知り、然る後に嘆美せんや?今粗ぼ其の一端を明らかにするも、亦た過半を思うべし。」 | |
| − | + | 秦の客難じて曰く、「八方の異俗にして、歌哭万殊なるも、然れども其の哀楽の情は、見ざるを得ざるなり。それ心は中に動き、声は心より出ず。之を他音に託し、之を余声に寄すと雖も、善く聴き察する者は、要ず自ら之を覚りて過ぐることを得しめざるなり。昔、伯牙琴を理め、而して鍾子其の至る所を知り、隷人磬を撃ちて、子産其の心の哀しきを識り、魯人晨に哭して、顔淵其の生離なるを察す。それ数子なる者は、豈に復た智を常音に仮り、験を曲度に借らんや?心戚しき者は則ち形之が為に動き、情悲しき者は則ち声之が為に哀し。此れ自然に相応じ、逃るるを得べからず。唯だ神明なる者のみ能く之を精しくするのみ。それ能ある者は声の衆きを以て難しとせず、能なき者は声の寡きを以て易しとせず。今、未だ善聴に遇わざるを以て声に察すべき理なしと謂うべからず、方俗の多変なるを見て声音に哀楽なしと謂うべからざるなり。又た云う、賢は宜しく愛と言うべからず、愚は宜しく憎と言うべからず、と。然らば則ち賢あって後に愛生じ、愚あって後に憎起こるも、但だ其の共の名に当たらざるのみ。哀楽の作も亦た由ありて然り。此れ声の我を哀しましめ、音の我を楽しましむるなり。苟しくも哀楽声に由れば、更に実あり。何ぞ名実俱に去るを得んや?又た云う、季札は詩を采り礼を観て以て風雅を別ち、仲尼は韶音の一致を嘆じて是を以て咨嗟す、と。是れ何の言ぞや?且つ師襄操を奏し、而して仲尼文王の容を睹る。師涓曲を進め、而して子野亡国の音を識る。寧ろ復た詩を講じて後に言を下し、礼を習いて然る後に評を立てんや?斯れ皆な神妙独見にして、留聞積日を待たずして、已に其の吉凶を綜ぶるなり。是を以て前史以て美談と為す。今、子、区区たる近知を以て、見る所を斉しくして限りと為す。乃ち前賢の識微を誣い、夫子の妙察に負くこと無きかな?」 | |
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| − | + | === 第2節 === | |
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主人答曰:“难云:虽歌哭殊万,善听察者要自觉之,不假智于常音,不借验于曲度。钟子之徒云云是也。此为心哀 各本作悲 者,虽谈笑鼓舞,情欢者,虽拊膺咨嗟,独不能御外形以自匿,诳察者于疑似也。尔为已就 四字各本作以为就令。旧校同 声音之无常,犹谓当有哀乐耳。又曰:季子听声,以知众国之风;师襄奏操,而仲尼睹文王之容。案如所云,此为文王之功德,与风俗之盛衰,皆可象之于声音。声之轻重,可移于后世,襄涓之巧,又 各本字夺 能得之于将来。若然者,三皇五帝,可不绝于今日,何独数事哉?若此果然也,则文王之操有常度,韶武之音有定数,不可杂以他变,操以余声也。则向所谓声音之无常,钟子之触类,于是乎踬矣。若音声之无常 原钞夺之字、常字。黄汪本同。据程二张本加 ,钟子之 黄汪本字夺 触类,其果然邪?则仲尼之识微,季札之善听,固亦诬矣。此皆俗儒妄记,欲神其事而追为耳。欲令天下 四字从旧校及各本 惑声音之道,不言理自。尽此而推 张燮本作惟 ,使神妙难知,恨不遇奇听于当时,慕古人而叹息 各本作自叹 。斯 二张本字无 所以大罔后生也。夫推类辨物,当先求之自然之理。理已足 黄汪二张本作定 ,然后借古义以明之耳。今未得之于心,而多恃前言以为谈证,自此以往,恐巧历不能纪耳 各本字夺 。又难云:哀乐之作,犹爱憎之由贤愚,此为声使我哀,而音使我乐。苟哀乐由声,更为有实矣。夫五色有好丑,五声有善恶,此物之自然也。至于爱与不爱,喜与不喜 原钞下三字误入下文物字下。今移正。各本夺。旧校亦删 ,人情之变,统物之理,唯止于此。然皆无豫于内,待物而成耳。至夫哀乐自以事会,先遘于心,但因和声,以自显发;故前论已明其无常,今复假此谈以正其名号耳。不谓哀乐发于声音,如爱憎之生于贤愚也。然和声之感人心,亦犹醞酒 各本作酒醴 之发人性 各本作情 也。酒以甘苦为主,而醉者以喜怒为用。其见欢戚为声发,而谓声有哀乐,犹 各本字夺。旧校亦删 不可见喜怒为酒使,而谓酒有喜怒之理也。” | 主人答曰:“难云:虽歌哭殊万,善听察者要自觉之,不假智于常音,不借验于曲度。钟子之徒云云是也。此为心哀 各本作悲 者,虽谈笑鼓舞,情欢者,虽拊膺咨嗟,独不能御外形以自匿,诳察者于疑似也。尔为已就 四字各本作以为就令。旧校同 声音之无常,犹谓当有哀乐耳。又曰:季子听声,以知众国之风;师襄奏操,而仲尼睹文王之容。案如所云,此为文王之功德,与风俗之盛衰,皆可象之于声音。声之轻重,可移于后世,襄涓之巧,又 各本字夺 能得之于将来。若然者,三皇五帝,可不绝于今日,何独数事哉?若此果然也,则文王之操有常度,韶武之音有定数,不可杂以他变,操以余声也。则向所谓声音之无常,钟子之触类,于是乎踬矣。若音声之无常 原钞夺之字、常字。黄汪本同。据程二张本加 ,钟子之 黄汪本字夺 触类,其果然邪?则仲尼之识微,季札之善听,固亦诬矣。此皆俗儒妄记,欲神其事而追为耳。欲令天下 四字从旧校及各本 惑声音之道,不言理自。尽此而推 张燮本作惟 ,使神妙难知,恨不遇奇听于当时,慕古人而叹息 各本作自叹 。斯 二张本字无 所以大罔后生也。夫推类辨物,当先求之自然之理。理已足 黄汪二张本作定 ,然后借古义以明之耳。今未得之于心,而多恃前言以为谈证,自此以往,恐巧历不能纪耳 各本字夺 。又难云:哀乐之作,犹爱憎之由贤愚,此为声使我哀,而音使我乐。苟哀乐由声,更为有实矣。夫五色有好丑,五声有善恶,此物之自然也。至于爱与不爱,喜与不喜 原钞下三字误入下文物字下。今移正。各本夺。旧校亦删 ,人情之变,统物之理,唯止于此。然皆无豫于内,待物而成耳。至夫哀乐自以事会,先遘于心,但因和声,以自显发;故前论已明其无常,今复假此谈以正其名号耳。不谓哀乐发于声音,如爱憎之生于贤愚也。然和声之感人心,亦犹醞酒 各本作酒醴 之发人性 各本作情 也。酒以甘苦为主,而醉者以喜怒为用。其见欢戚为声发,而谓声有哀乐,犹 各本字夺。旧校亦删 不可见喜怒为酒使,而谓酒有喜怒之理也。” | ||
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秦客难曰:“夫观气采色,天下之通用也。心变于内,而色应于外,较然可见。故吾子不疑。夫声音,气之激者也,心应感而动,声从变而发;心有盛衰,声亦降 张燮本作隆。答文中降杀字放此 杀。同见役于一身,何独于声便当疑邪?夫喜怒章于□诊 各本作色诊。旧校同 ,哀乐亦宜形于声音。声音自当有哀乐,但暗者不能识之。至钟子之徒,虽遭无常 程本讹当 之声,则颖然独见矣。今蒙瞽面墙而不悟,离娄照秋毫于百寻,以此言之,则明暗殊能矣。不可守咫尺之度,而疑离娄之察;执中庸之听,而猜钟子之聪。皆谓古人为妄记也。” | 秦客难曰:“夫观气采色,天下之通用也。心变于内,而色应于外,较然可见。故吾子不疑。夫声音,气之激者也,心应感而动,声从变而发;心有盛衰,声亦降 张燮本作隆。答文中降杀字放此 杀。同见役于一身,何独于声便当疑邪?夫喜怒章于□诊 各本作色诊。旧校同 ,哀乐亦宜形于声音。声音自当有哀乐,但暗者不能识之。至钟子之徒,虽遭无常 程本讹当 之声,则颖然独见矣。今蒙瞽面墙而不悟,离娄照秋毫于百寻,以此言之,则明暗殊能矣。不可守咫尺之度,而疑离娄之察;执中庸之听,而猜钟子之聪。皆谓古人为妄记也。” | ||
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主人答曰:“难云:心应感而动,声从变而发,心有盛衰,乐 黄本作声 亦降杀。哀乐之情,必形于声音。钟子之徒,虽遭无常之声,则颖然独见矣。必若所言,则浊质之饱,首阳之饥,卞和之冤,伯奇之悲,相如之含怒,不赡 各本作占 之怖,祗千变百态。使各发一咏之歌,同启数弹之微,则钟子之徒,各审其情矣。尔为听声者,不以寡众易思?察情者不以大小为异?同出一身者,斯 各本讹期 于识之也。设使从下出 黄汪二张本字夺。旧校亦删。程本有 ,则子野之徒,亦当复操律鸣管,以考其音。知南风之盛衰。别雅郑之淫正也。夫食辛之与甚噱,熏目之与哀泣,同用出泪,使易牙尝之,必不言乐泪甜,而哀泪苦。斯可知矣。何者?肌液肉汗,踧笮便出,无主于哀乐,犹簁酒之囊漉,虽笮具不同,而酒味不变也。声俱一体之所出,何独当 各本二字作当独 含哀乐之理邪 黄本作也 ?且夫咸池六茎,大章韶夏,此先王之至乐,所以动天地感鬼神者也 各本二字夺 。今必云声音,莫不象其体,而传其心;此必为至乐,不可托之于瞽史,必须圣人理其弦管,尔乃雅音得全也。舜命夔击石拊石,八音克谐,神人以和。以此言之,至乐虽待圣人而作,不必圣人自执也。何者?音声有自然之和,而无系于人情。克谐之音,成于金石;至和之声,得于管弦也。无纤毫自有形可察,故离瞽以明异功耳。若以水济水,孰异之哉!” | 主人答曰:“难云:心应感而动,声从变而发,心有盛衰,乐 黄本作声 亦降杀。哀乐之情,必形于声音。钟子之徒,虽遭无常之声,则颖然独见矣。必若所言,则浊质之饱,首阳之饥,卞和之冤,伯奇之悲,相如之含怒,不赡 各本作占 之怖,祗千变百态。使各发一咏之歌,同启数弹之微,则钟子之徒,各审其情矣。尔为听声者,不以寡众易思?察情者不以大小为异?同出一身者,斯 各本讹期 于识之也。设使从下出 黄汪二张本字夺。旧校亦删。程本有 ,则子野之徒,亦当复操律鸣管,以考其音。知南风之盛衰。别雅郑之淫正也。夫食辛之与甚噱,熏目之与哀泣,同用出泪,使易牙尝之,必不言乐泪甜,而哀泪苦。斯可知矣。何者?肌液肉汗,踧笮便出,无主于哀乐,犹簁酒之囊漉,虽笮具不同,而酒味不变也。声俱一体之所出,何独当 各本二字作当独 含哀乐之理邪 黄本作也 ?且夫咸池六茎,大章韶夏,此先王之至乐,所以动天地感鬼神者也 各本二字夺 。今必云声音,莫不象其体,而传其心;此必为至乐,不可托之于瞽史,必须圣人理其弦管,尔乃雅音得全也。舜命夔击石拊石,八音克谐,神人以和。以此言之,至乐虽待圣人而作,不必圣人自执也。何者?音声有自然之和,而无系于人情。克谐之音,成于金石;至和之声,得于管弦也。无纤毫自有形可察,故离瞽以明异功耳。若以水济水,孰异之哉!” | ||
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| − | + | 主人答えて曰く、「難じて云う、歌と哭は万殊なりといえども、善く聴き察する者はおのずからこれを覚り、智を常音に仮らず、験を曲度に借りず。鍾子の徒云々是なりと。これ心に哀しむ〔各本は悲に作る〕者は、談笑鼓舞すといえども、情に歓ぶ者は、膺を拊ち咨嗟すといえども、独り外形を御して自ら匿し、察者を疑似に誑すこと能わざるなり。爾は已にして就く〔四字は各本「以為就令」に作る。旧校同じ〕声音の常なきを為し、なお哀楽有るべしと謂えり。又曰く、季子は声を聴きて以て衆国の風を知り、師襄は操を奏して仲尼は文王の容を睹たりと。案ずるに云うところの如くんば、これ文王の功徳と風俗の盛衰と、皆これを声音に象るべきなり。声の軽重は後世に移すべく、襄涓の巧はまた〔各本この字を脱す〕これを将来に得ること能くべし。もし然らば、三皇五帝は今日に絶えざるべく、何ぞ独り数事のみならんや。もしこれ果たして然りとせば、文王の操に常度あり、韶武の音に定数あり、他の変を雑え、余声を以て操すべからざるなり。則ち向に謂うところの声音の常なきこと、鍾子の触類は、ここにおいて躓くなり。もし音声に常なく〔原鈔は之の字と常の字を脱す。黄汪本同じ。程二張本に拠りて加う〕、鍾子の〔黄汪本この字を脱す〕触類、その果たして然りとせば、仲尼の微を識ること、季札の善く聴くこと、固よりまた誣なり。これみな俗儒の妄記にして、その事を神にせんと欲して追いて為せるのみ。天下をして〔四字は旧校及び各本に従う〕声音の道に惑わしめんと欲し、理の自ずから尽くるを言わず。ここより推して〔張燮本は惟に作る〕、神妙にして知り難からしめ、奇聴に当時に遇わざるを恨み、古人を慕いて嘆息せしむ〔各本は自嘆に作る〕。これ〔二張本この字なし〕所以に大いに後生を罔すなり。それ類を推し物を辨ずるには、先ず自然の理に求むべし。理已に定まりて〔黄汪二張本は定に作る〕、然る後に古義を借りて以てこれを明らかにするのみ。今未だこれを心に得ずして、多く前言に恃みて以て談証と為す。此より以往、恐らくは巧暦も紀すること能わざらん〔各本この字を脱す〕。又難じて云う、哀楽の作は、なお愛憎の賢愚に由るが如く、これ声は我をして哀しましめ、音は我をして楽しましむるなり。いやしくも哀楽声に由らば、更に実あることとなる。それ五色に好醜あり、五声に善悪あり、これ物の自然なり。愛と不愛、喜と不喜に至りては〔原鈔は下三字を誤りて下文の物字の下に入る。今移して正す。各本は脱す。旧校もまた削る〕、人情の変にして物を統ぶるの理、ただここに止まるのみ。しかれども皆内に預かるなく、物を待ちて成るのみ。それ哀楽は自ら事の会する所を以て、先ず心に遘い、ただ和声に因りて自ら顕発するなり。ゆえに前論に已にその常なきを明らかにし、今また此の談を仮りて以てその名号を正すのみ。哀楽の声音に発するを謂うにあらず、愛憎の賢愚に生ずるが如きなり。しかれども和声の人心を感ぜしむるは、なお醞酒〔各本は酒醴に作る〕の人の性〔各本は情に作る〕を発するが如きなり。酒は甘苦を主とし、酔者は喜怒を用とす。歓戚の声に発するを見て、声に哀楽ありと謂うは、なお〔各本この字を脱す。旧校もまた削る〕喜怒の酒に使われるを見て、酒に喜怒の理ありと謂うべからざるが如きなり。」 | |
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秦客难曰:“虽众喻有隐,足招攻难,然其大理,当有所就。若葛卢闻牛鸣,知其三生 各本作子下三,生字并同 为牺;师旷吹律,知南风不竞 字从旧校。各本作竟,疑原钞亦同 ,楚师必败;羊舌母听闻儿啼,而知其丧家。凡此数事,皆效于上世,是以咸见录载。推此而言,而盛衰吉凶,莫不存乎声音矣。今若复谓之诬罔,则前言往记,皆为弃物,无用之也。以言通论,未之或安。若能明斯 张燮本作其 所以,显其所由,设二论俱济,愿重闻之。” | 秦客难曰:“虽众喻有隐,足招攻难,然其大理,当有所就。若葛卢闻牛鸣,知其三生 各本作子下三,生字并同 为牺;师旷吹律,知南风不竞 字从旧校。各本作竟,疑原钞亦同 ,楚师必败;羊舌母听闻儿啼,而知其丧家。凡此数事,皆效于上世,是以咸见录载。推此而言,而盛衰吉凶,莫不存乎声音矣。今若复谓之诬罔,则前言往记,皆为弃物,无用之也。以言通论,未之或安。若能明斯 张燮本作其 所以,显其所由,设二论俱济,愿重闻之。” | ||
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主人答曰:“吾谓能反三隅者,得意而忘 各本字夺 言。是以前论略而未详。今复烦寻环之难,敢不自一竭邪。夫鲁牛能知牺历之丧生,哀三生之不存;含悲经年,诉怨葛卢。此为心与人同,异于兽形耳。此又吾之所疑也。且牛非人类,无道相通。若谓鸟 各本作鸣 兽皆能有□ 旧校灭其原字。改作祸。程本作知。他本阙 ,葛卢受性,独晓之;此为解 黄本作称 其语而论其事,犹传译异言耳。不为考声音而知其情,则非所以为难也。若为知者,为当触物而达,无所不知。今且先议其所易者。请问圣人卒入胡域,当知其所言不 各本作否 乎?难者必曰:知之。知之之理,何以明之?愿借子之难以立鉴识之域焉 各本字夺 。或当与关接,识其言邪?将吹 黄本作次 律鸣管,校其音邪?观气采色,知其心邪?此为知心,自由气色;虽自不言,犹将知之。知之之道,可不待言也。若吹律校音,以知其心。假令心志于马,而误言鹿。察者故当由鹿以知 各本讹弘 马也。此为心不系于所言,言或不足以证心也。若当关接而知言,此为孺子学言于所师,然后知之。则何贵于聪明哉。夫言非自然一定之物。五方殊俗,同事异号。趣 各本字夺 举一名,以为标 各本作摽 识耳。夫圣人穷理,谓自然可寻,无微不照。苟无微不照 各本五字无。旧校亦删 ,理蔽 原作数。据各本及旧校改 则虽近不见。故异域之言,不得强通。推 张燮本作信 此以往,葛卢之不知牛鸣,得不全乎?又难云:师旷吹律,知南风不竞,楚多死声,此又吾之所疑也。请问师旷 《北堂书钞》一百十二引作子野 吹律之时,楚国之风邪?则相去千里,声不足达;若正识楚风 各本讹国 ,来入律中邪?则楚南有吴越,北有梁宋,苟不见其原,奚以识之哉?凡阴阳愤激,然后成风;气之相感,触地而发;何得发楚庭,来入晋乎?且又律吕分四时之气耳,时至而气动,律应而灰移。皆自然相待,不假人以为用也。上生下生,所以均五声之和,叙刚柔之分也。然律有一定之声,虽冬吹中吕,其音自满而无损也。今以晋人之气,吹无韵 案:当作损 之律,楚风安得来入其中,与为盈缩邪?风无形,声与律不通,则校理之地,无取于风律,不其然乎?岂独师旷 已上四字《书钞》引作子野。案:独字当衍 博物多识 各本作多识博物 ,自有以知胜败之形,欲固众心,而托以神微 《书钞》引作徵下有者也二字 。若伯常骞之许景公寿哉。又难云:羊舌母听闻儿啼,而审其丧家。复请问何由知之?为神心独悟,暗语而当邪?尝闻儿啼,若此其大而恶,今之啼声,似昔之啼声也 各本字夺 。故知其丧家邪?若神心独悟,暗语之当,非理之所得也。虽曰 原钞日。据各本及旧校改 听啼,无取验于儿声矣。若以尝闻之声为恶,故知今啼当恶,此为以甲声为度,以校乙之啼也。夫声之于音,犹形之于心也。有形同而情乖,貌殊而心均者;何以明之?圣人齐心等德,而形状不同也。苟心同而形异,则何言乎观形而知心哉?且口之激气为声,何异于籁籥纳气而鸣邪?啼声之善恶,不由儿口吉凶,犹琴瑟之清浊,不在操者之工拙也。心能辨理善谭 各本作谈 ,而不能令内 张燮本作籁 籥调利,犹瞽者能善其曲度,而不能令器必清和也。器不假妙瞽而良,籥不因慧 黄汪程张溥本作惠 心而调。然则心之与声,明为二物。二物 各本物下有之字 诚然,则求情者不留观于形貌,揆心者不借听于声音也。察者欲因声以知心,不亦外乎?今晋母未得之于考试 各本作老成。旧校同 ,而专信昨日之声,以证今日之啼;岂不误中于前世好奇者,从而称之哉?” | 主人答曰:“吾谓能反三隅者,得意而忘 各本字夺 言。是以前论略而未详。今复烦寻环之难,敢不自一竭邪。夫鲁牛能知牺历之丧生,哀三生之不存;含悲经年,诉怨葛卢。此为心与人同,异于兽形耳。此又吾之所疑也。且牛非人类,无道相通。若谓鸟 各本作鸣 兽皆能有□ 旧校灭其原字。改作祸。程本作知。他本阙 ,葛卢受性,独晓之;此为解 黄本作称 其语而论其事,犹传译异言耳。不为考声音而知其情,则非所以为难也。若为知者,为当触物而达,无所不知。今且先议其所易者。请问圣人卒入胡域,当知其所言不 各本作否 乎?难者必曰:知之。知之之理,何以明之?愿借子之难以立鉴识之域焉 各本字夺 。或当与关接,识其言邪?将吹 黄本作次 律鸣管,校其音邪?观气采色,知其心邪?此为知心,自由气色;虽自不言,犹将知之。知之之道,可不待言也。若吹律校音,以知其心。假令心志于马,而误言鹿。察者故当由鹿以知 各本讹弘 马也。此为心不系于所言,言或不足以证心也。若当关接而知言,此为孺子学言于所师,然后知之。则何贵于聪明哉。夫言非自然一定之物。五方殊俗,同事异号。趣 各本字夺 举一名,以为标 各本作摽 识耳。夫圣人穷理,谓自然可寻,无微不照。苟无微不照 各本五字无。旧校亦删 ,理蔽 原作数。据各本及旧校改 则虽近不见。故异域之言,不得强通。推 张燮本作信 此以往,葛卢之不知牛鸣,得不全乎?又难云:师旷吹律,知南风不竞,楚多死声,此又吾之所疑也。请问师旷 《北堂书钞》一百十二引作子野 吹律之时,楚国之风邪?则相去千里,声不足达;若正识楚风 各本讹国 ,来入律中邪?则楚南有吴越,北有梁宋,苟不见其原,奚以识之哉?凡阴阳愤激,然后成风;气之相感,触地而发;何得发楚庭,来入晋乎?且又律吕分四时之气耳,时至而气动,律应而灰移。皆自然相待,不假人以为用也。上生下生,所以均五声之和,叙刚柔之分也。然律有一定之声,虽冬吹中吕,其音自满而无损也。今以晋人之气,吹无韵 案:当作损 之律,楚风安得来入其中,与为盈缩邪?风无形,声与律不通,则校理之地,无取于风律,不其然乎?岂独师旷 已上四字《书钞》引作子野。案:独字当衍 博物多识 各本作多识博物 ,自有以知胜败之形,欲固众心,而托以神微 《书钞》引作徵下有者也二字 。若伯常骞之许景公寿哉。又难云:羊舌母听闻儿啼,而审其丧家。复请问何由知之?为神心独悟,暗语而当邪?尝闻儿啼,若此其大而恶,今之啼声,似昔之啼声也 各本字夺 。故知其丧家邪?若神心独悟,暗语之当,非理之所得也。虽曰 原钞日。据各本及旧校改 听啼,无取验于儿声矣。若以尝闻之声为恶,故知今啼当恶,此为以甲声为度,以校乙之啼也。夫声之于音,犹形之于心也。有形同而情乖,貌殊而心均者;何以明之?圣人齐心等德,而形状不同也。苟心同而形异,则何言乎观形而知心哉?且口之激气为声,何异于籁籥纳气而鸣邪?啼声之善恶,不由儿口吉凶,犹琴瑟之清浊,不在操者之工拙也。心能辨理善谭 各本作谈 ,而不能令内 张燮本作籁 籥调利,犹瞽者能善其曲度,而不能令器必清和也。器不假妙瞽而良,籥不因慧 黄汪程张溥本作惠 心而调。然则心之与声,明为二物。二物 各本物下有之字 诚然,则求情者不留观于形貌,揆心者不借听于声音也。察者欲因声以知心,不亦外乎?今晋母未得之于考试 各本作老成。旧校同 ,而专信昨日之声,以证今日之啼;岂不误中于前世好奇者,从而称之哉?” | ||
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秦客难曰:“吾闻败者不羞走,所以全也。今 各本字无 吾心未厌,而言于 各本字无 难,复更从其余。今平和之人,听筝笛批把 各本作琵琶,下放此 ,则形躁而志越。闻琴瑟之音,则听静而心闲。同一器之中,曲用每殊,则情随之变。奏秦声则叹羡而慷慨,理齐楚则情一而思专,肆姣弄则欢放而欲惬。心为声变,若此其众。苟躁静由声,则何为限其哀乐?而但云至和之声,无所不感;托大同于声音,归众变于人情。得无知彼不明此哉?” | 秦客难曰:“吾闻败者不羞走,所以全也。今 各本字无 吾心未厌,而言于 各本字无 难,复更从其余。今平和之人,听筝笛批把 各本作琵琶,下放此 ,则形躁而志越。闻琴瑟之音,则听静而心闲。同一器之中,曲用每殊,则情随之变。奏秦声则叹羡而慷慨,理齐楚则情一而思专,肆姣弄则欢放而欲惬。心为声变,若此其众。苟躁静由声,则何为限其哀乐?而但云至和之声,无所不感;托大同于声音,归众变于人情。得无知彼不明此哉?” | ||
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主人答曰:“难云:批把筝笛,令人躁越。又云:曲用每殊,而情随之变。此诚 张燮本作情 所以使人常感也。批把筝笛,间促而声高,变众而节数。以高声御数节,故使 各本讹更 形躁而志越。犹铃铎警耳,而 各本字无 钟 张燮本作 鼓骇心。故闻鼓鼙之音,则 各本字无 思将帅之臣;盖以声音有大小,故动人有猛静也。琴瑟之体,间 各本讹闻 辽而音埤,变希而声清,以埤音御希变,不虚心静听,则不尽清和之极。是以听静而心闲也。夫曲度 黄本作用 不同,亦犹殊器之音耳。齐楚之曲多重,故情一;变妙,故思专。姣弄之音,挹众声之美,会五音之和,其体赡而用博,故心役 各本讹侈 于众理。五音会,故欢放而欲惬。然皆以单、复、高、埤、善、恶为体,而人情以躁静专散为应。譬犹游观于都肆,则目滥而情放;留察于曲度,则思静 各本夺已以上二十五字 而容端。此为声音之体,尽于舒疾;情之应声;亦止于 张燮本作以 躁静耳。夫曲用每殊 原钞夺已以上十五字。依各本及旧校加 ,而情之处变,犹滋味异美,而口辄识之也。五味万殊,而大同于美;曲变虽众,亦大同于和。美有甘,和有乐;然随曲之情,尽乎 黄本作于 和域;应美之口,绝于甘境。安得哀乐于其间哉?然人情不自 各本字无 同,各 各本字夺 师所解,则发其所怀。若言平和哀乐正等,则无所先发,故终得躁静。若有所发,则是有主于内,不为平和也。以此言之,躁静者,声之功也;哀乐者,情之主也;不可见声有躁静之应,因谓哀乐皆由声音也。且声音虽有猛静 黄汪二张本重有猛静字。旧校亦加。程本无 ,各有一和,和之所感,莫不自发。何以明之?夫会宾盈堂,酒酣奏琴,或忻然而欢,或惨尔而泣。非进哀于彼,导乐于此也。其音无变于昔,而欢戚并用,斯非吹万不同邪?夫唯无主于喜怒,亦应 原作未应,今正。各本夺。旧校亦删 无主于哀乐,故欢戚俱见。若资不 各本作偏 固之音,含一致之声,其所发明,各当其分。则焉能兼御群理,总发众情邪?由是言之:声音以平和为体,而感物无常;心志以所俟为主,应感而发。然则声之与心,殊途异轨,不相经纬;焉得染太和于欢戚,缀虚名于哀乐哉?” | 主人答曰:“难云:批把筝笛,令人躁越。又云:曲用每殊,而情随之变。此诚 张燮本作情 所以使人常感也。批把筝笛,间促而声高,变众而节数。以高声御数节,故使 各本讹更 形躁而志越。犹铃铎警耳,而 各本字无 钟 张燮本作 鼓骇心。故闻鼓鼙之音,则 各本字无 思将帅之臣;盖以声音有大小,故动人有猛静也。琴瑟之体,间 各本讹闻 辽而音埤,变希而声清,以埤音御希变,不虚心静听,则不尽清和之极。是以听静而心闲也。夫曲度 黄本作用 不同,亦犹殊器之音耳。齐楚之曲多重,故情一;变妙,故思专。姣弄之音,挹众声之美,会五音之和,其体赡而用博,故心役 各本讹侈 于众理。五音会,故欢放而欲惬。然皆以单、复、高、埤、善、恶为体,而人情以躁静专散为应。譬犹游观于都肆,则目滥而情放;留察于曲度,则思静 各本夺已以上二十五字 而容端。此为声音之体,尽于舒疾;情之应声;亦止于 张燮本作以 躁静耳。夫曲用每殊 原钞夺已以上十五字。依各本及旧校加 ,而情之处变,犹滋味异美,而口辄识之也。五味万殊,而大同于美;曲变虽众,亦大同于和。美有甘,和有乐;然随曲之情,尽乎 黄本作于 和域;应美之口,绝于甘境。安得哀乐于其间哉?然人情不自 各本字无 同,各 各本字夺 师所解,则发其所怀。若言平和哀乐正等,则无所先发,故终得躁静。若有所发,则是有主于内,不为平和也。以此言之,躁静者,声之功也;哀乐者,情之主也;不可见声有躁静之应,因谓哀乐皆由声音也。且声音虽有猛静 黄汪二张本重有猛静字。旧校亦加。程本无 ,各有一和,和之所感,莫不自发。何以明之?夫会宾盈堂,酒酣奏琴,或忻然而欢,或惨尔而泣。非进哀于彼,导乐于此也。其音无变于昔,而欢戚并用,斯非吹万不同邪?夫唯无主于喜怒,亦应 原作未应,今正。各本夺。旧校亦删 无主于哀乐,故欢戚俱见。若资不 各本作偏 固之音,含一致之声,其所发明,各当其分。则焉能兼御群理,总发众情邪?由是言之:声音以平和为体,而感物无常;心志以所俟为主,应感而发。然则声之与心,殊途异轨,不相经纬;焉得染太和于欢戚,缀虚名于哀乐哉?” | ||
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| − | + | 秦客難じて曰く、「それ気を観、色を采るは、天下の通用なり。心は内に変じて色は外に応ず。較然として見るべし。ゆえに吾子は疑わず。それ声音は気の激する者なり。心は感に応じて動き、声は変に従いて発す。心に盛衰あらば、声にもまた降〔張燮本は隆に作る。答文中の降殺の字をここに放つ〕殺あり。同じく一身に役せらるるに、何ぞ独り声に於いてすなわち疑うべけんや。それ喜怒は□診〔各本は色診に作る。旧校同じ〕に章かなり。哀楽もまた声音に形るべし。声音に自ずから哀楽あるべきも、ただ暗き者はこれを識ること能わざるのみ。鍾子の徒に至りては、常なき〔程本は当に訛る〕の声に遭うといえども、穎然として独り見るなり。今、蒙して瞽にして墻に面す」 | |
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秦客难曰:“论云:猛静之音,各有一和。和之所感,莫不自发。是以酒酣奏琴,而欢戚并用。此言偏并 案:当作重 之情。先积于内,故怀欢者值哀音而发,内戚者遇乐声而感也。夫声音自当有一定之哀乐,但声化迟缓,不可仓卒,不能对易。偏重之情,触物而作。故令哀乐同时而应耳。虽二情俱见,则何损于声音有定理邪?” | 秦客难曰:“论云:猛静之音,各有一和。和之所感,莫不自发。是以酒酣奏琴,而欢戚并用。此言偏并 案:当作重 之情。先积于内,故怀欢者值哀音而发,内戚者遇乐声而感也。夫声音自当有一定之哀乐,但声化迟缓,不可仓卒,不能对易。偏重之情,触物而作。故令哀乐同时而应耳。虽二情俱见,则何损于声音有定理邪?” | ||
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主人答曰:“难云:哀乐自有定声,但偏重之情,不可卒移。故怀戚者遇乐声而哀耳。即如所言,声有定分;假使《鹿鸣》重奏,是乐声也;而令戚者遇之,虽声化迟缓,但当不能便 各本作使 变令欢耳。何得更以哀邪?犹一爝之火,虽未能温一室,不宜复增其寒矣。夫火非隆寒之物,乐非增哀之具也。理弦高堂,而欢戚并用者,直至 各本讹真主 和之发滞导情,故令外物所感,得自尽耳。难云:偏重之情,触物而作,故令哀乐同时而应耳。夫言哀者,或见机 张溥本作几。汪本讹机。下机字放此 杖而泣,或睹舆服而悲。徒以感人亡而物存,痛事显而形潜。其所以会之,皆自有由,不为触地而生哀,当席而泪出也。今无 各本作见。案:因无而讹 机杖以致感,听和声而流涕者,斯非和之所感,莫不自发也。” | 主人答曰:“难云:哀乐自有定声,但偏重之情,不可卒移。故怀戚者遇乐声而哀耳。即如所言,声有定分;假使《鹿鸣》重奏,是乐声也;而令戚者遇之,虽声化迟缓,但当不能便 各本作使 变令欢耳。何得更以哀邪?犹一爝之火,虽未能温一室,不宜复增其寒矣。夫火非隆寒之物,乐非增哀之具也。理弦高堂,而欢戚并用者,直至 各本讹真主 和之发滞导情,故令外物所感,得自尽耳。难云:偏重之情,触物而作,故令哀乐同时而应耳。夫言哀者,或见机 张溥本作几。汪本讹机。下机字放此 杖而泣,或睹舆服而悲。徒以感人亡而物存,痛事显而形潜。其所以会之,皆自有由,不为触地而生哀,当席而泪出也。今无 各本作见。案:因无而讹 机杖以致感,听和声而流涕者,斯非和之所感,莫不自发也。” | ||
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秦客难曰:“论云:酒酣奏琴,而欢戚并用。欲通此言,故答以偏情,感物而发耳。今且隐心而言,明之以成效。夫人心不欢则戚,不戚则欢,此情志之大域也。然泣是戚之伤,笑是欢之用也 各本字无 。盖闻齐楚之曲者,惟睹其哀涕之容,而未曾见笑噱之貌,此必齐楚之曲,以哀为体;故其所感,皆应其度 黄本度下有量字 。岂徒以多重而少变,则致精 各本作情 壹而思专邪?若诚能致泣,则声音之有哀乐,断可知矣。” | 秦客难曰:“论云:酒酣奏琴,而欢戚并用。欲通此言,故答以偏情,感物而发耳。今且隐心而言,明之以成效。夫人心不欢则戚,不戚则欢,此情志之大域也。然泣是戚之伤,笑是欢之用也 各本字无 。盖闻齐楚之曲者,惟睹其哀涕之容,而未曾见笑噱之貌,此必齐楚之曲,以哀为体;故其所感,皆应其度 黄本度下有量字 。岂徒以多重而少变,则致精 各本作情 壹而思专邪?若诚能致泣,则声音之有哀乐,断可知矣。” | ||
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| + | === 第3節 === | ||
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主人答曰:“虽人情感 黄本讹慼 于哀乐,哀乐各有多少。又哀乐之极,不必同致也。夫小哀容 程本讹密 坏,甚悲而泣;哀之方也。小欢颜悦,至乐而笑 各本作心愉 ;乐之理也。何以言 各本作明 之?夫至亲安豫,则怡然自若 各本作恬若自然 ,所猖狂 各本作自得 也。及在危急,仅然后济,则抃不及儛。由此言之,儛之不若向之自得,岂不然哉?至夫笑噱,虽出于欢情,然自以理成;又非 各本六字夺。旧校亦删 自然应声之具也。此为乐之应声,以自得为主;哀之应感,以垂涕为故。垂涕则形动而可觉,自得则神合而无变 各本作忧 。是以观其异,而不识其同 原钞四字夺。依各本及旧校加 ;别其外,而未察其内耳。然笑噱之不显于声音,岂独齐楚之曲邪?今不求乐于自得之域,而以无笑噱谓齐楚体哀,岂不知哀而不识乐乎?” | 主人答曰:“虽人情感 黄本讹慼 于哀乐,哀乐各有多少。又哀乐之极,不必同致也。夫小哀容 程本讹密 坏,甚悲而泣;哀之方也。小欢颜悦,至乐而笑 各本作心愉 ;乐之理也。何以言 各本作明 之?夫至亲安豫,则怡然自若 各本作恬若自然 ,所猖狂 各本作自得 也。及在危急,仅然后济,则抃不及儛。由此言之,儛之不若向之自得,岂不然哉?至夫笑噱,虽出于欢情,然自以理成;又非 各本六字夺。旧校亦删 自然应声之具也。此为乐之应声,以自得为主;哀之应感,以垂涕为故。垂涕则形动而可觉,自得则神合而无变 各本作忧 。是以观其异,而不识其同 原钞四字夺。依各本及旧校加 ;别其外,而未察其内耳。然笑噱之不显于声音,岂独齐楚之曲邪?今不求乐于自得之域,而以无笑噱谓齐楚体哀,岂不知哀而不识乐乎?” | ||
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| − | + | 主人答えて曰く、「人情は哀楽に感ずといえども、哀楽にはおのおの多少あり。また哀楽の極は、必ずしも同じく致るにあらざるなり。それ小哀なれば容は壊れ、甚だ悲しければ泣く。哀の方なり。小歓なれば顔は悦び、至楽なれば笑う。楽の理なり。何を以てこれを言うか。それ至親安豫なれば、すなわち怡然として自若たり、猖狂するところなり。危急に在りて、僅かにして後に済するに及べば、すなわち抃して舞うに及ばず。これに由りてこれを言えば、舞の先の自得に若かざること、豈に然らざらんや。それ笑噱に至りては、歓情より出づといえども、然れども自ら理を以て成る。また自然に声に応ずるの具にあらざるなり。これ楽の声に応ずるは、自得を以て主と為し、哀の感に応ずるは、垂涕を以て故と為す。垂涕すれば形動きて覚るべく、自得すれば神合して変なし。ここを以てその異を観て、その同を識らず。その外を別ちて、未だその内を察せざるのみ。然れども笑噱の声音に顕れざること、豈にひとり斉楚の曲のみならんや。今楽を自得の域に求めずして、笑噱なきを以て斉楚は哀を体すと謂う、豈に哀を知りて楽を識らざるにあらずや。」 | |
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秦客问曰:“仲尼有言:移风易俗,莫善于乐。即如所论,凡百哀乐,皆不在声,则 各本作即 移风易俗,果以何物邪?又古人慎靡靡之风,抑滔 各本作慆 耳之声。故曰:放郑声,远佞人。然则郑卫之音 案:此下当有夺文 ,击鸣球以协神人,敢问郑雅之体,隆弊所极,风俗移易,奚由而济?愿 黄本作幸 重闻之,以悟所疑。” | 秦客问曰:“仲尼有言:移风易俗,莫善于乐。即如所论,凡百哀乐,皆不在声,则 各本作即 移风易俗,果以何物邪?又古人慎靡靡之风,抑滔 各本作慆 耳之声。故曰:放郑声,远佞人。然则郑卫之音 案:此下当有夺文 ,击鸣球以协神人,敢问郑雅之体,隆弊所极,风俗移易,奚由而济?愿 黄本作幸 重闻之,以悟所疑。” | ||
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 秦客問いて曰く、「仲尼に言あり、風を移し俗を易うるは、楽より善きはなし、と。すなわち論ずるところのごとく、およそ百の哀楽、皆声に在らずとせば、すなわち風を移し俗を易うるは、果たして何物を以てするや。また古人は靡靡の風を慎み、耳を慆すの声を抑う。故に曰く、鄭声を放ち、佞人を遠ざけよ、と。然らば鄭衛の音、鳴球を撃ちて以て神人を協わす。敢えて問う、鄭雅の体、隆弊の極まるところ、風俗の移り易わること、何に由りて済さんや。願わくは重ねてこれを聞き、以て疑うところを悟らん。」 | |
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
主人应之曰:“夫言移风易俗者,必承衰 张燮本讹哀 弊之后也。古之王者,承天理物,必崇简易之教,御无为之治。君静于上,臣顺 原钞四字夺。依各本及旧校加 于下;玄化潜通,天人交泰。枯槁之类,浸育灵液,六合之内,沐浴鸿流,荡涤尘垢;群生安逸,自求多福;默然从道,怀忠抱义,而不觉其所以然也。和心足于内,和气见 原钞五字夺,依旧校及各本加 于外;故歌以叙志,儛以宣情。然后文之以采章,照之以风雅,播之以八音,感之以太和;导其神气,养而就之;迎其情性 张燮本作性情 ,致而明之;使心与理相顺,气 各本讹和 与声相应。合乎会通,以济其美。故凯乐之情,见于金石;含弘光大,显于音声也。若以往则万国同风,芳荣济茂,馥如秋兰;不期而信,不谋而成 各本作诚 ,穆然相爱;犹舒锦布彩 各本采上夺布字。下衍而字。旧校依改,非 ,灿炳可观也。大道之隆,莫盛于兹,太平之业,莫显于此。故曰:移风易俗,莫善于乐。然 各本字无 乐之为体,以心为主。故无声之乐,民之父母也。至八音会谐,人之所悦,亦总谓之乐。然风俗移易,本 各本字夺 不在此也。夫音声和比 各本讹此 ,人情所不能已者也。是以古人知情 各本情下有之字 不可放,故抑其所遁;知欲 各本欲下有之字 不可绝,故自以为致 各本作因其所自 。故 各本字无 为可奉之礼,制可导之乐。口不尽味,乐不极音;揆终始之宜,度贤愚之中;为之检则,使远近同风,用而不竭,亦所以结忠信,著不迁也。故乡校庠塾亦随之。使 各本作变 丝竹与俎豆并存,羽毛与揖让俱用,正言与和声同发。使将听是声也,必闻此言;将观是容也,必崇此礼。礼犹宾主升降,然后酬酢行焉。于是言语之节,声音之度,揖让之仪,动止之数,进退相须,共为一体。君臣用之于朝,庶士用之于家。少而习之,长而不怠,心安志固,从善日迁,然后临之以敬,持之以 以下当夺一字 久而不变,然后化成。此又先王用乐之意也。故朝宴聘享,嘉乐必存;是以国史采风俗之盛衰,寄之乐工,宣之管弦,使言之者无罪,闻之者足以 各本以下有自字 诫。此又先王用乐之意也。若夫郑声,是音声之至妙。妙音感人,犹美色惑志,耽槃荒酒,易以丧业。自非至人,孰能御 黄本作禦 之?先王恐天下流而不反,故具其八音,不渎其声,绝其大和,不穷其变。捐窈窕之声,使乐而不淫。犹大羹不和,不极勺药之味也。若流浴浅近,则声不足悦,又非所欢也。若上失其道,国丧其纪;男女奔随,淫 各本作婬 荒无度;则风以此变,俗以好成。尚其所志,则群能肆之;乐其所习,则何以诛之?托于和声,配而长之,诚动于言,心感于和,风俗壹成,因而名 原钞字夺。据汪程本及旧校加 之。然所名之声,无中 黄本空阙。张燮本作甚 于淫邪也。淫之与正同乎心,雅郑之体,亦足以观矣。” | 主人应之曰:“夫言移风易俗者,必承衰 张燮本讹哀 弊之后也。古之王者,承天理物,必崇简易之教,御无为之治。君静于上,臣顺 原钞四字夺。依各本及旧校加 于下;玄化潜通,天人交泰。枯槁之类,浸育灵液,六合之内,沐浴鸿流,荡涤尘垢;群生安逸,自求多福;默然从道,怀忠抱义,而不觉其所以然也。和心足于内,和气见 原钞五字夺,依旧校及各本加 于外;故歌以叙志,儛以宣情。然后文之以采章,照之以风雅,播之以八音,感之以太和;导其神气,养而就之;迎其情性 张燮本作性情 ,致而明之;使心与理相顺,气 各本讹和 与声相应。合乎会通,以济其美。故凯乐之情,见于金石;含弘光大,显于音声也。若以往则万国同风,芳荣济茂,馥如秋兰;不期而信,不谋而成 各本作诚 ,穆然相爱;犹舒锦布彩 各本采上夺布字。下衍而字。旧校依改,非 ,灿炳可观也。大道之隆,莫盛于兹,太平之业,莫显于此。故曰:移风易俗,莫善于乐。然 各本字无 乐之为体,以心为主。故无声之乐,民之父母也。至八音会谐,人之所悦,亦总谓之乐。然风俗移易,本 各本字夺 不在此也。夫音声和比 各本讹此 ,人情所不能已者也。是以古人知情 各本情下有之字 不可放,故抑其所遁;知欲 各本欲下有之字 不可绝,故自以为致 各本作因其所自 。故 各本字无 为可奉之礼,制可导之乐。口不尽味,乐不极音;揆终始之宜,度贤愚之中;为之检则,使远近同风,用而不竭,亦所以结忠信,著不迁也。故乡校庠塾亦随之。使 各本作变 丝竹与俎豆并存,羽毛与揖让俱用,正言与和声同发。使将听是声也,必闻此言;将观是容也,必崇此礼。礼犹宾主升降,然后酬酢行焉。于是言语之节,声音之度,揖让之仪,动止之数,进退相须,共为一体。君臣用之于朝,庶士用之于家。少而习之,长而不怠,心安志固,从善日迁,然后临之以敬,持之以 以下当夺一字 久而不变,然后化成。此又先王用乐之意也。故朝宴聘享,嘉乐必存;是以国史采风俗之盛衰,寄之乐工,宣之管弦,使言之者无罪,闻之者足以 各本以下有自字 诫。此又先王用乐之意也。若夫郑声,是音声之至妙。妙音感人,犹美色惑志,耽槃荒酒,易以丧业。自非至人,孰能御 黄本作禦 之?先王恐天下流而不反,故具其八音,不渎其声,绝其大和,不穷其变。捐窈窕之声,使乐而不淫。犹大羹不和,不极勺药之味也。若流浴浅近,则声不足悦,又非所欢也。若上失其道,国丧其纪;男女奔随,淫 各本作婬 荒无度;则风以此变,俗以好成。尚其所志,则群能肆之;乐其所习,则何以诛之?托于和声,配而长之,诚动于言,心感于和,风俗壹成,因而名 原钞字夺。据汪程本及旧校加 之。然所名之声,无中 黄本空阙。张燮本作甚 于淫邪也。淫之与正同乎心,雅郑之体,亦足以观矣。” | ||
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| + | 主人これに応えて曰く、「それ風を移し俗を易うると言う者は、必ず衰弊の後を承くるなり。古の王者は、天を承けて物を理め、必ず簡易の教えを崇び、無為の治を御す。君は上に静かに、臣は下に順う。玄化潜かに通じ、天人交わりて泰し。枯槁の類も、霊液に浸育せられ、六合の内、鴻流に沐浴して、塵垢を蕩滌す。群生安逸にして、自ら多福を求む。黙然として道に従い、忠を懐き義を抱きて、その然る所以を覚えざるなり。和心は内に足り、和気は外に見る。故に歌いて以て志を叙べ、舞いて以て情を宣ぶ。然る後にこれに文うるに采章を以てし、これを照らすに風雅を以てし、これを播くに八音を以てし、これに感ぜしむるに太和を以てす。その神気を導き、養いてこれを就す。その情性を迎え、致してこれを明らかにす。心と理とをして相順ぜしめ、気と声とをして相応ぜしむ。会通に合して、以てその美を済す。故に凱楽の情は金石に見れ、含弘光大は音声に顕る。もし以往なれば万国風を同じくし、芳栄済々として茂り、馥しきこと秋蘭のごとし。期せずして信あり、謀らずして成り、穆然として相愛す。なお錦を舒べ彩を布くがごとく、燦炳として観るべきなり。大道の隆んなること、これより盛んなるはなく、太平の業、これより顕かなるはなし。故に曰く、風を移し俗を易うるは、楽より善きはなし、と。然れども楽の体たるや、心を以て主と為す。故に無声の楽は、民の父母なり。八音会して諧い、人の悦ぶところに至りては、また総じてこれを楽と謂う。然れども風俗の移易は、本よりここに在らざるなり。それ音声の和して比するは、人情の已むあたわざるところなり。ここを以て古人は情の放つべからざるを知る、故にその遁ぐるところを抑う。欲の絶つべからざるを知る、故に自ら以て致すところとなす。故に奉ずべきの礼を為し、導くべきの楽を制す。口は味を尽くさず、楽は音を極めず。終始の宜しきを揆り、賢愚の中を度り、これが検則を為して、遠近をして風を同じくせしめ、用いて竭きず、また忠信を結び、不遷を著すゆえんなり。故に郷校庠塾も亦これに随う。絲竹をして俎豆と並び存し、羽毛をして揖譲と倶に用いらしめ、正言をして和声と同に発せしむ。この声を聴かんとすれば、必ずこの言を聞き、この容を観んとすれば、必ずこの礼を崇ぶ。礼はなお賓主の升降のごとく、然る後に酬酢行わる。ここにおいて言語の節、声音の度、揖譲の儀、動止の数、進退相須ちて、共に一体を為す。君臣はこれを朝に用い、庶士はこれを家に用う。少くしてこれを習い、長じて怠らず、心安んじ志固く、善に従いて日に遷る。然る後にこれに臨むに敬を以てし、これを持するに久しくして変ぜず、然る後に化成る。これまた先王の楽を用うるの意なり。故に朝宴聘享に嘉楽必ず存す。ここを以て国史は風俗の盛衰を采り、これを楽工に寄せ、これを管弦に宣べ、言う者をして罪なからしめ、聞く者をして以て自ら戒むるに足らしむ。これまた先王の楽を用うるの意なり。もし鄭声に至りては、これ音声の至妙なり。妙音の人を感ぜしむること、なお美色の志を惑わすがごとく、盤に耽り酒に荒れ、以て業を喪いやすし。至人にあらざれば、孰かよくこれを御せん。先王は天下の流れて反らざるを恐る、故にその八音を具え、その声を瀆さず、その大和を絶ち、その変を窮めず。窈窕の声を捐て、楽しみて淫せざらしむ。なお大羹の和せずして、勺薬の味を極めざるがごとし。もし浅近に流浴すれば、声は悦ぶに足らず、また歓ぶところにあらざるなり。もし上その道を失い、国その紀を喪い、男女奔随して、淫荒度なければ、風はこれを以て変じ、俗は好みを以て成る。その志をしきものは、群もよくこれを肆にし、その習いを楽しむものは、何を以てこれを誅せんや。和声に託し、配してこれを長じ、誠は言に動き、心は和に感じ、風俗ひとたび成れば、因りてこれを名づく。然れどもその名づくるところの声、淫邪に甚だしきものなきなり。淫と正とは心に同じ、雅鄭の体もまた以て観るに足る。」 | ||
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【第六篇 六朝之鬼神志怪书(下)】 | 【第六篇 六朝之鬼神志怪书(下)】 | ||
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| − | + | 【第六篇 六朝の鬼神志怪書(下)】 | |
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| − | + | 释氏辅教之书,《隋志》著录九家,在子部及史部,今惟颜之推《冤魂志》存,引经史以证报应,已开混合儒释之端矣,而余则俱佚。遗文之可考见者,有宋刘义庆《宣验记》,齐王琰《冥祥记》,隋颜之推《集灵记》,侯白《旌异记》四种,大抵记经像之显效,明应验之实有,以震耸世俗,使生敬信之心,顾后世则或视为小说。王琰者,太原人,幼在交阯,受五戒,于宋大明及建元 五世纪中 年,两感金像之异,因作记,撰集像事,继以经塔,凡十卷,谓之《冥祥》,自序其事甚悉 见《法苑珠林》卷十七 。《冥祥记》在《珠林》及《太平广记》中所存最多,其叙述亦最委曲详尽,今略引三事,以概其余。 | |
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| − | + | 釈氏の教えを輔くるの書は、『隋志』に九家を著録し、子部および史部に在り、今はただ顔之推の『冤魂志』のみ存す。経史を引きて報応を証し、すでに儒釈混合の端を開きたり。而してその余はすべて佚す。遺文の考え見るべきものには、宋の劉義慶の『宣験記』、斉の王琰の『冥祥記』、隋の顔之推の『集霊記』、侯白の『旌異記』の四種あり、大抵は経像の顕効を記し、応験の実に有ることを明らかにし、以て世俗を震耸し、敬信の心を生ぜしめんとす。顧みれば後世にはあるいは小説と視せり。王琰は太原の人、幼くして交阯に在り、五戒を受け、宋の大明および建元(五世紀中)年に、二たび金像の異に感じ、因りて記を作り、像の事を撰集し、経塔を以て継ぎ、凡そ十巻、これを『冥祥』と謂う。自らその事を序すること甚だ悉し(『法苑珠林』巻十七に見ゆ)。『冥祥記』は『珠林』および『太平広記』中に存するもの最も多く、その叙述もまた最も委曲詳尽なり。今略ぼ三事を引きて、以てその余を概す。 | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 汉明帝梦见神人,形垂二丈,身黄金色,项佩日光。以问群臣,或对曰:“西方有神,其号曰佛,形如陛下所梦,得无是乎?”于是发使天竺,写致经像。表之中夏,自天子王侯,咸敬事之,闻人死精神不灭,莫不惧然自失。初,使者蔡愔将西域沙门迦叶摩腾等赍优填王画释迦佛像,帝重之,如梦所见也,乃遣画工图之数本,于南宫清凉台及高阳门显节寿陵上供养。又于白马寺壁画千乘万骑绕塔三匝之像,如诸传备载。 《珠林》十三 | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 漢の明帝、夢に神人を見る。形は二丈に垂んとし、身は黄金色、項に日光を佩ぶ。以て群臣に問うに、あるいは対えて曰く、「西方に神あり、その号は仏と曰う。形は陛下の夢に見たまいしがごとし、これにあらずや。」ここにおいて使者を天竺に発し、経像を写し致す。これを中夏に表し、天子王侯より、ことごとく敬い事え、人の死して精神滅びざるを聞きて、惧然として自失せざるはなし。初め、使者蔡愔、西域の沙門迦葉摩騰らを将いて、優填王の画ける釈迦仏像を齎す。帝これを重んじ、夢に見しがごとくなれば、すなわち画工を遣わしてこれを数本図かしめ、南宮の清涼台および高陽門の顕節寿陵の上に供養す。また白馬寺に千乗万騎塔を繞ること三匝の像を壁画す。諸伝に備さに載するがごとし。(『珠林』十三) | |
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| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | 晋谢敷字庆绪,会稽山阴人也,……少有高操,隐于东山,笃信大法,精勤不倦,手写《首楞严经》,当在都白马寺中,寺为灾火所延,什物余经,并成煨尽,而此经止烧纸头界外而已,文字悉存,无所毁失。敷死时,友人疑其得道,及闻此经,弥复惊异。…… 《珠林》十八 | |
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| − | + | 晋の謝敷、字は慶緒、会稽山陰の人なり。……少くして高操あり、東山に隠れ、大法を篤信し、精勤して倦まず、手ずから『首楞厳経』を写す。まさに都の白馬寺中に在りしとき、寺は災火の延ぶるところとなり、什物余経、並びに煨燼と成る。而してこの経はただ紙の頭の界の外を焼くのみにて、文字はことごとく存し、毀失するところなし。敷の死せる時、友人その得道せるを疑い、この経のことを聞くに及びて、いよいよまた驚異す。……(『珠林』十八) | |
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| − | + | 晋赵泰字文和,清河贝邱人也,……年三十五时,尝卒心痛,须臾而死。下尸于地,心暖不已,屈伸随人。留尸十日,平旦,喉中有声如雨,俄而苏活。说初死之时,梦有一人来近心下,复有二人乘黄马,从者二人,扶泰腋径将东行,不知可几里,至一大城,崔巍高峻,城色青黑。将泰向城门入,经两重门,有瓦屋可数千间,男女大小亦数千人,行列而立。吏著皂衣,有五六人,条疏姓字,云“当以科呈府君”。泰名在三十,须臾,将泰与数千人男女一时俱进。府君西向坐,简视名簿讫,复遣泰南入黑门。有人著绛衣坐大屋下,以次呼名,问:“生时所事?作何孽罪?行何福善?谛汝等辞,以实言也!此恒遣六部使者常在人间,疏记善恶,具有条状,不可得虚。”泰答:“父兄仕宦,皆二千石。我少在家,修学而已,无所事也,亦不犯恶。”乃遣泰为水官将作。……后转泰水官都督知诸狱事,给泰兵马,令案行地狱。所至诸狱,楚毒各殊:或针贯其舌,流血竟体;或被头露发,裸形徒跣,相牵而行,有持大杖,从后催促,铁床铜柱,烧之洞然,驱迫此人,抱卧其上,赴即焦烂,寻复还生;……或剑树高广,不知限量,根茎枝叶,皆剑为之,人众相訾,自登自攀,若有欣竞,而身首割截,尺寸离断。泰见祖父母及二弟在此狱中,相见涕泣。泰出狱门,见有二人赍文书,来语狱吏,言有三人,其家为其于塔寺中悬幡烧香,救解其罪,可出福舍。俄见三人自狱而出,已有自然衣服,完整在身,南诣一门,云名开光大舍。……泰案行毕,还水官处。……主者曰:“卿无罪过,故相使为水官都督,不尔,与地狱中人无以异也。”泰问主者曰:“人有何行,死得乐报?”主者唯言“奉法弟子精进持戒,得乐报,无有谪罚也。”泰复问曰:“人未事法时所行罪过,事法之后,得以除不?”答曰:“皆除也。”语毕,主者开縢箧检泰年纪,尚有余算三十年在,乃遣泰还。……时晋太始五年七月十三日也。…… 《珠林》七。《广记》三百七十七 | |
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| − | + | 晋の趙泰、字は文和、清河貝丘の人なり。……年三十五の時、かつて卒かに心痛し、須臾にして死す。尸を地に下すも、心は暖かきこと已まず、屈伸人に随う。尸を留むること十日、平旦に喉中に声ありて雨のごとし。俄にして蘇りて活く。初め死する時を説くに、夢に一人来たりて心下に近づき、また二人黄馬に乗り、従者二人ありて、泰の腋を扶けて径ちに東行に将いゆくこと、幾里ばかりか知らず、一大城に至る。崔巍として高峻、城の色は青黒なり。泰を将いて城門より入り、二重の門を経るに、瓦屋数千間ばかりあり、男女大小また数千人、行列して立つ。吏は皂衣を著し、五六人あり、姓字を条疏して、「まさに科を以て府君に呈すべし」と云う。泰の名は三十に在り。須臾にして泰と数千人の男女を将いて一時にともに進む。府君は西向きに坐し、名簿を簡視し訖りて、また泰を遣わして南に黒門より入らしむ。人の絳衣を著して大屋の下に坐するあり、次を以て名を呼び、問う、「生時の所事は何ぞ。何の孽罪を作せるか。何の福善を行えるか。汝等の辞を諦かにし、実を以て言え。ここには恒に六部の使者を遣わして常に人間に在らしめ、善悪を疏記し、具さに条状あり、虚を得べからず。」泰答う、「父兄は仕宦し、皆二千石なり。我少くして家に在り、修学するのみ、事とするところなく、また悪を犯さず。」すなわち泰を遣わして水官の将作と為す。……後に泰を転じて水官都督とし諸獄の事を知らしめ、泰に兵馬を給し、地獄を案行せしむ。至るところの諸獄、楚毒おのおの殊なり。あるいは針もてその舌を貫き、血を流すこと体に竟り、あるいは頭を被き髪を露し、裸形徒跣にて相牽きて行き、大杖を持する者あり、後より催促す。鉄床銅柱、これを焼くこと洞然たり、この人を駆迫してその上に抱き臥さしむれば、赴けばすなわち焦爛し、尋いでまた還りて生ず。……あるいは剣樹あり高く広く、限量を知らず、根茎枝葉、皆剣もてこれを為す。人衆相訾り、自ら登り自ら攀じ、欣び競うあるがごとくして、身首割截せられ、尺寸離断す。泰、祖父母および二弟のこの獄中に在るを見て、相見て涕泣す。泰、獄門を出づるに、二人の文書を齎す者あり、来たりて獄吏に語る。三人あり、その家その為に塔寺中に幡を懸け香を焼きて、その罪を救解し、福舎に出づべしと言う。俄にして三人獄より出づるを見るに、すでに自然の衣服あり、完整にして身に在り。南に一門に詣る、名を開光大舎と云う。……泰案行し畢りて、水官のところに還る。……主者曰く、「卿は罪過なし、故に相使して水官都督と為す。しからずんば、地獄中の人と以て異なることなきなり。」泰、主者に問いて曰く、「人はいかなる行あれば、死して楽報を得るか。」主者ただ言う、「奉法の弟子、精進して持戒すれば、楽報を得て、謫罰あることなきなり。」泰また問いて曰く、「人いまだ法に事えざる時に行いし罪過は、法に事えし後に、以て除くを得るや否や。」答えて曰く、「皆除かるるなり。」語り畢りて、主者は縢箧を開きて泰の年紀を検するに、なお余算三十年在り、すなわち泰を遣わして還らしむ。……時に晋の太始五年七月十三日なり。……(『珠林』七。『広記』三百七十七) | |
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| − | + | 佛教既渐流播,经论日多,杂说亦日出,闻者虽或悟无常而归依,然亦或怖无常而却走。此之反动,则有方士亦自造伪经,多作异记,以长生久视之道,网罗天下之逃苦空者,今所存汉小说,除一二文人著述外,其余盖皆是矣。方士撰书,大抵托名古人,故称晋宋人作者不多有,惟类书间有引《神异记》者,则为道士王浮作。浮,晋人;有浅妄之称,即惠帝时 三世纪末至四世纪初 与帛选抗论屡屈,遂改换《西域传》造老子《明威化胡经》者也 见唐释法琳《辩正论》六 。其记似亦言神仙鬼神,如《洞冥》、《列异》之类。 | |
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| − | + | 仏教すでに漸く流播し、経論日に多く、雑説もまた日に出づ。聞く者はあるいは無常を悟りて帰依するも、またあるいは無常を怖れて却走す。この反動として、方士もまた自ら偽経を造り、多く異記を作り、長生久視の道を以て、天下の苦空を逃るる者を網羅す。今存するところの漢の小説は、一二の文人の著述を除くほかは、その余は蓋しみなこれなり。方士の書を撰するは、大抵古人に託名す。故に晋宋の人の作と称するもの多くはなし。ただ類書の間に『神異記』を引くものあり、すなわち道士王浮の作なり。浮は晋の人にして、浅妄の称あり。すなわち恵帝の時(三世紀末より四世紀初)帛選と抗論して屡々屈し、遂に『西域伝』を改換して老子の『明威化胡経』を造りし者なり(唐の釈法琳の『弁正論』六に見ゆ)。その記もまた神仙鬼神を言うこと、『洞冥』・『列異』の類のごとし。 | |
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| − | + | 陈敏,孙皓之世为江夏太守,自建业赴职,闻宫亭庙验 原注云言灵验 ,过乞在任安稳,当上银杖一枚。年限既满,作杖拟以还庙,捶铁以为干,以银涂之。寻徵为散骑常侍,往宫亭,送杖于庙中讫,即进路。日晚,降神巫宣教曰:“陈敏许我银杖,今以涂杖见与,便投水中,当以还之。欺蔑之罪,不可容也!”于是取银杖看之,剖视中见铁干,乃置之湖中。杖浮在水上,其疾如飞,遥到敏舫前,敏舟遂覆也。 《太平御览》七百十 | |
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| − | + | 陳敏、孫皓の世に江夏太守と為り、建業より職に赴く。宮亭廟の験あるを聞き、過ぎて任に在りて安穏ならんことを乞い、まさに銀杖一枚を上ぐべしとす。年限すでに満ち、杖を作りて以て廟に還さんと擬し、鉄を捶ちて以て干と為し、銀を以てこれに塗る。尋いで散騎常侍に徵され、宮亭に往き、杖を廟中に送り訖りて、すなわち路に進む。日晩に、降神の巫宣教して曰く、「陳敏我に銀杖を許すも、今塗杖を以て与えらる。すなわち水中に投じ、まさに以てこれを還すべし。欺蔑の罪は容すべからざるなり。」ここにおいて銀杖を取りてこれを看るに、剖きて中を視れば鉄の干を見る。すなわちこれを湖中に置く。杖は水上に浮き、その疾きこと飛ぶがごとく、遥かに敏の舫の前に到り、敏の舟遂に覆る。(『太平御覧』七百十) | |
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| − | + | 丹丘生大茗,服之生羽翼。 《事类赋注》十六 | |
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| − | + | 丹丘は大茗を生じ、これを服すれば羽翼を生ず。(『事類賦注』十六) | |
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| − | + | 《拾遗记》十卷,题晋陇西王嘉撰,梁萧绮录。《晋书·艺术列传》中有王嘉,略云,嘉字子年,陇西安阳人,初隐于东阳谷,后入长安,苻坚累徵不起,能言未然之事,辞如谶记,当时鲜能晓之。姚苌入长安,逼嘉自随;后以答问失苌意,为苌所杀 约三九○ 。嘉尝造《牵三歌谶》,又著《拾遗录》十卷,其事多诡怪,今行于世。传所云《拾遗录》者,盖即今记,前有萧绮序,言书本十九卷,二百二十篇,当苻秦之季,典章散灭,此书亦多有亡,绮更删繁存实,合为一部,凡十卷。今书前九卷起庖牺迄东晋,末一卷则记昆仑等九仙山,与序所谓“事讫西晋之末”者稍不同。其文笔颇靡丽,而事皆诞谩无实,萧绮之录亦附会,胡应麟 《笔丛》三十二 以为“盖即绮撰而托之王嘉”者也。 | |
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| − | + | 『拾遺記』十巻、晋の隴西の王嘉の撰と題し、梁の蕭綺録す。『晋書・芸術列伝』中に王嘉あり、略ぼ云う。嘉、字は子年、隴西安陽の人。初め東陽谷に隠れ、後に長安に入る。苻堅累ねて徵すれども起たず。よく未然の事を言い、辞は讖記のごとく、当時よくこれを暁る者鮮し。姚萇長安に入り、嘉を逼りて自ら随わしむ。後に答問の萇の意に失するを以て、萇の殺すところと為る(約三九〇年)。嘉かつて『牽三歌讖』を造り、また『拾遺録』十巻を著す。その事多く詭怪にして、今世に行わる。伝に云う『拾遺録』なる者は、蓋しすなわち今の記なり。前に蕭綺の序あり、言う、書は本十九巻、二百二十篇、苻秦の季に当たりて、典章散滅し、この書もまた多く亡ぶることあり。綺さらに繁を削り実を存し、合して一部と為す。凡そ十巻なり。今の書の前九巻は庖犧に起こりて東晋に迄り、末の一巻は崑崙等の九仙山を記す。序に謂うところの「事は西晋の末に訖る」とはやや同じからず。その文筆は頗る靡麗にして、事はみな誕漫にして実なし。蕭綺の録もまた附会にして、胡応麟(『筆叢』三十二)以て「蓋しすなわち綺の撰にして王嘉に託せるなり」と為す。 | |
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| − | + | 少昊以金德王,母曰皇娥,处璇宫而夜织,或乘桴木而昼游,经历穷桑沧茫之浦。时有神童,容貌绝俗,称为白帝之子,即太白之精,降乎水际,与皇娥宴戏,奏便娟之乐,游漾忘归。穷桑者,西海之滨,有孤桑之树,直上千寻,叶红椹紫,万岁一实,食之后天而老。……帝子与皇娥并坐,抚桐峰梓瑟,皇娥倚瑟而清歌曰:“天清地旷浩茫茫,万象回薄化无方,浛天荡荡望沧沧,乘桴轻漾著日傍,当其何所至穷桑,心知和乐悦未央。”俗谓游乐之处为桑中也,《诗·卫风》云“期我乎桑中”,盖类此也。……及皇娥生少昊,号曰穷桑氏,亦曰桑丘氏。至六国时,桑丘子著阴阳书,即其余裔也。…… 卷一 | |
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| − | + | 少昊は金徳を以て王たり。母は皇娥と曰い、璇宮に処りて夜に織り、あるいは桴木に乗じて昼に遊び、窮桑滄茫の浦を経歴す。時に神童あり、容貌俗を絶し、白帝の子と称す。すなわち太白の精にして、水際に降り、皇娥と宴戲し、便娟の楽を奏し、游漾して帰るを忘る。窮桑なる者は西海の浜にして、孤桑の樹あり、直上すること千尋、葉は紅く椹は紫にして、万歳に一たび実を結び、これを食すれば天に後れて老ゆ。……帝子と皇娥と並び坐し、桐峰の梓瑟を撫す。皇娥瑟に倚りて清歌して曰く、「天清く地曠くして浩として茫茫たり、万象回薄して化すること方なし、浛天蕩蕩として滄滄を望み、桴に乗じて軽く漾いて日の傍に著く、まさにいずくにか至りて窮桑に至らん、心は和楽を知りて悦びていまだ央きず。」俗に遊楽の処を桑中と謂うなり。『詩・衛風』に「我を桑中に期す」と云うは、蓋しこれに類するなり。……皇娥少昊を生むに及び、号して窮桑氏と曰い、また桑丘氏と曰う。六国の時に至りて、桑丘子陰陽の書を著す。すなわちその余裔なり。……(巻一) | |
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| − | + | 刘向于成帝之末,校书天禄阁,专精覃思。夜,有老人著黄衣,植青藜杖,登阁而进,见向暗中独坐诵书,老父乃吹杖端,烟燃,因以见向,说开辟已前。向因受五行洪范之文,恐辞说繁广忘之,乃裂帛及绅,以记其言,至曙而去。向请问姓名,云“我是太一之精,天帝闻卯金之子有博学者,下而观焉”。乃出怀中竹牒,有天文地图之书,“余略授子焉”。至向子歆,从向授其术。向亦不悟此人焉。 卷六 | |
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| − | + | 劉向、成帝の末に天禄閣に書を校す。専精覃思す。夜に老人ありて黄衣を著し、青藜の杖を植え、閣に登りて進む。向の暗中に独り坐して書を誦するを見て、老父すなわち杖の端を吹くに、煙燃え、因りて以て向に見え、開闢以前を説く。向、因りて五行洪範の文を受く。辞説の繁広にしてこれを忘れんことを恐れ、すなわち帛および紳を裂きて、以てその言を記す。曙に至りて去る。向、姓名を請い問うに、云う、「我はこれ太一の精なり。天帝卯金の子に博学の者あるを聞き、下りて観るなり。」すなわち懐中の竹牒を出すに、天文地図の書あり、「余略ぼ子に授けん。」向の子歆に至り、向より其の術を授かる。向もまたこの人を悟らざるなり。(巻六) | |
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| − | + | 洞庭山浮于水上,其下有金堂数百间,玉女居之,四时闻金石丝竹之声,彻于山顶。楚怀王之时,举群才赋诗于水湄。……后怀王好进奸雄,群贤逃越。屈原以忠见斥,隐于沅湘,披蓁茹草,混同禽兽,不交世务,采柏实以和桂膏,用养心神,被王逼逐,乃赴清泠之水,楚人思慕,谓之水仙。其神游于天河,精灵时降湘浦,楚人为之立祠,汉末犹在。 卷十 | |
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| − | + | 洞庭山は水上に浮かぶ。その下に金堂数百間あり、玉女これに居す。四時金石絲竹の声を聞くこと、山頂に徹す。楚の懐王の時、群才を挙げて水湄に詩を賦す。……後に懐王奸雄を進むるを好み、群賢逃越す。屈原は忠を以て斥けられ、沅湘に隠れ、蓁を披き草を茹り、禽獣に混同して、世務に交わらず、柏実を采りて桂膏を和し、以て心神を養う。王に逼迫せられて、すなわち清泠の水に赴く。楚人思慕し、これを水仙と謂う。その神は天河に遊び、精霊時に湘浦に降る。楚人これが為に祠を立つ。漢末なお在り。(巻十) | |
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【第二十四篇 清之人情小说】 | 【第二十四篇 清之人情小说】 | ||
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| + | 【第二十四篇 清の人情小説】 | ||
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| + | 乾隆中 一七六五年顷 ,有小说曰《石头记》者忽出于北京,历五六年而盛行,然皆写本,以数十金鬻于庙市。其本止八十回,开篇即叙本书之由来,谓女娲补天,独留一石未用,石甚自悼叹,俄见一僧一道,以为“形体到也是个宝物了,还只没有实在好处,须得再镌上数字,使人一见便知是奇物方妙。然后好携你到隆盛昌明之邦,诗礼簪缨之族,花柳繁华之地,温柔富贵之乡,去安身乐业”。于是袖之而去。不知更历几劫,有空空道人见此大石,上镌文词,从石之请,钞以问世。道人亦“因空见色,由色生情,传情入色,自色悟空,遂易名为情僧,改《石头记》为《情僧录》;东鲁孔梅溪则题曰《风月宝鉴》;后因曹雪芹于悼红轩中披阅十载,增删五次,纂成目录,分出章回,则题曰《金陵十二钗》,并题一绝云:‘满纸荒唐言,一把辛酸泪。都云作者痴,谁解其中味?’” 戚蓼生所序八十回本之第一回 | ||
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| + | 乾隆中(一七六五年頃)、小説に『石頭記』なるものあり、忽ち北京に出づ。五六年を歴て盛行す。然れどもみな写本にして、数十金を以て廟市に鬻ぐ。その本はただ八十回にて、開篇にすなわち本書の由来を叙す。女媧天を補うに、ひとり一石を留めて用いず。石甚だ自ら悼嘆す。俄にして一僧一道を見るに、以て「形体はまずは一個の宝物なり。まだただ実在の好いところがない。すべからくさらに数字を鐫りつけ、人をして一見してすなわち奇物なるを知らしむるのが妙であろう。然る後に好くも汝を隆盛昌明の邦、詩礼簪纓の族、花柳繁華の地、温柔富貴の郷に携え、安身立業せしめん」と為す。ここにおいてこれを袖にして去る。さらに幾劫を歴たるを知らず、空空道人あり、この大石を見るに、上に文詞を鐫る。石の請いに従い、鈔して以て世に問う。道人もまた「空に因りて色を見、色に由りて情を生じ、情を伝えて色に入り、色より空を悟り、遂に名を情僧と易え、『石頭記』を改めて『情僧録』と為す。東魯の孔梅渓はすなわち『風月宝鑑』と題す。後に曹雪芹の悼紅軒中にて披閲すること十載、増刪すること五次、目録を纂成し、章回を分出するに因り、すなわち『金陵十二釵』と題し、並びに一絶を題して云う、『満紙荒唐の言、一把辛酸の涙。都な作者の痴と云うも、誰かその中の味を解せん。』」(戚蓼生の序する八十回本の第一回) | ||
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| − | + | === 第4節 === | |
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本文所叙事则在石头城 非即金陵 之贾府,为宁国、荣国二公后。宁公长孙曰敷,早死;次敬袭爵,而性好道,又让爵于子珍,弃家学仙;珍遂纵恣,有子蓉,娶秦可卿。荣公长孙曰赦,子琏,娶王熙凤;次曰政;女曰敏,适林海,中年而亡,仅遗一女曰黛玉。贾政娶于王,生子珠,早卒;次生女曰元春,后选为妃;次复得子,则衔玉而生,玉又有字,因名宝玉,人皆以为“来历不小”,而政母史太君尤钟爱之。宝玉既七八岁,聪明绝人,然性爱女子,常说:“女儿是水作的骨肉,男人是泥作的骨肉。”人于是又以为将来且为“色鬼”;贾政亦不甚爱惜,驭之极严,盖缘“不知道这人来历。……若非多读书识字,加以致知格物之功,悟道参玄之力者,不能知也” 戚本第二回贾雨村云 。而贾氏实亦“闺阁中历历有人”,主从之外,姻连亦众,如黛玉、宝钗,皆来寄寓,史湘云亦时至,尼妙玉则习静于后园。右即贾氏谱大要,用虚线者其姻连,著×者夫妇,著*者在“金陵十二钗”之数者也。 | 本文所叙事则在石头城 非即金陵 之贾府,为宁国、荣国二公后。宁公长孙曰敷,早死;次敬袭爵,而性好道,又让爵于子珍,弃家学仙;珍遂纵恣,有子蓉,娶秦可卿。荣公长孙曰赦,子琏,娶王熙凤;次曰政;女曰敏,适林海,中年而亡,仅遗一女曰黛玉。贾政娶于王,生子珠,早卒;次生女曰元春,后选为妃;次复得子,则衔玉而生,玉又有字,因名宝玉,人皆以为“来历不小”,而政母史太君尤钟爱之。宝玉既七八岁,聪明绝人,然性爱女子,常说:“女儿是水作的骨肉,男人是泥作的骨肉。”人于是又以为将来且为“色鬼”;贾政亦不甚爱惜,驭之极严,盖缘“不知道这人来历。……若非多读书识字,加以致知格物之功,悟道参玄之力者,不能知也” 戚本第二回贾雨村云 。而贾氏实亦“闺阁中历历有人”,主从之外,姻连亦众,如黛玉、宝钗,皆来寄寓,史湘云亦时至,尼妙玉则习静于后园。右即贾氏谱大要,用虚线者其姻连,著×者夫妇,著*者在“金陵十二钗”之数者也。 | ||
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| − | + | 事即始于林夫人 贾敏 之死,黛玉失恃,又善病,遂来依外家,时与宝玉同年,为十一岁。已而王夫人女弟所生女亦至,即薛宝钗,较长一年,颇极端丽。宝玉纯朴,并爱二人无偏心,宝钗浑然不觉,而黛玉稍恚。一日,宝玉倦卧秦可卿室,遽梦入太虚境,遇警幻仙,阅《金陵十二钗正册》及《副册》,有图有诗,然不解。警幻命奏新制《红楼梦》十二支,其末阕为《飞鸟各投林》,词有云: | |
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| + | 本文の叙事するところは石頭城(すなわち金陵にあらず)の賈府にあり、寧国・栄国二公の後なり。寧公の長孫を敷と曰い、早く死す。次の敬は爵を襲うも、性は道を好み、また爵を子の珍に譲り、家を棄てて仙を学ぶ。珍遂に縦恣し、子の蓉あり、秦可卿を娶る。栄公の長孫を赦と曰い、子の璉あり、王熙鳳を娶る。次を政と曰う。女を敏と曰い、林海に適ぎ、中年にして亡じ、僅かに一女を遺す、黛玉と曰う。賈政は王氏を娶り、子の珠を生むも、早く卒す。次に女を生み元春と曰い、後に選ばれて妃と為る。次にまた子を得るに、すなわち玉を銜みて生まる。玉にまた字あり、因りて宝玉と名づく。人みな以て「来歴小さからず」と為す。而して政の母の史太君はことに鍾愛す。宝玉すでに七八歳、聡明人に絶するも、性は女子を愛し、常に言う、「女の子は水で出来た骨肉で、男は泥で出来た骨肉だ。」人ここにおいてまた以て将来は「色鬼」と為らんと為す。賈政もまたあまり愛惜せず、これを御すること極めて厳なり。蓋し「この人の来歴を知らざるに縁る。……もし多く書を読み字を識り、致知格物の功を加え、悟道参玄の力ある者にあらざれば、知ることあたわざるなり」(戚本第二回賈雨村云う)に因る。而して賈氏には実にまた「閨閣の中歴歴として人あり」、主従のほかに、姻連もまた衆し。黛玉・宝釵のごときは、皆来たりて寄寓し、史湘雲もまた時に至り、尼の妙玉はすなわち後園に習静す。右すなわち賈氏の譜の大要にして、虚線を用うるはその姻連、×を著すは夫婦、*を著すは「金陵十二釵」の数に在る者なり。 | ||
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| + | “为官的,家业凋零;富贵的,金银散尽。有恩的,死里逃生;无情的,分明报应。欠命的命已还,欠泪的泪已尽!……看破的,遁入空门;痴迷的,枉送了性命。好一似,食尽鸟投林:落了片白茫茫大地真干净!” 戚本第五回 | ||
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| − | + | 然宝玉又不解,更历他梦而寤。迨元春被选为妃,荣公府愈贵盛,及其归省,则辟大观园以宴之,情亲毕至,极天伦之乐。宝玉亦渐长,于外昵秦钟、蒋玉函,归则周旋于姊妹中表以及侍儿如袭人、晴雯、平儿、紫鹃辈之间,昵而敬之,恐拂其意,爱博而心劳,而忧患亦日甚矣。 | |
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| − | + | 这日,宝玉因见湘云渐愈,然后去看黛玉。正值黛玉才歇午觉,宝玉不敢惊动。因紫鹃正在回廊上手里做针线,便上来问他:“昨日夜里咳嗽的可好些?”紫娟道:“好些了。” 宝玉道:“阿弥陀佛,宁可好了罢。”紫鹃笑道:“你也念起佛来,真是新闻。” 宝玉笑道:“所谓‘病笃乱投医’了。”一面说,一面见他穿着弹墨绫子薄绵袄,外面只穿着青缎子夹背心,宝玉便伸手向他身上抹了一抹,说:“穿的这样单薄,还在风口里坐着春风才至,时气最不好。你再病了,越发难了。”紫鹃便说道:“从此咱们只可说话,别动手动脚的。一年大二年小的,叫人看着不尊重;又打着那起混账行子们背地里说你。你总不留心,还只管合小时一般行为,如何使得?姑娘常常吩咐我们,不叫合你说笑。你近来瞧他,远着你,还恐远不及呢。”说着,便起身,携了针线,进别房去了。宝玉见了这般景况,心中忽觉浇了一盆冷水一般,只看着竹子发了回呆。因祝妈正来挖笋修竿,便忙忙走了出来,一时魂魄失守,心无所知,随便坐在一块石上出神,不觉滴下泪来。直呆了五六顿饭工夫,千思万想,总不知如何是好。偶值雪雁从王夫人房中取了人参来,从此经过,……便走过来,蹲下笑道:“你在这里作什么呢?”宝玉忽见了雪雁,便说道:“你又作什么来招我?你难道不是女儿?他既防嫌,总不许你们理我,你又来寻我,倘被人看见,岂不又生口舌?你快家去罢。”雪雁听了,只当他又受了黛玉的委屈,只得回至房中,黛玉未醒,将人参交与紫鹃。……雪雁道:“姑娘还没醒呢,是谁给了宝玉气受?坐在那里哭呢。”……紫鹃听说,忙放下针线,……一直来寻宝玉。走到宝玉跟前,含笑说道:“我不过说了两句话,为的是大家好。你就赌气,跑了这风地里来哭,作出病来唬我。”宝玉忙笑道:“谁赌气了?我因为听你说的有理,我想你们既这样说,自然别人也是这样说,将来渐渐的都不理我了。我所以想着自己伤心。”…… 戚本第五十七回,括弧中句据程本补。 | |
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| + | 事すなわち林夫人(賈敏)の死に始まる。黛玉は恃を失い、またよく病み、遂に来たりて外家に依る。時に宝玉と同年にして、十一歳なり。すでにして王夫人の女弟の生める女もまた至る。すなわち薛宝釵にして、一年年長にして、頗る端麗を極む。宝玉は純朴にして、並びに二人を愛し偏心なし。宝釵は渾然として覚えず、而して黛玉はやや恚る。一日、宝玉倦みて秦可卿の室に臥す。遽に夢みて太虚境に入り、警幻仙に遇い、『金陵十二釵正冊』および『副冊』を閲す。図あり詩あり、然れども解せず。警幻は新制の『紅楼夢』十二支を奏ぜしむ。その末闋を『飛鳥各投林』と為し、詞に云う、 | ||
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| + | 然荣公府虽煊赫,而“生齿日繁,事务日盛,主仆上下,安富尊荣者尽多,运筹谋画者无一,其日用排场,又不能将就省俭”,故“外面的架子虽未甚倒,内囊却也尽上来了。” 第二回。 颓运方至,变故渐多;宝玉在繁华丰厚中,且亦屡与“无常”觌面,先有可卿自经;秦钟夭逝;自又中父妾厌胜之术,几死;继以金钏投井;尤二姐吞金;而所爱之侍儿晴雯又被遣,随殁。悲凉之雾,遍被华林,然呼吸而领会之者,独宝玉而已。 | ||
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| − | + | ……他便带了两个小丫头到一石后,也不怎么样,只问他二人道:“自我去了,你袭人姐姐可打发人瞧晴雯姐姐去了不曾?”这一个答道:“打发宋妈妈瞧去了。”宝玉道:“回来说什么?”小丫头道:“回来说晴雯姐姐直着脖子叫了一夜,今儿早起就闭了眼,住了口,人事不知,也出不得一声儿了,只有倒气的分儿了。”宝玉忙问道:“一夜叫的是谁?”小丫头子道: “一夜叫的是娘。”宝玉拭泪道:“还叫谁?”小丫头说: “没有听见叫别人。”宝玉道:“你糊涂,想必没听真。” ……因又想: “虽然临终未见,如今且去灵前一拜,也算尽这五六年的情肠。”……遂一径出园,往前日之处来,意为停柩在内。谁知他哥嫂见他一嚈气,便回了进去,希图得几两发送例银。王夫人闻知,便赏了十两银子;又命“即刻送到外头焚化了罢。‘女儿痨’死的,断不可留!”他哥嫂听了这话,一面就雇了人来入殓,抬往城外化人厂去了。……宝玉走来扑了个空,……自立了半天,别没法儿,只得翻身进入园中,待回自房,甚觉无趣,因乃顺路来找黛玉,偏他不在房中。……又到蘅芜院中,只见寂静无人。……仍往潇湘馆来,偏黛玉尚未回来。……正在不知所以之际,忽见王夫人的丫头进来找他,说:“老爷回来了,找你呢。又得了好题目来了,快走快走!”宝玉听了,只得跟了出来。……彼时贾政正与众幕友谈论寻秋之胜;又说:“临散时忽然谈及一事,最是千古佳谈,‘风流俊逸忠义慷慨’八字皆备。到是个好题目,大家都要作一首挽词。”众人听了,都忙请教是何等妙题。贾政乃说:“近日有一位恒王,出镇青州。这恒王最喜女色,且公余好武,因选了许多美女,日习武事。……其姬中有一姓林行四者,姿色既冠,且武艺更精,皆呼为林四娘。恒王最得意,遂超拔林四娘统辖诸姬,又呼为姽婳将军。”众清客都称:“妙极神奇!竟以‘姽婳’下加‘将军’二字,更觉妩媚风流,真绝世奇文!想这恒王也是第一风流人物了。”…… 戚本第七十八回,括弧中句据程本补。 | |
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| + | 「官と為りし者は、家業凋零す。富貴なりし者は、金銀散じ尽く。恩ありし者は、死裏に逃生す。無情なる者は、分明に報応す。命を欠きし者は命すでに還り、涙を欠きし者は涙すでに尽きぬ。……破り看たる者は、空門に遁入し、痴迷せる者は、枉に性命を送れり。好く一つ似たり、食い尽くして鳥林に投ずるに。落ちたるは片の白茫茫たる大地、真に干浄なり。」(戚本第五回) | ||
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| + | 《石头记》结局,虽早隐现于宝玉幻梦中,而八十回仅露“悲音”,殊难必其究竟。比乾隆五十七年 一七九二 ,乃有百二十回之排印本出,改名《红楼梦》,字句亦时有不同,程伟元序其前云:“……然原本目录百二十卷,……爰为竭力搜罗,自藏书家甚至故纸堆中,无不留心。数年以来,仅积有二十余卷。一日,偶于鼓担上得十余卷,遂重价购之。……然漶漫不可收拾,乃同友人细加厘剔,截长补短,钞成全部,复为镌板以公同好。《石头记》全书至是始告成矣。”友人盖谓高鹗,亦有序,末题“乾隆辛亥冬至后一日”,先于程序者一年。 | ||
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| − | + | 后四十回虽数量止初本之半,而大故迭起,破败死亡相继,与所谓“食尽鸟飞独存白地”者颇符,惟结末又稍振。宝玉先失其通灵玉,状类失神。会贾政将赴外任,欲于宝玉娶妇后始就道,以黛玉羸弱,乃迎宝钗。姻事由王熙凤谋画,运行甚密,而卒为黛玉所知,咯血,病日甚,至宝玉成婚之日遂卒。宝玉知将婚,自以为必黛玉,欣然临席,比见新妇为宝钗,乃悲叹复病。时元妃先薨;贾赦以“交通外官倚势凌弱”革职查抄,累及荣府;史太君又寻亡;妙玉则遭盗劫,不知所终;王熙凤既失势,亦郁郁死。宝玉病亦加,一日垂绝,忽有一僧持玉来,遂苏,见僧复气绝,历噩梦而觉;乃忽改行,发愤欲振家声,次年应乡试,以第七名中式。宝钗亦有孕,而宝玉忽亡去。贾政既葬母于金陵,将归京师,雪夜泊舟毗陵驿,见一人光头赤足,披大红猩猩毡斗篷,向之下拜,审视知为宝玉。方欲就语,忽来一僧一道,挟以俱去,且不知何人作歌,云“归大荒”,追之无有,“只见白茫茫一片旷野”而已。“后人见了这本传奇,亦曾题过四句,为作者缘起之言更进一竿云:‘说到酸辛事,荒唐愈可悲,由来同一梦,休笑世人痴。’” 第一百二十回 | |
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| + | 然れども宝玉またも解せず、さらに他の夢を歴て寤む。元春の選ばれて妃と為るに逮びて、栄公府はいよいよ貴盛し、その帰省に及びて、大観園を辟きて以てこれを宴す。情親ことごとく至り、天倫の楽を極む。宝玉もまた漸く長じ、外にては秦鍾・蒋玉函に昵み、帰りてはすなわち姉妹中表および侍児の襲人・晴雯・平児・紫鵑の輩の間に周旋す。昵みてこれを敬い、その意に拂うを恐れ、愛は博くして心は労し、而して憂患もまた日に甚だしくなれり。 | ||
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| + | 全书所写,虽不外悲喜之情,聚散之迹,而人物事故,则摆脱旧套,与在先之人情小说甚不同。如开篇所说: | ||
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| − | + | 空空道人遂向石头说道:“石兄,你这一段故事,……据我看来:第一件,无朝代年纪可考;第二件,并无大贤大忠,理朝廷治风俗的善政。其中只不过几个异样女子——或情,或痴,或小才微善——亦无班姑、蔡女之德能。我纵钞去,恐世人不爱看呢。” | |
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| − | + | 石头笑曰:“我师何太痴也!若云无朝代可考,今我师竟假借汉、唐等年纪添缀,又有何难?但我想历来野史,皆蹈一辙;莫如我不借此套,反到新鲜别致,不过只取其事体情理罢了。……历来野史,或讪谤君相,或贬人妻女,奸淫凶恶,不可胜数。……至若才子佳人等书,则又千部共出一套,且其中终不能不涉于淫滥,以致满纸‘潘安子建’,‘西子文君’;……且环婢开口,即‘者也之乎’,非文即理,故逐一看去,悉皆自相矛盾,大不近情理之说。竟不如我半世亲睹亲闻的这几个女子,虽不敢说强似前代所有书中之人,但事迹原委,亦可以消愁破闷也。……至若离合悲欢,兴衰际遇,则又追踪蹑迹,不敢稍加穿凿,徒为哄人之目,而反失其真传者。……” 戚本第一回 | |
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| − | + | 盖叙述皆存本真,闻见悉所亲历,正因写实,转成新鲜。而世人忽略此言,每欲别求深义,揣测之说,久而遂多。今汰去悠谬不足辩,如谓是刺和珅 《谭瀛室笔记》 、藏谶纬 《寄蜗残赘》 、明易象 《金玉缘》评语 之类,而著其世所广传者于下: | |
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| − | + | 一、纳兰成德家事说 自来信此者甚多。陈康祺 《燕下乡脞录》五 记姜宸英典康熙乙卯顺天乡试获咎事,因及其师徐时栋 号柳泉 之说云:“小说《红楼梦》一书,即记故相明珠家事,金钗十二,皆纳兰侍御所奉为上客者也,宝钗影高澹人;妙玉即影西溟先生:‘妙’为‘少女’,‘姜’亦妇人之美称;‘如玉’‘如英’,义可通假。……”侍御谓明珠之子成德,后改名性德,字容若。张维屏 《诗人征略》 云:“贾宝玉盖即容若也;《红楼梦》所云,乃其髫龄时事。”俞樾 《小浮梅闲话》 亦谓其“中举人止十五岁,于书中所述颇合”。然其他事迹,乃皆不符;胡适作《红楼梦考证》 《文存》三 ,已历正其失。最有力者,一为姜宸英有《祭纳兰成德文》,相契之深,非妙玉于宝玉可比;一为成德死时年三十一,时明珠方贵盛也。 | |
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| + | この日、宝玉は湘雲の漸く癒ゆるを見て、然る後に黛玉を看に往く。まさに黛玉の昼寝を終えたばかりの時に当たり、宝玉は驚かすを敢えてせず。紫鵑がまさに回廊の上にて手に針仕事をしているのを見て、すなわち上がりて問う、「昨夜の咳は少しはましか。」紫鵑道う、「ましになりました。」宝玉道う、「阿弥陀仏、どうか良くなりますように。」紫鵑笑いて道う、「あなたも念仏するようになって、本当にニュースですこと。」宝玉笑いて道う、「いわゆる『病篤くして医を乱投す』というやつさ。」一面に言いつつ、彼女が弾墨綾子の薄綿袄を着て、外にはただ青緞子の挟背心だけを着ているのを見て、宝玉はすなわち手を伸ばして彼女の身の上を一撫でして言う—— | ||
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| + | 二、清世祖与董鄂妃故事说 王梦阮沈瓶庵合著之《红楼梦索隐》为此说。其提要有云:“盖尝闻之京师故老云,是书全为清世祖与董鄂妃而作,兼及当时诸名王奇女也。……”而又指董鄂妃为即秦淮旧妓嫁为冒襄妾之董小宛,清兵下江南,掠以北,有宠于清世祖,封贵妃,已而夭逝;世祖哀痛,乃遁迹五台山为僧云。孟森作《董小宛考》 《心史丛刊》三集 ,则历摘此说之谬,最有力者为小宛生于明天启甲子,若以顺治七年入宫,已二十八岁矣,而其时清世祖方十四岁。 | ||
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| − | + | 三、康熙朝政治状态说 此说即发端于徐时栋,而大备于蔡元培之《石头记索隐》。开卷即云:“《石头记》者,清康熙朝政治小说也。作者持民族主义甚挚,书中本事,在吊明之亡,揭清之失,而尤于汉族名士仕清者寓痛惜之意。……”于是比拟引申,以求其合,以“红”为影“朱”字;以“石头”为指金陵;以“贾”为斥伪朝;以“金陵十二钗”为拟清初江南之名士:如林黛玉影朱彝尊,王熙凤影余国柱,史湘云影陈维崧,宝钗妙玉则从徐说,旁征博引,用力甚勤。然胡适既考得作者生平,而此说遂不立,最有力者即曹雪芹为汉军,而《石头记》实其自叙也。 | |
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| − | + | === 第5節 === | |
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然谓《红楼梦》乃作者自叙,与本书开篇契合者,其说之出实最先,而确定反最后。嘉庆初,袁枚 《随园诗话》二 已云:“康熙中,曹练亭为江宁织造,……其子雪芹撰《红楼梦》一书,备记风月繁华之盛。中有所谓大观园者,即余之随园也。”末二语盖夸,余亦有小误 如以楝为练,以孙为子 ,但已明言雪芹之书,所记者其闻见矣。而世间信者特少,王国维 《静庵文集》 且诘难此类,以为“所谓‘亲见亲闻’者,亦可自旁观者之口言之,未必躬为剧中之人物”也,迨胡适作考证,乃较然彰明,知曹雪芹实生于荣华,终于苓落,半生经历,绝似“石头”,著书西郊,未就而没;晚出全书,乃高鄂续成之者矣。 | 然谓《红楼梦》乃作者自叙,与本书开篇契合者,其说之出实最先,而确定反最后。嘉庆初,袁枚 《随园诗话》二 已云:“康熙中,曹练亭为江宁织造,……其子雪芹撰《红楼梦》一书,备记风月繁华之盛。中有所谓大观园者,即余之随园也。”末二语盖夸,余亦有小误 如以楝为练,以孙为子 ,但已明言雪芹之书,所记者其闻见矣。而世间信者特少,王国维 《静庵文集》 且诘难此类,以为“所谓‘亲见亲闻’者,亦可自旁观者之口言之,未必躬为剧中之人物”也,迨胡适作考证,乃较然彰明,知曹雪芹实生于荣华,终于苓落,半生经历,绝似“石头”,著书西郊,未就而没;晚出全书,乃高鄂续成之者矣。 | ||
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| − | + | 雪芹名霑,字芹溪,一字芹圃,正白旗汉军。祖寅,字子清,号楝亭,康熙中为江宁织造。清世祖南巡时,五次以织造署为行宫,后四次皆寅在任。然颇嗜风雅,尝刻古书十余种,为时所称;亦能文,所著有《楝亭诗钞》五卷《词钞》一卷 《四库书目》 ,传奇二种 《在园杂志》 。寅子,即雪芹父,亦为江宁织造,故雪芹生于南京。时盖康熙末。雍正六年,卸任,雪芹亦归北京,时约十岁。然不知何因,是后曹氏似遭巨变,家顿落,雪芹至中年,乃至贫居西郊,啜粥,但犹傲兀,时复纵酒赋诗,而作《石头记》盖亦此际。乾隆二十七年,子殇,雪芹伤感成疾,至除夕,卒,年四十余 一七一九?——一七六三 。其《石头记》尚未就,今所传者止八十回 详见《胡适文选》 。 | |
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| + | しかれども『紅楼夢』は作者の自叙なりと謂い、本書の開篇と契合するものは、その説の出づること実に最も先にして、確定するは反って最も後なり。嘉慶の初め、袁枚(『随園詩話』二)すでに云う、「康熙中、曹練亭は江寧織造と為り、……その子雪芹は『紅楼夢』一書を撰し、備さに風月繁華の盛んなるを記す。中にいわゆる大観園なる者は、すなわち余が随園なり。」末の二語は蓋し誇りなり。余もまたいささかの小誤あり(楝を練と為し、孫を子と為すがごとし)。しかれどもすでに明らかに雪芹の書は、その聞見するところを記すと言えり。而して世間これを信ずる者は特に少なし。王国維(『静庵文集』)はまた難詰して、以て「いわゆる『親しく見親しく聞く』とは、また傍観者の口より言うことを得べし、必ずしも躬ら劇中の人物と為るにあらず」と為す。胡適の考証を作すに逮びて、すなわちいよいよ彰明にして、曹雪芹は実に栄華に生まれ、苓落に終わり、半生の経歴は「石頭」に絶似し、西郊に書を著すも、就らずして没す。晩に出づる全書は、すなわち高鶚の続成したるものなりと知る。 | ||
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| + | 言后四十回为高鹗作者,俞樾 《小浮梅闲话》 云:“《船山诗草》有《赠高兰墅鹗同年》一首云:‘艳情人自说《红楼》。’注云:‘《红楼梦》八十回以后,俱兰墅所补。’然则此书非出一手。按乡会试增五言八韵诗,始乾隆朝,而书中叙科场事已有诗,则其为高君所补可证矣。”然鹗所作序,仅言“友人程子小泉过予,以其所购全书见示,且曰:‘此仆数年铢积寸累之辛心,将付剞劂,公同好。子闲且惫矣,盍分任之。’予以是书……尚不背于名教,……遂襄其役。”盖不欲明言己出,而寮友则颇有知之者。鹗即字兰墅,镶黄旗汉军,乾隆戊申举人,乙卯进士,旋入翰林,官侍读,又尝为嘉庆辛酉顺天乡试同考官。其补《红楼梦》当在乾隆辛亥时,未成进士,“闲且惫矣”,故于雪芹萧条之感,偶或相通。然心志未灰,则与所谓“暮年之人,贫病交攻,渐渐的露出那下世光景来” 戚本第一回 者又绝异。是以续书虽亦悲凉,而贾氏终于“兰桂齐芳”,家业复起,殊不类茫茫白地,真成干净者矣。 | ||
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| − | + | 续《红楼梦》八十回本者,尚不止一高鹗。俞平伯从戚蓼生所序之八十回本旧评中抉剔,知先有续书三十回,似叙贾氏子孙流散,宝玉贫寒不堪,“悬崖撒手”,终于为僧;然其详不可考 《红楼梦辨》下有专论 。或谓“戴君诚夫见一旧时真本,八十回之后,皆与今本不同,荣宁籍没后,皆极萧条;宝钗亦早卒,宝玉无以作家,至沦于击柝之流。史湘云则为乞丐,后乃与宝玉仍成夫妇。……闻吴润生中丞家尚藏有其本” 蒋瑞藻《小说考证》七引《续阅微草堂笔记》 此又一本,盖亦续书。二书所补,或俱未契于作者本怀,然长夜无晨,则与前书之伏线亦不背。 | |
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| − | + | 此他续作,纷纭尚多,如《后红楼梦》、《红楼后梦》、《续红楼梦》、《红楼复梦》、《红楼梦补》、《红楼补梦》、《红楼重梦》、《红楼再梦》、《红楼幻梦》、《红楼圆梦》、《增补红楼》、《鬼红楼》、《红楼梦影》等。大率承高鹗续书而更补其缺陷,结以“团圆”;甚或谓作者本以为书中无一好人,因而钻刺吹求,大加笔伐,但据本书自说,则仅乃如实抒写,绝无讥弹,独于自身,深所忏悔。此固常情所嘉,故《红楼梦》至今为人爱重,然亦常情所怪,故复有人不满,奋起而补订圆满之。此足见人之度量相去之远,亦曹雪芹之所以不可及也。仍录彼语,以结此篇: | |
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| − | + | ……作者自云:因曾历过一番梦幻之后,故将真事隐去,而借“通灵”之说,撰此《石头记》一书也。……自又云:今风尘碌碌,一事无成,忽念及当日所有之女子,一一细考较去,觉其行止见识,皆出于我之上。何我堂堂须眉,诚不若彼裙钗女子?实愧则有余,悔又无益,是大无可如何之日也。当此,则自欲将已往所赖天恩祖德,锦衣纨裤之时,饫甘餍肥之日,背父兄教育之恩,负师友规训之德,以致今日一技无成,半生潦倒之罪,编述一集,以告天下人。我之罪固不免,然闺阁中本自历历有人,万不可因我之不肖,自己护短,一并使其泯灭。虽今日之茅椽蓬牖,瓦灶绳床,其晨夕风露,阶柳庭花,亦未有妨我之襟怀,束笔阁墨;虽我未学,下笔无文,又何妨用俚语村言,敷衍出一段故事来,亦可使闺阁照传,复可悦世之目,破人愁闷,不亦宜乎?…… 戚本第一回 | |
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| + | 雪芹の名は霑、字は芹渓、一字は芹圃、正白旗漢軍なり。祖の寅、字は子清、号は楝亭、康熙中に江寧織造と為る。清の世祖南巡の時、五次織造署を以て行宮と為す。後の四次は皆寅の在任中なり。しかれどもすこぶる風雅を嗜み、かつて古書十余種を刻し、時の称するところとなる。また能く文し、著すところに『楝亭詩鈔』五巻『詞鈔』一巻あり(『四庫書目』)、伝奇二種あり(『在園雑志』)。寅の子、すなわち雪芹の父もまた江寧織造と為る。故に雪芹は南京に生まる。時は蓋し康熙の末なり。雍正六年、任を卸し、雪芹もまた北京に帰る。時に約十歳なり。しかるに何の因によるか知らず、これより後、曹氏は巨変に遭いしごとく、家は頓に落ち、雪芹は中年に至りて、すなわち貧にして西郊に居し、粥を啜り、しかもなお傲兀にして、時にまた酒を縦にして詩を賦す。『石頭記』を作るは蓋しまたこの際なり。乾隆二十七年、子殤じ、雪芹傷感して疾を成し、除夕に至りて卒す。年四十余(一七一九?——一七六三)。その『石頭記』はなお就らず、今伝わるところはただ八十回のみなり(詳しくは『胡適文選』を見よ)。 | ||
| + | |- | ||
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| + | [1]E.Th.A.Hoffmann(1776—1822),德国的浪漫派作家。——译者 | ||
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| − | + | [2]Ilias,希腊诗人荷马(Hom eros)所作有名的两大史诗之一。——译者 | |
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| + | [3]“Le Tartuffe”法国笑剧作家莫利哀(J. B. P. Molière,1622—1673)的作品。——译者 | ||
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| − | [ | + | |- |
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| + | [4]Gordon Byron(1788—1824),英国诗人;Auguste Chateaubriand(1768—1848),法国作家,世称近代浪漫主义的开创者。——译者 | ||
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| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [5]Frsnz schubert(1797—1828)奥国有名的音乐家,最大功绩是在完成谣曲(Lied),世有“谣曲王”之称。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [6]陀思妥夫斯基的长篇小说,中国有李霁野译本,在《世界文学名著》中。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [7]Auklageliteratur,也曾译作“谴责小说”。——译者 | |
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| − | + | |- | |
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| − | + | [8]Katechismus,耶稣教中对于新入者用问等施以教化的方法。——译者 | |
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| − | + | [9]Dante Alighieri(1265—1321),意太利的大诗人;“叙事诗”即指他所作的《神曲》。——译者 | |
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| − | + | |- | |
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| − | + | [10]这里引的是第十一章,但原译和本文即微有不同,所以现在也不改和本文一律。——译者 | |
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| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [11]Sbiten是一种用水,蜜,莓叶或紫苏做成的饮料,下层阶级当作茶喝的。——译者 | |
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| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [12]Samovar是一种茶具,用火暖着茶,不使冷却,象中国的火锅一样。——译者 | |
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| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [13]这是纯粹的俄国姓名,却自称外国人,所以从他们看来,是可笑的。——译者 | |
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| − | + | |- | |
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| − | + | [14]Kotzebue(1761—1819)德国的戏曲作家。——译者 | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [15]Partie Boston是叶子牌的一种。——译者 | |
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| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [16]法国话,直译是“恶魔捉我”,意译是“任其自然”。——译者 | |
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| − | + | |- | |
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| − | + | [17]俄国旧例,每人都有两个名字,例如这里的保甫尔·伊凡诺维支·乞乞科夫,末一个是姓,第一个是他自己的本名,中间的就是父称,译出意义来,是“伊凡之子”,或是“少伊”。平常相呼,必用本名连父称。否则便是失礼。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
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| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [18]Versta,俄里名。每一俄里,约合中国市里二里余。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
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| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [19]Bogdan和Selifan都是人名。这两句话,犹言既非城里的绅士,又非乡下的农夫。——译者 | |
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| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [20]Grazie是神女们,分掌美,文雅和欢喜,出希腊神话。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
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| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [21]完全中立的关于历史,政治,文学的杂志,一八一二年至一八五二年,在彼得堡发行。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 後の四十回を高鶚の作と言う者は、俞樾(『小浮梅閑話』)の云う、「『船山詩草』に『高蘭墅鶚同年に贈る』一首あり、『艶情人自ら紅楼を説く』と云う。注に云う、『紅楼夢は八十回以後、すべて蘭墅の補うところなり。』然らばこの書は一手より出でたるにあらず。按ずるに郷会試に五言八韻の詩を増すは、乾隆朝に始まる。而して書中に科場の事を叙するにすでに詩あれば、その高君の補いしところなるを証すべし。」と。しかれども鶚の作りし序には、ただ「友人程子小泉、余を過り、その購うところの全書を以て示し、かつ曰く、『これ僕の数年銖積寸累の辛心なり。まさに剞劂に付して、同好に公にせんとす。子は閑にしてかつ惫れたり、盍ぞこれを分担せざるや。』余以てこの書は……なお名教に背かず……遂にその役を襄く。」と言うのみ。蓋し己より出づるを明言するを欲せざるも、而して僚友にはすこぶるこれを知る者あり。鶚はすなわち字を蘭墅と曰い、鑲黄旗漢軍にして、乾隆戊申の挙人、乙卯の進士、旋いで翰林に入り、侍読に官す。またかつて嘉慶辛酉の順天郷試の同考官と為る。その『紅楼夢』を補うは、まさに乾隆辛亥の時に当たり、いまだ進士と成らず、「閑にしてかつ惫れたり」なれば、雪芹の蕭条の感に偶々あるいは相通ず。しかれども心志いまだ灰ならざれば、いわゆる「暮年の人、貧病交々攻め、漸く下世の光景を露出す」(戚本第一回)という者とはまた絶えて異なる。ここを以て続書もまた悲涼なりといえども、賈氏は終に「蘭桂斉しく芳し」くして、家業復興し、殊に茫茫たる白地、真に干浄と成るがごときものには類せざるなり。 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | [22]Kutusov,一八一二年拿破仑进攻俄国时,给他打退了的有名的将军。——译者 | ||
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| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [23]Pavel Petrovich(1754——1801),指俄皇彼得第一世,是对于军队的服饰和教练,非常认真的人。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [24]Prometheus,希腊神话上的天神和地祇所生的巨人之一,因把天神宙斯(Zeus)从人间取回之火,又送给人类,被罚,锁在高加索斯(Caucasus)山的岩石上,白昼有大鹫啄食其肝,夜又复生如故。后为赫尔库来斯(Hercules)所释放。这里所用的意义,和原典有些不符。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [25]Publius Ovidius Naso(B. C. 43—18 A. D),罗马的著名的诗人。著有《变形记》(Metamorphoses),今尚存。——译者 | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [26]Korobochika,“小箱”或“小窝”之意。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [27]Pud,四十俄磅为一普特。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [28]Petr Saveliev Neuvazhai—koruito,意云“蔑视洗濯水槽的彼得·萨惠略夫”。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [29]Korovuii kirpitch otto Buek的德译本作“母牛屎”,S. Graham序的英译本和上田进的日译本均作“母牛砖”,虽然直译原语,却不象诨名,也许倒是不对的。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [30]Kolovi Ivan,译出来,是“轮子伊凡”的意思。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [31]Philiporka,耶稣复活节前的精进期。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [32]Karlsbad,德国的温泉场。先前的俄国贵族是很喜欢到那里去的,但大抵只为了玩耍,并不是来养病的。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [33]Buchara,中央亚细亚的地名。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [34]Doublet,纸牌比赛的一种。——译者 | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [35]Galbik,打牌之一种。——译者 | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [36]Bankishka,同上。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [37]“大批”之意。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [38]乞乞科夫的本名和父称是保甫尔·伊凡诺维支,罗士特来夫却乱叫作阿波克勒杜克(Opodeldok)伊凡诺维支,在那时的俄国是算很失礼的。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [39]Thenardi,那时的著名的马戏班子。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [40]Saveli Sibiriakov,这是俄国人的名姓。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [41]John Churchill Marlborough(1650—1722),英国的大将,以常胜著名。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [42]硝强水和盐强水的混合物。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [43]恰如我们的叫猴子作阿三一样,俄国呼熊为“米莎”,这就是米哈尔的爱称。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [44]Bagration(1766—1812),是参加拿破仑战争的俄国著名将军。——译者 | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [45]Goga i Magoga,都是背叛天国的人。——译者 | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [46]Kosichai是俄国传说中的人物,充着“无常”的脚色的,也就是“死”。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 続『紅楼夢』は八—— | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | [47]一八一二年。——译者 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [48]十卢布的钞票。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [49]Friedrich Schiller(1759—1805),德国有名的诗人和戏曲家。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [50]Torshok,那时有名的,以买卖米麦和皮革制品为主的市场。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [51]Vorobi,“麻雀”之意。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [52]在河面凿开冰,以便汲水或洗濯东西的洞穴。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [53]“服罗吉多”,据Otto Buek译,是“飞脚”的意思。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [54]这是一种游戏,先排小骨成列,再从一定的地方,把一块小骨抛过去,将列中的小骨打倒,打倒得最多者胜。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [55]Eau de Cologne,一种香水。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [56]Homeros世界上最大的叙事诗人,约二千八百余年前,生于希腊,著有“Iliad”与“Odyssey”二大史诗,今存。——译者 | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [57]Zeus,希腊神话上最高的大神,亦见于荷马的史诗中。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [58]Themis,希腊神话里的法律之神。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [59]Aichin,一阿耳申约中国二尺余。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |- | |
| − | + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | |
| − | + | [60]但丁(Dante Alighieri)作《神曲》,自记游历地狱,净罪,天堂三界,引导他的是罗马的大诗人斐尔吉留斯(Virgilius,70—19 B.C.)。——译者 | |
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| − | + | |} | |
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| − | + | === 第6節 === | |
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| − | + | ! style="width:50%; background-color:#f0f0f0;" | 中文 | |
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第八卷 | 第八卷 | ||
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| + | 宅无吉凶摄生论 难上 各本无此二字。旧校亦删 | ||
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| + | 夫善求寿强者,必先知夭 各本作灾。旧校同。案:夭疾与寿强为对文。原钞于义为长 疾之所自来,然后其至可防也。祸起于此,为防于彼;则祸无自瘳矣。世有安宅,葬埋,阴阳,度 原作步。据各本及旧校改 数,刑德之忌,是何所生乎?不见性命,不知祸福也。不见故妄求,不知故干 程本讹于 幸。是以善执生者,见性命之所宜,知祸福之所来。故求之实,而防之信,夫多饮而走,则为澹支;数行而风,则为养 各本作痒 毒;久居于湿,则要疾偏枯;好内不怠,则昏丧女疾 各本讹文房 。若此之类,灾之所以来,寿之所以去也。而掘墓 各本作基 筑室 各本作宅 ,费日苦身以求之,疾生于形,而治加于土木,是疾无道瘳矣 各本字无 。诗云 各本作曰 :恺悌君子,求福不回者,匪避谤议而为义然也;盖知回匪所求福也;故寿强。专 程本讹传 气致柔,少私寡欲,直行情性之所宜,而合于养生之正度。求之于怀抱之内,而得之矣。尝有不知蚕者,出口动手,皆为忌祟;不 张燮本讹既 得蚕滋 原作丝。今正各本丝下仍有滋字,非 甚,为忌祟滋多;犹自以犯之也。有教之知蚕者,其颛于桑火寒暑燥湿也,于是百忌自息,而为 原钞字无 利十倍。何者?先不知所以然,故忌祟之情繁;后知所以然者 各本字无 ,故求之之 原钞字无。据各本加 术正。故忌祟常 各本字无 生于不知,使知性命犹知 各本作如。非 蚕,则忌祟无所立矣。多食不消,含黄丸而筮祝 程本讹记 谴祟,或从乞胡求福者,凡人 各本人下有皆字 所笑之。何者?以智能达 原作迁。据各本改 其无祸也。胡忌祟举生于不知,由知者言之,皆乞胡也。设为三公之宅,而令 《御览》一百八十引作命 愚民居之,必不为三公,可知也。夫寿夭之不可求,甚于贵贱。然则择百年之宫,而望殇子之寿;孤逆魁罡 各本作冈,《御览》作忌 ,以速彭祖之夭;必不几 二字《御览》作诬 矣。或曰:愚民必不得久居公侯宅。然则果无宅 五字原夺。据各本加 也,是性命自然,不可求矣。有贼方至,不疾逃,独安须臾,遂为所虏。然则避祸趣 程张燮本作趋。旧校同 福,无过缘理。避贼之理,莫如速逃,则斯善矣。养生之道,莫如先知 二字从旧校。各本同 ,则为尽矣。夫避贼宜速章章然,故中人不难睹;避祸之理冥冥然,故明者不易见;其于理动,不可妄 原钞作妖。各本作要。今以意正 求,一也。孔子有疾,医 医下原有监字。旧校作者。案:即因医字讹衍也。今除去。各本亦无 曰:子居处适也,饮食药也,有疾天也,医焉能事?是以知命不忧,原始要 各本作反 终,遂知死生之说。夫时日谴祟,古之盛王无之,而季王之所好听也。制寿宫而得夭短,求百男而无立嗣,必占不启之陵,而陵不宿草。何者?高台深宫,以隔寒暑;靡色厚味,以毒其精;亡之于实,而求之于虚;故性命不遂也。或曰:所问之师不工,则天下无工师矣。夫一棲 《御览》一百十八引作同栖 之鸡,一阑 原作兰,今正。各本作栏。下诸阑字放此 之羊,宾至而有死者,岂居异哉?故命有制也。知命者则不滞于俗矣。若许负之相,条侯英布之黥而后王,彭祖三百 各本作七百。旧校同。下诸三百字放此 ,殇子之夭,是皆性命也。若相宅质居,自东徂西,而得反此,是灭性命之宜。孔子登东山而小鲁,登泰山而小天下,立丘而观居 各本立下有高字,观下有民字,旧校亦加 ,则知伯 疑徂之讹。各本作曰 东西非祸福矣。若乃忘地道之博岂 各本作爽塏 ,而心 各本作立 制于帷墙,则所见滋褊。从达者观之,则 字惟张燮本有。他本俱无。黄本亦有 夫乾确然示人易矣;夫坤然示人简矣。天地易简,而惧以细苛,是更所以为逆也。是以君子奉天明而事地察,世之工师,占成居则验,使造新则无征。世人多其占旧,思 各本作因 求其造新,是见舟之行于水,而欲推之于陆,是不明数也。夫旧新 各本讹断 之理,犹卜筮也。夫凿龟数筴,可以知吉凶;然不能为吉凶。何者?吉凶可知,而不可为也。夫先筮吉卦,而后名之无福,犹先筑利宅,而后居之无报也。占旧居以谴祟则可,安新居以求福则不可。即 各本作则 犹卜筮之说耳。俗有裁衣种谷,皆择日,衣者伤寒,种者失泽。凡火流寒至,则当 黄本字无 授衣;时雨既降,则当下种。贼方至,则当疾走。今舍实趣虚,故三患随至。凡以忌祟治家者,求富 各本作福 而其极皆贫。故有“知星宿,衣不覆”之谚。古言无虚,不可不察也。 | ||
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| + | 第八巻 | ||
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| + | 难宅无吉凶摄生论 原作《难摄生中》。依各本及旧校改 | ||
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| + | 夫神祗遐远,吉凶难明。虽中人自竭,莫得其端,而易以惑道。故夫子寝答于来问,终慎神怪而不言。是以吉人 各本作古人。下诸吉人字放此 显仁于物,藏用于身。知其不可,众所共非,故隐之,彼非所明也。吾无意于庶几,而足下师心陋见,断然不疑。系决如此,足以独断。思省来论,旨多不通。谨因来言,以生此难。方推金木,未知所在,莫有食治。世无自理之道,法无独善之术。苟非其人,道不虚行,礼乐政刑,经常外事,犹有所疏;况乎幽微者邪?纵欲辩明神微,袪惑 程本讹感 ,起滞,立端,以明所由 黄汪二张本由下空一字。程本作立。盖意加 ;断以检 各本检下有其字 要,乃为有徴 黄汪二张本作□微。程本作阐微。俱误 。若但撮提群愚 黄汪二张本愚下空二字。程本作不察。亦意加 ,蚕种忿而弃之,因谓无阴阳吉凶之理,得无似噎而怨粒稼,溺而责舟楫者邪? | ||
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| + | 论曰:百年之宫,不能令殇子寿;孤逆魁罡,不能令彭祖夭。又曰:许负之相,条侯英布之黥而后王,皆性命也。应曰:此为命有所定,寿有所在。其 各本字无 祸不可以智逃,福不可以力致。英布畏痛,卒罹刀锯。亚夫忌馁,终有饿患,万事万物,凡所遭遇,无非相命也。然唐虞之世,命何同延?长平之卒,命何同短?此吾之所疑也。即如所论,虽慎若曾颜,不得免祸。恶若桀跖,故当昌炽。吉凶素定,不可推移。则古人何言:积善之家,必有余庆?履信思顺,自天祐之?必积善而后福应,信著而后祐来;犹罪之招罚,功之致赏也。苟先积而后受报,事理所得,不为暗自遇之也。若皆谓之是相,此为决相命于行事,定吉凶于智力,恐非本论之意。此又吾之所疑也。又云:多食不消,必须黄丸。苟命自当生,多食何畏?而服良药?若谓服药是相之所一,宅岂非是一邪?若谓虽命犹当须药自济;何知相不须宅以自辅乎?若谓药可论而宅不可说,恐天下或有说之者矣。既曰寿夭不可求,甚于贵贱;而复曰善求寿强者,必先知夭 各本作灾,非 疾之所自来,然后可防也。然则寿夭果可求邪?不可求也?既曰彭祖三百,殇子之夭,皆性命自然;而复曰不知防疾,致寿去夭;求实于虚,故性命不遂。此为寿夭之来,生于用身,性命之遂,得于善求。然则夭短者,何得不谓之愚?寿延者,何得不谓之智?苟寿夭成于愚智,则自然之命不可求之论,奚所措之?凡此数事 各本作者 ,亦雅论之矛戟 惟程荣本与此合。他本俱作楯非 矣。 | ||
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| + | 宅に吉凶なき摂生論 上を難ず | ||
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| + | 论曰:专气致柔,少私寡欲;直行情性之所宜,而合养生之正度。求之于怀抱之内,而得之矣。文曰:善养生者,和为尽矣。诚哉斯言!匪谓不然。但谓全生不尽此耳。夫危邦不入,所以避乱政之害。重门击柝,所以备 各本作避 狂暴之灾。居必爽垲,所以远气 各本作风 毒之患。凡事之在外能为害者,此未足以尽其数也。安在守一和 黄汪程本作利 而可以为尽乎?夫专静寡欲,莫过 各本作若 单豹,行年七十,而有童孺之色。可谓柔和之用矣。而一旦为虎所食,岂非恃内而忽外邪?若谓豹相正当给厨 二张本作虎 ,虽智不免,则寡欲何益?而云养生可得?若单豹以未尽善而致灾,则辅生之道,不止于一和。苟和 二字原夺。据各本补 未足保生,则外物之为患者,吾未知其所济 各本作齐 矣。 | ||
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| + | 论曰:师占成居则有验,使造新则无征。请问占成居而有验者,为但占墙屋邪?占居者之吉凶也?若占居者而知盛衰,此自占人,非占成居也。占成居而知吉凶,此为宅自有善恶,而居者从之。故占者观表,而得内也。苟宅能制人使从之 已上十七字各本夺 ,则当吉之人,受灾于凶宅;妖逆无道,获福于吉居。尔为吉凶之致,唯宅而已?更令 原作全。依各本改 由人也,新便无征邪?若吉凶故当由人,则虽成居,何得而后 各本作云 有验邪?若此,果可占邪?不可占也?果有宅邪?其无宅也? | ||
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| + | 论曰:宅犹卜筮,可以知吉凶,而不能为吉凶也。应曰:此相似而不同。卜者吉凶无豫,待物而应,将来之兆 各本讹地 也。相宅不问居者之贤愚,唯睹已然。有传者,已成之形也。犹睹龙颜,而知当贵。见纵理,而知当饿 旧校于下加死字。各本亦有。而无当字 。然各有由,不为暗中也。今见其同于得吉凶,因谓相宅,与卜不异,此犹见琴而谓之箜篌,非但不知琴也。纵如论宅与卜同,但能知而不能 四字原夺。据各本加 为,则吉凶已成,虽知何益?卜与不卜,了无所在;而吉人将有为,必曰问之龟筮吉,以定所由差,此岂徒也哉?此复吾之所疑也。武王营周,则云考卜唯王,宅是镐京。周公迁邑,乃卜涧,终惟洛食。又曰:卜其宅兆而安厝之,古人修之,于昔如彼;足下非之,于今如此。不知谁定可从? | ||
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| + | 论曰:为三公宅,而愚民必不为三公,可知也。或曰:愚民必不得久居公侯宅。然则果无宅也?应曰:不谓吉宅,能独成福,但谓君子既有贤才,又卜其居,顺履 二字各本作复顺 积德,乃享元吉。犹夫良农既怀善艺,又择沃土,复加耘耔,乃有盈仓之报耳。今见愚民不能得福于吉居,便谓宅无善恶,何异睹种 各本作田 者之无十千,而谓田无壤塉邪?良田虽美,而稼不独茂;卜宅虽吉,而功不独成。相须之理诚然,则宅之吉凶,未可惑也。今信征祥,则弃人理之所宜;守卜相则绝阴阳之凶吉 各本二字到 ;持智 原钞字夺。据旧校加。各本作知 力则忘天道之所存;此何异识时雨之生物,因垂拱 程本讹持 而望嘉谷乎?是故疑怪之论生,偏是之议兴,所托不一,乌能相通?若夫兼而善之者,得无半非冢宅邪。 | ||
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| + | それ善く寿強を求むる者は、必ず先ず夭疾の自ら来たるところを知り、然る後にその至るを防ぐべきなり。禍はここに起こりて、防ぐはかしこに為す。すなわち禍は自ら瘳ゆるなし。世に安宅・葬埋・陰陽・度数・刑徳の忌あり、これ何より生ずるか。性命を見ず、禍福を知らざるなり。見ざる故に妄りに求め、知らざる故に幸を干す。ここを以て善く生を執る者は、性命の宜しきところを見、禍福の来たるところを知る。故にこれを実に求め、これを信に防ぐ。それ多く飲みて走れば、すなわち澹支と為り、しばしば行きて風に当たれば、すなわち痒毒と為り、久しく湿に居れば、すなわち要疾偏枯し、内を好みて怠らざれば、すなわち昏喪して女疾す。かくのごときの類は、災の来たるゆえんにして、寿の去るゆえんなり。而して墓を掘り室を築き、日を費やし身を苦しめて以てこれを求む。疾は形に生じて、治は土木に加う。これ疾の瘳ゆる道なし。詩に云う、「恺悌の君子、福を求めて回らず」とは、謗議を避けて義然たるにあらざるなり。蓋し回は福を求むるところにあらざるを知ればなり。故に寿強なり。気を専らにして柔を致し、私を少なくして欲を寡くし、直ちに情性の宜しきところを行いて、養生の正度に合す。これを懐抱の内に求めて、これを得たり。かつて蚕を知らざる者あり、口を出だし手を動かすに、みな忌祟と為す。蚕を得ること滋ますます甚だしからず、忌祟のためにますます多し。なおみずから犯すと以為えるなり。蚕を知る者あり、これに教えて、蚕はもっぱら桑と火と寒暑燥湿にあるを知らしむれば、ここにおいて百忌おのずから息み、利すること十倍なり。何となれば、先ず然る所以を知らざれば、故に忌祟の情繁く、後に然る所以を知る者は、故にこれを求むるの術正し。故に忌祟は常に不知より生ず。性命を知ることなお蚕を知るがごとくならしめば、忌祟は立つところなし。多く食して消さざれば、黄丸を含みて筮祝し谴祟を祓い、あるいは胡に従いて福を求むる者は、およそ人の笑うところなり。何となれば、智もてその禍なきを達するを以てなり。忌祟のことごとく不知より生ずること、知る者よりこれを言えば、みな胡に乞うがごとし。設けて三公の宅と為し、愚民をしてこれに居らしめば、必ずしも三公と為らず。知るべきなり。それ寿夭の求むべからざること、貴賤よりも甚だし。然らば百年の宮を択びて殤子の寿を望み、魁罡を孤逆して彭祖の夭を速めんとすること、必ず幾からず。あるいは曰く、愚民は必ずしも久しく公侯の宅に居るを得ず、と。然らば果たして宅なきなり。これ性命は自然にして求むべからず。賊の方に至らんとするに、疾く逃げずして、独り須臾を安んぜば、遂に虜するところとなる。然らば禍を避け福に趣くは、理に縁るに過ぐるはなし。賊を避くるの理は、速く逃ぐるにしくはなし。すなわちこれ善なり。養生の道は、先ず知るにしくはなし。すなわち尽くすを為す。それ賊を避くるは速やかなるべきこと章々として然り。故に中人も睹るを難しとせず。禍を避くるの理は冥々として然り。故に明者も見ること易からず。その理に動くにおいては、妄りに求むべからず、一なり。孔子疾あり、医—— | ||
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| + | 论曰:时日谴祟,古盛王无之,季王之所好。听此言善矣,顾其不尽然。汤祷桑林,周公秉圭,不知是谴祟非也?吉日惟戊,既伯既祷,不知是时日非也?此皆足下家事,先师所立,而一朝背之,必若汤周未为盛王,幸更思 各本作详 之。又当校 各本字夺。旧校亦删 知二贤,何如足下邪? | ||
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| + | 论曰:贼方至,以疾走为务;食不消,以黄为先。子徒知此为贤于安须臾,与求乞胡;而不知制贼病于无形,事功幽而无跌也。夫救火以水,虽自多于抱薪,而不知曲突之先物也 各本作矣 。况乎天下微事,言所不能及,数所不能分?是以古人存而不论,神而明之,遂知来物。故能独观于万化之前,收功于大顺之后。百姓谓之自然,而不知所以然。若此,岂常理之所逮邪?今形象著明,有数者,犹尚滞之;天地广远,品物多方,智之所知,未若所不知者众也。今执避贼消谷 四字各本作辟谷 之术,谓养生已备,至理已尽;驰心极观,齐此而还,意所不及,皆谓无之。欲据所见,以定古人之所难言,得无似蟪蛄之议冰雪邪?欲以所识 识下当夺六字。黄汪二张本作而□□□之所。程本而下作求今人。旧校作决古人。盖皆意补 弃,得无似戎 原作终。据各本改 人问布于中国,睹麻种而不事邪?吾怯于专断,进不敢定祸福于卜相,退不敢谓家无吉凶也。 | ||
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| − | + | === 第7節 === | |
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第五篇 ,大旨悉同,当即此篇所本。明人汤显祖之《邯郸记》,则又本之此篇。既济文笔简炼,又多规诲之意,故事虽不经,尚为当时推重,比之韩愈《毛颖传》;间亦有病其俳谐者,则以作者尝为史官,因而绳以史法,失小说之意矣。既济又有《任氏传》 见《广记》四百五十二 一篇,言妖狐幻化,终于守志殉人,“虽今之妇人有不如者”,亦讽世之作也。 | 第五篇 ,大旨悉同,当即此篇所本。明人汤显祖之《邯郸记》,则又本之此篇。既济文笔简炼,又多规诲之意,故事虽不经,尚为当时推重,比之韩愈《毛颖传》;间亦有病其俳谐者,则以作者尝为史官,因而绳以史法,失小说之意矣。既济又有《任氏传》 见《广记》四百五十二 一篇,言妖狐幻化,终于守志殉人,“虽今之妇人有不如者”,亦讽世之作也。 | ||
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第五篇の大旨はすべて同じく、すなわちこの篇の典拠となったものである。明の湯顕祖の『邯鄲記』は、またこの篇に基づいている。既済の文筆は簡練で、かつ規誡の意が多く、故事は荒唐ではあるが、当時なお推重されて韓愈の『毛穎伝』に比せられた。たまに諧謔を病む者もあったが、それは作者がかつて史官であったため、史法をもってこれを律し、小説の本意を失ったのである。既済にはまた『任氏伝』(『広記』四百五十二に見える)一篇があり、妖狐の幻化を語り、ついに志を守って人に殉じ、「今の婦人にも及ばぬ者がある」と述べた、やはり世を諷する作である。 | 第五篇の大旨はすべて同じく、すなわちこの篇の典拠となったものである。明の湯顕祖の『邯鄲記』は、またこの篇に基づいている。既済の文筆は簡練で、かつ規誡の意が多く、故事は荒唐ではあるが、当時なお推重されて韓愈の『毛穎伝』に比せられた。たまに諧謔を病む者もあったが、それは作者がかつて史官であったため、史法をもってこれを律し、小説の本意を失ったのである。既済にはまた『任氏伝』(『広記』四百五十二に見える)一篇があり、妖狐の幻化を語り、ついに志を守って人に殉じ、「今の婦人にも及ばぬ者がある」と述べた、やはり世を諷する作である。 | ||
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| + | “吴兴才人” 李贺语 沈亚之字下贤,元和十年进士第,太和初为德州行营使者柏耆判官,耆以罪贬,亚之亦谪南康尉,终郢州掾 约八世纪末至九世纪中 ,集十二卷,今存。亚之有文名,自谓“能创窈窕之思”,今集中有传奇文三篇 《沈下贤集》卷二卷四,亦见《广记》二百八十二及二百九十八 ,皆以华艳之笔,叙恍忽之情,而好言仙鬼复死,尤与同时文人异趣。《湘中怨》记郑生偶遇孤女,相依数年,一旦别去,自云“蛟宫之娣”,谪限已满矣,十余年后,又遥见之画舻中,含悲歌,而“风涛崩怒”,竟失所在。《异梦录》记邢凤梦见美人,示以“弓弯”之舞;及王炎梦侍吴王久,忽闻笳皷,乃葬西施,因奉教作挽歌,王嘉赏之。《秦梦记》则自述道经长安,客橐泉邸舍,梦为秦官有功,时弄玉婿箫史先死,因尚公主,自题所居曰翠微宫。穆公遇亚之亦甚厚,一日,公主忽无疾卒,穆公乃不复欲见亚之,遣之归。 | ||
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「呉興の才人」(李賀の語)沈亜之は字を下賢といい、元和十年に進士に及第し、太和の初めに徳州行営使の柏耆の判官となったが、耆が罪を得て貶せられ、亜之もまた南康尉に左遷され、郢州の掾に終わった(およそ八世紀末から九世紀中頃)。集は十二巻、今も存する。亜之は文名があり、自ら「窈窕の思いを創り得る」と称した。今の集中に伝奇文が三篇あり(『沈下賢集』巻二・巻四、また『広記』二百八十二および二百九十八に見える)、いずれも華艶なる筆をもって恍惚たる情を叙し、仙鬼の復死を好んで語るところは、同時の文人と殊に趣を異にしている。『湘中怨』は鄭生がたまたま孤女に出会い、相依ること数年、ある日別れ去って、自ら「蛟宮の妹」と称し、謫限はすでに満ちたと言い、十余年後にまた遠くこれを画舫の中に見かけ、悲しげに歌うのを聞いたが、「風涛崩怒」して、ついにその所在を見失った。『異夢録』は邢鳳が夢に美人に見え、「弓弯」の舞を示されたこと、および王炎が夢に呉王に久しく仕え、にわかに笳鼓を聞けば西施の葬礼で、教えに従って挽歌を作ると、王がこれを嘉賞したことを記す。『秦夢記』は自ら長安を経て橐泉の邸舎に宿り、夢に秦の官となって功あり、時に弄玉の婿の蕭史がまず死んでいたため、公主を娶り、その居所を翠微宮と自ら題したことを述べる。穆公の亜之への待遇もまた甚だ厚かったが、ある日公主が突然無病にして卒し、穆公はもう亜之に会おうとせず、帰国させた。 | 「呉興の才人」(李賀の語)沈亜之は字を下賢といい、元和十年に進士に及第し、太和の初めに徳州行営使の柏耆の判官となったが、耆が罪を得て貶せられ、亜之もまた南康尉に左遷され、郢州の掾に終わった(およそ八世紀末から九世紀中頃)。集は十二巻、今も存する。亜之は文名があり、自ら「窈窕の思いを創り得る」と称した。今の集中に伝奇文が三篇あり(『沈下賢集』巻二・巻四、また『広記』二百八十二および二百九十八に見える)、いずれも華艶なる筆をもって恍惚たる情を叙し、仙鬼の復死を好んで語るところは、同時の文人と殊に趣を異にしている。『湘中怨』は鄭生がたまたま孤女に出会い、相依ること数年、ある日別れ去って、自ら「蛟宮の妹」と称し、謫限はすでに満ちたと言い、十余年後にまた遠くこれを画舫の中に見かけ、悲しげに歌うのを聞いたが、「風涛崩怒」して、ついにその所在を見失った。『異夢録』は邢鳳が夢に美人に見え、「弓弯」の舞を示されたこと、および王炎が夢に呉王に久しく仕え、にわかに笳鼓を聞けば西施の葬礼で、教えに従って挽歌を作ると、王がこれを嘉賞したことを記す。『秦夢記』は自ら長安を経て橐泉の邸舎に宿り、夢に秦の官となって功あり、時に弄玉の婿の蕭史がまず死んでいたため、公主を娶り、その居所を翠微宮と自ら題したことを述べる。穆公の亜之への待遇もまた甚だ厚かったが、ある日公主が突然無病にして卒し、穆公はもう亜之に会おうとせず、帰国させた。 | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 将去,公置酒高会,声秦声,舞秦舞,舞者击膊拊髀呜呜而音有不快,声甚怨。……既,再拜辞去,公复命至翠微宫与公主侍人别,重入殿内时,见珠翠遗碎青阶下,窗纱檀点依然,宫人泣对亚之。亚之感咽良久,因题宫门诗曰:“君王多感放东归,从此秦宫不复期,春景自伤秦丧主,落花如雨泪胭脂。”竟别去,……觉卧邸舍。明日,亚之与友人崔九万具道;九万,博陵人,谙古,谓余曰:“《皇览》云,‘秦穆公葬雍橐泉祈年宫下’,非其神灵凭乎?”亚之更求得秦时地志,说如九万云。呜呼!弄玉既仙矣,恶又死乎? | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
去るに臨み、公は酒宴を大いに設け、秦の音を奏し、秦の舞を舞わせた。舞う者は膊を打ち髀を撫でて嗚嗚と声を発するも、音に快からぬものがあり、声は甚だ怨みがましかった。……やがて再拝して辞し去り、公はまた翠微宮に至って公主の侍人と別れよと命じた。殿内に再び入った時、珠翠の欠片が青い階の下に散乱し、窓紗の檀点は依然としてあり、宮人は亜之に向かって泣いた。亜之は感じ入って長く咽び、やがて宮門に詩を題して曰く、「君王多感にして東帰を放ち、此より秦宮また期すべからず、春景自ら秦の主を喪いしを傷み、落花雨の如く泪は胭脂なり」と。ついに別れ去り、……邸舎に覚めた。翌日、亜之は友人の崔九万にこの経緯を詳しく語った。九万は博陵の人で古事に通じており、余に謂って曰く、「『皇覧』に云う、『秦の穆公は雍の橐泉の祈年宮の下に葬る』と。その神霊の憑依したるにあらずや」と。亜之はさらに秦代の地誌を求め得たが、九万の言うとおりであった。ああ、弄玉はすでに仙人となったのに、どうしてまた死ぬことがあろうか。 | 去るに臨み、公は酒宴を大いに設け、秦の音を奏し、秦の舞を舞わせた。舞う者は膊を打ち髀を撫でて嗚嗚と声を発するも、音に快からぬものがあり、声は甚だ怨みがましかった。……やがて再拝して辞し去り、公はまた翠微宮に至って公主の侍人と別れよと命じた。殿内に再び入った時、珠翠の欠片が青い階の下に散乱し、窓紗の檀点は依然としてあり、宮人は亜之に向かって泣いた。亜之は感じ入って長く咽び、やがて宮門に詩を題して曰く、「君王多感にして東帰を放ち、此より秦宮また期すべからず、春景自ら秦の主を喪いしを傷み、落花雨の如く泪は胭脂なり」と。ついに別れ去り、……邸舎に覚めた。翌日、亜之は友人の崔九万にこの経緯を詳しく語った。九万は博陵の人で古事に通じており、余に謂って曰く、「『皇覧』に云う、『秦の穆公は雍の橐泉の祈年宮の下に葬る』と。その神霊の憑依したるにあらずや」と。亜之はさらに秦代の地誌を求め得たが、九万の言うとおりであった。ああ、弄玉はすでに仙人となったのに、どうしてまた死ぬことがあろうか。 | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 陈鸿为文,则辞意慷慨,长于吊古,追怀往事,如不胜情。鸿少学为史,贞元二十一年登太常第,始闲居遂志,乃修《大统纪》三十卷,七年始成 《唐文粹》九十五 ,在长安时,尝与白居易为友,为《长恨歌》作传 见《广记》四百八十六 。《新唐志》小说家类有陈鸿《开元升平源》一卷,注云“字大亮,贞元主客郎中”,或亦其人也 约八世纪后半至九世纪中叶 。所作又有《东城老父传》 见《广记》四百八十五 ,记贾昌于兵火之后,忆念太平盛事,荣华苓落,两相比照,其语甚悲。《长恨歌传》则作于元和初,亦追述开元中杨妃入宫以至死蜀本末,法与《贾昌传》相类。杨妃故事,唐人本所乐道,然鲜有条贯秩然如此传者,又得白居易作歌,故特为世间所知,清洪升撰《长生殿传奇》,即本此传及歌意也。传今有数本,《广记》及《文苑英华》 七百九十四 所录,字句已多异同,而明人附载《文苑英华》后之出于《丽情集》及《京本大曲》者尤异,盖后人 《丽情集》之撰者张君房? 又增损之。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
陳鴻の文章は辞意慷慨にして、弔古を長じ、往事を追懐して情に勝えざるが如くであった。鴻は少くして史を学び、貞元二十一年に太常第に登り、初め閑居して志を遂げ、『大統紀』三十巻を修して七年にしてようやく成った(『唐文粋』九十五)。長安にあった時、かつて白居易と友となり、『長恨歌』のために伝を作った(『広記』四百八十六に見える)。『新唐志』小説家類に陳鴻『開元升平源』一巻があり、注に「字は大亮、貞元の主客郎中」とあるのは、あるいはまたこの人であろう(およそ八世紀後半から九世紀中葉)。その作にはまた『東城老父伝』(『広記』四百八十五に見える)があり、賈昌が兵火の後、太平の盛事を追憶し、栄華の零落を両相対照する、その語は甚だ悲しい。『長恨歌伝』は元和の初めに作られ、やはり開元中の楊妃の入宮から蜀に死するまでの顛末を追述し、法は『賈昌伝』に類する。楊妃の故事は唐人のもともと好んで語るところであるが、条理秩然としてこの伝のごとき者は稀であり、また白居易の歌を得たがゆえに、とりわけ世に知られることとなった。清の洪昇が『長生殿伝奇』を撰したのは、すなわちこの伝と歌の意に基づいたものである。伝には今いくつかの版本があり、『広記』と『文苑英華』(七百九十四)所録のものは字句にすでに異同が多いが、明人が『文苑英華』の後に付載した『麗情集』および『京本大曲』から出たものは殊に異なる。けだし後人(『麗情集』の撰者張君房か)がさらに増損したのであろう。 | 陳鴻の文章は辞意慷慨にして、弔古を長じ、往事を追懐して情に勝えざるが如くであった。鴻は少くして史を学び、貞元二十一年に太常第に登り、初め閑居して志を遂げ、『大統紀』三十巻を修して七年にしてようやく成った(『唐文粋』九十五)。長安にあった時、かつて白居易と友となり、『長恨歌』のために伝を作った(『広記』四百八十六に見える)。『新唐志』小説家類に陳鴻『開元升平源』一巻があり、注に「字は大亮、貞元の主客郎中」とあるのは、あるいはまたこの人であろう(およそ八世紀後半から九世紀中葉)。その作にはまた『東城老父伝』(『広記』四百八十五に見える)があり、賈昌が兵火の後、太平の盛事を追憶し、栄華の零落を両相対照する、その語は甚だ悲しい。『長恨歌伝』は元和の初めに作られ、やはり開元中の楊妃の入宮から蜀に死するまでの顛末を追述し、法は『賈昌伝』に類する。楊妃の故事は唐人のもともと好んで語るところであるが、条理秩然としてこの伝のごとき者は稀であり、また白居易の歌を得たがゆえに、とりわけ世に知られることとなった。清の洪昇が『長生殿伝奇』を撰したのは、すなわちこの伝と歌の意に基づいたものである。伝には今いくつかの版本があり、『広記』と『文苑英華』(七百九十四)所録のものは字句にすでに異同が多いが、明人が『文苑英華』の後に付載した『麗情集』および『京本大曲』から出たものは殊に異なる。けだし後人(『麗情集』の撰者張君房か)がさらに増損したのであろう。 | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 天宝末,兄国忠盗丞相位,愚弄国柄,及安禄山引兵向阙,以讨杨氏为词。潼关不守,翠华南幸,出咸阳,道次马嵬亭,六军徘徊,持戟不进,从官郎吏伏上马前,请诛晁错以谢天下,国忠奉氂缨盘水,死于道周。左右之意未快,上问之,当时敢言者请以贵妃塞天下怨,上知不免,而不忍见其死,反袂掩面,使牵之而去;仓皇展转,竟就死于尺组之下。 《文苑英华》所载 | ||
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天宝の末、兄の国忠が丞相の位を僭し、国柄を愚弄し、安禄山が兵を率いて闕に向かい、楊氏を討つことを口実とした。潼関は守れず、翠華は南に幸し、咸陽を出て、道すがら馬嵬亭に次いだ。六軍は徘徊し、戟を持して進まず、従官郎吏は上の馬前に伏して、晁錯を誅して天下に謝せんと請うた。国忠は氂纓盤水を奉じて道の周に死した。左右の意はなお快からず、上がこれを問えば、当時敢えて言う者は貴妃をもって天下の怨みを塞がんと請うた。上は免れ得ぬことを知りながら、なおその死を見るに忍びず、袂を翻して面を掩い、牽いて去らしめた。倉皇として展転し、ついに尺組の下に死を就いた。(『文苑英華』所載) | 天宝の末、兄の国忠が丞相の位を僭し、国柄を愚弄し、安禄山が兵を率いて闕に向かい、楊氏を討つことを口実とした。潼関は守れず、翠華は南に幸し、咸陽を出て、道すがら馬嵬亭に次いだ。六軍は徘徊し、戟を持して進まず、従官郎吏は上の馬前に伏して、晁錯を誅して天下に謝せんと請うた。国忠は氂纓盤水を奉じて道の周に死した。左右の意はなお快からず、上がこれを問えば、当時敢えて言う者は貴妃をもって天下の怨みを塞がんと請うた。上は免れ得ぬことを知りながら、なおその死を見るに忍びず、袂を翻して面を掩い、牽いて去らしめた。倉皇として展転し、ついに尺組の下に死を就いた。(『文苑英華』所載) | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 天宝末,兄国忠盗丞相位,窃弄国柄,羯胡乱燕,二京连陷,翠华南幸,驾出都西门百余里,六师徘徊,拥戟不行,从官郎吏伏上马前,请诛错以谢之;国忠奉氂缨盘水,死于道周。左右之意未快,当时敢言者请以贵妃塞天下之怒,上惨容,但心不忍见其死,反袂掩面,使牵之而去。拜于上前,回眸血下,坠金钿翠羽于地,上自收之。呜呼,蕙心纨质,天王之爱,不得已而死于尺组之下,叔向母云“甚美必甚恶”,李延年歌曰“倾国复倾城”,此之谓也。 《丽情集》及《大曲》所载 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
天宝の末、兄の国忠が丞相の位を僭し、ひそかに国柄を弄し、羯胡が燕に乱を起こし、二京は連なって陥り、翠華は南に幸した。駕は都の西門を出ること百余里、六師は徘徊して戟を擁して行かず、従官郎吏は上の馬前に伏して、錯を誅してこれに謝せんと請うた。国忠は氂纓盤水を奉じて道の周に死した。左右の意はなお快からず、当時敢えて言う者は貴妃をもって天下の怒りを塞がんと請うた。上は惨容にしてただ心にその死を見るに忍びず、袂を翻して面を掩い、牽いて去らしめた。上の前に拝し、眸を回せば血の下り、金釵翠羽を地に墜とした。上はみずからこれを拾った。ああ、蕙心紈質、天王の愛なるも、やむを得ず尺組の下に死す。叔向の母は云う「甚だ美なれば必ず甚だ悪し」と、李延年は歌って曰う「国を傾け城を傾く」と、これの謂いなり。(『麗情集』および『大曲』所載) | 天宝の末、兄の国忠が丞相の位を僭し、ひそかに国柄を弄し、羯胡が燕に乱を起こし、二京は連なって陥り、翠華は南に幸した。駕は都の西門を出ること百余里、六師は徘徊して戟を擁して行かず、従官郎吏は上の馬前に伏して、錯を誅してこれに謝せんと請うた。国忠は氂纓盤水を奉じて道の周に死した。左右の意はなお快からず、当時敢えて言う者は貴妃をもって天下の怒りを塞がんと請うた。上は惨容にしてただ心にその死を見るに忍びず、袂を翻して面を掩い、牽いて去らしめた。上の前に拝し、眸を回せば血の下り、金釵翠羽を地に墜とした。上はみずからこれを拾った。ああ、蕙心紈質、天王の愛なるも、やむを得ず尺組の下に死す。叔向の母は云う「甚だ美なれば必ず甚だ悪し」と、李延年は歌って曰う「国を傾け城を傾く」と、これの謂いなり。(『麗情集』および『大曲』所載) | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 白行简字知退,其先盖太原人,后家韩城,又徙下邽,居易之弟也,贞元末进士第,累迁司门员外郎主客郎中,宝历二年 八二六 冬病卒,年盖五十余,两《唐书》皆附见《居易传》。有集二十卷,今不存,而《广记》 四百八十四 收其传奇文一篇曰《李娃传》,言荥阳巨族之子溺于长安倡女李娃,贫病困顿,至流落为挽郎,复为李娃所拯,勉之学,遂擢第,官成都府参军。行简本善文笔,李娃事又近情而耸听,故缠绵可观;元人已本其事为《曲江池》,明薛近兖则以作《绣襦记》。行简又有《三梦记》一篇 见原本《说郛》四 ,举“彼梦有所往而此遇之者,或此有所为而彼梦之者,或两相通梦者”三事,皆叙述简质,而事特瑰奇,其第一事尤胜。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 白行簡は字を知退といい、その先はけだし太原の人で、後に韓城に家し、また下邽に移り、居易の弟である。貞元の末に進士に及第し、累遷して司門員外郎・主客郎中に至り、宝暦二年(八二六)冬に病没、年はおよそ五十余。両『唐書』いずれも『居易伝』に附見されている。集二十巻があったが今は存せず、しかし『広記』(四百八十四)にその伝奇文一篇を収めて『李娃伝』と曰う。滎陽の巨族の子が長安の娼女李娃に溺れ、貧病に困頓し、挽郎に身を落とすまでに至ったが、また李娃に救われ、学に励まされて、ついに科挙に及第し、成都府の参軍となったことを語る。行簡はもともと文筆に長じ、李娃の事もまた人情に近くして聳聞であるから、纏綿として見るに堪える。元人はすでにその事を本として『曲江池』と為し、明の薛近兖はこれをもって『繡襦記』を作った。行簡にはまた『三夢記』一篇(原本『説郛』四に見える)があり、「かの者が夢に往くところありてこの者がこれに遇う者、あるいはこの者が為すところありてかの者がこれを夢見る者、あるいは二人が相い夢に通ずる者」の三事を挙げ、いずれも叙述は簡質であるが事は殊に瑰奇で、その第一事がもっとも勝れている。 | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 天后时,刘幽求为朝邑丞,尝奉使夜归,未及家十余里,适有佛寺,路出其侧,闻寺中歌笑欢洽。寺垣短缺,尽得睹其中。刘俯身窥之,见十数人儿女杂坐,罗列盘馔,环绕之而共食。见其妻在坐中语笑。刘初愕然,不测其故,久之,且思其不当至此,复不能舍之。又熟视容止言笑无异,将就察之,寺门闭不得入,刘掷瓦击之,中其罍洗,破迸散走,因忽不见。刘逾垣直入,与从者同视殿庑,皆无人,寺扃如故。刘讶益甚,遂驰归。比至其家,妻方寝,闻刘至,乃叙寒暄讫,妻笑曰:“向梦中与数十人同游一寺,皆不相识,会食于殿庭,有人自外以瓦砾投之,杯盘狼藉,因而遂觉。”刘亦具陈其见,盖所谓彼梦有所往而此遇之也。 | ||
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| + | 天后の時、劉幽求は朝邑の丞であったが、かつて使いを奉じて夜帰る折、家に至るまであと十余里というところで、たまたま仏寺があり、路がその傍を過ぎていた。寺中に歌笑の歓洽する声を聞いた。寺垣は低く欠けて、中の様子がすべて見えた。劉は身を俯せてこれを窺い、十数人の男女が雑坐し、盤饌を羅列してこれを環繞して共に食すのを見た。その妻が座中にあって語笑するのが見えた。劉は初め愕然として、そのゆえを測りかねたが、しばらくして、妻がこの場所に来るはずがないと思い返しつつも、なお棄て去ることができなかった。さらに容姿言笑を熟視するに、まったく異なるところがなく、近づいて確かめようとしたが、寺門は閉ざされて入れなかった。劉は瓦を投げてこれを撃つと、その酒器に当たって破散し、人々は走り散って忽ち見えなくなった。劉は垣を越えてまっすぐに入り、従者とともに殿廡を見て回ったが、すべて人はなく、寺は元のまま閉ざされていた。劉はいよいよ怪しみ、馬を飛ばして帰った。家に着くと、妻はまさに寝ているところで、劉が着いたと聞いて寒暄を叙し終えると、妻は笑って曰く、「先ほど夢の中で十数人とある寺を遊んだのですが、みな知らない人ばかりでした。殿庭で会食していると、外から瓦礫を投げ込む者があり、杯盤は狼藉として、それで目が覚めたのです」と。劉もまたその見たことを詳しく述べた。けだしいわゆる「かの者が夢に往くところありてこの者がこれに遇う」ということであった。 | ||
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| − | + | === 第8節 === | |
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| + | === 第9節 === | ||
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| + | 第九篇 唐之传奇文(下)】 | ||
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| + | 然传奇诸作者中,有特有关系者二人:其一,所作不多而影响甚大,名亦甚盛者曰元稹;其二,多所著作,影响亦甚大而名不甚彰者曰李公佐。 | ||
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| + | 元稹字微之,河南河内人,举明经,补校书郎,元和初应制策第一,除左拾遗,历监察御史,坐事贬江陵,又自虢州长史征入,渐迁至中书舍人承旨学士,进工部侍郎同平章事,未几罢相,出为同州刺史,又改越州,兼浙东观察使。太和初,入为尚书左丞检校户部尚书,兼鄂州刺史武昌军节度使,五年七月暴疾,一日而卒于镇,时年五十三 七七九——八三一 ,两《唐书》皆有传。稹自少与白居易唱和,当时言诗者称元白,号为“元和体”,然所传小说,止《莺莺传》 见《广记》四百八十八 一篇。 | ||
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第九篇 唐の伝奇文(下)】 | 第九篇 唐の伝奇文(下)】 | ||
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| + | 《莺莺传》者,即叙崔张故事,亦名《会真记》者也。略谓贞元中,有张生者,性貌温美,非礼不动,年二十三未尝近女色。时生游于蒲,寓普救寺,适有崔氏孀妇将归长安,过蒲,亦寓兹寺,绪其亲则于张为异派之从母。会浑瑊薨,军人因丧大扰蒲人,崔氏甚惧,而生与蒲将之党有善,得将护之,十余日后廉使杜确来治军,军遂戢。崔氏由此甚感张生,因招宴,见其女莺莺,生惑焉,托崔之婢红娘以《春词》二首通意,是夕得彩笺,题其篇曰《明月三五夜》,辞云:“待月西厢下,迎风户半开,隔墙花影动,疑是玉人来。”张喜且骇,已而崔至,则端服严容,责其非礼,竟去,张自失者久之,数夕后,崔又至,将晓而去,终夕无一言。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
しかるに伝奇の諸作者の中に、特に関係ある者が二人いる。その一は、作品は多くないが影響が甚だ大きく、名もまた甚だ高い者、元稹である。その二は、著作が多く影響もまた甚だ大きいが、名はそれほど顕著でない者、李公佐である。 | しかるに伝奇の諸作者の中に、特に関係ある者が二人いる。その一は、作品は多くないが影響が甚だ大きく、名もまた甚だ高い者、元稹である。その二は、著作が多く影響もまた甚だ大きいが、名はそれほど顕著でない者、李公佐である。 | ||
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| + | ……张生辨色而兴,自疑曰:“岂其梦邪?”及明,睹妆在臂,香在衣,泪光荧荧然犹莹于茵席而已。是后又十余日,杳不复知。张生赋《会真诗》三十韵,未毕而红娘适至,因授之,以贻崔氏。自是复容之,朝隐而出,暮隐而入,同安于曩所谓西厢者几一月矣。张生常诘郑氏之情,则曰:“我不可奈何矣。”因欲就成之。无何,张生将至长安,先以情谕之,崔氏宛然无难词,然而愁怨之容动人矣。将行之夕,不可复见,而张生遂西下。…… | ||
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元稹は字を微之といい、河南河内の人である。明経に挙げられて校書郎に補せられ、元和の初めに制策に応じて第一となり、左拾遺に除せられ、監察御史を歴任し、事に坐して江陵に貶せられ、また虢州長史より召し入れられ、漸く遷って中書舍人承旨学士に至り、工部侍郎同平章事に進んだが、まもなく罷相となり、同州刺史に出され、また越州に改められて浙東観察使を兼ねた。太和の初め、入って尚書左丞検校戸部尚書に至り、鄂州刺史兼武昌軍節度使となったが、五年七月に暴疾にかかり、一日にして鎮に卒した。時に年五十三(七七九——八三一)。両『唐書』にいずれも伝がある。稹は少くより白居易と唱和し、当時詩を論ずる者は元白と称し、「元和体」と号した。しかし伝わる小説は『鶯鶯伝』(『広記』四百八十八に見える)一篇のみである。 | 元稹は字を微之といい、河南河内の人である。明経に挙げられて校書郎に補せられ、元和の初めに制策に応じて第一となり、左拾遺に除せられ、監察御史を歴任し、事に坐して江陵に貶せられ、また虢州長史より召し入れられ、漸く遷って中書舍人承旨学士に至り、工部侍郎同平章事に進んだが、まもなく罷相となり、同州刺史に出され、また越州に改められて浙東観察使を兼ねた。太和の初め、入って尚書左丞検校戸部尚書に至り、鄂州刺史兼武昌軍節度使となったが、五年七月に暴疾にかかり、一日にして鎮に卒した。時に年五十三(七七九——八三一)。両『唐書』にいずれも伝がある。稹は少くより白居易と唱和し、当時詩を論ずる者は元白と称し、「元和体」と号した。しかし伝わる小説は『鶯鶯伝』(『広記』四百八十八に見える)一篇のみである。 | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 明年,文战不利,张生遂止于京,贻书崔氏以广其意,崔报之,而生发其书于所知,由是为时人传说。杨巨源为赋《崔娘诗》,元稹亦续生《会真诗》三十韵,张之友闻者皆耸异,而张志亦绝矣。元稹与张厚,问其说,张曰: | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | “大凡天之所命尤物也,不妖其身,必妖于人。使崔氏子遇合富贵,秉娇宠,不为云为雨,则为蛟为螭,吾不知其变化矣。昔殷之辛,周之幽,据万乘之国,其势甚厚,然而一女子败之,溃其众,屠其身,至今为天下僇笑,予之德不足以胜妖孽,是用忍情。” | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
『鶯鶯伝』とは、すなわち崔張の故事を叙したもので、また『会真記』とも名づけられる。略述すれば、貞元中、張生なる者あり、性は温美にして容貌端正、礼にあらざれば動かず、年二十三にしていまだ女色に近づいたことがなかった。時に生は蒲に遊び、普救寺に寓した。たまたま崔氏の寡婦が長安に帰ろうとして蒲を過ぎ、やはりこの寺に寓した。その親戚を辿れば、張にとっては異派の従母にあたる。折しも渾瑊が薨じ、軍人が喪に乗じて蒲の人々を大いに騒擾した。崔氏は甚だ恐れたが、生は蒲の将の党と親しかったため、これを護ることができ、十余日の後、廉使の杜確が来て軍を治め、軍はすなわち戢まった。崔氏はこれにより張生に甚だ感謝し、宴に招いた。その娘の鶯鶯に会うと、生は惑い、崔の婢の紅娘に託して『春詞』二首をもって意を通じた。その夕、彩箋を得て、その篇に題して『明月三五夜』と曰う。辞に云く、「月を待つ西廂の下、風を迎えて戸は半ば開く、隔壁の花影動き、疑うらくは玉人の来たるかと」。張は喜びかつ驚いたが、やがて崔が至ると、端服厳容にしてその非礼を責め、ついに去り、張は放心すること久しかった。数夕の後、崔がまた至り、暁になって去ったが、終夕一言もなかった。 | 『鶯鶯伝』とは、すなわち崔張の故事を叙したもので、また『会真記』とも名づけられる。略述すれば、貞元中、張生なる者あり、性は温美にして容貌端正、礼にあらざれば動かず、年二十三にしていまだ女色に近づいたことがなかった。時に生は蒲に遊び、普救寺に寓した。たまたま崔氏の寡婦が長安に帰ろうとして蒲を過ぎ、やはりこの寺に寓した。その親戚を辿れば、張にとっては異派の従母にあたる。折しも渾瑊が薨じ、軍人が喪に乗じて蒲の人々を大いに騒擾した。崔氏は甚だ恐れたが、生は蒲の将の党と親しかったため、これを護ることができ、十余日の後、廉使の杜確が来て軍を治め、軍はすなわち戢まった。崔氏はこれにより張生に甚だ感謝し、宴に招いた。その娘の鶯鶯に会うと、生は惑い、崔の婢の紅娘に託して『春詞』二首をもって意を通じた。その夕、彩箋を得て、その篇に題して『明月三五夜』と曰う。辞に云く、「月を待つ西廂の下、風を迎えて戸は半ば開く、隔壁の花影動き、疑うらくは玉人の来たるかと」。張は喜びかつ驚いたが、やがて崔が至ると、端服厳容にしてその非礼を責め、ついに去り、張は放心すること久しかった。数夕の後、崔がまた至り、暁になって去ったが、終夕一言もなかった。 | ||
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| + | 越岁余,崔已适人,张亦别娶,适过其所居,请以外兄见,崔终不出;后数日,张生将行,崔则赋诗一章以谢绝之云:“弃置今何道,当时且自亲,还将旧来意,怜取眼前人。”自是遂不复知。时人多许张为善补过者云。 | ||
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| + | 元稹以张生自寓,述其亲历之境,虽文章尚非上乘,而时有情致,固亦可观,惟篇末文过饰非,遂堕恶趣,而李绅、杨巨源辈既各赋诗以张之,稹又早有诗名,后秉节钺,故世人仍多乐道,宋赵德麟已取其事作《商调蝶恋花》十阕 见《侯鲭录》 ,金则有董解元《弦索西厢》,元则有王实甫《西厢记》,关汉卿《续西厢记》,明则有李日华《南西厢记》,陆采《南西厢记》等,其他曰《竟》曰《翻》曰《后》曰《续》者尤繁,至今尚或称道其事。唐人传奇留遗不少,而后来煊赫如是者,惟此篇及李朝威《柳毅传》而已。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
……張生は色を弁じて起き、自ら疑って曰く「あに夢か」と。明くるに及び、化粧が臂にあり、香が衣にあり、涙光が瑩々として茵席に瑩いているのを睹た。これより後また十余日、杳として復た知れず。張生は『会真詩』三十韻を賦したが、未だ畢らざるに紅娘がたまたま至り、これを授けて崔氏に贈らしめた。これより復た容れられ、朝に隠れて出で、暮に隠れて入り、いわゆる西廂において安んずることほとんど一月であった。張生がつねに鄭氏の情を問えば、曰く「我はいかんともし難し」と。よってこれを成就しようとした。まもなく張生が長安に赴こうとし、まずその情を諭すと、崔氏は婉然として難色なく、しかし愁怨の容は人を動かした。出発の夕、もはや会うことが叶わず、張生はついに西に下った。…… | ……張生は色を弁じて起き、自ら疑って曰く「あに夢か」と。明くるに及び、化粧が臂にあり、香が衣にあり、涙光が瑩々として茵席に瑩いているのを睹た。これより後また十余日、杳として復た知れず。張生は『会真詩』三十韻を賦したが、未だ畢らざるに紅娘がたまたま至り、これを授けて崔氏に贈らしめた。これより復た容れられ、朝に隠れて出で、暮に隠れて入り、いわゆる西廂において安んずることほとんど一月であった。張生がつねに鄭氏の情を問えば、曰く「我はいかんともし難し」と。よってこれを成就しようとした。まもなく張生が長安に赴こうとし、まずその情を諭すと、崔氏は婉然として難色なく、しかし愁怨の容は人を動かした。出発の夕、もはや会うことが叶わず、張生はついに西に下った。…… | ||
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| + | 李公佐字颛蒙,陇西人,尝举进士,元和中为江淮从事,后罢归长安 见所作《谢小娥传》中 。会昌初,又为杨府录事,大中二年,坐累削两任官 见《唐书·宣宗纪》 ,盖生于代宗时,至宣宗初犹在 约七七○——八五○ ,余事未详;《新唐书·宗室世系表》有千牛备身公佐,则别一人也。其著作今存四篇,《南柯太守传》 见《广记》四百七十五,题《淳于棼》,今据《唐语林》改正 最有名,传言东平淳于棼家广陵郡东十里,宅南有大槐一株,贞元七年九月因沉醉致疾,二友扶生归家,令卧东庑下,而自秣马濯足以俟之。生就枕,昏然若梦,见二紫衣使称奉王命相邀,出门登车,指古槐穴而去。使者驱车入穴,忽见山川,终入一大城,城楼上有金书题曰“大槐安国”。生既至,拜驸马,复出为南柯太守,守郡三十载,“风化广被,百姓歌谣,建功德碑,立生祠宇”,王甚重之,递迁大位,生五男二女,后将兵与檀萝国战,败绩,公主又薨。生罢郡,而威福日盛,王疑惮之,遂禁生游从,处之私第,已而送归。既醒,则“见家之童仆拥篲于庭,二客濯足于榻,斜日未隐于西垣,余樽尚湛于东牖,梦中倏忽,若度一世矣”。其立意与《枕中记》同,而描摹更为尽致,明汤显祖亦本之作传奇曰《南柯记》。篇末言命仆发穴,以究根源,乃见蚁聚,悉符前梦,则假实证幻,余韵悠然,虽未尽于物情,已非《枕中》之所及矣。 | ||
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翌年、科挙に失敗し、張生はやむなく京に留まり、崔氏に書を贈った。崔はこれに返書した。しかし生はその書を知己に示したため、時の人の語り草となった。楊巨源はこのために『崔娘詩』を賦し、元稹もまた生の『会真詩』三十韻を続けた。張の友人でこれを聞いた者はみな驚き怪しんだが、張の志もまたすでに絶えていた。元稹は張と厚く、その話を問うと、張は曰く—— | 翌年、科挙に失敗し、張生はやむなく京に留まり、崔氏に書を贈った。崔はこれに返書した。しかし生はその書を知己に示したため、時の人の語り草となった。楊巨源はこのために『崔娘詩』を賦し、元稹もまた生の『会真詩』三十韻を続けた。張の友人でこれを聞いた者はみな驚き怪しんだが、張の志もまたすでに絶えていた。元稹は張と厚く、その話を問うと、張は曰く—— | ||
「およそ天の命ずるところの尤物は、その身を妖せざれば、必ず人を妖す。もし崔氏の子が富貴に遇合し、嬌寵を恃めば、雲となり雨とならざれば、蛟となり螭となるであろう。吾はその変化を知らず。昔、殷の辛、周の幽は万乗の国に拠り、その勢は甚だ厚かった。しかるに一人の女子がこれを敗り、その衆を潰し、その身を屠り、今に至るまで天下の笑い者となっている。予の徳は妖孽に勝つに足らず、ゆえに情を忍ぶのだ。」 | 「およそ天の命ずるところの尤物は、その身を妖せざれば、必ず人を妖す。もし崔氏の子が富貴に遇合し、嬌寵を恃めば、雲となり雨とならざれば、蛟となり螭となるであろう。吾はその変化を知らず。昔、殷の辛、周の幽は万乗の国に拠り、その勢は甚だ厚かった。しかるに一人の女子がこれを敗り、その衆を潰し、その身を屠り、今に至るまで天下の笑い者となっている。予の徳は妖孽に勝つに足らず、ゆえに情を忍ぶのだ。」 | ||
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| + | ……有大穴,根洞然明朗,可容一榻。上有积土壤以为城郭殿台之状,有蚁数斛,隐聚其中。中有小台,其色若丹,二大蚁处之,素翼朱首,长可三寸,左右大蚁数十辅之,诸蚁不敢近,此其王矣:即槐安国都是也。又穷一穴,直上南枝可四丈,宛转方中,亦有土城小楼,群蚁亦处其中:即生所领南柯郡也……追想前事,感叹于怀,……不欲令二客坏之,遽令掩塞如旧。……复念檀萝征伐之事,又请二客访迹于外,宅东一里有古涸涧,侧有大檀树一株,藤萝拥织,上不见日,旁有小穴,亦有群蚁隐聚其间。檀萝之国,岂非此耶?嗟乎!蚁之灵异犹不可穷,况山藏木伏之大者所变化乎?…… | ||
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一年余りを過ぎて、崔はすでに他に嫁ぎ、張もまた別に妻を娶った。たまたまその住むところを過ぎ、外兄として面会を請うたが、崔はついに出なかった。後日、張生が去ろうとした時、崔は詩一章を賦して訣別の辞を送った。「棄置して今何ぞ道わん、当時はまた自ら親しめり、なお旧き意をもって取り来たり、眼前の人を憐れめ」と。これより遂に復た消息を知らなかった。時の人は多く張を善く過ちを補う者と称したという。 | 一年余りを過ぎて、崔はすでに他に嫁ぎ、張もまた別に妻を娶った。たまたまその住むところを過ぎ、外兄として面会を請うたが、崔はついに出なかった。後日、張生が去ろうとした時、崔は詩一章を賦して訣別の辞を送った。「棄置して今何ぞ道わん、当時はまた自ら親しめり、なお旧き意をもって取り来たり、眼前の人を憐れめ」と。これより遂に復た消息を知らなかった。時の人は多く張を善く過ちを補う者と称したという。 | ||
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| + | 《谢小娥传》 见《广记》四百九十一 言小娥姓谢,豫章人,八岁丧母,后嫁历阳侠士段居贞。夫妇与父皆习贾,往来江湖间,为盗所杀,小娥亦折足堕水,他船拯起之,流转至上元县,依妙果寺尼以居。初,小娥尝梦父告以仇人为“車中猴東門草”,又梦夫告以仇人为“禾中走一日夫”,广求智者,皆不能解,至公佐乃辨之曰:“車中猴,車字去上下各一画,是申字,又申属猴,故曰車中猴;草下有門,門中有東,乃蘭字也。又禾中走是穿田过,亦是申字也;一日夫者,夫上更一画,下有日,是春字也。杀汝父是申蘭,杀汝夫是申春,足可明矣。”小娥乃变男子服为佣保,果遇二贼于浔阳,刺杀之,并闻于官,擒其党,而小娥得免死。解谜获贼,甚乏理致,而当时亦盛传,李复言已演其文入《续玄怪录》,明人则本之作平话。 见《拍案惊奇》十九 | ||
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元稹は張生に自らを託し、その親しく経験した境を述べている。文章はなお上乗とは言えないが、時に情致があり、もとより見るに堪える。ただ篇末に文をもって非を飾り、遂に悪趣に堕した。しかし李紳・楊巨源の輩がおのおの詩を賦してこれを助け、稹もまた早くから詩名があり、後に節鉞を秉ったため、世人はなお多くこれを好んで語った。宋の趙徳麟はすでにその事を取って『商調蝶恋花』十闋を作り(『侯鯖録』に見える)、金には董解元の『弦索西廂』があり、元には王実甫の『西廂記』、関漢卿の『続西廂記』があり、明には李日華の『南西廂記』、陸采の『南西廂記』等がある。その他「竟」「翻」「後」「続」と題するものはさらに繁多で、今に至るまでなおその事を称道する者がいる。唐人の伝奇は遺存するもの少なくないが、後世これほど煊赫たるは、ただこの篇と李朝威の『柳毅伝』のみである。 | 元稹は張生に自らを託し、その親しく経験した境を述べている。文章はなお上乗とは言えないが、時に情致があり、もとより見るに堪える。ただ篇末に文をもって非を飾り、遂に悪趣に堕した。しかし李紳・楊巨源の輩がおのおの詩を賦してこれを助け、稹もまた早くから詩名があり、後に節鉞を秉ったため、世人はなお多くこれを好んで語った。宋の趙徳麟はすでにその事を取って『商調蝶恋花』十闋を作り(『侯鯖録』に見える)、金には董解元の『弦索西廂』があり、元には王実甫の『西廂記』、関漢卿の『続西廂記』があり、明には李日華の『南西廂記』、陸采の『南西廂記』等がある。その他「竟」「翻」「後」「続」と題するものはさらに繁多で、今に至るまでなおその事を称道する者がいる。唐人の伝奇は遺存するもの少なくないが、後世これほど煊赫たるは、ただこの篇と李朝威の『柳毅伝』のみである。 | ||
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| + | 所余二篇,其一未详原题,《广记》则题曰《庐江冯媪》 三百四十三 ,记董江妻亡更娶,而媪见有女泣路隅一室中,后乃知即亡人之墓,董闻则罪以妖妄,逐媪去之,其事甚简,故文亦不华。其一曰《古岳渎经》 见《广记》四百六十七,题曰《李汤》 ,有李汤者,永泰时楚州刺史,闻渔人见龟山下水中有大铁锁,乃以人牛曳出之,风涛陡作,“一兽状有如猿,白首长鬐,雪牙金爪,闯然上岸,高五丈许,蹲踞之状若猿猴,但两目不能开,兀若昏昧,……久乃引颈伸欠,双目忽开,光彩若电,顾视人焉,欲发狂怒,观者奔走,兽亦徐徐引锁曳牛入水去,竟不复出。”当时汤与楚州知名之士,皆错愕不知其由。后公佐访古东吴,泛洞庭,登包山,入灵洞,探仙书,于石穴间得《古岳渎经》第八卷,乃得其故,而其经文字奇古,编次蠹毁,颇不能解,公佐与道士焦君共详读之,如下文: | ||
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李公佐は字を颛蒙といい、隴西の人である。かつて進士に挙げられ、元和中に江淮の従事となり、後に罷めて長安に帰った(所作の『謝小娥伝』中に見える)。会昌の初め、またも楊府の録事となり、大中二年に累に坐して二任の官を削られた(『唐書・宣宗紀』に見える)。けだし代宗の時に生まれ、宣宗の初めになお在世していた(およそ七七〇——八五〇)。余事は未詳。『新唐書・宗室世系表』にある千牛備身公佐は、別人である。その著作は今四篇存し、『南柯太守伝』(『広記』四百七十五に見え、『淳于棼』と題する。今は『唐語林』に拠って改正する)が最も有名である。伝に言う、東平の淳于棼は家が広陵郡の東十里にあり、宅の南に大槐が一株あった。貞元七年九月、沈酔により疾を致し、二人の友が生を扶けて家に帰らせ、東廡の下に臥せしめた。生は枕に就くと昏然として夢のごとく、二人の紫衣の使者が王命をもって招くのを見た。門を出て車に乗り、古い槐の穴を指して入っていった。使者は車を駆って穴に入ると、忽ち山川が見え、ついに一大城に入った。城楼の上に金書で「大槐安国」と題されていた。生は至って駙馬を拝し、復た南柯太守に出された。郡を守ること三十年、「風化は広く及び、百姓は歌謡し、功徳碑を建て、生祠を立てた」。王は甚だこれを重んじ、次々と大位に遷した。生に五男二女があったが、後に兵を率いて檀蘿国と戦い、敗績した。公主もまた薨じた。生は郡を罷められたが、威福は日に盛んで、王は疑い憚り、遂に生の遊従を禁じ、私第に処した。やがて送り帰された。覚めてみれば、「家の童僕が庭で箒を揮っており、二客は榻で足を濯い、斜日はまだ西垣に隠れず、余樽はなお東牖に湛えていた。夢中の忽忽は、一生を過ごしたかのようであった」。その立意は『枕中記』と同じだが、描写はいっそう尽くされている。明の湯顕祖もまたこれに基づいて伝奇『南柯記』を作った。篇末に穴を掘って根源を究めたところ、蟻が群がっており、すべて前の夢に符合したと記す。実証をもって幻を証したもので、余韻悠然、物情を尽くしたとは言えないが、すでに『枕中記』の及ぶところではない。 | 李公佐は字を颛蒙といい、隴西の人である。かつて進士に挙げられ、元和中に江淮の従事となり、後に罷めて長安に帰った(所作の『謝小娥伝』中に見える)。会昌の初め、またも楊府の録事となり、大中二年に累に坐して二任の官を削られた(『唐書・宣宗紀』に見える)。けだし代宗の時に生まれ、宣宗の初めになお在世していた(およそ七七〇——八五〇)。余事は未詳。『新唐書・宗室世系表』にある千牛備身公佐は、別人である。その著作は今四篇存し、『南柯太守伝』(『広記』四百七十五に見え、『淳于棼』と題する。今は『唐語林』に拠って改正する)が最も有名である。伝に言う、東平の淳于棼は家が広陵郡の東十里にあり、宅の南に大槐が一株あった。貞元七年九月、沈酔により疾を致し、二人の友が生を扶けて家に帰らせ、東廡の下に臥せしめた。生は枕に就くと昏然として夢のごとく、二人の紫衣の使者が王命をもって招くのを見た。門を出て車に乗り、古い槐の穴を指して入っていった。使者は車を駆って穴に入ると、忽ち山川が見え、ついに一大城に入った。城楼の上に金書で「大槐安国」と題されていた。生は至って駙馬を拝し、復た南柯太守に出された。郡を守ること三十年、「風化は広く及び、百姓は歌謡し、功徳碑を建て、生祠を立てた」。王は甚だこれを重んじ、次々と大位に遷した。生に五男二女があったが、後に兵を率いて檀蘿国と戦い、敗績した。公主もまた薨じた。生は郡を罷められたが、威福は日に盛んで、王は疑い憚り、遂に生の遊従を禁じ、私第に処した。やがて送り帰された。覚めてみれば、「家の童僕が庭で箒を揮っており、二客は榻で足を濯い、斜日はまだ西垣に隠れず、余樽はなお東牖に湛えていた。夢中の忽忽は、一生を過ごしたかのようであった」。その立意は『枕中記』と同じだが、描写はいっそう尽くされている。明の湯顕祖もまたこれに基づいて伝奇『南柯記』を作った。篇末に穴を掘って根源を究めたところ、蟻が群がっており、すべて前の夢に符合したと記す。実証をもって幻を証したもので、余韻悠然、物情を尽くしたとは言えないが、すでに『枕中記』の及ぶところではない。 | ||
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| + | “禹理水,三至桐柏山,惊风走雷,石号木鸣,土伯拥川,天老肃兵,功不能兴。禹怒,召集百灵,授命夔龙,桐柏等山君长稽首请命,禹因囚鸿蒙氏、章商氏、兜卢氏、犁娄氏,乃获淮涡水神名无支祁,善应对言语,辨江淮之浅深,原隰之远近,形若猿猴,缩鼻高额,青躯白首,金目雪牙,颈伸百尺,力逾九象,搏击腾踔疾奔,轻利倏忽,闻视不可久。禹授之童律,不能制;授之乌木由,不能制;授之庚辰,能制。鸱脾桓胡木魅水灵山祅石怪奔号聚绕,以数千载,庚辰以战 一作戟 逐去,颈锁大索,鼻穿金铃,徙淮阴之龟山之足下,俾淮水永安流注海也。庚辰之后,皆图此形者,免淮涛风雨之难。” | ||
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……大きな穴があり、根の洞は明朗として一榻を容れるに足りた。上に積土壌をもって城郭殿台の状を為し、蟻が数斛も隠れ集まっていた。中に小さな台があり、その色は丹の如く、二匹の大蟻がそこにおり、素翼朱首、長さ三寸ばかり、左右に大蟻数十匹がこれを輔け、諸蟻は敢えて近づかなかった。これがその王であり、すなわち槐安国の都である。さらに一穴を極めると、まっすぐに南枝を上ること四丈ばかり、宛転として方形の中にやはり土城小楼があり、蟻の群れもまたそこに住んでいた。すなわち生が領した南柯郡である。……前事を追想し、感嘆の懐いを抱き、……二客にこれを壊させたくなく、にわかに掩塞して旧に復せしめた。……さらに檀蘿征伐のことを念じ、また二客にその跡を外に訪ねてもらうと、宅の東一里に古い涸れた澗があり、側に大きな檀の木が一株あって、藤蘿が擁織し、上に日を見ず、傍らに小さな穴があり、やはり蟻の群れが隠れ集まっていた。檀蘿の国とは、これではなかろうか。ああ、蟻の霊異すらなお窮め尽くせないのだ、まして山に潜み木に隠れた大いなるものの変化においておや。…… | ……大きな穴があり、根の洞は明朗として一榻を容れるに足りた。上に積土壌をもって城郭殿台の状を為し、蟻が数斛も隠れ集まっていた。中に小さな台があり、その色は丹の如く、二匹の大蟻がそこにおり、素翼朱首、長さ三寸ばかり、左右に大蟻数十匹がこれを輔け、諸蟻は敢えて近づかなかった。これがその王であり、すなわち槐安国の都である。さらに一穴を極めると、まっすぐに南枝を上ること四丈ばかり、宛転として方形の中にやはり土城小楼があり、蟻の群れもまたそこに住んでいた。すなわち生が領した南柯郡である。……前事を追想し、感嘆の懐いを抱き、……二客にこれを壊させたくなく、にわかに掩塞して旧に復せしめた。……さらに檀蘿征伐のことを念じ、また二客にその跡を外に訪ねてもらうと、宅の東一里に古い涸れた澗があり、側に大きな檀の木が一株あって、藤蘿が擁織し、上に日を見ず、傍らに小さな穴があり、やはり蟻の群れが隠れ集まっていた。檀蘿の国とは、これではなかろうか。ああ、蟻の霊異すらなお窮め尽くせないのだ、まして山に潜み木に隠れた大いなるものの変化においておや。…… | ||
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| + | 宋朱熹 《楚辞辨证》中 尝斥僧伽降伏无支祁事为俚说,罗泌 《路史》 有《无支祁辩》,元吴昌龄《西游记》杂剧中有“无支祁是他姊妹”语,明宋濂亦隐括其事为文,知宋元以来,此说流传不绝,且广被民间,致劳学者弹纠,而实则仅出于李公佐假设之作而已。惟后来渐误禹为僧伽或泗洲大圣,明吴承恩演《西游记》,又移其神变奋迅之状于孙悟空,于是禹伏无支祁故事遂以堙昧也。 | ||
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『謝小娥伝』(『広記』四百九十一に見える)は、小娥が姓は謝、豫章の人で、八歳にして母を喪い、後に歴陽の侠士段居貞に嫁いだことを語る。夫婦と父はいずれも商いを習い、江湖を往来する間に盗賊に殺され、小娥もまた足を折って水に堕ちたが、他の船に救い上げられた。初め、小娥はかつて夢に父が仇人は「車中猴東門草」と告げるのを見、また夢に夫が仇人は「禾中走一日夫」と告げるのを見た。広く智者を求めたが、みな解けなかった。公佐に至ってようやくこれを弁じて曰く、「車中猴とは、車の字の上下各一画を去れば申の字であり、草の下に門があり門の中に東がある、これは蘭の字である。また禾中走は田を穿って過ぎることで、やはり申の字である。一日夫とは、夫の上にさらに一画あり下に日がある、これは春の字だ。汝の父を殺したのは申蘭、汝の夫を殺したのは申春である」と。小娥はそこで男装して傭保となり、果たして潯陽で二賊に遭い、これを刺殺し、さらに官に告げてその一党を捕えた。謎解きによって賊を捕えるという筋は、甚だ理致に乏しいが、当時もまた盛んに伝えられた。 | 『謝小娥伝』(『広記』四百九十一に見える)は、小娥が姓は謝、豫章の人で、八歳にして母を喪い、後に歴陽の侠士段居貞に嫁いだことを語る。夫婦と父はいずれも商いを習い、江湖を往来する間に盗賊に殺され、小娥もまた足を折って水に堕ちたが、他の船に救い上げられた。初め、小娥はかつて夢に父が仇人は「車中猴東門草」と告げるのを見、また夢に夫が仇人は「禾中走一日夫」と告げるのを見た。広く智者を求めたが、みな解けなかった。公佐に至ってようやくこれを弁じて曰く、「車中猴とは、車の字の上下各一画を去れば申の字であり、草の下に門があり門の中に東がある、これは蘭の字である。また禾中走は田を穿って過ぎることで、やはり申の字である。一日夫とは、夫の上にさらに一画あり下に日がある、これは春の字だ。汝の父を殺したのは申蘭、汝の夫を殺したのは申春である」と。小娥はそこで男装して傭保となり、果たして潯陽で二賊に遭い、これを刺殺し、さらに官に告げてその一党を捕えた。謎解きによって賊を捕えるという筋は、甚だ理致に乏しいが、当時もまた盛んに伝えられた。 | ||
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| + | 传奇之文,此外尚夥,其较显著者,有陇西李朝威作《柳毅传》 见《广记》四百十九 ,记毅以下第将归湘滨,道经泾阳,遇牧羊女子言是龙女,为舅姑及婿所贬,托毅寄书于父洞庭君,洞庭君有弟钱塘君性刚暴,杀婿取女归,欲以配毅,因毅严拒而止。后毅丧妻,徙家金陵,娶范阳卢氏,则龙女也,又徙南海,复归洞庭,其表弟薛嘏尝遇之于湖中,得仙药五十丸,此后遂绝影响。金人已取其事为杂剧 语见董解元《弦索西厢》中 ,元尚仲贤则作《柳毅传书》,翻案而为《张生煮海》,清李渔又折衷之而成《蜃中楼》。又有蒋防作《霍小玉传》 见《广记》四百八十七 ,言李益年二十擢进士第,入长安,思得名妓,乃遇霍小玉,寓于其家,相从者二年,其后年,生授郑县主簿,则坚约婚姻而别。及生觐母,始知已订婚卢氏,母又素严,生不敢拒,遂与小玉绝。小玉久不得生音问,竟卧病,踪迹招益,益亦不敢往。一日益在崇敬寺,忽有黄衫豪士强邀之,至霍氏家,小玉力疾相见,数其负心,长恸而卒。益为之缟素,旦夕哭泣甚哀,已而婚于卢氏,然为怨鬼所祟,竟以猜忌出其妻,至于三娶,莫不如是。杜甫《少年行》有云:“黄衫年少宜来数,不见堂前东逝渡”,谓此也。又有许尧佐作《柳氏传》 见《广记》四百八十五 ,记诗人韩翃得李生艳姬柳氏,会安禄山反,因寄柳于法灵寺而自为淄青节度使书记,乱平复来,则柳已为蕃将沙吒利所取,淄青诸将中有侠士许虞候者,劫以还翃。其事又见于孟棨《本事诗》,盖亦实录矣。他如柳珵 《广记》二百七十五《上清传》 薛调 又四百八十六《无双传》 皇甫枚 又四百九十一《非烟传》 房千里 同上《杨娼传》 等,亦皆有造作。而杜光庭之《虬髯客传》 见《广记》一百九十三 流传乃独广,光庭为蜀道士,事王衍,多所著述,大抵诞谩,此传则记杨素妓人之执红拂者识李靖于布衣时,相约遁去,道中又逢虬髯客,知其不凡,推资财,授兵法,令佐太宗兴唐,而自率海贼入扶余国杀其主,自立为王云。后世乐此故事,至作画图,谓之三侠;在曲则明凌初成有《虬髯翁》,张凤翼张太和皆有《红拂记》。 | ||
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残る二篇のうち、その一つは原題が未詳で、『広記』では『廬江馮媼』と題する。事は甚だ簡素で、ゆえに文もまた華やかではない。もう一つは『古岳瀆経』(『広記』四百六十七に見える)という。李湯なる者が、永泰の時の楚州刺史で、漁人が亀山の水中に大鉄鎖を見たと聞き、人と牛でこれを引き出した。風涛はにわかに起こり、「一獣、状は猿の如く、白首長鬐、雪牙金爪」が岸に上がった。後に公佐は古の東呉を訪ね、石穴の間に『古岳瀆経』第八巻を得て、禹が水を治めんとして桐柏山に至り、ついに淮渦の水神、無支祁を獲えた故事を知った。宋元以来、この説が流伝して絶えず、民間に広まった。ただ後に次第に禹を僧伽あるいは泗洲大聖と誤り、明の呉承恩が『西遊記』を演ずるにあたって、その神変奮迅の状を孫悟空に移したため、禹が無支祁を伏した故事は遂に埋没するに至った。 | 残る二篇のうち、その一つは原題が未詳で、『広記』では『廬江馮媼』と題する。事は甚だ簡素で、ゆえに文もまた華やかではない。もう一つは『古岳瀆経』(『広記』四百六十七に見える)という。李湯なる者が、永泰の時の楚州刺史で、漁人が亀山の水中に大鉄鎖を見たと聞き、人と牛でこれを引き出した。風涛はにわかに起こり、「一獣、状は猿の如く、白首長鬐、雪牙金爪」が岸に上がった。後に公佐は古の東呉を訪ね、石穴の間に『古岳瀆経』第八巻を得て、禹が水を治めんとして桐柏山に至り、ついに淮渦の水神、無支祁を獲えた故事を知った。宋元以来、この説が流伝して絶えず、民間に広まった。ただ後に次第に禹を僧伽あるいは泗洲大聖と誤り、明の呉承恩が『西遊記』を演ずるにあたって、その神変奮迅の状を孫悟空に移したため、禹が無支祁を伏した故事は遂に埋没するに至った。 | ||
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以上に挙げたもののほか、なお作者不明の『李衛公別伝』『李林甫外伝』、郭湜の『高力士外伝』、姚汝能の『安禄山事迹』等がある。著述の本意は幽隠を顕揚するにあり、伝奇のためではないが、文の枝蔓なること、事の瑣屑なることにより、後人もまたしばしば小説と見なしたのである。 | 以上に挙げたもののほか、なお作者不明の『李衛公別伝』『李林甫外伝』、郭湜の『高力士外伝』、姚汝能の『安禄山事迹』等がある。著述の本意は幽隠を顕揚するにあり、伝奇のためではないが、文の枝蔓なること、事の瑣屑なることにより、後人もまたしばしば小説と見なしたのである。 | ||
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| + | 上来所举之外,尚有不知作者之《李卫公别传》,《李林甫外传》,郭湜之《高力士外传》,姚汝能之《安禄山事迹》等,惟著述本意,或在显扬幽隐,非为传奇,特以行文枝蔓,或拾事琐屑,故后人亦每以小说视之。 | ||
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| + | === 第10節 === | ||
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| + | 第十篇 唐之传奇集及杂俎】 | ||
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| + | 造传奇之文,会萃为一集者,在唐代多有,而煊赫莫如牛僧孺之《玄怪录》。僧孺字思黯,本陇西狄道人,居宛叶间,元和初以贤良方正对策第一,条指失政,鲠讦不避宰相,至考官皆调去,僧孺则调伊阙尉,穆宗即位,渐至御史中丞,后以户部侍郎同中书门下平章事,武宗时累贬循州长史,宣宗立,乃召还为太子少师,大中二年卒,赠太尉,年六十九 七八○——八四八 ,曰文简,有传在两《唐书》。僧孺性坚僻,而颇嗜志怪,所撰《玄怪录》十卷,今已佚,然《太平广记》所引尚三十一篇,可以考见大概。其文虽与他传奇无甚异,而时时示人以出于造作,不求见信;盖李公佐李朝威辈,仅在显扬笔妙,故尚不肯言事状之虚,至僧孺乃并欲以构想之幻自见,因故示其诡设之迹矣。《元无有》即其一例: | ||
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第十篇 唐の伝奇集および雑俎】 | 第十篇 唐の伝奇集および雑俎】 | ||
伝奇の文を造り、一集に会萃した者は、唐代に多くあったが、煊赫たること牛僧孺の『玄怪録』に及ぶものはない。僧孺は字を思黯といい、もと隴西狄道の人で、宛葉の間に居した。元和の初めに賢良方正の対策で第一となり、失政を条指して鯁諤して宰相すら避けなかったため、考官はみな調去され、僧孺もまた伊闕尉に調せられた。穆宗が即位すると漸く御史中丞に至り、後に戸部侍郎同中書門下平章事となったが、武宗の時に累貶されて循州長史となった。宣宗が立つと召し還されて太子少師となり、大中二年に卒し、太尉を贈られた。年六十九(七八〇——八四八)。文簡と諡され、両『唐書』に伝がある。僧孺の性は堅僻にしてかなり志怪を嗜み、撰した『玄怪録』十巻は今はすでに散逸しているが、『太平広記』に引くところなお三十一篇あり、大概を考見することができる。その文は他の伝奇と大きな違いはないが、時々に造作から出たことを示して信を求めない。けだし李公佐・李朝威の輩は筆妙を顕揚するのに急であったため、なお事状の虚なることを言おうとしなかったが、僧孺に至っては構想の幻をもってみずから見えんと欲し、ゆえにことさらにその詭設の跡を示したのである。『元無有』はその一例である—— | 伝奇の文を造り、一集に会萃した者は、唐代に多くあったが、煊赫たること牛僧孺の『玄怪録』に及ぶものはない。僧孺は字を思黯といい、もと隴西狄道の人で、宛葉の間に居した。元和の初めに賢良方正の対策で第一となり、失政を条指して鯁諤して宰相すら避けなかったため、考官はみな調去され、僧孺もまた伊闕尉に調せられた。穆宗が即位すると漸く御史中丞に至り、後に戸部侍郎同中書門下平章事となったが、武宗の時に累貶されて循州長史となった。宣宗が立つと召し還されて太子少師となり、大中二年に卒し、太尉を贈られた。年六十九(七八〇——八四八)。文簡と諡され、両『唐書』に伝がある。僧孺の性は堅僻にしてかなり志怪を嗜み、撰した『玄怪録』十巻は今はすでに散逸しているが、『太平広記』に引くところなお三十一篇あり、大概を考見することができる。その文は他の伝奇と大きな違いはないが、時々に造作から出たことを示して信を求めない。けだし李公佐・李朝威の輩は筆妙を顕揚するのに急であったため、なお事状の虚なることを言おうとしなかったが、僧孺に至っては構想の幻をもってみずから見えんと欲し、ゆえにことさらにその詭設の跡を示したのである。『元無有』はその一例である—— | ||
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| + | 宝应中,有元无有,常以仲春末独行维扬郊野。值日晚,风雨大至,时兵荒后,人户多逃,遂入路旁空庄。须臾霁止,斜月方出,无有坐北窗,忽闻西廊有行人声,未几见月中有四人,衣冠皆异,相与谈谐吟咏甚畅,乃云:“今夕如秋,风月若此,吾辈岂得不为一言,以展平生之事也?”……吟咏既朗,无有听之具悉。其一衣冠长人即先吟曰:“齐纨鲁缟如霜雪,寥亮高声予所发。”其二黑衣冠短陋人诗曰:“嘉宾良会清夜时,煌煌灯烛我能持。”其三故弊黄衣冠人,亦短陋,诗曰:“清冷之泉候朝汲,桑绠相牵常出入。”其四故黑衣冠人诗曰:“爨薪贮泉相煎熬,充他口腹我为劳。”无有亦不以四人为异,四人亦不虞无有之在堂隍也,递相褒赏,观其自负,则虽阮嗣宗《咏怀》,亦若不能加矣。四人迟明乃归旧所;无有就寻之,堂中惟有故杵灯台水桶破铛:乃知四人即此物所为也。 《广记》三百六十九 | ||
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宝応中、元無有なる者あり、常に仲春の末に独り維揚の郊野を行く。日暮に遇い、風雨大いに至った。時に兵荒の後で、人家は多く逃げ去っていたため、路傍の空き家に入った。しばらくして雨が止み、斜月がまさに出たところ、無有は北窓に座していると、忽ち西廊に人の歩く音が聞こえた。まもなく月光の中に四人が見えた。衣冠はみな異様で、互いに談笑吟詠すること甚だ暢達であった。……吟詠は朗々として、無有はこれを聴くに具さに悉った。その一の詩は「斉の紈魯の縞、霜雪の如し」、その二は「煌煌たる灯燭は我よく持つ」、その三は「清冷の泉、朝の汲みを候つ」、その四は「爨薪泉を貯えて相い煎熬す」と。四人は暁近くなってようやく元の場所に戻った。無有がこれを探ると、堂中にあるのは古い杵と灯台と水桶と壊れた鉄鍋のみであった。すなわち四人はこれらの物が化けたものだったのである。(『広記』三百六十九) | 宝応中、元無有なる者あり、常に仲春の末に独り維揚の郊野を行く。日暮に遇い、風雨大いに至った。時に兵荒の後で、人家は多く逃げ去っていたため、路傍の空き家に入った。しばらくして雨が止み、斜月がまさに出たところ、無有は北窓に座していると、忽ち西廊に人の歩く音が聞こえた。まもなく月光の中に四人が見えた。衣冠はみな異様で、互いに談笑吟詠すること甚だ暢達であった。……吟詠は朗々として、無有はこれを聴くに具さに悉った。その一の詩は「斉の紈魯の縞、霜雪の如し」、その二は「煌煌たる灯燭は我よく持つ」、その三は「清冷の泉、朝の汲みを候つ」、その四は「爨薪泉を貯えて相い煎熬す」と。四人は暁近くなってようやく元の場所に戻った。無有がこれを探ると、堂中にあるのは古い杵と灯台と水桶と壊れた鉄鍋のみであった。すなわち四人はこれらの物が化けたものだったのである。(『広記』三百六十九) | ||
牛僧孺は朝廷にあって李徳裕と互いに門戸を立てて党争をなした。その小説好きのゆえに、李の門客韋瓘がそこで僧孺の名を騙って『周秦行紀』を撰し、これを誣した。德裕はこのために論を作り、僧孺の姓は図讖に応じ、『玄怪録』にまた多く隠語を造っており、民を惑わさんとする意があるとし、「須らく太牢をもって少長ともに法に置くべし」と述べた。古来、小説を仮りて人を排陷するは、これをもって最も怪となす。しかし当時その説は行われなかった。ただ僧孺にはすでに才名があり、また高位を歴たため、その著作は世に盛んに伝えられた。模倣者もまた少なくなく、李復言に『続玄怪録』十巻があり、薛漁思に『河東記』三巻があった。 | 牛僧孺は朝廷にあって李徳裕と互いに門戸を立てて党争をなした。その小説好きのゆえに、李の門客韋瓘がそこで僧孺の名を騙って『周秦行紀』を撰し、これを誣した。德裕はこのために論を作り、僧孺の姓は図讖に応じ、『玄怪録』にまた多く隠語を造っており、民を惑わさんとする意があるとし、「須らく太牢をもって少長ともに法に置くべし」と述べた。古来、小説を仮りて人を排陷するは、これをもって最も怪となす。しかし当時その説は行われなかった。ただ僧孺にはすでに才名があり、また高位を歴たため、その著作は世に盛んに伝えられた。模倣者もまた少なくなく、李復言に『続玄怪録』十巻があり、薛漁思に『河東記』三巻があった。 | ||
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| + | 牛僧孺在朝,与李德裕各立门户,为党争,以其好作小说,李之门客韦瓘遂托僧孺名撰《周秦行纪》以诬之。记言自以举进士落第将归宛叶,经伊阙鸣皋山下,因暮失道,遂止薄太后庙中,与汉唐妃嫔燕饮。太后问今天子为谁?则对曰:“‘今皇帝先帝长子。’太真笑曰:‘沈婆儿作天子也。大奇!’”复赋诗,终以昭君侍寝,至明别去,“竟不知其何如” 详见《广记》四百八十九 。德裕因作论,谓僧孺姓应图谶,《玄怪录》又多造隐语,意在惑民,《周秦行纪》则以身与后妃冥遇,欲证其身非人臣相,“及至戏德宗为沈婆儿,以代宗皇后为沈婆,令人骨战,可谓无礼于其君甚矣!”作逆若非当代,必在子孙,故“须以‘太牢’少长成置于法,则刑罚中而社稷安”也 详见《李卫公外集》四 。自来假小说以排陷人,此为最怪,顾当时说亦不行。惟僧孺既有才名,又历高位,其所著作,世遂盛传。而摹拟者亦不鲜,李复言有《续玄怪录》十卷,“分仙术感应二门”,薛渔思有《河东记》三卷,“亦记谲怪事,序云续牛僧孺之书” 皆见宋晁公武《郡斋读书志》十三 ;又有撰《宣室志》十卷,以记仙鬼灵异事迹者,曰张读字圣朋,则张之裔而牛僧孺之外孙也 见《唐书·张荐传》 ,后来亦疑为“少而习见,故沿其流波” 清《四库提要》子部小说家类三 云。 | ||
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ほかに蘇鶚に『杜陽雑編』、高彦休に『唐闕史』がある。康駢の『劇談録』に至っては漸く世務が多くなり、孫棨の『北里志』は専ら狭邪を叙し、范摅の『雲渓友議』は特に歌詠を重んじている。裴鉶に至って書を著し、直に『伝奇』と称したが、神仙の怪譎なる事を盛んに述べ、多く崇飾して観る者を惑わそうとした。聶隠娘が妙手空空児に勝つ事はまさにこの書から出たもので、明人がこれを取って偽作の段成式『剣侠伝』に入れたため、流伝がことに広まった。 | ほかに蘇鶚に『杜陽雑編』、高彦休に『唐闕史』がある。康駢の『劇談録』に至っては漸く世務が多くなり、孫棨の『北里志』は専ら狭邪を叙し、范摅の『雲渓友議』は特に歌詠を重んじている。裴鉶に至って書を著し、直に『伝奇』と称したが、神仙の怪譎なる事を盛んに述べ、多く崇飾して観る者を惑わそうとした。聶隠娘が妙手空空児に勝つ事はまさにこの書から出たもので、明人がこれを取って偽作の段成式『剣侠伝』に入れたため、流伝がことに広まった。 | ||
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夏の啓は東明公、文王は西明公、邵公は南明公、季札は北明公となり、四時は四方の鬼を主る。至忠至孝の人は、命終わればみな地下の主者となる。(巻二『玉格』) | 夏の啓は東明公、文王は西明公、邵公は南明公、季札は北明公となり、四時は四方の鬼を主る。至忠至孝の人は、命終わればみな地下の主者となる。(巻二『玉格』) | ||
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| + | 他如武功人苏鹗有《杜阳杂编》,记唐世故事,而多夸远方珍异,参寥子高彦休有《唐阙史》,虽间有实录,而亦言见梦升仙,故皆传奇,但稍迁变。至于康骈《剧谈录》之渐多世务,孙棨《北里志》之专叙狭邪,范摅《云溪友议》之特重歌咏,虽若弥近人情,远于灵怪,然选事则新颖,行文则逶迤,固仍以传奇为骨者也。迨裴铏著书,径称《传奇》,则盛述神仙怪谲之事,又多崇饰,以惑观者。铏为淮南节度副大使高骈从事,骈后失志,尤好神仙,卒以叛死,则此或当时谀导之作,非由本怀。聂隐娘胜妙手空空儿事即出此书 文见《广记》一百九十四 ,明人取以入伪作之段成式《剑侠传》,流传遂广,迄今犹为所谓文人者所乐道也。 | ||
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初めて天に生まれた者に五相あり、一に光が身を覆うも衣なし、二に物を見て希有の心を生ず、三に顔色弱く、四に疑い、五に怖る。(巻三『貝編』) | 初めて天に生まれた者に五相あり、一に光が身を覆うも衣なし、二に物を見て希有の心を生ず、三に顔色弱く、四に疑い、五に怖る。(巻三『貝編』) | ||
天翁は姓を張、名を堅、字を刺渇といい、漁陽の人である。少くして不羈にして拘忌するところなし。常に羅を張って一羽の白雀を得、愛してこれを養った。夢に劉天翁が怒りを責め、しばしばこれを殺さんと欲したが、白雀はそのたびに堅に報せた。天翁は遂に自ら下って来て観たが、堅はひそかに天翁の車に騎り、白龍に乗って天に登った。天翁は追ったが及ばなかった。堅は玄宮に至ると百官を易え、北門を杜塞し、白雀を上卿侯に封じた。劉翁は治を失い、五岳を徘徊して災いを作した。堅はこれを患い、劉翁を太山太守として生死の籍を主らしめた。(巻十四『諾皋記』) | 天翁は姓を張、名を堅、字を刺渇といい、漁陽の人である。少くして不羈にして拘忌するところなし。常に羅を張って一羽の白雀を得、愛してこれを養った。夢に劉天翁が怒りを責め、しばしばこれを殺さんと欲したが、白雀はそのたびに堅に報せた。天翁は遂に自ら下って来て観たが、堅はひそかに天翁の車に騎り、白龍に乗って天に登った。天翁は追ったが及ばなかった。堅は玄宮に至ると百官を易え、北門を杜塞し、白雀を上卿侯に封じた。劉翁は治を失い、五岳を徘徊して災いを作した。堅はこれを患い、劉翁を太山太守として生死の籍を主らしめた。(巻十四『諾皋記』) | ||
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| + | 段成式字柯古,齐州临淄人,宰相文昌子也,以荫为校书郎,累迁至吉州刺史,大中中归京,仕至太常少卿,咸通四年 八六三 六月卒,《新唐书》附见段志玄传末 余见《酉阳杂俎》及《南楚新闻》 。成式家多奇篇秘籍,博学强记,尤深于佛书,而少好畋猎,亦早有文名,词句多奥博,世所珍异,其小说有《庐陵官下记》二卷,今佚;《酉阳杂俎》二十卷凡三十篇,今具在,并有《续集》十卷:卷一篇,或录秘书,或叙异事,仙佛人鬼以至动植,弥不毕载,以类相聚,有如类书,虽源或出于张华《博物志》,而在唐时,则犹之独创之作矣。每篇各有题目,亦殊隐僻,如纪道术者曰《壶史》,钞释典者曰《贝编》,述丧葬者曰《尸窀》,志怪异者曰《诺皋记》,而抉择记叙,亦多古艳颖异,足副其目也。 | ||
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また文身の事を集めたものは『黥』と曰い、鷹の養い方を述べたものは『肉攫部』と曰う。渉るところ既に広ければ、珍異も多く、世に愛玩されて伝奇と並び駆けて先を争った。 | また文身の事を集めたものは『黥』と曰い、鷹の養い方を述べたものは『肉攫部』と曰う。渉るところ既に広ければ、珍異も多く、世に愛玩されて伝奇と並び駆けて先を争った。 | ||
成式は詩をよくし、幽渋繁縟であった。時に温庭筠・李商隠もまた同様で互いに誇り、「三十六体」と号した。温庭筠にも小説三巻『乾巛子』があるが、簡率にして見るべきものなし。李には『義山雑纂』一巻があり、俚俗の常談鄙事を集めたもので、瑣綴に止まるとはいえ、世務の幽隠を穿つものがある。 | 成式は詩をよくし、幽渋繁縟であった。時に温庭筠・李商隠もまた同様で互いに誇り、「三十六体」と号した。温庭筠にも小説三巻『乾巛子』があるが、簡率にして見るべきものなし。李には『義山雑纂』一巻があり、俚俗の常談鄙事を集めたもので、瑣綴に止まるとはいえ、世務の幽隠を穿つものがある。 | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 夏启为东明公,文王为西明公,邵公为南明公,季札为北明公,四时主四方鬼。至忠至孝之人,命终皆为地下主者,一百四十年,乃授下仙之教,授以大道。有上圣之德,命终受三官书,为地下主者,一千年乃转三官之五帝,复一千四百年方得游行太清,为九宫之中仙。 卷二《玉格》 | ||
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| + | 殺風景 | ||
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| + | 始生天者五相,一光覆身而无衣,二见物生希有心,三弱颜,四疑,五怖。 卷三《贝编》 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 国初僧玄奘往五印取经,西域敬之。成式见倭国僧金刚三昧,言尝至中天寺,寺中多画玄奘麻屩及匙箸,以彩云乘之,盖西域所无者,每至斋日,辄膜拜焉。 同上 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
松の下で喝道する 花を看て涙を下す 苔の上に蓆を敷く 垂柳を斫る 花の下に褌を晒す | 松の下で喝道する 花を看て涙を下す 苔の上に蓆を敷く 垂柳を斫る 花の下に褌を晒す | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 天翁姓张,名坚,字刺渴,渔阳人,少不羁,无所拘忌。常张罗得一白雀,爱而养之,梦刘天翁责怒,每欲杀之,白雀辄以报坚,坚设诸方待之,终莫能害。天翁遂下观之,坚盛设宾主,乃窃骑天翁车,乘白龙,振策登天,天翁乘余龙追之,不及。坚既到玄宫,易百官,杜塞北门,封白雀为上卿侯,改白雀之胤不产于下土。刘翁失治,徘徊五岳作灾,坚患之,以刘翁为太山太守,主生死之籍。 卷十四《诺皋记》 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
遊春に重載する 石筍に馬を繋ぐ 月の下に松明を持つ 歩行の将軍 山に背いて楼を起てる | 遊春に重載する 石筍に馬を繋ぐ 月の下に松明を持つ 歩行の将軍 山に背いて楼を起てる | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 大历中,有士人庄在渭南,遇疾卒于京,妻柳氏因庄居。……士人祥斋日,暮,柳氏露坐逐凉,有胡蜂绕其首面,柳氏以扇击堕地,乃胡桃也。柳氏遽取,玩之掌中;遂长,初如拳,如碗,惊顾之际,已如盘矣。曝然分为两扇,空中轮转,声如分蜂,忽合于柳氏首。柳氏碎首,齿著于树。其物因飞去,竟不知何怪也。 同上 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
果樹園に菜を植える 花棚の下に鶏鴨を養う | 果樹園に菜を植える 花棚の下に鶏鴨を養う | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 又有聚文身之事者曰《黥》,述养鹰之法者曰《肉攫部》,《续集》则有《贬误》以收考证,有《寺塔记》以志伽蓝,所涉既广,遂多珍异,为世爱玩,与传奇并驱争先矣。 | ||
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| + | 成式能诗,幽涩繁缛如他著述,时有祁人温庭筠字飞卿,河内李商隐字义山,亦俱用是相夸,号“三十六体”。温庭筠亦有小说三卷曰《乾子》,遗文见于《广记》,仅录事略,简率无可观,与其诗赋之艳丽者不类。李于小说无闻,今有《义山杂纂》一卷,《新唐志》不著录,宋陈振孙 《直斋书录解题》十一 以为商隐作,书皆集俚俗常谈鄙事,以类相从,虽止于琐缀,而颇亦穿世务之幽隐,盖不特聊资笑噱而已。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
悪模様 | 悪模様 | ||
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| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 杀风景 | ||
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| + | 松下喝道 看花泪下 苔上铺席 斫却垂杨 花下晒裩 | ||
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| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 游春重载 石笋系马 月下把火 步行将军 背山起楼 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | |||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 果园种菜 花架下养鸡鸭 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | |||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 恶模样 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
客となって人と口喧嘩する …… 客として台や卓をひっくり返す …… 舅姑の前で艶曲を歌う | 客となって人と口喧嘩する …… 客として台や卓をひっくり返す …… 舅姑の前で艶曲を歌う | ||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 作客与人相争骂 …… 做客踏翻台桌 …… 对丈人丈母唱艳曲 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | |||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 嚼残鱼肉归盘上 对众倒卧 横箸在羹碗上 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | |||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 十诫 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | |||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 不得饮酒至醉 不得暗黑处惊人 不得阴损于人 不得独入寡妇人房 不得开人家书 不得戏取物不令人知 不得暗黑独自行 不得与无赖子弟往还 不得借人物用 了经旬不还 原缺一则 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | |||
| + | |- | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
| + | 中和年间有李就今字袞求,为临晋令,亦号义山,能诗,初举时恒游倡家,见孙棨《北里志》,则《杂纂》之作,或出此人,未必定属商隐,然他无显证,未能定也。后亦时有仿作者,宋有续,称王君玉,有再续,称苏东坡,明有三续,为黄允交。 | ||
| + | | style="vertical-align:top; padding:10px;" | | ||
噛み残した魚肉を皿に戻す 衆人の前で横になる 箸を椀の上に横たえる | 噛み残した魚肉を皿に戻す 衆人の前で横になる 箸を椀の上に横たえる | ||
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无常 / 無常
魯迅 (鲁迅, ルーシュン, 1881-1936)
中日対照翻訳。
第1節
| 中文 | 日本語 |
|---|---|
|
【一九一八年】 |
|
|
【梦】 |
|
|
很多的梦,趁黄昏起哄。 |
|
|
前梦才挤却大前梦时,后梦又赶走了前梦。 |
【一九一八年】 |
|
去的前梦黑如墨,在的后梦墨一般黑; |
|
|
去的在的仿佛都说,“看我真好颜色;” |
【夢】 |
|
颜色许好,暗里不知; |
|
|
而且不知道,说话的是谁? |
|
|
○ ○ ○ |
|
|
暗里不知,身热头痛。 |
|
|
你来你来!明白的梦。 |
多くの夢が、黄昏に乗じて騒ぎ立てる。 |
|
(《新青年》第四卷第五号。) |
|
|
【爱之神】 |
|
|
一个小娃子,展开翅子在空中, |
|
|
一手搭箭,一手张弓, |
前の夢が大前の夢を押しのけたばかりなのに、後の夢がまた前の夢を追い払った。 |
|
不知怎么一下,一箭射着前胸。 |
|
|
“小娃子先生,谢你胡乱栽培! |
|
|
但得告诉我!我应该爱谁?” |
|
|
娃子着慌,摇头说:“唉! |
去った前の夢は墨のように黒く、今の後の夢も墨のように黒い。 |
|
你是还有心胸的人,竟也说这宗话。 |
|
|
你应该爱谁,我怎么知道。 |
|
|
总之我的箭是放过了! |
|
|
你要是爱谁,便没命的去爱他; |
去ったのも今のも、どちらも言うようだ、「私の色の美しさを見よ。」 |
|
你要是谁也不爱,也可以没命的去自己死掉。” |
|
|
(《新青年》第四卷第五号。) |
|
|
【桃花】 |
色は美しいかもしれぬが、暗がりの中では知れない。 |
|
春雨过了,太阳又很好,随便走到园中。 |
|
|
桃花开在园西,李花开在园东。 |
|
|
我说,“好极了!桃花红,李花白。” |
しかも知れない、話しているのが誰なのかも。 |
|
(没说,桃花不及李花白。) |
|
|
桃花可是生了气,满面涨作“杨妃红”。 |
|
|
好小子!真了得!竟能气红了面孔。 |
○ ○ ○ |
|
我的话可并没得罪你,你怎的便涨红了面孔! |
|
|
唉!花有花道理。我不懂。 |
|
|
(《新青年》第四卷第五号。) |
暗がりの中で知れず、体は熱く頭は痛む。 |
|
【他们的花园】 |
|
|
小娃子,卷螺发, |
|
|
银黄面庞上还有微红,——看他意思是正要活。 |
|
|
走出破大门,望见邻家: |
来い、来い!明らかなる夢よ。 |
|
他们大花园里,有许多好花。 |
|
|
用尽小心机,得了一朵百合; |
|
|
又白又光明,像才下的雪。 |
|
|
好生拿了回家,映着面庞,分外添出血色。 |
(『新青年』第四巻第五号。) |
|
苍蝇绕花飞鸣,乱在一屋子里—— |
|
|
“偏爱这不干净花,是胡涂孩子!” |
|
|
忙看百合花,却已有几点蝇矢。 |
【愛の神】 |
|
看不得;舍不得。 |
|
|
瞪眼望天空,他更无话可说。 |
|
|
说不出话,想起邻家: |
|
|
他们大花园里,有许多好花。 |
一人の小さな子供が、翼を広げて空中に、 |
|
(《新青年》第五卷第一号。) |
|
|
【人与时】 |
|
|
一人说,将来胜过现在。 |
|
|
一人说,现在远不及从前。 |
|
|
一人说,什么? |
一手に矢をつがえ、一手に弓を引く。 |
|
时道,你们都侮辱我的现在。 |
|
|
从前好的,自己回去。 |
|
|
将来好的,跟我前去。 |
|
|
这说什么的, |
|
|
我不知你说什么。 |
どうしたわけか、一矢が胸に射ささった。 |
|
(《新青年》第五卷第一号。) |
|
|
【渡河与引路】 |
|
|
玄同兄: |
|
|
两日前看见《新青年》五卷二号通信里面,兄有唐俟也不反对Esperanto,以及可以一齐讨论的话;我于Esperanto固不反对,但也不愿讨论;因为我的赞成Esperanto的理由,十分简单,还不能开口讨论。 |
「小さなお方、でたらめなお導きに感謝いたします! しかしお教えください!私は誰を愛すべきでしょう?」 |
|
要问赞成的理由,便只是依我看来,人类将来总当有一种共同的言语;所以赞成Esperanto。 |
子供は慌てて、首を振って言った。「ああ! |
|
至于将来通用的是否Esperanto,却无从断定。大约或者便从Esperanto改良,更加圆满;或者别有一种更好的出现;都未可知。但现在既是只有这Esperanto,便只能先学这Esperanto。现在不过草创时代,正如未有汽船,便只好先坐独木小舟;倘使因为豫料将来当有汽船,便不造独木小舟,或不坐独木小舟,那便连汽船也不会发明,人类也不能渡水了。 |
あなたはまだ心胸のある人なのに、こんなことを言うとは。 あなたが誰を愛すべきかなど、私にわかるはずがない。 とにかく私の矢は放ったのだ! あなたが誰かを愛したいなら、命がけで愛しなさい。 |
|
然问将来何以必有一种人类共通的言语,却不能拿出确凿证据。说将来必不能有的,也是如此。所以全无讨论的必要;只能各依自己所信的做去就是了。 |
あなたが誰も愛さないなら、命がけで自分で死ぬがよい。」 |
|
但我还有一个意见,以为学Esperanto是一件事,学Esperanto的精神,又是一件事。——白话文学也是如此。——倘若思想照旧,便仍然换牌不换货;才从“四目仓圣”面前爬起,又向“柴明华先师”脚下跪倒;无非反对人类进步的时候,从前是说no,现在是说ne;从前写作“咈哉”,现在写作“不行”罢了。所以我的意见,以为灌输正当的学术文艺,改良思想,是第一事;讨论Esperanto,尚在其次,至于辩难驳诘,更可一笔勾消。 |
(『新青年』第四巻第五号。) 【桃花】 春雨が過ぎて、太陽がまたとても好い。ぶらぶらと庭に歩いて行った。 桃の花は庭の西に咲き、李の花は庭の東に咲いている。 私は言った。「素晴らしい!桃の花は紅く、李の花は白い。」 |
|
《新青年》里的通信,现在颇觉发达。读者也都喜看。但据我个人意见,以为还可酌减;只须将诚恳切实的讨论,按期登载;其他不负责任的随口批评,没有常识的问难;至多只要答他一回,此后便不必多说,省出纸墨,移作别用。例如见鬼,求仙,打脸之类,明明白白全是毫无常识的事情,《新青年》却还和他们反复辩论,对他们说“二五得一十”的道理,这功夫岂不可惜,这事业岂不可怜。 |
(桃の花が李の花ほど白くないとは言わなかった。) ところが桃の花が怒ったらしく、顔中を「楊妃紅」に染め上げた。 いい度胸だ!たいしたものだ!怒って顔を紅くするとは。 |
|
我看《新青年》的内容,大略不外两类:一是觉得空气闭塞污浊,吸这空气的人,将要完结了;便不免皱一皱眉,说一声“唉”。希望同感的人,因此也都注意,开辟一条活路。假如有人说这脸色声音,没有妓女的眉眼一般好看,唱小调一般好听,那是极确的真话;我们不必和他分辩,说是皱眉叹气,更为好看。和他分辩,我们就错了。一是觉得历来所走的路,万分危险,而且将到尽头;于是凭着良心,切实寻觅,看见别一条平坦有希望的路,便大叫一声说:“这边走好。”希望同感的人,因此转身,脱了危险,容易进步。假如有人偏向别处走,再劝一番,固无不可;但若仍旧不信,便不必拚命去拉,各走自己的路。因为拉得打架,不独于他无益,连自己和同感的人,也都耽搁了工夫。 |
私の言葉は別にお前に失礼をしたわけではない。どうして顔を赤くするのだ! ああ!花には花の道理がある。私にはわからぬ。 (『新青年』第四巻第五号。) 【彼らの花園】 小さな子供、巻き毛で、 銀黄色の顔にはまだほんのり紅みがある——見たところまさに生きようとしている。 壊れた大門を出て、隣家を眺めると、 |
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耶稣说,见车要翻了,扶他一下。Nietzsche说,见车要翻了,推他一下。我自然是赞成耶稣的话;但以为倘若不愿你扶,便不必硬扶,听他罢了。此后能够不翻,固然很好,倘若终于翻倒,然后再来切切实实的帮他抬。 |
彼らの大きな花園に、たくさんの美しい花がある。 小さな知恵を絞って、百合の花を一輪手に入れた。 |
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老兄,硬扶比抬更为费力,更难见效。翻后再抬比将翻便扶,于他们更为有益。 |
白くて光り輝いて、降りたての雪のよう。 |
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唐俟。十一月四日。 |
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(《新青年》第五卷第五号。) |
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【】 |
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【第五卷】 |
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【声无哀乐论】 |
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有秦客问于东野主人曰:“闻之前论曰:治世之音安以乐,亡国之音哀以思。夫治乱在政,而音声应之。故哀思之情,表于金石。安乐之象,形于管弦也。又仲尼闻韶,识虞舜之德;季札听弦,识 黄本作知 众国之风。斯已然之事,先贤所不疑也。今子独以为声无哀乐,其理何居?若有嘉讯 各本讯下有今字 ,请闻其说。”主人应之曰:“斯义久滞,莫肯拯救。故令 各本作念。二张本有注云或作令 历世,滥于名实。今蒙启导,将言其一隅焉。夫天地合德,万物资 各本讹贵 生。寒暑代往,五行以成 各本成下有故字。旧校亦加。案:无者为长 。章为五色,发为五音。音声之作,其犹臭味在于天地之间。其善与不善,虽遭 各本遭下有遇字 浊乱,其体自若,而无 各本作不 变也。岂以爱憎易操,哀乐改度哉?及宫商集比 各本讹化 ,声音克谐。此人心至愿,情欲之所钟。古人知情不可恣,欲不可极,故 各本字夺。旧校亦删 因其所用每为之节。使哀不至伤,乐不至淫。因事与名,物有其号。哭谓之哀,歌谓之乐 各本以上十六字夺。旧校亦删 。斯其大较也。然乐云乐云,钟鼓云乎哉?哀云哀云,哭泣云乎哉?因兹而言,玉帛非礼敬之实,歌舞 字从旧校。案当作哭 非悲哀 疑当作哀乐 之主也。何以明之?夫殊方异俗,歌哭 《世说新语·文学篇》注引作笑 不同;使错而用之,或闻哭而欢,或听歌而戚 各本作感 。然其 各本作而 哀乐之怀 各本作情 均也。今用均同 原钞字夺。黄汪程本同。今据《世说》注引补,二张本作一 之情,而发万殊之声,斯非音声之无常哉 《世说》注引作乎 ?然声音和比,感人之最深者也。劳者歌其事,乐者舞其功。夫内有悲痛之心,则激哀切之言 各本作切哀,又夺之字 。言比成诗,声比成音。杂而咏之,聚而听之。心动于和声,情感于苦言。嗟叹未绝,而泣涕流涟矣。夫哀心藏于 黄汪程本于下有苦心二字。旧校亦加。二张本又于心下加之字,盖俱不当有 内,遇和声而后发;和声无象,而哀心有主。夫以有主之哀心,因乎无象之和声而后发 各本三字无。旧校亦删。案:而上当夺一字,删之甚非 ,其所觉悟,唯哀而已。岂复知吹万不同,而使其自已哉。风俗之流,遂成其政,是故国史明政教之得失,审国风之盛衰,吟咏情性,以讽其上。故曰:亡国之音哀以思也。夫喜怒哀乐,爱憎惭惧,凡此八者,生民所以接物传情,区别有属,而不可溢者也。夫味以甘苦为称,今以甲贤而心爱,以乙愚而情憎。则爱憎宜属我,而贤愚宜属彼也。可以我爱而谓之爱人,我憎则 各本作而 谓之憎人?所喜则谓之喜味,所怒则谓之怒味哉?由此言之,则外内 张燮本作内外 殊用,彼我异名。声音自当,以善恶为主,则无关于哀乐。哀乐 原钞二字夺。据各本及旧校加 自当,以情感而后发 各本无此三字。旧校亦删 ,则无系于声音。名实俱去,则尽然可见矣。且季子在鲁,采诗观礼,以别风雅。岂徒任声以决臧否哉?又仲尼闻韶,叹其一致,是以咨嗟,何必因声以知虞舜之德,然后叹美邪?今粗明其一端,亦可思过 |
大事に持ち帰り、顔に映すと、一段と血の色が増した。 蠅が花の周りを飛び鳴き、部屋中に乱れ回る—— 「こんな不潔な花ばかり好むとは、馬鹿な子供だ!」 急いで百合の花を見ると、もう蠅の糞が何点かついていた。 見ていられない。捨てるに忍びない。 目を見開いて空を仰ぎ、彼にはもう言うべき言葉がなかった。 言葉が出ず、隣家のことを思い出す。 彼らの大きな花園に、たくさんの美しい花がある。 (『新青年』第五巻第一号。) 【人と時】 一人が言った。将来は現在に勝る。 一人が言った。現在は昔に遠く及ばない。 一人が言った。何だと? 時が言った。お前たちはみな私の現在を侮辱している。 昔が良いなら、自分で帰れ。 将来が良いなら、私について前へ来い。 この何だと言った者よ、 お前が何を言っているのか、私にはわからぬ。 (『新青年』第五巻第一号。) 【渡河と道案内】 玄同兄: 二日前、『新青年』五巻二号の通信欄で、兄が唐俟もエスペラントに反対しないこと、合わせて議論してもよいという話を見ました。私はエスペラントにもとより反対しませんが、しかし議論したくもありません。というのも、私がエスペラントに賛成する理由はきわめて簡単で、まだ口を開いて議論するほどのものではないからです。 賛成の理由を問われれば、ただこういうことです。私が見るところ、人類は将来きっと何かの共通の言語を持つべきである。だからエスペラントに賛成するのです。 将来通用するのがエスペラントかどうかは、むろん断定できません。おそらくエスペラントを改良して、より完全なものにするか、あるいは別にもっと良いものが出現するか、まだわかりません。しかし現在これしかない以上、まずこのエスペラントを学ぶしかないのです。今はまだ草創の時代で、汽船がまだなければ丸木舟に乗るしかないのと同じです。もし将来汽船ができるはずだからといって、丸木舟を造らなかったり乗らなかったりすれば、汽船も発明されず、人類は水を渡ることができなくなるでしょう。 しかし将来なぜ必ず人類共通の言語があるかと問われれば、確たる証拠は出せません。将来必ずありえないと言う者もまた同様です。だから議論の必要はまったくなく、各自が信じるところに従って行うだけです。 しかし私にはもう一つ意見があります。エスペラントを学ぶのは一つのことであり、エスペラントの精神を学ぶのは、また別のことだと思うのです。——白話文学もまた同様です。——もし思想が旧態のままならば、やはり看板を変えて中身を変えないのと同じです。ようやく「四目蒼聖」の前から這い上がったかと思えば、また「柴明華先師」の足元に跪くのです。人類の進歩に反対する時、以前はnoと言い、今はneと言うだけ。以前は「咈哉」と書き、今は「不行」と書くだけのことです。だから私の意見では、正当な学術文芸を注入し、思想を改良するのが第一であり、エスペラントの議論はそれに次ぐもので、弁駁に至ってはまったく不要です。 |
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半矣。” |
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秦客难曰:“八方异俗,歌哭万殊,然其哀乐之情,不得不见也。夫心动于中,而声出于心。虽托之于他音,寄之于余声,善听察者,要自觉之不使得过也。昔伯牙理琴,而钟子知其所至 各本作志 ;隶人击磬,而子产识其心哀;鲁人晨哭,而颜渊察 各本作审 其生离;夫数子者,岂复假智于常音,借验于曲度哉?心戚者则形为之动,情悲者则声为之哀。此自然相应,不可得逃。唯神明者能精之耳。夫能者不以声众为难,不能者不以声寡为易。今不可以未遇善听,而谓之声无可察之理;见方俗之多变,而谓声音无哀乐也。又云:贤不宜言爱,愚不宜言憎。然则有贤然后爱生,有愚然后憎起 各本作成 ,但不当其共 各本二字倒 名耳。哀乐之作,亦有由而然。此为声使我哀,音使我乐也。苟哀乐由声,更为有实,何得名实俱去邪?又云:季札 原作体,因札讹礼,礼又为礼而讹也,今正各本作子 采诗观礼,以别风雅;仲尼叹韶音之一致,是以咨嗟;是何言与?且师襄奏 黄汪二张本讹奉。下诸奏字同。程本不误 操,而仲尼睹文王之容;师涓进曲,而子野识亡国之音。宁复讲诗而后下言,习礼然后立评哉?斯皆神妙独见,不待留闻积日,而已综 原钞作终。据各本及旧校改 其吉凶矣。是以前史以为美谈。今子以区区之近知,齐所见而为限;无乃诬前贤之识微,负夫子之妙察邪?” |
『新青年』の通信欄は、近頃だいぶ発達してきたようです。読者も好んで読みます。しかし私の個人的な意見では、もう少し減らしてもよいと思います。誠実で切実な議論だけを毎号掲載すればよい。その他の無責任な口先だけの批評や、常識のない問難には、せいぜい一度だけ答えればよく、それ以後は多くを語る必要はなく、紙とインクを節約して他に回すべきです。たとえば幽霊を見たとか、仙人を求めるとか、顔を打つとかいった類は、明々白々、まったく常識のないことなのに、『新青年』はなおも彼らと反復して論じ、「二五は十である」という道理を説いている。この手間は惜しくないか、この事業は哀れではないか。 私の見るところ、『新青年』の内容は大略二類に出ない。一つは、空気が閉塞し汚濁していて、この空気を吸う人間はもうおしまいだと感じ、眉を顰めて「ああ」と一声嘆かずにはいられない。同感の人々がこれによって注意を払い、活路を切り開くことを望むのだ。もし誰かが、この顔色と声は、妓女の秋波のようには美しくなく、小唄のようには美しく聞こえないと言うなら、それはまったく正しい。我々は彼と弁論する必要はない。眉を顰めてため息をつくほうがもっと美しいなどと言えば、こちらが間違いだ。もう一つは、これまで歩んできた道がきわめて危険で、しかももう行き止まりに近いと感じ、良心に従って切実に探し求め、別の平坦で希望のある道を見つけたら、大声で「こちらに行くのがよい」と叫ぶことだ。同感の人々がこれによって身を翻し、危険を脱して進歩しやすくなることを望むのだ。もし誰かが別の方向に行こうとするなら、もう一度勧めるのも構わないが、それでも信じなければ、命がけで引き止める必要はなく、各自が自分の道を行けばよい。引き止めて喧嘩になっては、彼に益がないだけでなく、自分も同感の人々も時間を無駄にするのだから。 イエスは言った。車が転覆しそうなのを見たら、支えてやれ。ニーチェは言った。車が転覆しそうなのを見たら、押してやれ。私はもちろんイエスの言葉に賛成する。しかし思うに、もし支えてもらいたくないなら、無理に支える必要はない。放っておけばよい。その後転覆しなければもちろん結構だし、もし結局ひっくり返ったなら、その時こそ切実に手を貸して起こしてやればよいのだ。 兄よ、無理に支えるのは起こすよりも骨が折れ、効果も見えにくい。ひっくり返ってから起こすほうが、転覆しかけた時に支えるよりも、彼らにとってより有益なのだ。 唐俟。十一月四日。 (『新青年』第五巻第五号。) 【】 【第五巻】 【声は哀楽なきの論】 秦の客、東野の主人に問うて曰く、「之を前論に聞けば曰く、治世の音は安にして楽しく、亡国の音は哀にして思う、と。それ治乱は政にあり、而して音声之に応ず。故に哀思の情は金石に表れ、安楽の象は管弦に形る、と。又た仲尼、韶を聞き、虞舜の徳を識り、季札、弦を聴きて、衆国の風を識る。斯れ已然の事にして、先賢の疑わざる所なり。今、子独り以為えらく声に哀楽なしと。其の理は何くにか居る?若し嘉訊あらば、請う其の説を聞かん。」主人之に応じて曰く、「斯の義久しく滞りて、肯えて拯救する莫し。故に歴世をして名実に濫せしむ。今啓導を蒙り、将に其の一隅を言わんとす。それ天地徳を合わせ、万物生を資く。寒暑代わり往き、五行以て成る。章を五色と為し、発して五音と為す。音声の作、其れ猶お臭味の天地の間に在るがごとし。其の善と不善と、浊乱に遭うと雖も、其の体は自若にして変ずること無きなり。豈に愛憎を以て操を易え、哀楽もて度を改めんや?宮商の集比に及び、声音克く諧う。此れ人心の至願にして、情欲の鋳る所なり。古人、情の恣にすべからざるを知り、欲の極むべからざるを知る。故に其の用うる所に因りて毎に之が節を為す。哀をして傷に至らしめず、楽をして淫に至らしめず。事に因りて名を与え、物に其の号あり。哭、之を哀と謂い、歌、之を楽と謂う。斯れ其の大較なり。然れども楽と云い楽と云う、鍾鼓云うか哉?哀と云い哀と云う、哭泣云うか哉?兹に因りて言えば、玉帛は礼敬の実にあらず、歌舞は悲哀の主にあらざるなり。何を以て之を明らかにせん?それ殊方異俗にして、歌哭同じからず。錯りて之を用いしめば、或いは哭を聞きて歓び、或いは歌を聴きて戚しむ。然れども其の哀楽の懐は均しきなり。今均同の情を用いて、万殊の声を発す。斯れ音声の常なきにあらざらんや?然れども声音の和比は、人を感ぜしむるの最も深き者なり。労する者は其の事を歌い、楽しむ者は其の功を舞う。それ内に悲痛の心あれば、則ち激しく哀切の言を発す。言比して詩を成し、声比して音を成す。雑えて之を詠じ、聚めて之を聴く。心は和声に動き、情は苦言に感ず。嗟嘆未だ絶えざるに、泣涕流涟す。それ哀心は内に蔵し、和声に遇いて後に発す。和声に象なくして、哀心に主あり。それ主ある哀心を以て、象なき和声に因りて後に発すれば、其の覚悟する所は、唯だ哀のみ。豈に復た吹万の同じからざるを知りて、其をして自ら已ましめんや。風俗の流れ、遂に其の政を成す。是の故に国史は政教の得失を明らかにし、国風の盛衰を審らかにし、情性を吟詠して、以て其の上を諷す。故に曰く、亡国の音は哀にして思う、と。それ喜怒哀楽、愛憎慚懼、凡そ此の八者は、生民の以て物に接し情を伝うる所にして、区別に属あり、而して溢すべからざる者なり。それ味は甘苦を以て称と為す。今、甲の賢なるを以て心に愛し、乙の愚なるを以て情に憎む。則ち愛憎は宜しく我に属すべく、而して賢愚は宜しく彼に属すべきなり。我が愛を以て之を愛人と謂い、我が憎を以て之を憎人と謂うべけんや?喜ぶ所を以て之を喜味と謂い、怒る所を以て之を怒味と謂うべけんや?此に由りて之を言えば、則ち外内用を殊にし、彼我名を異にす。声音は自ら当に善悪を以て主と為すべく、則ち哀楽に関わり無し。哀楽は自ら当に情感ありて後に発すべく、則ち声音に系り無し。名実俱に去れば、則ち尽然として見るべし。且つ季子の魯に在りしは、詩を采り礼を観て、以て風雅を別ちしなり。豈に徒だ声に任せて以て臧否を決せんや?又た仲尼の韶を聞きしは、其の一致を嘆じしなり。是を以て咨嗟す。何ぞ必ずしも声に因りて虞舜の徳を知り、然る後に嘆美せんや?今粗ぼ其の一端を明らかにするも、亦た過半を思うべし。」 秦の客難じて曰く、「八方の異俗にして、歌哭万殊なるも、然れども其の哀楽の情は、見ざるを得ざるなり。それ心は中に動き、声は心より出ず。之を他音に託し、之を余声に寄すと雖も、善く聴き察する者は、要ず自ら之を覚りて過ぐることを得しめざるなり。昔、伯牙琴を理め、而して鍾子其の至る所を知り、隷人磬を撃ちて、子産其の心の哀しきを識り、魯人晨に哭して、顔淵其の生離なるを察す。それ数子なる者は、豈に復た智を常音に仮り、験を曲度に借らんや?心戚しき者は則ち形之が為に動き、情悲しき者は則ち声之が為に哀し。此れ自然に相応じ、逃るるを得べからず。唯だ神明なる者のみ能く之を精しくするのみ。それ能ある者は声の衆きを以て難しとせず、能なき者は声の寡きを以て易しとせず。今、未だ善聴に遇わざるを以て声に察すべき理なしと謂うべからず、方俗の多変なるを見て声音に哀楽なしと謂うべからざるなり。又た云う、賢は宜しく愛と言うべからず、愚は宜しく憎と言うべからず、と。然らば則ち賢あって後に愛生じ、愚あって後に憎起こるも、但だ其の共の名に当たらざるのみ。哀楽の作も亦た由ありて然り。此れ声の我を哀しましめ、音の我を楽しましむるなり。苟しくも哀楽声に由れば、更に実あり。何ぞ名実俱に去るを得んや?又た云う、季札は詩を采り礼を観て以て風雅を別ち、仲尼は韶音の一致を嘆じて是を以て咨嗟す、と。是れ何の言ぞや?且つ師襄操を奏し、而して仲尼文王の容を睹る。師涓曲を進め、而して子野亡国の音を識る。寧ろ復た詩を講じて後に言を下し、礼を習いて然る後に評を立てんや?斯れ皆な神妙独見にして、留聞積日を待たずして、已に其の吉凶を綜ぶるなり。是を以て前史以て美談と為す。今、子、区区たる近知を以て、見る所を斉しくして限りと為す。乃ち前賢の識微を誣い、夫子の妙察に負くこと無きかな?」 |
第2節
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主人答曰:“难云:虽歌哭殊万,善听察者要自觉之,不假智于常音,不借验于曲度。钟子之徒云云是也。此为心哀 各本作悲 者,虽谈笑鼓舞,情欢者,虽拊膺咨嗟,独不能御外形以自匿,诳察者于疑似也。尔为已就 四字各本作以为就令。旧校同 声音之无常,犹谓当有哀乐耳。又曰:季子听声,以知众国之风;师襄奏操,而仲尼睹文王之容。案如所云,此为文王之功德,与风俗之盛衰,皆可象之于声音。声之轻重,可移于后世,襄涓之巧,又 各本字夺 能得之于将来。若然者,三皇五帝,可不绝于今日,何独数事哉?若此果然也,则文王之操有常度,韶武之音有定数,不可杂以他变,操以余声也。则向所谓声音之无常,钟子之触类,于是乎踬矣。若音声之无常 原钞夺之字、常字。黄汪本同。据程二张本加 ,钟子之 黄汪本字夺 触类,其果然邪?则仲尼之识微,季札之善听,固亦诬矣。此皆俗儒妄记,欲神其事而追为耳。欲令天下 四字从旧校及各本 惑声音之道,不言理自。尽此而推 张燮本作惟 ,使神妙难知,恨不遇奇听于当时,慕古人而叹息 各本作自叹 。斯 二张本字无 所以大罔后生也。夫推类辨物,当先求之自然之理。理已足 黄汪二张本作定 ,然后借古义以明之耳。今未得之于心,而多恃前言以为谈证,自此以往,恐巧历不能纪耳 各本字夺 。又难云:哀乐之作,犹爱憎之由贤愚,此为声使我哀,而音使我乐。苟哀乐由声,更为有实矣。夫五色有好丑,五声有善恶,此物之自然也。至于爱与不爱,喜与不喜 原钞下三字误入下文物字下。今移正。各本夺。旧校亦删 ,人情之变,统物之理,唯止于此。然皆无豫于内,待物而成耳。至夫哀乐自以事会,先遘于心,但因和声,以自显发;故前论已明其无常,今复假此谈以正其名号耳。不谓哀乐发于声音,如爱憎之生于贤愚也。然和声之感人心,亦犹醞酒 各本作酒醴 之发人性 各本作情 也。酒以甘苦为主,而醉者以喜怒为用。其见欢戚为声发,而谓声有哀乐,犹 各本字夺。旧校亦删 不可见喜怒为酒使,而谓酒有喜怒之理也。” |
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秦客难曰:“夫观气采色,天下之通用也。心变于内,而色应于外,较然可见。故吾子不疑。夫声音,气之激者也,心应感而动,声从变而发;心有盛衰,声亦降 张燮本作隆。答文中降杀字放此 杀。同见役于一身,何独于声便当疑邪?夫喜怒章于□诊 各本作色诊。旧校同 ,哀乐亦宜形于声音。声音自当有哀乐,但暗者不能识之。至钟子之徒,虽遭无常 程本讹当 之声,则颖然独见矣。今蒙瞽面墙而不悟,离娄照秋毫于百寻,以此言之,则明暗殊能矣。不可守咫尺之度,而疑离娄之察;执中庸之听,而猜钟子之聪。皆谓古人为妄记也。” |
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主人答曰:“难云:心应感而动,声从变而发,心有盛衰,乐 黄本作声 亦降杀。哀乐之情,必形于声音。钟子之徒,虽遭无常之声,则颖然独见矣。必若所言,则浊质之饱,首阳之饥,卞和之冤,伯奇之悲,相如之含怒,不赡 各本作占 之怖,祗千变百态。使各发一咏之歌,同启数弹之微,则钟子之徒,各审其情矣。尔为听声者,不以寡众易思?察情者不以大小为异?同出一身者,斯 各本讹期 于识之也。设使从下出 黄汪二张本字夺。旧校亦删。程本有 ,则子野之徒,亦当复操律鸣管,以考其音。知南风之盛衰。别雅郑之淫正也。夫食辛之与甚噱,熏目之与哀泣,同用出泪,使易牙尝之,必不言乐泪甜,而哀泪苦。斯可知矣。何者?肌液肉汗,踧笮便出,无主于哀乐,犹簁酒之囊漉,虽笮具不同,而酒味不变也。声俱一体之所出,何独当 各本二字作当独 含哀乐之理邪 黄本作也 ?且夫咸池六茎,大章韶夏,此先王之至乐,所以动天地感鬼神者也 各本二字夺 。今必云声音,莫不象其体,而传其心;此必为至乐,不可托之于瞽史,必须圣人理其弦管,尔乃雅音得全也。舜命夔击石拊石,八音克谐,神人以和。以此言之,至乐虽待圣人而作,不必圣人自执也。何者?音声有自然之和,而无系于人情。克谐之音,成于金石;至和之声,得于管弦也。无纤毫自有形可察,故离瞽以明异功耳。若以水济水,孰异之哉!” |
主人答えて曰く、「難じて云う、歌と哭は万殊なりといえども、善く聴き察する者はおのずからこれを覚り、智を常音に仮らず、験を曲度に借りず。鍾子の徒云々是なりと。これ心に哀しむ〔各本は悲に作る〕者は、談笑鼓舞すといえども、情に歓ぶ者は、膺を拊ち咨嗟すといえども、独り外形を御して自ら匿し、察者を疑似に誑すこと能わざるなり。爾は已にして就く〔四字は各本「以為就令」に作る。旧校同じ〕声音の常なきを為し、なお哀楽有るべしと謂えり。又曰く、季子は声を聴きて以て衆国の風を知り、師襄は操を奏して仲尼は文王の容を睹たりと。案ずるに云うところの如くんば、これ文王の功徳と風俗の盛衰と、皆これを声音に象るべきなり。声の軽重は後世に移すべく、襄涓の巧はまた〔各本この字を脱す〕これを将来に得ること能くべし。もし然らば、三皇五帝は今日に絶えざるべく、何ぞ独り数事のみならんや。もしこれ果たして然りとせば、文王の操に常度あり、韶武の音に定数あり、他の変を雑え、余声を以て操すべからざるなり。則ち向に謂うところの声音の常なきこと、鍾子の触類は、ここにおいて躓くなり。もし音声に常なく〔原鈔は之の字と常の字を脱す。黄汪本同じ。程二張本に拠りて加う〕、鍾子の〔黄汪本この字を脱す〕触類、その果たして然りとせば、仲尼の微を識ること、季札の善く聴くこと、固よりまた誣なり。これみな俗儒の妄記にして、その事を神にせんと欲して追いて為せるのみ。天下をして〔四字は旧校及び各本に従う〕声音の道に惑わしめんと欲し、理の自ずから尽くるを言わず。ここより推して〔張燮本は惟に作る〕、神妙にして知り難からしめ、奇聴に当時に遇わざるを恨み、古人を慕いて嘆息せしむ〔各本は自嘆に作る〕。これ〔二張本この字なし〕所以に大いに後生を罔すなり。それ類を推し物を辨ずるには、先ず自然の理に求むべし。理已に定まりて〔黄汪二張本は定に作る〕、然る後に古義を借りて以てこれを明らかにするのみ。今未だこれを心に得ずして、多く前言に恃みて以て談証と為す。此より以往、恐らくは巧暦も紀すること能わざらん〔各本この字を脱す〕。又難じて云う、哀楽の作は、なお愛憎の賢愚に由るが如く、これ声は我をして哀しましめ、音は我をして楽しましむるなり。いやしくも哀楽声に由らば、更に実あることとなる。それ五色に好醜あり、五声に善悪あり、これ物の自然なり。愛と不愛、喜と不喜に至りては〔原鈔は下三字を誤りて下文の物字の下に入る。今移して正す。各本は脱す。旧校もまた削る〕、人情の変にして物を統ぶるの理、ただここに止まるのみ。しかれども皆内に預かるなく、物を待ちて成るのみ。それ哀楽は自ら事の会する所を以て、先ず心に遘い、ただ和声に因りて自ら顕発するなり。ゆえに前論に已にその常なきを明らかにし、今また此の談を仮りて以てその名号を正すのみ。哀楽の声音に発するを謂うにあらず、愛憎の賢愚に生ずるが如きなり。しかれども和声の人心を感ぜしむるは、なお醞酒〔各本は酒醴に作る〕の人の性〔各本は情に作る〕を発するが如きなり。酒は甘苦を主とし、酔者は喜怒を用とす。歓戚の声に発するを見て、声に哀楽ありと謂うは、なお〔各本この字を脱す。旧校もまた削る〕喜怒の酒に使われるを見て、酒に喜怒の理ありと謂うべからざるが如きなり。」 |
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秦客难曰:“虽众喻有隐,足招攻难,然其大理,当有所就。若葛卢闻牛鸣,知其三生 各本作子下三,生字并同 为牺;师旷吹律,知南风不竞 字从旧校。各本作竟,疑原钞亦同 ,楚师必败;羊舌母听闻儿啼,而知其丧家。凡此数事,皆效于上世,是以咸见录载。推此而言,而盛衰吉凶,莫不存乎声音矣。今若复谓之诬罔,则前言往记,皆为弃物,无用之也。以言通论,未之或安。若能明斯 张燮本作其 所以,显其所由,设二论俱济,愿重闻之。” |
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主人答曰:“吾谓能反三隅者,得意而忘 各本字夺 言。是以前论略而未详。今复烦寻环之难,敢不自一竭邪。夫鲁牛能知牺历之丧生,哀三生之不存;含悲经年,诉怨葛卢。此为心与人同,异于兽形耳。此又吾之所疑也。且牛非人类,无道相通。若谓鸟 各本作鸣 兽皆能有□ 旧校灭其原字。改作祸。程本作知。他本阙 ,葛卢受性,独晓之;此为解 黄本作称 其语而论其事,犹传译异言耳。不为考声音而知其情,则非所以为难也。若为知者,为当触物而达,无所不知。今且先议其所易者。请问圣人卒入胡域,当知其所言不 各本作否 乎?难者必曰:知之。知之之理,何以明之?愿借子之难以立鉴识之域焉 各本字夺 。或当与关接,识其言邪?将吹 黄本作次 律鸣管,校其音邪?观气采色,知其心邪?此为知心,自由气色;虽自不言,犹将知之。知之之道,可不待言也。若吹律校音,以知其心。假令心志于马,而误言鹿。察者故当由鹿以知 各本讹弘 马也。此为心不系于所言,言或不足以证心也。若当关接而知言,此为孺子学言于所师,然后知之。则何贵于聪明哉。夫言非自然一定之物。五方殊俗,同事异号。趣 各本字夺 举一名,以为标 各本作摽 识耳。夫圣人穷理,谓自然可寻,无微不照。苟无微不照 各本五字无。旧校亦删 ,理蔽 原作数。据各本及旧校改 则虽近不见。故异域之言,不得强通。推 张燮本作信 此以往,葛卢之不知牛鸣,得不全乎?又难云:师旷吹律,知南风不竞,楚多死声,此又吾之所疑也。请问师旷 《北堂书钞》一百十二引作子野 吹律之时,楚国之风邪?则相去千里,声不足达;若正识楚风 各本讹国 ,来入律中邪?则楚南有吴越,北有梁宋,苟不见其原,奚以识之哉?凡阴阳愤激,然后成风;气之相感,触地而发;何得发楚庭,来入晋乎?且又律吕分四时之气耳,时至而气动,律应而灰移。皆自然相待,不假人以为用也。上生下生,所以均五声之和,叙刚柔之分也。然律有一定之声,虽冬吹中吕,其音自满而无损也。今以晋人之气,吹无韵 案:当作损 之律,楚风安得来入其中,与为盈缩邪?风无形,声与律不通,则校理之地,无取于风律,不其然乎?岂独师旷 已上四字《书钞》引作子野。案:独字当衍 博物多识 各本作多识博物 ,自有以知胜败之形,欲固众心,而托以神微 《书钞》引作徵下有者也二字 。若伯常骞之许景公寿哉。又难云:羊舌母听闻儿啼,而审其丧家。复请问何由知之?为神心独悟,暗语而当邪?尝闻儿啼,若此其大而恶,今之啼声,似昔之啼声也 各本字夺 。故知其丧家邪?若神心独悟,暗语之当,非理之所得也。虽曰 原钞日。据各本及旧校改 听啼,无取验于儿声矣。若以尝闻之声为恶,故知今啼当恶,此为以甲声为度,以校乙之啼也。夫声之于音,犹形之于心也。有形同而情乖,貌殊而心均者;何以明之?圣人齐心等德,而形状不同也。苟心同而形异,则何言乎观形而知心哉?且口之激气为声,何异于籁籥纳气而鸣邪?啼声之善恶,不由儿口吉凶,犹琴瑟之清浊,不在操者之工拙也。心能辨理善谭 各本作谈 ,而不能令内 张燮本作籁 籥调利,犹瞽者能善其曲度,而不能令器必清和也。器不假妙瞽而良,籥不因慧 黄汪程张溥本作惠 心而调。然则心之与声,明为二物。二物 各本物下有之字 诚然,则求情者不留观于形貌,揆心者不借听于声音也。察者欲因声以知心,不亦外乎?今晋母未得之于考试 各本作老成。旧校同 ,而专信昨日之声,以证今日之啼;岂不误中于前世好奇者,从而称之哉?” |
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秦客难曰:“吾闻败者不羞走,所以全也。今 各本字无 吾心未厌,而言于 各本字无 难,复更从其余。今平和之人,听筝笛批把 各本作琵琶,下放此 ,则形躁而志越。闻琴瑟之音,则听静而心闲。同一器之中,曲用每殊,则情随之变。奏秦声则叹羡而慷慨,理齐楚则情一而思专,肆姣弄则欢放而欲惬。心为声变,若此其众。苟躁静由声,则何为限其哀乐?而但云至和之声,无所不感;托大同于声音,归众变于人情。得无知彼不明此哉?” |
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主人答曰:“难云:批把筝笛,令人躁越。又云:曲用每殊,而情随之变。此诚 张燮本作情 所以使人常感也。批把筝笛,间促而声高,变众而节数。以高声御数节,故使 各本讹更 形躁而志越。犹铃铎警耳,而 各本字无 钟 张燮本作 鼓骇心。故闻鼓鼙之音,则 各本字无 思将帅之臣;盖以声音有大小,故动人有猛静也。琴瑟之体,间 各本讹闻 辽而音埤,变希而声清,以埤音御希变,不虚心静听,则不尽清和之极。是以听静而心闲也。夫曲度 黄本作用 不同,亦犹殊器之音耳。齐楚之曲多重,故情一;变妙,故思专。姣弄之音,挹众声之美,会五音之和,其体赡而用博,故心役 各本讹侈 于众理。五音会,故欢放而欲惬。然皆以单、复、高、埤、善、恶为体,而人情以躁静专散为应。譬犹游观于都肆,则目滥而情放;留察于曲度,则思静 各本夺已以上二十五字 而容端。此为声音之体,尽于舒疾;情之应声;亦止于 张燮本作以 躁静耳。夫曲用每殊 原钞夺已以上十五字。依各本及旧校加 ,而情之处变,犹滋味异美,而口辄识之也。五味万殊,而大同于美;曲变虽众,亦大同于和。美有甘,和有乐;然随曲之情,尽乎 黄本作于 和域;应美之口,绝于甘境。安得哀乐于其间哉?然人情不自 各本字无 同,各 各本字夺 师所解,则发其所怀。若言平和哀乐正等,则无所先发,故终得躁静。若有所发,则是有主于内,不为平和也。以此言之,躁静者,声之功也;哀乐者,情之主也;不可见声有躁静之应,因谓哀乐皆由声音也。且声音虽有猛静 黄汪二张本重有猛静字。旧校亦加。程本无 ,各有一和,和之所感,莫不自发。何以明之?夫会宾盈堂,酒酣奏琴,或忻然而欢,或惨尔而泣。非进哀于彼,导乐于此也。其音无变于昔,而欢戚并用,斯非吹万不同邪?夫唯无主于喜怒,亦应 原作未应,今正。各本夺。旧校亦删 无主于哀乐,故欢戚俱见。若资不 各本作偏 固之音,含一致之声,其所发明,各当其分。则焉能兼御群理,总发众情邪?由是言之:声音以平和为体,而感物无常;心志以所俟为主,应感而发。然则声之与心,殊途异轨,不相经纬;焉得染太和于欢戚,缀虚名于哀乐哉?” |
秦客難じて曰く、「それ気を観、色を采るは、天下の通用なり。心は内に変じて色は外に応ず。較然として見るべし。ゆえに吾子は疑わず。それ声音は気の激する者なり。心は感に応じて動き、声は変に従いて発す。心に盛衰あらば、声にもまた降〔張燮本は隆に作る。答文中の降殺の字をここに放つ〕殺あり。同じく一身に役せらるるに、何ぞ独り声に於いてすなわち疑うべけんや。それ喜怒は□診〔各本は色診に作る。旧校同じ〕に章かなり。哀楽もまた声音に形るべし。声音に自ずから哀楽あるべきも、ただ暗き者はこれを識ること能わざるのみ。鍾子の徒に至りては、常なき〔程本は当に訛る〕の声に遭うといえども、穎然として独り見るなり。今、蒙して瞽にして墻に面す」 |
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秦客难曰:“论云:猛静之音,各有一和。和之所感,莫不自发。是以酒酣奏琴,而欢戚并用。此言偏并 案:当作重 之情。先积于内,故怀欢者值哀音而发,内戚者遇乐声而感也。夫声音自当有一定之哀乐,但声化迟缓,不可仓卒,不能对易。偏重之情,触物而作。故令哀乐同时而应耳。虽二情俱见,则何损于声音有定理邪?” |
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主人答曰:“难云:哀乐自有定声,但偏重之情,不可卒移。故怀戚者遇乐声而哀耳。即如所言,声有定分;假使《鹿鸣》重奏,是乐声也;而令戚者遇之,虽声化迟缓,但当不能便 各本作使 变令欢耳。何得更以哀邪?犹一爝之火,虽未能温一室,不宜复增其寒矣。夫火非隆寒之物,乐非增哀之具也。理弦高堂,而欢戚并用者,直至 各本讹真主 和之发滞导情,故令外物所感,得自尽耳。难云:偏重之情,触物而作,故令哀乐同时而应耳。夫言哀者,或见机 张溥本作几。汪本讹机。下机字放此 杖而泣,或睹舆服而悲。徒以感人亡而物存,痛事显而形潜。其所以会之,皆自有由,不为触地而生哀,当席而泪出也。今无 各本作见。案:因无而讹 机杖以致感,听和声而流涕者,斯非和之所感,莫不自发也。” |
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秦客难曰:“论云:酒酣奏琴,而欢戚并用。欲通此言,故答以偏情,感物而发耳。今且隐心而言,明之以成效。夫人心不欢则戚,不戚则欢,此情志之大域也。然泣是戚之伤,笑是欢之用也 各本字无 。盖闻齐楚之曲者,惟睹其哀涕之容,而未曾见笑噱之貌,此必齐楚之曲,以哀为体;故其所感,皆应其度 黄本度下有量字 。岂徒以多重而少变,则致精 各本作情 壹而思专邪?若诚能致泣,则声音之有哀乐,断可知矣。” |
第3節
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主人答曰:“虽人情感 黄本讹慼 于哀乐,哀乐各有多少。又哀乐之极,不必同致也。夫小哀容 程本讹密 坏,甚悲而泣;哀之方也。小欢颜悦,至乐而笑 各本作心愉 ;乐之理也。何以言 各本作明 之?夫至亲安豫,则怡然自若 各本作恬若自然 ,所猖狂 各本作自得 也。及在危急,仅然后济,则抃不及儛。由此言之,儛之不若向之自得,岂不然哉?至夫笑噱,虽出于欢情,然自以理成;又非 各本六字夺。旧校亦删 自然应声之具也。此为乐之应声,以自得为主;哀之应感,以垂涕为故。垂涕则形动而可觉,自得则神合而无变 各本作忧 。是以观其异,而不识其同 原钞四字夺。依各本及旧校加 ;别其外,而未察其内耳。然笑噱之不显于声音,岂独齐楚之曲邪?今不求乐于自得之域,而以无笑噱谓齐楚体哀,岂不知哀而不识乐乎?” |
主人答えて曰く、「人情は哀楽に感ずといえども、哀楽にはおのおの多少あり。また哀楽の極は、必ずしも同じく致るにあらざるなり。それ小哀なれば容は壊れ、甚だ悲しければ泣く。哀の方なり。小歓なれば顔は悦び、至楽なれば笑う。楽の理なり。何を以てこれを言うか。それ至親安豫なれば、すなわち怡然として自若たり、猖狂するところなり。危急に在りて、僅かにして後に済するに及べば、すなわち抃して舞うに及ばず。これに由りてこれを言えば、舞の先の自得に若かざること、豈に然らざらんや。それ笑噱に至りては、歓情より出づといえども、然れども自ら理を以て成る。また自然に声に応ずるの具にあらざるなり。これ楽の声に応ずるは、自得を以て主と為し、哀の感に応ずるは、垂涕を以て故と為す。垂涕すれば形動きて覚るべく、自得すれば神合して変なし。ここを以てその異を観て、その同を識らず。その外を別ちて、未だその内を察せざるのみ。然れども笑噱の声音に顕れざること、豈にひとり斉楚の曲のみならんや。今楽を自得の域に求めずして、笑噱なきを以て斉楚は哀を体すと謂う、豈に哀を知りて楽を識らざるにあらずや。」 |
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秦客问曰:“仲尼有言:移风易俗,莫善于乐。即如所论,凡百哀乐,皆不在声,则 各本作即 移风易俗,果以何物邪?又古人慎靡靡之风,抑滔 各本作慆 耳之声。故曰:放郑声,远佞人。然则郑卫之音 案:此下当有夺文 ,击鸣球以协神人,敢问郑雅之体,隆弊所极,风俗移易,奚由而济?愿 黄本作幸 重闻之,以悟所疑。” |
秦客問いて曰く、「仲尼に言あり、風を移し俗を易うるは、楽より善きはなし、と。すなわち論ずるところのごとく、およそ百の哀楽、皆声に在らずとせば、すなわち風を移し俗を易うるは、果たして何物を以てするや。また古人は靡靡の風を慎み、耳を慆すの声を抑う。故に曰く、鄭声を放ち、佞人を遠ざけよ、と。然らば鄭衛の音、鳴球を撃ちて以て神人を協わす。敢えて問う、鄭雅の体、隆弊の極まるところ、風俗の移り易わること、何に由りて済さんや。願わくは重ねてこれを聞き、以て疑うところを悟らん。」 |
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主人应之曰:“夫言移风易俗者,必承衰 张燮本讹哀 弊之后也。古之王者,承天理物,必崇简易之教,御无为之治。君静于上,臣顺 原钞四字夺。依各本及旧校加 于下;玄化潜通,天人交泰。枯槁之类,浸育灵液,六合之内,沐浴鸿流,荡涤尘垢;群生安逸,自求多福;默然从道,怀忠抱义,而不觉其所以然也。和心足于内,和气见 原钞五字夺,依旧校及各本加 于外;故歌以叙志,儛以宣情。然后文之以采章,照之以风雅,播之以八音,感之以太和;导其神气,养而就之;迎其情性 张燮本作性情 ,致而明之;使心与理相顺,气 各本讹和 与声相应。合乎会通,以济其美。故凯乐之情,见于金石;含弘光大,显于音声也。若以往则万国同风,芳荣济茂,馥如秋兰;不期而信,不谋而成 各本作诚 ,穆然相爱;犹舒锦布彩 各本采上夺布字。下衍而字。旧校依改,非 ,灿炳可观也。大道之隆,莫盛于兹,太平之业,莫显于此。故曰:移风易俗,莫善于乐。然 各本字无 乐之为体,以心为主。故无声之乐,民之父母也。至八音会谐,人之所悦,亦总谓之乐。然风俗移易,本 各本字夺 不在此也。夫音声和比 各本讹此 ,人情所不能已者也。是以古人知情 各本情下有之字 不可放,故抑其所遁;知欲 各本欲下有之字 不可绝,故自以为致 各本作因其所自 。故 各本字无 为可奉之礼,制可导之乐。口不尽味,乐不极音;揆终始之宜,度贤愚之中;为之检则,使远近同风,用而不竭,亦所以结忠信,著不迁也。故乡校庠塾亦随之。使 各本作变 丝竹与俎豆并存,羽毛与揖让俱用,正言与和声同发。使将听是声也,必闻此言;将观是容也,必崇此礼。礼犹宾主升降,然后酬酢行焉。于是言语之节,声音之度,揖让之仪,动止之数,进退相须,共为一体。君臣用之于朝,庶士用之于家。少而习之,长而不怠,心安志固,从善日迁,然后临之以敬,持之以 以下当夺一字 久而不变,然后化成。此又先王用乐之意也。故朝宴聘享,嘉乐必存;是以国史采风俗之盛衰,寄之乐工,宣之管弦,使言之者无罪,闻之者足以 各本以下有自字 诫。此又先王用乐之意也。若夫郑声,是音声之至妙。妙音感人,犹美色惑志,耽槃荒酒,易以丧业。自非至人,孰能御 黄本作禦 之?先王恐天下流而不反,故具其八音,不渎其声,绝其大和,不穷其变。捐窈窕之声,使乐而不淫。犹大羹不和,不极勺药之味也。若流浴浅近,则声不足悦,又非所欢也。若上失其道,国丧其纪;男女奔随,淫 各本作婬 荒无度;则风以此变,俗以好成。尚其所志,则群能肆之;乐其所习,则何以诛之?托于和声,配而长之,诚动于言,心感于和,风俗壹成,因而名 原钞字夺。据汪程本及旧校加 之。然所名之声,无中 黄本空阙。张燮本作甚 于淫邪也。淫之与正同乎心,雅郑之体,亦足以观矣。” |
主人これに応えて曰く、「それ風を移し俗を易うると言う者は、必ず衰弊の後を承くるなり。古の王者は、天を承けて物を理め、必ず簡易の教えを崇び、無為の治を御す。君は上に静かに、臣は下に順う。玄化潜かに通じ、天人交わりて泰し。枯槁の類も、霊液に浸育せられ、六合の内、鴻流に沐浴して、塵垢を蕩滌す。群生安逸にして、自ら多福を求む。黙然として道に従い、忠を懐き義を抱きて、その然る所以を覚えざるなり。和心は内に足り、和気は外に見る。故に歌いて以て志を叙べ、舞いて以て情を宣ぶ。然る後にこれに文うるに采章を以てし、これを照らすに風雅を以てし、これを播くに八音を以てし、これに感ぜしむるに太和を以てす。その神気を導き、養いてこれを就す。その情性を迎え、致してこれを明らかにす。心と理とをして相順ぜしめ、気と声とをして相応ぜしむ。会通に合して、以てその美を済す。故に凱楽の情は金石に見れ、含弘光大は音声に顕る。もし以往なれば万国風を同じくし、芳栄済々として茂り、馥しきこと秋蘭のごとし。期せずして信あり、謀らずして成り、穆然として相愛す。なお錦を舒べ彩を布くがごとく、燦炳として観るべきなり。大道の隆んなること、これより盛んなるはなく、太平の業、これより顕かなるはなし。故に曰く、風を移し俗を易うるは、楽より善きはなし、と。然れども楽の体たるや、心を以て主と為す。故に無声の楽は、民の父母なり。八音会して諧い、人の悦ぶところに至りては、また総じてこれを楽と謂う。然れども風俗の移易は、本よりここに在らざるなり。それ音声の和して比するは、人情の已むあたわざるところなり。ここを以て古人は情の放つべからざるを知る、故にその遁ぐるところを抑う。欲の絶つべからざるを知る、故に自ら以て致すところとなす。故に奉ずべきの礼を為し、導くべきの楽を制す。口は味を尽くさず、楽は音を極めず。終始の宜しきを揆り、賢愚の中を度り、これが検則を為して、遠近をして風を同じくせしめ、用いて竭きず、また忠信を結び、不遷を著すゆえんなり。故に郷校庠塾も亦これに随う。絲竹をして俎豆と並び存し、羽毛をして揖譲と倶に用いらしめ、正言をして和声と同に発せしむ。この声を聴かんとすれば、必ずこの言を聞き、この容を観んとすれば、必ずこの礼を崇ぶ。礼はなお賓主の升降のごとく、然る後に酬酢行わる。ここにおいて言語の節、声音の度、揖譲の儀、動止の数、進退相須ちて、共に一体を為す。君臣はこれを朝に用い、庶士はこれを家に用う。少くしてこれを習い、長じて怠らず、心安んじ志固く、善に従いて日に遷る。然る後にこれに臨むに敬を以てし、これを持するに久しくして変ぜず、然る後に化成る。これまた先王の楽を用うるの意なり。故に朝宴聘享に嘉楽必ず存す。ここを以て国史は風俗の盛衰を采り、これを楽工に寄せ、これを管弦に宣べ、言う者をして罪なからしめ、聞く者をして以て自ら戒むるに足らしむ。これまた先王の楽を用うるの意なり。もし鄭声に至りては、これ音声の至妙なり。妙音の人を感ぜしむること、なお美色の志を惑わすがごとく、盤に耽り酒に荒れ、以て業を喪いやすし。至人にあらざれば、孰かよくこれを御せん。先王は天下の流れて反らざるを恐る、故にその八音を具え、その声を瀆さず、その大和を絶ち、その変を窮めず。窈窕の声を捐て、楽しみて淫せざらしむ。なお大羹の和せずして、勺薬の味を極めざるがごとし。もし浅近に流浴すれば、声は悦ぶに足らず、また歓ぶところにあらざるなり。もし上その道を失い、国その紀を喪い、男女奔随して、淫荒度なければ、風はこれを以て変じ、俗は好みを以て成る。その志をしきものは、群もよくこれを肆にし、その習いを楽しむものは、何を以てこれを誅せんや。和声に託し、配してこれを長じ、誠は言に動き、心は和に感じ、風俗ひとたび成れば、因りてこれを名づく。然れどもその名づくるところの声、淫邪に甚だしきものなきなり。淫と正とは心に同じ、雅鄭の体もまた以て観るに足る。」 |
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【第六篇 六朝之鬼神志怪书(下)】 |
【第六篇 六朝の鬼神志怪書(下)】 |
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释氏辅教之书,《隋志》著录九家,在子部及史部,今惟颜之推《冤魂志》存,引经史以证报应,已开混合儒释之端矣,而余则俱佚。遗文之可考见者,有宋刘义庆《宣验记》,齐王琰《冥祥记》,隋颜之推《集灵记》,侯白《旌异记》四种,大抵记经像之显效,明应验之实有,以震耸世俗,使生敬信之心,顾后世则或视为小说。王琰者,太原人,幼在交阯,受五戒,于宋大明及建元 五世纪中 年,两感金像之异,因作记,撰集像事,继以经塔,凡十卷,谓之《冥祥》,自序其事甚悉 见《法苑珠林》卷十七 。《冥祥记》在《珠林》及《太平广记》中所存最多,其叙述亦最委曲详尽,今略引三事,以概其余。 |
釈氏の教えを輔くるの書は、『隋志』に九家を著録し、子部および史部に在り、今はただ顔之推の『冤魂志』のみ存す。経史を引きて報応を証し、すでに儒釈混合の端を開きたり。而してその余はすべて佚す。遺文の考え見るべきものには、宋の劉義慶の『宣験記』、斉の王琰の『冥祥記』、隋の顔之推の『集霊記』、侯白の『旌異記』の四種あり、大抵は経像の顕効を記し、応験の実に有ることを明らかにし、以て世俗を震耸し、敬信の心を生ぜしめんとす。顧みれば後世にはあるいは小説と視せり。王琰は太原の人、幼くして交阯に在り、五戒を受け、宋の大明および建元(五世紀中)年に、二たび金像の異に感じ、因りて記を作り、像の事を撰集し、経塔を以て継ぎ、凡そ十巻、これを『冥祥』と謂う。自らその事を序すること甚だ悉し(『法苑珠林』巻十七に見ゆ)。『冥祥記』は『珠林』および『太平広記』中に存するもの最も多く、その叙述もまた最も委曲詳尽なり。今略ぼ三事を引きて、以てその余を概す。 |
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汉明帝梦见神人,形垂二丈,身黄金色,项佩日光。以问群臣,或对曰:“西方有神,其号曰佛,形如陛下所梦,得无是乎?”于是发使天竺,写致经像。表之中夏,自天子王侯,咸敬事之,闻人死精神不灭,莫不惧然自失。初,使者蔡愔将西域沙门迦叶摩腾等赍优填王画释迦佛像,帝重之,如梦所见也,乃遣画工图之数本,于南宫清凉台及高阳门显节寿陵上供养。又于白马寺壁画千乘万骑绕塔三匝之像,如诸传备载。 《珠林》十三 |
漢の明帝、夢に神人を見る。形は二丈に垂んとし、身は黄金色、項に日光を佩ぶ。以て群臣に問うに、あるいは対えて曰く、「西方に神あり、その号は仏と曰う。形は陛下の夢に見たまいしがごとし、これにあらずや。」ここにおいて使者を天竺に発し、経像を写し致す。これを中夏に表し、天子王侯より、ことごとく敬い事え、人の死して精神滅びざるを聞きて、惧然として自失せざるはなし。初め、使者蔡愔、西域の沙門迦葉摩騰らを将いて、優填王の画ける釈迦仏像を齎す。帝これを重んじ、夢に見しがごとくなれば、すなわち画工を遣わしてこれを数本図かしめ、南宮の清涼台および高陽門の顕節寿陵の上に供養す。また白馬寺に千乗万騎塔を繞ること三匝の像を壁画す。諸伝に備さに載するがごとし。(『珠林』十三) |
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晋谢敷字庆绪,会稽山阴人也,……少有高操,隐于东山,笃信大法,精勤不倦,手写《首楞严经》,当在都白马寺中,寺为灾火所延,什物余经,并成煨尽,而此经止烧纸头界外而已,文字悉存,无所毁失。敷死时,友人疑其得道,及闻此经,弥复惊异。…… 《珠林》十八 |
晋の謝敷、字は慶緒、会稽山陰の人なり。……少くして高操あり、東山に隠れ、大法を篤信し、精勤して倦まず、手ずから『首楞厳経』を写す。まさに都の白馬寺中に在りしとき、寺は災火の延ぶるところとなり、什物余経、並びに煨燼と成る。而してこの経はただ紙の頭の界の外を焼くのみにて、文字はことごとく存し、毀失するところなし。敷の死せる時、友人その得道せるを疑い、この経のことを聞くに及びて、いよいよまた驚異す。……(『珠林』十八) |
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晋赵泰字文和,清河贝邱人也,……年三十五时,尝卒心痛,须臾而死。下尸于地,心暖不已,屈伸随人。留尸十日,平旦,喉中有声如雨,俄而苏活。说初死之时,梦有一人来近心下,复有二人乘黄马,从者二人,扶泰腋径将东行,不知可几里,至一大城,崔巍高峻,城色青黑。将泰向城门入,经两重门,有瓦屋可数千间,男女大小亦数千人,行列而立。吏著皂衣,有五六人,条疏姓字,云“当以科呈府君”。泰名在三十,须臾,将泰与数千人男女一时俱进。府君西向坐,简视名簿讫,复遣泰南入黑门。有人著绛衣坐大屋下,以次呼名,问:“生时所事?作何孽罪?行何福善?谛汝等辞,以实言也!此恒遣六部使者常在人间,疏记善恶,具有条状,不可得虚。”泰答:“父兄仕宦,皆二千石。我少在家,修学而已,无所事也,亦不犯恶。”乃遣泰为水官将作。……后转泰水官都督知诸狱事,给泰兵马,令案行地狱。所至诸狱,楚毒各殊:或针贯其舌,流血竟体;或被头露发,裸形徒跣,相牵而行,有持大杖,从后催促,铁床铜柱,烧之洞然,驱迫此人,抱卧其上,赴即焦烂,寻复还生;……或剑树高广,不知限量,根茎枝叶,皆剑为之,人众相訾,自登自攀,若有欣竞,而身首割截,尺寸离断。泰见祖父母及二弟在此狱中,相见涕泣。泰出狱门,见有二人赍文书,来语狱吏,言有三人,其家为其于塔寺中悬幡烧香,救解其罪,可出福舍。俄见三人自狱而出,已有自然衣服,完整在身,南诣一门,云名开光大舍。……泰案行毕,还水官处。……主者曰:“卿无罪过,故相使为水官都督,不尔,与地狱中人无以异也。”泰问主者曰:“人有何行,死得乐报?”主者唯言“奉法弟子精进持戒,得乐报,无有谪罚也。”泰复问曰:“人未事法时所行罪过,事法之后,得以除不?”答曰:“皆除也。”语毕,主者开縢箧检泰年纪,尚有余算三十年在,乃遣泰还。……时晋太始五年七月十三日也。…… 《珠林》七。《广记》三百七十七 |
晋の趙泰、字は文和、清河貝丘の人なり。……年三十五の時、かつて卒かに心痛し、須臾にして死す。尸を地に下すも、心は暖かきこと已まず、屈伸人に随う。尸を留むること十日、平旦に喉中に声ありて雨のごとし。俄にして蘇りて活く。初め死する時を説くに、夢に一人来たりて心下に近づき、また二人黄馬に乗り、従者二人ありて、泰の腋を扶けて径ちに東行に将いゆくこと、幾里ばかりか知らず、一大城に至る。崔巍として高峻、城の色は青黒なり。泰を将いて城門より入り、二重の門を経るに、瓦屋数千間ばかりあり、男女大小また数千人、行列して立つ。吏は皂衣を著し、五六人あり、姓字を条疏して、「まさに科を以て府君に呈すべし」と云う。泰の名は三十に在り。須臾にして泰と数千人の男女を将いて一時にともに進む。府君は西向きに坐し、名簿を簡視し訖りて、また泰を遣わして南に黒門より入らしむ。人の絳衣を著して大屋の下に坐するあり、次を以て名を呼び、問う、「生時の所事は何ぞ。何の孽罪を作せるか。何の福善を行えるか。汝等の辞を諦かにし、実を以て言え。ここには恒に六部の使者を遣わして常に人間に在らしめ、善悪を疏記し、具さに条状あり、虚を得べからず。」泰答う、「父兄は仕宦し、皆二千石なり。我少くして家に在り、修学するのみ、事とするところなく、また悪を犯さず。」すなわち泰を遣わして水官の将作と為す。……後に泰を転じて水官都督とし諸獄の事を知らしめ、泰に兵馬を給し、地獄を案行せしむ。至るところの諸獄、楚毒おのおの殊なり。あるいは針もてその舌を貫き、血を流すこと体に竟り、あるいは頭を被き髪を露し、裸形徒跣にて相牽きて行き、大杖を持する者あり、後より催促す。鉄床銅柱、これを焼くこと洞然たり、この人を駆迫してその上に抱き臥さしむれば、赴けばすなわち焦爛し、尋いでまた還りて生ず。……あるいは剣樹あり高く広く、限量を知らず、根茎枝葉、皆剣もてこれを為す。人衆相訾り、自ら登り自ら攀じ、欣び競うあるがごとくして、身首割截せられ、尺寸離断す。泰、祖父母および二弟のこの獄中に在るを見て、相見て涕泣す。泰、獄門を出づるに、二人の文書を齎す者あり、来たりて獄吏に語る。三人あり、その家その為に塔寺中に幡を懸け香を焼きて、その罪を救解し、福舎に出づべしと言う。俄にして三人獄より出づるを見るに、すでに自然の衣服あり、完整にして身に在り。南に一門に詣る、名を開光大舎と云う。……泰案行し畢りて、水官のところに還る。……主者曰く、「卿は罪過なし、故に相使して水官都督と為す。しからずんば、地獄中の人と以て異なることなきなり。」泰、主者に問いて曰く、「人はいかなる行あれば、死して楽報を得るか。」主者ただ言う、「奉法の弟子、精進して持戒すれば、楽報を得て、謫罰あることなきなり。」泰また問いて曰く、「人いまだ法に事えざる時に行いし罪過は、法に事えし後に、以て除くを得るや否や。」答えて曰く、「皆除かるるなり。」語り畢りて、主者は縢箧を開きて泰の年紀を検するに、なお余算三十年在り、すなわち泰を遣わして還らしむ。……時に晋の太始五年七月十三日なり。……(『珠林』七。『広記』三百七十七) |
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佛教既渐流播,经论日多,杂说亦日出,闻者虽或悟无常而归依,然亦或怖无常而却走。此之反动,则有方士亦自造伪经,多作异记,以长生久视之道,网罗天下之逃苦空者,今所存汉小说,除一二文人著述外,其余盖皆是矣。方士撰书,大抵托名古人,故称晋宋人作者不多有,惟类书间有引《神异记》者,则为道士王浮作。浮,晋人;有浅妄之称,即惠帝时 三世纪末至四世纪初 与帛选抗论屡屈,遂改换《西域传》造老子《明威化胡经》者也 见唐释法琳《辩正论》六 。其记似亦言神仙鬼神,如《洞冥》、《列异》之类。 |
仏教すでに漸く流播し、経論日に多く、雑説もまた日に出づ。聞く者はあるいは無常を悟りて帰依するも、またあるいは無常を怖れて却走す。この反動として、方士もまた自ら偽経を造り、多く異記を作り、長生久視の道を以て、天下の苦空を逃るる者を網羅す。今存するところの漢の小説は、一二の文人の著述を除くほかは、その余は蓋しみなこれなり。方士の書を撰するは、大抵古人に託名す。故に晋宋の人の作と称するもの多くはなし。ただ類書の間に『神異記』を引くものあり、すなわち道士王浮の作なり。浮は晋の人にして、浅妄の称あり。すなわち恵帝の時(三世紀末より四世紀初)帛選と抗論して屡々屈し、遂に『西域伝』を改換して老子の『明威化胡経』を造りし者なり(唐の釈法琳の『弁正論』六に見ゆ)。その記もまた神仙鬼神を言うこと、『洞冥』・『列異』の類のごとし。 |
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陈敏,孙皓之世为江夏太守,自建业赴职,闻宫亭庙验 原注云言灵验 ,过乞在任安稳,当上银杖一枚。年限既满,作杖拟以还庙,捶铁以为干,以银涂之。寻徵为散骑常侍,往宫亭,送杖于庙中讫,即进路。日晚,降神巫宣教曰:“陈敏许我银杖,今以涂杖见与,便投水中,当以还之。欺蔑之罪,不可容也!”于是取银杖看之,剖视中见铁干,乃置之湖中。杖浮在水上,其疾如飞,遥到敏舫前,敏舟遂覆也。 《太平御览》七百十 |
陳敏、孫皓の世に江夏太守と為り、建業より職に赴く。宮亭廟の験あるを聞き、過ぎて任に在りて安穏ならんことを乞い、まさに銀杖一枚を上ぐべしとす。年限すでに満ち、杖を作りて以て廟に還さんと擬し、鉄を捶ちて以て干と為し、銀を以てこれに塗る。尋いで散騎常侍に徵され、宮亭に往き、杖を廟中に送り訖りて、すなわち路に進む。日晩に、降神の巫宣教して曰く、「陳敏我に銀杖を許すも、今塗杖を以て与えらる。すなわち水中に投じ、まさに以てこれを還すべし。欺蔑の罪は容すべからざるなり。」ここにおいて銀杖を取りてこれを看るに、剖きて中を視れば鉄の干を見る。すなわちこれを湖中に置く。杖は水上に浮き、その疾きこと飛ぶがごとく、遥かに敏の舫の前に到り、敏の舟遂に覆る。(『太平御覧』七百十) |
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丹丘生大茗,服之生羽翼。 《事类赋注》十六 |
丹丘は大茗を生じ、これを服すれば羽翼を生ず。(『事類賦注』十六) |
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《拾遗记》十卷,题晋陇西王嘉撰,梁萧绮录。《晋书·艺术列传》中有王嘉,略云,嘉字子年,陇西安阳人,初隐于东阳谷,后入长安,苻坚累徵不起,能言未然之事,辞如谶记,当时鲜能晓之。姚苌入长安,逼嘉自随;后以答问失苌意,为苌所杀 约三九○ 。嘉尝造《牵三歌谶》,又著《拾遗录》十卷,其事多诡怪,今行于世。传所云《拾遗录》者,盖即今记,前有萧绮序,言书本十九卷,二百二十篇,当苻秦之季,典章散灭,此书亦多有亡,绮更删繁存实,合为一部,凡十卷。今书前九卷起庖牺迄东晋,末一卷则记昆仑等九仙山,与序所谓“事讫西晋之末”者稍不同。其文笔颇靡丽,而事皆诞谩无实,萧绮之录亦附会,胡应麟 《笔丛》三十二 以为“盖即绮撰而托之王嘉”者也。 |
『拾遺記』十巻、晋の隴西の王嘉の撰と題し、梁の蕭綺録す。『晋書・芸術列伝』中に王嘉あり、略ぼ云う。嘉、字は子年、隴西安陽の人。初め東陽谷に隠れ、後に長安に入る。苻堅累ねて徵すれども起たず。よく未然の事を言い、辞は讖記のごとく、当時よくこれを暁る者鮮し。姚萇長安に入り、嘉を逼りて自ら随わしむ。後に答問の萇の意に失するを以て、萇の殺すところと為る(約三九〇年)。嘉かつて『牽三歌讖』を造り、また『拾遺録』十巻を著す。その事多く詭怪にして、今世に行わる。伝に云う『拾遺録』なる者は、蓋しすなわち今の記なり。前に蕭綺の序あり、言う、書は本十九巻、二百二十篇、苻秦の季に当たりて、典章散滅し、この書もまた多く亡ぶることあり。綺さらに繁を削り実を存し、合して一部と為す。凡そ十巻なり。今の書の前九巻は庖犧に起こりて東晋に迄り、末の一巻は崑崙等の九仙山を記す。序に謂うところの「事は西晋の末に訖る」とはやや同じからず。その文筆は頗る靡麗にして、事はみな誕漫にして実なし。蕭綺の録もまた附会にして、胡応麟(『筆叢』三十二)以て「蓋しすなわち綺の撰にして王嘉に託せるなり」と為す。 |
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少昊以金德王,母曰皇娥,处璇宫而夜织,或乘桴木而昼游,经历穷桑沧茫之浦。时有神童,容貌绝俗,称为白帝之子,即太白之精,降乎水际,与皇娥宴戏,奏便娟之乐,游漾忘归。穷桑者,西海之滨,有孤桑之树,直上千寻,叶红椹紫,万岁一实,食之后天而老。……帝子与皇娥并坐,抚桐峰梓瑟,皇娥倚瑟而清歌曰:“天清地旷浩茫茫,万象回薄化无方,浛天荡荡望沧沧,乘桴轻漾著日傍,当其何所至穷桑,心知和乐悦未央。”俗谓游乐之处为桑中也,《诗·卫风》云“期我乎桑中”,盖类此也。……及皇娥生少昊,号曰穷桑氏,亦曰桑丘氏。至六国时,桑丘子著阴阳书,即其余裔也。…… 卷一 |
少昊は金徳を以て王たり。母は皇娥と曰い、璇宮に処りて夜に織り、あるいは桴木に乗じて昼に遊び、窮桑滄茫の浦を経歴す。時に神童あり、容貌俗を絶し、白帝の子と称す。すなわち太白の精にして、水際に降り、皇娥と宴戲し、便娟の楽を奏し、游漾して帰るを忘る。窮桑なる者は西海の浜にして、孤桑の樹あり、直上すること千尋、葉は紅く椹は紫にして、万歳に一たび実を結び、これを食すれば天に後れて老ゆ。……帝子と皇娥と並び坐し、桐峰の梓瑟を撫す。皇娥瑟に倚りて清歌して曰く、「天清く地曠くして浩として茫茫たり、万象回薄して化すること方なし、浛天蕩蕩として滄滄を望み、桴に乗じて軽く漾いて日の傍に著く、まさにいずくにか至りて窮桑に至らん、心は和楽を知りて悦びていまだ央きず。」俗に遊楽の処を桑中と謂うなり。『詩・衛風』に「我を桑中に期す」と云うは、蓋しこれに類するなり。……皇娥少昊を生むに及び、号して窮桑氏と曰い、また桑丘氏と曰う。六国の時に至りて、桑丘子陰陽の書を著す。すなわちその余裔なり。……(巻一) |
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刘向于成帝之末,校书天禄阁,专精覃思。夜,有老人著黄衣,植青藜杖,登阁而进,见向暗中独坐诵书,老父乃吹杖端,烟燃,因以见向,说开辟已前。向因受五行洪范之文,恐辞说繁广忘之,乃裂帛及绅,以记其言,至曙而去。向请问姓名,云“我是太一之精,天帝闻卯金之子有博学者,下而观焉”。乃出怀中竹牒,有天文地图之书,“余略授子焉”。至向子歆,从向授其术。向亦不悟此人焉。 卷六 |
劉向、成帝の末に天禄閣に書を校す。専精覃思す。夜に老人ありて黄衣を著し、青藜の杖を植え、閣に登りて進む。向の暗中に独り坐して書を誦するを見て、老父すなわち杖の端を吹くに、煙燃え、因りて以て向に見え、開闢以前を説く。向、因りて五行洪範の文を受く。辞説の繁広にしてこれを忘れんことを恐れ、すなわち帛および紳を裂きて、以てその言を記す。曙に至りて去る。向、姓名を請い問うに、云う、「我はこれ太一の精なり。天帝卯金の子に博学の者あるを聞き、下りて観るなり。」すなわち懐中の竹牒を出すに、天文地図の書あり、「余略ぼ子に授けん。」向の子歆に至り、向より其の術を授かる。向もまたこの人を悟らざるなり。(巻六) |
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洞庭山浮于水上,其下有金堂数百间,玉女居之,四时闻金石丝竹之声,彻于山顶。楚怀王之时,举群才赋诗于水湄。……后怀王好进奸雄,群贤逃越。屈原以忠见斥,隐于沅湘,披蓁茹草,混同禽兽,不交世务,采柏实以和桂膏,用养心神,被王逼逐,乃赴清泠之水,楚人思慕,谓之水仙。其神游于天河,精灵时降湘浦,楚人为之立祠,汉末犹在。 卷十 |
洞庭山は水上に浮かぶ。その下に金堂数百間あり、玉女これに居す。四時金石絲竹の声を聞くこと、山頂に徹す。楚の懐王の時、群才を挙げて水湄に詩を賦す。……後に懐王奸雄を進むるを好み、群賢逃越す。屈原は忠を以て斥けられ、沅湘に隠れ、蓁を披き草を茹り、禽獣に混同して、世務に交わらず、柏実を采りて桂膏を和し、以て心神を養う。王に逼迫せられて、すなわち清泠の水に赴く。楚人思慕し、これを水仙と謂う。その神は天河に遊び、精霊時に湘浦に降る。楚人これが為に祠を立つ。漢末なお在り。(巻十) |
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【第二十四篇 清之人情小说】 |
【第二十四篇 清の人情小説】 |
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乾隆中 一七六五年顷 ,有小说曰《石头记》者忽出于北京,历五六年而盛行,然皆写本,以数十金鬻于庙市。其本止八十回,开篇即叙本书之由来,谓女娲补天,独留一石未用,石甚自悼叹,俄见一僧一道,以为“形体到也是个宝物了,还只没有实在好处,须得再镌上数字,使人一见便知是奇物方妙。然后好携你到隆盛昌明之邦,诗礼簪缨之族,花柳繁华之地,温柔富贵之乡,去安身乐业”。于是袖之而去。不知更历几劫,有空空道人见此大石,上镌文词,从石之请,钞以问世。道人亦“因空见色,由色生情,传情入色,自色悟空,遂易名为情僧,改《石头记》为《情僧录》;东鲁孔梅溪则题曰《风月宝鉴》;后因曹雪芹于悼红轩中披阅十载,增删五次,纂成目录,分出章回,则题曰《金陵十二钗》,并题一绝云:‘满纸荒唐言,一把辛酸泪。都云作者痴,谁解其中味?’” 戚蓼生所序八十回本之第一回 |
乾隆中(一七六五年頃)、小説に『石頭記』なるものあり、忽ち北京に出づ。五六年を歴て盛行す。然れどもみな写本にして、数十金を以て廟市に鬻ぐ。その本はただ八十回にて、開篇にすなわち本書の由来を叙す。女媧天を補うに、ひとり一石を留めて用いず。石甚だ自ら悼嘆す。俄にして一僧一道を見るに、以て「形体はまずは一個の宝物なり。まだただ実在の好いところがない。すべからくさらに数字を鐫りつけ、人をして一見してすなわち奇物なるを知らしむるのが妙であろう。然る後に好くも汝を隆盛昌明の邦、詩礼簪纓の族、花柳繁華の地、温柔富貴の郷に携え、安身立業せしめん」と為す。ここにおいてこれを袖にして去る。さらに幾劫を歴たるを知らず、空空道人あり、この大石を見るに、上に文詞を鐫る。石の請いに従い、鈔して以て世に問う。道人もまた「空に因りて色を見、色に由りて情を生じ、情を伝えて色に入り、色より空を悟り、遂に名を情僧と易え、『石頭記』を改めて『情僧録』と為す。東魯の孔梅渓はすなわち『風月宝鑑』と題す。後に曹雪芹の悼紅軒中にて披閲すること十載、増刪すること五次、目録を纂成し、章回を分出するに因り、すなわち『金陵十二釵』と題し、並びに一絶を題して云う、『満紙荒唐の言、一把辛酸の涙。都な作者の痴と云うも、誰かその中の味を解せん。』」(戚蓼生の序する八十回本の第一回) |
第4節
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本文所叙事则在石头城 非即金陵 之贾府,为宁国、荣国二公后。宁公长孙曰敷,早死;次敬袭爵,而性好道,又让爵于子珍,弃家学仙;珍遂纵恣,有子蓉,娶秦可卿。荣公长孙曰赦,子琏,娶王熙凤;次曰政;女曰敏,适林海,中年而亡,仅遗一女曰黛玉。贾政娶于王,生子珠,早卒;次生女曰元春,后选为妃;次复得子,则衔玉而生,玉又有字,因名宝玉,人皆以为“来历不小”,而政母史太君尤钟爱之。宝玉既七八岁,聪明绝人,然性爱女子,常说:“女儿是水作的骨肉,男人是泥作的骨肉。”人于是又以为将来且为“色鬼”;贾政亦不甚爱惜,驭之极严,盖缘“不知道这人来历。……若非多读书识字,加以致知格物之功,悟道参玄之力者,不能知也” 戚本第二回贾雨村云 。而贾氏实亦“闺阁中历历有人”,主从之外,姻连亦众,如黛玉、宝钗,皆来寄寓,史湘云亦时至,尼妙玉则习静于后园。右即贾氏谱大要,用虚线者其姻连,著×者夫妇,著*者在“金陵十二钗”之数者也。 |
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事即始于林夫人 贾敏 之死,黛玉失恃,又善病,遂来依外家,时与宝玉同年,为十一岁。已而王夫人女弟所生女亦至,即薛宝钗,较长一年,颇极端丽。宝玉纯朴,并爱二人无偏心,宝钗浑然不觉,而黛玉稍恚。一日,宝玉倦卧秦可卿室,遽梦入太虚境,遇警幻仙,阅《金陵十二钗正册》及《副册》,有图有诗,然不解。警幻命奏新制《红楼梦》十二支,其末阕为《飞鸟各投林》,词有云: |
本文の叙事するところは石頭城(すなわち金陵にあらず)の賈府にあり、寧国・栄国二公の後なり。寧公の長孫を敷と曰い、早く死す。次の敬は爵を襲うも、性は道を好み、また爵を子の珍に譲り、家を棄てて仙を学ぶ。珍遂に縦恣し、子の蓉あり、秦可卿を娶る。栄公の長孫を赦と曰い、子の璉あり、王熙鳳を娶る。次を政と曰う。女を敏と曰い、林海に適ぎ、中年にして亡じ、僅かに一女を遺す、黛玉と曰う。賈政は王氏を娶り、子の珠を生むも、早く卒す。次に女を生み元春と曰い、後に選ばれて妃と為る。次にまた子を得るに、すなわち玉を銜みて生まる。玉にまた字あり、因りて宝玉と名づく。人みな以て「来歴小さからず」と為す。而して政の母の史太君はことに鍾愛す。宝玉すでに七八歳、聡明人に絶するも、性は女子を愛し、常に言う、「女の子は水で出来た骨肉で、男は泥で出来た骨肉だ。」人ここにおいてまた以て将来は「色鬼」と為らんと為す。賈政もまたあまり愛惜せず、これを御すること極めて厳なり。蓋し「この人の来歴を知らざるに縁る。……もし多く書を読み字を識り、致知格物の功を加え、悟道参玄の力ある者にあらざれば、知ることあたわざるなり」(戚本第二回賈雨村云う)に因る。而して賈氏には実にまた「閨閣の中歴歴として人あり」、主従のほかに、姻連もまた衆し。黛玉・宝釵のごときは、皆来たりて寄寓し、史湘雲もまた時に至り、尼の妙玉はすなわち後園に習静す。右すなわち賈氏の譜の大要にして、虚線を用うるはその姻連、×を著すは夫婦、*を著すは「金陵十二釵」の数に在る者なり。 |
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“为官的,家业凋零;富贵的,金银散尽。有恩的,死里逃生;无情的,分明报应。欠命的命已还,欠泪的泪已尽!……看破的,遁入空门;痴迷的,枉送了性命。好一似,食尽鸟投林:落了片白茫茫大地真干净!” 戚本第五回 |
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然宝玉又不解,更历他梦而寤。迨元春被选为妃,荣公府愈贵盛,及其归省,则辟大观园以宴之,情亲毕至,极天伦之乐。宝玉亦渐长,于外昵秦钟、蒋玉函,归则周旋于姊妹中表以及侍儿如袭人、晴雯、平儿、紫鹃辈之间,昵而敬之,恐拂其意,爱博而心劳,而忧患亦日甚矣。 |
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这日,宝玉因见湘云渐愈,然后去看黛玉。正值黛玉才歇午觉,宝玉不敢惊动。因紫鹃正在回廊上手里做针线,便上来问他:“昨日夜里咳嗽的可好些?”紫娟道:“好些了。” 宝玉道:“阿弥陀佛,宁可好了罢。”紫鹃笑道:“你也念起佛来,真是新闻。” 宝玉笑道:“所谓‘病笃乱投医’了。”一面说,一面见他穿着弹墨绫子薄绵袄,外面只穿着青缎子夹背心,宝玉便伸手向他身上抹了一抹,说:“穿的这样单薄,还在风口里坐着春风才至,时气最不好。你再病了,越发难了。”紫鹃便说道:“从此咱们只可说话,别动手动脚的。一年大二年小的,叫人看着不尊重;又打着那起混账行子们背地里说你。你总不留心,还只管合小时一般行为,如何使得?姑娘常常吩咐我们,不叫合你说笑。你近来瞧他,远着你,还恐远不及呢。”说着,便起身,携了针线,进别房去了。宝玉见了这般景况,心中忽觉浇了一盆冷水一般,只看着竹子发了回呆。因祝妈正来挖笋修竿,便忙忙走了出来,一时魂魄失守,心无所知,随便坐在一块石上出神,不觉滴下泪来。直呆了五六顿饭工夫,千思万想,总不知如何是好。偶值雪雁从王夫人房中取了人参来,从此经过,……便走过来,蹲下笑道:“你在这里作什么呢?”宝玉忽见了雪雁,便说道:“你又作什么来招我?你难道不是女儿?他既防嫌,总不许你们理我,你又来寻我,倘被人看见,岂不又生口舌?你快家去罢。”雪雁听了,只当他又受了黛玉的委屈,只得回至房中,黛玉未醒,将人参交与紫鹃。……雪雁道:“姑娘还没醒呢,是谁给了宝玉气受?坐在那里哭呢。”……紫鹃听说,忙放下针线,……一直来寻宝玉。走到宝玉跟前,含笑说道:“我不过说了两句话,为的是大家好。你就赌气,跑了这风地里来哭,作出病来唬我。”宝玉忙笑道:“谁赌气了?我因为听你说的有理,我想你们既这样说,自然别人也是这样说,将来渐渐的都不理我了。我所以想着自己伤心。”…… 戚本第五十七回,括弧中句据程本补。 |
事すなわち林夫人(賈敏)の死に始まる。黛玉は恃を失い、またよく病み、遂に来たりて外家に依る。時に宝玉と同年にして、十一歳なり。すでにして王夫人の女弟の生める女もまた至る。すなわち薛宝釵にして、一年年長にして、頗る端麗を極む。宝玉は純朴にして、並びに二人を愛し偏心なし。宝釵は渾然として覚えず、而して黛玉はやや恚る。一日、宝玉倦みて秦可卿の室に臥す。遽に夢みて太虚境に入り、警幻仙に遇い、『金陵十二釵正冊』および『副冊』を閲す。図あり詩あり、然れども解せず。警幻は新制の『紅楼夢』十二支を奏ぜしむ。その末闋を『飛鳥各投林』と為し、詞に云う、 |
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然荣公府虽煊赫,而“生齿日繁,事务日盛,主仆上下,安富尊荣者尽多,运筹谋画者无一,其日用排场,又不能将就省俭”,故“外面的架子虽未甚倒,内囊却也尽上来了。” 第二回。 颓运方至,变故渐多;宝玉在繁华丰厚中,且亦屡与“无常”觌面,先有可卿自经;秦钟夭逝;自又中父妾厌胜之术,几死;继以金钏投井;尤二姐吞金;而所爱之侍儿晴雯又被遣,随殁。悲凉之雾,遍被华林,然呼吸而领会之者,独宝玉而已。 |
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……他便带了两个小丫头到一石后,也不怎么样,只问他二人道:“自我去了,你袭人姐姐可打发人瞧晴雯姐姐去了不曾?”这一个答道:“打发宋妈妈瞧去了。”宝玉道:“回来说什么?”小丫头道:“回来说晴雯姐姐直着脖子叫了一夜,今儿早起就闭了眼,住了口,人事不知,也出不得一声儿了,只有倒气的分儿了。”宝玉忙问道:“一夜叫的是谁?”小丫头子道: “一夜叫的是娘。”宝玉拭泪道:“还叫谁?”小丫头说: “没有听见叫别人。”宝玉道:“你糊涂,想必没听真。” ……因又想: “虽然临终未见,如今且去灵前一拜,也算尽这五六年的情肠。”……遂一径出园,往前日之处来,意为停柩在内。谁知他哥嫂见他一嚈气,便回了进去,希图得几两发送例银。王夫人闻知,便赏了十两银子;又命“即刻送到外头焚化了罢。‘女儿痨’死的,断不可留!”他哥嫂听了这话,一面就雇了人来入殓,抬往城外化人厂去了。……宝玉走来扑了个空,……自立了半天,别没法儿,只得翻身进入园中,待回自房,甚觉无趣,因乃顺路来找黛玉,偏他不在房中。……又到蘅芜院中,只见寂静无人。……仍往潇湘馆来,偏黛玉尚未回来。……正在不知所以之际,忽见王夫人的丫头进来找他,说:“老爷回来了,找你呢。又得了好题目来了,快走快走!”宝玉听了,只得跟了出来。……彼时贾政正与众幕友谈论寻秋之胜;又说:“临散时忽然谈及一事,最是千古佳谈,‘风流俊逸忠义慷慨’八字皆备。到是个好题目,大家都要作一首挽词。”众人听了,都忙请教是何等妙题。贾政乃说:“近日有一位恒王,出镇青州。这恒王最喜女色,且公余好武,因选了许多美女,日习武事。……其姬中有一姓林行四者,姿色既冠,且武艺更精,皆呼为林四娘。恒王最得意,遂超拔林四娘统辖诸姬,又呼为姽婳将军。”众清客都称:“妙极神奇!竟以‘姽婳’下加‘将军’二字,更觉妩媚风流,真绝世奇文!想这恒王也是第一风流人物了。”…… 戚本第七十八回,括弧中句据程本补。 |
「官と為りし者は、家業凋零す。富貴なりし者は、金銀散じ尽く。恩ありし者は、死裏に逃生す。無情なる者は、分明に報応す。命を欠きし者は命すでに還り、涙を欠きし者は涙すでに尽きぬ。……破り看たる者は、空門に遁入し、痴迷せる者は、枉に性命を送れり。好く一つ似たり、食い尽くして鳥林に投ずるに。落ちたるは片の白茫茫たる大地、真に干浄なり。」(戚本第五回) |
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《石头记》结局,虽早隐现于宝玉幻梦中,而八十回仅露“悲音”,殊难必其究竟。比乾隆五十七年 一七九二 ,乃有百二十回之排印本出,改名《红楼梦》,字句亦时有不同,程伟元序其前云:“……然原本目录百二十卷,……爰为竭力搜罗,自藏书家甚至故纸堆中,无不留心。数年以来,仅积有二十余卷。一日,偶于鼓担上得十余卷,遂重价购之。……然漶漫不可收拾,乃同友人细加厘剔,截长补短,钞成全部,复为镌板以公同好。《石头记》全书至是始告成矣。”友人盖谓高鹗,亦有序,末题“乾隆辛亥冬至后一日”,先于程序者一年。 |
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后四十回虽数量止初本之半,而大故迭起,破败死亡相继,与所谓“食尽鸟飞独存白地”者颇符,惟结末又稍振。宝玉先失其通灵玉,状类失神。会贾政将赴外任,欲于宝玉娶妇后始就道,以黛玉羸弱,乃迎宝钗。姻事由王熙凤谋画,运行甚密,而卒为黛玉所知,咯血,病日甚,至宝玉成婚之日遂卒。宝玉知将婚,自以为必黛玉,欣然临席,比见新妇为宝钗,乃悲叹复病。时元妃先薨;贾赦以“交通外官倚势凌弱”革职查抄,累及荣府;史太君又寻亡;妙玉则遭盗劫,不知所终;王熙凤既失势,亦郁郁死。宝玉病亦加,一日垂绝,忽有一僧持玉来,遂苏,见僧复气绝,历噩梦而觉;乃忽改行,发愤欲振家声,次年应乡试,以第七名中式。宝钗亦有孕,而宝玉忽亡去。贾政既葬母于金陵,将归京师,雪夜泊舟毗陵驿,见一人光头赤足,披大红猩猩毡斗篷,向之下拜,审视知为宝玉。方欲就语,忽来一僧一道,挟以俱去,且不知何人作歌,云“归大荒”,追之无有,“只见白茫茫一片旷野”而已。“后人见了这本传奇,亦曾题过四句,为作者缘起之言更进一竿云:‘说到酸辛事,荒唐愈可悲,由来同一梦,休笑世人痴。’” 第一百二十回 |
然れども宝玉またも解せず、さらに他の夢を歴て寤む。元春の選ばれて妃と為るに逮びて、栄公府はいよいよ貴盛し、その帰省に及びて、大観園を辟きて以てこれを宴す。情親ことごとく至り、天倫の楽を極む。宝玉もまた漸く長じ、外にては秦鍾・蒋玉函に昵み、帰りてはすなわち姉妹中表および侍児の襲人・晴雯・平児・紫鵑の輩の間に周旋す。昵みてこれを敬い、その意に拂うを恐れ、愛は博くして心は労し、而して憂患もまた日に甚だしくなれり。 |
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全书所写,虽不外悲喜之情,聚散之迹,而人物事故,则摆脱旧套,与在先之人情小说甚不同。如开篇所说: |
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空空道人遂向石头说道:“石兄,你这一段故事,……据我看来:第一件,无朝代年纪可考;第二件,并无大贤大忠,理朝廷治风俗的善政。其中只不过几个异样女子——或情,或痴,或小才微善——亦无班姑、蔡女之德能。我纵钞去,恐世人不爱看呢。” |
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石头笑曰:“我师何太痴也!若云无朝代可考,今我师竟假借汉、唐等年纪添缀,又有何难?但我想历来野史,皆蹈一辙;莫如我不借此套,反到新鲜别致,不过只取其事体情理罢了。……历来野史,或讪谤君相,或贬人妻女,奸淫凶恶,不可胜数。……至若才子佳人等书,则又千部共出一套,且其中终不能不涉于淫滥,以致满纸‘潘安子建’,‘西子文君’;……且环婢开口,即‘者也之乎’,非文即理,故逐一看去,悉皆自相矛盾,大不近情理之说。竟不如我半世亲睹亲闻的这几个女子,虽不敢说强似前代所有书中之人,但事迹原委,亦可以消愁破闷也。……至若离合悲欢,兴衰际遇,则又追踪蹑迹,不敢稍加穿凿,徒为哄人之目,而反失其真传者。……” 戚本第一回 |
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盖叙述皆存本真,闻见悉所亲历,正因写实,转成新鲜。而世人忽略此言,每欲别求深义,揣测之说,久而遂多。今汰去悠谬不足辩,如谓是刺和珅 《谭瀛室笔记》 、藏谶纬 《寄蜗残赘》 、明易象 《金玉缘》评语 之类,而著其世所广传者于下: |
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一、纳兰成德家事说 自来信此者甚多。陈康祺 《燕下乡脞录》五 记姜宸英典康熙乙卯顺天乡试获咎事,因及其师徐时栋 号柳泉 之说云:“小说《红楼梦》一书,即记故相明珠家事,金钗十二,皆纳兰侍御所奉为上客者也,宝钗影高澹人;妙玉即影西溟先生:‘妙’为‘少女’,‘姜’亦妇人之美称;‘如玉’‘如英’,义可通假。……”侍御谓明珠之子成德,后改名性德,字容若。张维屏 《诗人征略》 云:“贾宝玉盖即容若也;《红楼梦》所云,乃其髫龄时事。”俞樾 《小浮梅闲话》 亦谓其“中举人止十五岁,于书中所述颇合”。然其他事迹,乃皆不符;胡适作《红楼梦考证》 《文存》三 ,已历正其失。最有力者,一为姜宸英有《祭纳兰成德文》,相契之深,非妙玉于宝玉可比;一为成德死时年三十一,时明珠方贵盛也。 |
この日、宝玉は湘雲の漸く癒ゆるを見て、然る後に黛玉を看に往く。まさに黛玉の昼寝を終えたばかりの時に当たり、宝玉は驚かすを敢えてせず。紫鵑がまさに回廊の上にて手に針仕事をしているのを見て、すなわち上がりて問う、「昨夜の咳は少しはましか。」紫鵑道う、「ましになりました。」宝玉道う、「阿弥陀仏、どうか良くなりますように。」紫鵑笑いて道う、「あなたも念仏するようになって、本当にニュースですこと。」宝玉笑いて道う、「いわゆる『病篤くして医を乱投す』というやつさ。」一面に言いつつ、彼女が弾墨綾子の薄綿袄を着て、外にはただ青緞子の挟背心だけを着ているのを見て、宝玉はすなわち手を伸ばして彼女の身の上を一撫でして言う—— |
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二、清世祖与董鄂妃故事说 王梦阮沈瓶庵合著之《红楼梦索隐》为此说。其提要有云:“盖尝闻之京师故老云,是书全为清世祖与董鄂妃而作,兼及当时诸名王奇女也。……”而又指董鄂妃为即秦淮旧妓嫁为冒襄妾之董小宛,清兵下江南,掠以北,有宠于清世祖,封贵妃,已而夭逝;世祖哀痛,乃遁迹五台山为僧云。孟森作《董小宛考》 《心史丛刊》三集 ,则历摘此说之谬,最有力者为小宛生于明天启甲子,若以顺治七年入宫,已二十八岁矣,而其时清世祖方十四岁。 |
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三、康熙朝政治状态说 此说即发端于徐时栋,而大备于蔡元培之《石头记索隐》。开卷即云:“《石头记》者,清康熙朝政治小说也。作者持民族主义甚挚,书中本事,在吊明之亡,揭清之失,而尤于汉族名士仕清者寓痛惜之意。……”于是比拟引申,以求其合,以“红”为影“朱”字;以“石头”为指金陵;以“贾”为斥伪朝;以“金陵十二钗”为拟清初江南之名士:如林黛玉影朱彝尊,王熙凤影余国柱,史湘云影陈维崧,宝钗妙玉则从徐说,旁征博引,用力甚勤。然胡适既考得作者生平,而此说遂不立,最有力者即曹雪芹为汉军,而《石头记》实其自叙也。 |
第5節
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然谓《红楼梦》乃作者自叙,与本书开篇契合者,其说之出实最先,而确定反最后。嘉庆初,袁枚 《随园诗话》二 已云:“康熙中,曹练亭为江宁织造,……其子雪芹撰《红楼梦》一书,备记风月繁华之盛。中有所谓大观园者,即余之随园也。”末二语盖夸,余亦有小误 如以楝为练,以孙为子 ,但已明言雪芹之书,所记者其闻见矣。而世间信者特少,王国维 《静庵文集》 且诘难此类,以为“所谓‘亲见亲闻’者,亦可自旁观者之口言之,未必躬为剧中之人物”也,迨胡适作考证,乃较然彰明,知曹雪芹实生于荣华,终于苓落,半生经历,绝似“石头”,著书西郊,未就而没;晚出全书,乃高鄂续成之者矣。 |
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雪芹名霑,字芹溪,一字芹圃,正白旗汉军。祖寅,字子清,号楝亭,康熙中为江宁织造。清世祖南巡时,五次以织造署为行宫,后四次皆寅在任。然颇嗜风雅,尝刻古书十余种,为时所称;亦能文,所著有《楝亭诗钞》五卷《词钞》一卷 《四库书目》 ,传奇二种 《在园杂志》 。寅子,即雪芹父,亦为江宁织造,故雪芹生于南京。时盖康熙末。雍正六年,卸任,雪芹亦归北京,时约十岁。然不知何因,是后曹氏似遭巨变,家顿落,雪芹至中年,乃至贫居西郊,啜粥,但犹傲兀,时复纵酒赋诗,而作《石头记》盖亦此际。乾隆二十七年,子殇,雪芹伤感成疾,至除夕,卒,年四十余 一七一九?——一七六三 。其《石头记》尚未就,今所传者止八十回 详见《胡适文选》 。 |
しかれども『紅楼夢』は作者の自叙なりと謂い、本書の開篇と契合するものは、その説の出づること実に最も先にして、確定するは反って最も後なり。嘉慶の初め、袁枚(『随園詩話』二)すでに云う、「康熙中、曹練亭は江寧織造と為り、……その子雪芹は『紅楼夢』一書を撰し、備さに風月繁華の盛んなるを記す。中にいわゆる大観園なる者は、すなわち余が随園なり。」末の二語は蓋し誇りなり。余もまたいささかの小誤あり(楝を練と為し、孫を子と為すがごとし)。しかれどもすでに明らかに雪芹の書は、その聞見するところを記すと言えり。而して世間これを信ずる者は特に少なし。王国維(『静庵文集』)はまた難詰して、以て「いわゆる『親しく見親しく聞く』とは、また傍観者の口より言うことを得べし、必ずしも躬ら劇中の人物と為るにあらず」と為す。胡適の考証を作すに逮びて、すなわちいよいよ彰明にして、曹雪芹は実に栄華に生まれ、苓落に終わり、半生の経歴は「石頭」に絶似し、西郊に書を著すも、就らずして没す。晩に出づる全書は、すなわち高鶚の続成したるものなりと知る。 |
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言后四十回为高鹗作者,俞樾 《小浮梅闲话》 云:“《船山诗草》有《赠高兰墅鹗同年》一首云:‘艳情人自说《红楼》。’注云:‘《红楼梦》八十回以后,俱兰墅所补。’然则此书非出一手。按乡会试增五言八韵诗,始乾隆朝,而书中叙科场事已有诗,则其为高君所补可证矣。”然鹗所作序,仅言“友人程子小泉过予,以其所购全书见示,且曰:‘此仆数年铢积寸累之辛心,将付剞劂,公同好。子闲且惫矣,盍分任之。’予以是书……尚不背于名教,……遂襄其役。”盖不欲明言己出,而寮友则颇有知之者。鹗即字兰墅,镶黄旗汉军,乾隆戊申举人,乙卯进士,旋入翰林,官侍读,又尝为嘉庆辛酉顺天乡试同考官。其补《红楼梦》当在乾隆辛亥时,未成进士,“闲且惫矣”,故于雪芹萧条之感,偶或相通。然心志未灰,则与所谓“暮年之人,贫病交攻,渐渐的露出那下世光景来” 戚本第一回 者又绝异。是以续书虽亦悲凉,而贾氏终于“兰桂齐芳”,家业复起,殊不类茫茫白地,真成干净者矣。 |
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续《红楼梦》八十回本者,尚不止一高鹗。俞平伯从戚蓼生所序之八十回本旧评中抉剔,知先有续书三十回,似叙贾氏子孙流散,宝玉贫寒不堪,“悬崖撒手”,终于为僧;然其详不可考 《红楼梦辨》下有专论 。或谓“戴君诚夫见一旧时真本,八十回之后,皆与今本不同,荣宁籍没后,皆极萧条;宝钗亦早卒,宝玉无以作家,至沦于击柝之流。史湘云则为乞丐,后乃与宝玉仍成夫妇。……闻吴润生中丞家尚藏有其本” 蒋瑞藻《小说考证》七引《续阅微草堂笔记》 此又一本,盖亦续书。二书所补,或俱未契于作者本怀,然长夜无晨,则与前书之伏线亦不背。 |
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此他续作,纷纭尚多,如《后红楼梦》、《红楼后梦》、《续红楼梦》、《红楼复梦》、《红楼梦补》、《红楼补梦》、《红楼重梦》、《红楼再梦》、《红楼幻梦》、《红楼圆梦》、《增补红楼》、《鬼红楼》、《红楼梦影》等。大率承高鹗续书而更补其缺陷,结以“团圆”;甚或谓作者本以为书中无一好人,因而钻刺吹求,大加笔伐,但据本书自说,则仅乃如实抒写,绝无讥弹,独于自身,深所忏悔。此固常情所嘉,故《红楼梦》至今为人爱重,然亦常情所怪,故复有人不满,奋起而补订圆满之。此足见人之度量相去之远,亦曹雪芹之所以不可及也。仍录彼语,以结此篇: |
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……作者自云:因曾历过一番梦幻之后,故将真事隐去,而借“通灵”之说,撰此《石头记》一书也。……自又云:今风尘碌碌,一事无成,忽念及当日所有之女子,一一细考较去,觉其行止见识,皆出于我之上。何我堂堂须眉,诚不若彼裙钗女子?实愧则有余,悔又无益,是大无可如何之日也。当此,则自欲将已往所赖天恩祖德,锦衣纨裤之时,饫甘餍肥之日,背父兄教育之恩,负师友规训之德,以致今日一技无成,半生潦倒之罪,编述一集,以告天下人。我之罪固不免,然闺阁中本自历历有人,万不可因我之不肖,自己护短,一并使其泯灭。虽今日之茅椽蓬牖,瓦灶绳床,其晨夕风露,阶柳庭花,亦未有妨我之襟怀,束笔阁墨;虽我未学,下笔无文,又何妨用俚语村言,敷衍出一段故事来,亦可使闺阁照传,复可悦世之目,破人愁闷,不亦宜乎?…… 戚本第一回 |
雪芹の名は霑、字は芹渓、一字は芹圃、正白旗漢軍なり。祖の寅、字は子清、号は楝亭、康熙中に江寧織造と為る。清の世祖南巡の時、五次織造署を以て行宮と為す。後の四次は皆寅の在任中なり。しかれどもすこぶる風雅を嗜み、かつて古書十余種を刻し、時の称するところとなる。また能く文し、著すところに『楝亭詩鈔』五巻『詞鈔』一巻あり(『四庫書目』)、伝奇二種あり(『在園雑志』)。寅の子、すなわち雪芹の父もまた江寧織造と為る。故に雪芹は南京に生まる。時は蓋し康熙の末なり。雍正六年、任を卸し、雪芹もまた北京に帰る。時に約十歳なり。しかるに何の因によるか知らず、これより後、曹氏は巨変に遭いしごとく、家は頓に落ち、雪芹は中年に至りて、すなわち貧にして西郊に居し、粥を啜り、しかもなお傲兀にして、時にまた酒を縦にして詩を賦す。『石頭記』を作るは蓋しまたこの際なり。乾隆二十七年、子殤じ、雪芹傷感して疾を成し、除夕に至りて卒す。年四十余(一七一九?——一七六三)。その『石頭記』はなお就らず、今伝わるところはただ八十回のみなり(詳しくは『胡適文選』を見よ)。 |
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[1]E.Th.A.Hoffmann(1776—1822),德国的浪漫派作家。——译者 |
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[2]Ilias,希腊诗人荷马(Hom eros)所作有名的两大史诗之一。——译者 |
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[3]“Le Tartuffe”法国笑剧作家莫利哀(J. B. P. Molière,1622—1673)的作品。——译者 |
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[4]Gordon Byron(1788—1824),英国诗人;Auguste Chateaubriand(1768—1848),法国作家,世称近代浪漫主义的开创者。——译者 |
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[5]Frsnz schubert(1797—1828)奥国有名的音乐家,最大功绩是在完成谣曲(Lied),世有“谣曲王”之称。——译者 |
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[6]陀思妥夫斯基的长篇小说,中国有李霁野译本,在《世界文学名著》中。——译者 |
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[7]Auklageliteratur,也曾译作“谴责小说”。——译者 |
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[8]Katechismus,耶稣教中对于新入者用问等施以教化的方法。——译者 |
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[9]Dante Alighieri(1265—1321),意太利的大诗人;“叙事诗”即指他所作的《神曲》。——译者 |
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[10]这里引的是第十一章,但原译和本文即微有不同,所以现在也不改和本文一律。——译者 |
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[11]Sbiten是一种用水,蜜,莓叶或紫苏做成的饮料,下层阶级当作茶喝的。——译者 |
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[12]Samovar是一种茶具,用火暖着茶,不使冷却,象中国的火锅一样。——译者 |
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[13]这是纯粹的俄国姓名,却自称外国人,所以从他们看来,是可笑的。——译者 |
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[14]Kotzebue(1761—1819)德国的戏曲作家。——译者 |
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[15]Partie Boston是叶子牌的一种。——译者 |
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[16]法国话,直译是“恶魔捉我”,意译是“任其自然”。——译者 |
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[17]俄国旧例,每人都有两个名字,例如这里的保甫尔·伊凡诺维支·乞乞科夫,末一个是姓,第一个是他自己的本名,中间的就是父称,译出意义来,是“伊凡之子”,或是“少伊”。平常相呼,必用本名连父称。否则便是失礼。——译者 |
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[18]Versta,俄里名。每一俄里,约合中国市里二里余。——译者 |
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[19]Bogdan和Selifan都是人名。这两句话,犹言既非城里的绅士,又非乡下的农夫。——译者 |
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[20]Grazie是神女们,分掌美,文雅和欢喜,出希腊神话。——译者 |
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[21]完全中立的关于历史,政治,文学的杂志,一八一二年至一八五二年,在彼得堡发行。——译者 |
後の四十回を高鶚の作と言う者は、俞樾(『小浮梅閑話』)の云う、「『船山詩草』に『高蘭墅鶚同年に贈る』一首あり、『艶情人自ら紅楼を説く』と云う。注に云う、『紅楼夢は八十回以後、すべて蘭墅の補うところなり。』然らばこの書は一手より出でたるにあらず。按ずるに郷会試に五言八韻の詩を増すは、乾隆朝に始まる。而して書中に科場の事を叙するにすでに詩あれば、その高君の補いしところなるを証すべし。」と。しかれども鶚の作りし序には、ただ「友人程子小泉、余を過り、その購うところの全書を以て示し、かつ曰く、『これ僕の数年銖積寸累の辛心なり。まさに剞劂に付して、同好に公にせんとす。子は閑にしてかつ惫れたり、盍ぞこれを分担せざるや。』余以てこの書は……なお名教に背かず……遂にその役を襄く。」と言うのみ。蓋し己より出づるを明言するを欲せざるも、而して僚友にはすこぶるこれを知る者あり。鶚はすなわち字を蘭墅と曰い、鑲黄旗漢軍にして、乾隆戊申の挙人、乙卯の進士、旋いで翰林に入り、侍読に官す。またかつて嘉慶辛酉の順天郷試の同考官と為る。その『紅楼夢』を補うは、まさに乾隆辛亥の時に当たり、いまだ進士と成らず、「閑にしてかつ惫れたり」なれば、雪芹の蕭条の感に偶々あるいは相通ず。しかれども心志いまだ灰ならざれば、いわゆる「暮年の人、貧病交々攻め、漸く下世の光景を露出す」(戚本第一回)という者とはまた絶えて異なる。ここを以て続書もまた悲涼なりといえども、賈氏は終に「蘭桂斉しく芳し」くして、家業復興し、殊に茫茫たる白地、真に干浄と成るがごときものには類せざるなり。 |
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[22]Kutusov,一八一二年拿破仑进攻俄国时,给他打退了的有名的将军。——译者 |
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[23]Pavel Petrovich(1754——1801),指俄皇彼得第一世,是对于军队的服饰和教练,非常认真的人。——译者 |
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[24]Prometheus,希腊神话上的天神和地祇所生的巨人之一,因把天神宙斯(Zeus)从人间取回之火,又送给人类,被罚,锁在高加索斯(Caucasus)山的岩石上,白昼有大鹫啄食其肝,夜又复生如故。后为赫尔库来斯(Hercules)所释放。这里所用的意义,和原典有些不符。——译者 |
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[25]Publius Ovidius Naso(B. C. 43—18 A. D),罗马的著名的诗人。著有《变形记》(Metamorphoses),今尚存。——译者 |
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[26]Korobochika,“小箱”或“小窝”之意。——译者 |
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[27]Pud,四十俄磅为一普特。——译者 |
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[28]Petr Saveliev Neuvazhai—koruito,意云“蔑视洗濯水槽的彼得·萨惠略夫”。——译者 |
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[29]Korovuii kirpitch otto Buek的德译本作“母牛屎”,S. Graham序的英译本和上田进的日译本均作“母牛砖”,虽然直译原语,却不象诨名,也许倒是不对的。——译者 |
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[30]Kolovi Ivan,译出来,是“轮子伊凡”的意思。——译者 |
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[31]Philiporka,耶稣复活节前的精进期。——译者 |
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[32]Karlsbad,德国的温泉场。先前的俄国贵族是很喜欢到那里去的,但大抵只为了玩耍,并不是来养病的。——译者 |
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[33]Buchara,中央亚细亚的地名。——译者 |
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[34]Doublet,纸牌比赛的一种。——译者 |
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[35]Galbik,打牌之一种。——译者 |
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[36]Bankishka,同上。——译者 |
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[37]“大批”之意。——译者 |
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[38]乞乞科夫的本名和父称是保甫尔·伊凡诺维支,罗士特来夫却乱叫作阿波克勒杜克(Opodeldok)伊凡诺维支,在那时的俄国是算很失礼的。——译者 |
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[39]Thenardi,那时的著名的马戏班子。——译者 |
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[40]Saveli Sibiriakov,这是俄国人的名姓。——译者 |
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[41]John Churchill Marlborough(1650—1722),英国的大将,以常胜著名。——译者 |
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[42]硝强水和盐强水的混合物。——译者 |
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[43]恰如我们的叫猴子作阿三一样,俄国呼熊为“米莎”,这就是米哈尔的爱称。——译者 |
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[44]Bagration(1766—1812),是参加拿破仑战争的俄国著名将军。——译者 |
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[45]Goga i Magoga,都是背叛天国的人。——译者 |
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[46]Kosichai是俄国传说中的人物,充着“无常”的脚色的,也就是“死”。——译者 |
続『紅楼夢』は八—— |
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[47]一八一二年。——译者 |
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[48]十卢布的钞票。——译者 |
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[49]Friedrich Schiller(1759—1805),德国有名的诗人和戏曲家。——译者 |
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[50]Torshok,那时有名的,以买卖米麦和皮革制品为主的市场。——译者 |
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[51]Vorobi,“麻雀”之意。——译者 |
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[52]在河面凿开冰,以便汲水或洗濯东西的洞穴。——译者 |
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[53]“服罗吉多”,据Otto Buek译,是“飞脚”的意思。——译者 |
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[54]这是一种游戏,先排小骨成列,再从一定的地方,把一块小骨抛过去,将列中的小骨打倒,打倒得最多者胜。——译者 |
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[55]Eau de Cologne,一种香水。——译者 |
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[56]Homeros世界上最大的叙事诗人,约二千八百余年前,生于希腊,著有“Iliad”与“Odyssey”二大史诗,今存。——译者 |
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[57]Zeus,希腊神话上最高的大神,亦见于荷马的史诗中。——译者 |
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[58]Themis,希腊神话里的法律之神。——译者 |
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[59]Aichin,一阿耳申约中国二尺余。——译者 |
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[60]但丁(Dante Alighieri)作《神曲》,自记游历地狱,净罪,天堂三界,引导他的是罗马的大诗人斐尔吉留斯(Virgilius,70—19 B.C.)。——译者 |
第6節
| 中文 | 日本語 |
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第八卷 |
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宅无吉凶摄生论 难上 各本无此二字。旧校亦删 |
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夫善求寿强者,必先知夭 各本作灾。旧校同。案:夭疾与寿强为对文。原钞于义为长 疾之所自来,然后其至可防也。祸起于此,为防于彼;则祸无自瘳矣。世有安宅,葬埋,阴阳,度 原作步。据各本及旧校改 数,刑德之忌,是何所生乎?不见性命,不知祸福也。不见故妄求,不知故干 程本讹于 幸。是以善执生者,见性命之所宜,知祸福之所来。故求之实,而防之信,夫多饮而走,则为澹支;数行而风,则为养 各本作痒 毒;久居于湿,则要疾偏枯;好内不怠,则昏丧女疾 各本讹文房 。若此之类,灾之所以来,寿之所以去也。而掘墓 各本作基 筑室 各本作宅 ,费日苦身以求之,疾生于形,而治加于土木,是疾无道瘳矣 各本字无 。诗云 各本作曰 :恺悌君子,求福不回者,匪避谤议而为义然也;盖知回匪所求福也;故寿强。专 程本讹传 气致柔,少私寡欲,直行情性之所宜,而合于养生之正度。求之于怀抱之内,而得之矣。尝有不知蚕者,出口动手,皆为忌祟;不 张燮本讹既 得蚕滋 原作丝。今正各本丝下仍有滋字,非 甚,为忌祟滋多;犹自以犯之也。有教之知蚕者,其颛于桑火寒暑燥湿也,于是百忌自息,而为 原钞字无 利十倍。何者?先不知所以然,故忌祟之情繁;后知所以然者 各本字无 ,故求之之 原钞字无。据各本加 术正。故忌祟常 各本字无 生于不知,使知性命犹知 各本作如。非 蚕,则忌祟无所立矣。多食不消,含黄丸而筮祝 程本讹记 谴祟,或从乞胡求福者,凡人 各本人下有皆字 所笑之。何者?以智能达 原作迁。据各本改 其无祸也。胡忌祟举生于不知,由知者言之,皆乞胡也。设为三公之宅,而令 《御览》一百八十引作命 愚民居之,必不为三公,可知也。夫寿夭之不可求,甚于贵贱。然则择百年之宫,而望殇子之寿;孤逆魁罡 各本作冈,《御览》作忌 ,以速彭祖之夭;必不几 二字《御览》作诬 矣。或曰:愚民必不得久居公侯宅。然则果无宅 五字原夺。据各本加 也,是性命自然,不可求矣。有贼方至,不疾逃,独安须臾,遂为所虏。然则避祸趣 程张燮本作趋。旧校同 福,无过缘理。避贼之理,莫如速逃,则斯善矣。养生之道,莫如先知 二字从旧校。各本同 ,则为尽矣。夫避贼宜速章章然,故中人不难睹;避祸之理冥冥然,故明者不易见;其于理动,不可妄 原钞作妖。各本作要。今以意正 求,一也。孔子有疾,医 医下原有监字。旧校作者。案:即因医字讹衍也。今除去。各本亦无 曰:子居处适也,饮食药也,有疾天也,医焉能事?是以知命不忧,原始要 各本作反 终,遂知死生之说。夫时日谴祟,古之盛王无之,而季王之所好听也。制寿宫而得夭短,求百男而无立嗣,必占不启之陵,而陵不宿草。何者?高台深宫,以隔寒暑;靡色厚味,以毒其精;亡之于实,而求之于虚;故性命不遂也。或曰:所问之师不工,则天下无工师矣。夫一棲 《御览》一百十八引作同栖 之鸡,一阑 原作兰,今正。各本作栏。下诸阑字放此 之羊,宾至而有死者,岂居异哉?故命有制也。知命者则不滞于俗矣。若许负之相,条侯英布之黥而后王,彭祖三百 各本作七百。旧校同。下诸三百字放此 ,殇子之夭,是皆性命也。若相宅质居,自东徂西,而得反此,是灭性命之宜。孔子登东山而小鲁,登泰山而小天下,立丘而观居 各本立下有高字,观下有民字,旧校亦加 ,则知伯 疑徂之讹。各本作曰 东西非祸福矣。若乃忘地道之博岂 各本作爽塏 ,而心 各本作立 制于帷墙,则所见滋褊。从达者观之,则 字惟张燮本有。他本俱无。黄本亦有 夫乾确然示人易矣;夫坤然示人简矣。天地易简,而惧以细苛,是更所以为逆也。是以君子奉天明而事地察,世之工师,占成居则验,使造新则无征。世人多其占旧,思 各本作因 求其造新,是见舟之行于水,而欲推之于陆,是不明数也。夫旧新 各本讹断 之理,犹卜筮也。夫凿龟数筴,可以知吉凶;然不能为吉凶。何者?吉凶可知,而不可为也。夫先筮吉卦,而后名之无福,犹先筑利宅,而后居之无报也。占旧居以谴祟则可,安新居以求福则不可。即 各本作则 犹卜筮之说耳。俗有裁衣种谷,皆择日,衣者伤寒,种者失泽。凡火流寒至,则当 黄本字无 授衣;时雨既降,则当下种。贼方至,则当疾走。今舍实趣虚,故三患随至。凡以忌祟治家者,求富 各本作福 而其极皆贫。故有“知星宿,衣不覆”之谚。古言无虚,不可不察也。 |
第八巻 |
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难宅无吉凶摄生论 原作《难摄生中》。依各本及旧校改 |
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夫神祗遐远,吉凶难明。虽中人自竭,莫得其端,而易以惑道。故夫子寝答于来问,终慎神怪而不言。是以吉人 各本作古人。下诸吉人字放此 显仁于物,藏用于身。知其不可,众所共非,故隐之,彼非所明也。吾无意于庶几,而足下师心陋见,断然不疑。系决如此,足以独断。思省来论,旨多不通。谨因来言,以生此难。方推金木,未知所在,莫有食治。世无自理之道,法无独善之术。苟非其人,道不虚行,礼乐政刑,经常外事,犹有所疏;况乎幽微者邪?纵欲辩明神微,袪惑 程本讹感 ,起滞,立端,以明所由 黄汪二张本由下空一字。程本作立。盖意加 ;断以检 各本检下有其字 要,乃为有徴 黄汪二张本作□微。程本作阐微。俱误 。若但撮提群愚 黄汪二张本愚下空二字。程本作不察。亦意加 ,蚕种忿而弃之,因谓无阴阳吉凶之理,得无似噎而怨粒稼,溺而责舟楫者邪? |
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论曰:百年之宫,不能令殇子寿;孤逆魁罡,不能令彭祖夭。又曰:许负之相,条侯英布之黥而后王,皆性命也。应曰:此为命有所定,寿有所在。其 各本字无 祸不可以智逃,福不可以力致。英布畏痛,卒罹刀锯。亚夫忌馁,终有饿患,万事万物,凡所遭遇,无非相命也。然唐虞之世,命何同延?长平之卒,命何同短?此吾之所疑也。即如所论,虽慎若曾颜,不得免祸。恶若桀跖,故当昌炽。吉凶素定,不可推移。则古人何言:积善之家,必有余庆?履信思顺,自天祐之?必积善而后福应,信著而后祐来;犹罪之招罚,功之致赏也。苟先积而后受报,事理所得,不为暗自遇之也。若皆谓之是相,此为决相命于行事,定吉凶于智力,恐非本论之意。此又吾之所疑也。又云:多食不消,必须黄丸。苟命自当生,多食何畏?而服良药?若谓服药是相之所一,宅岂非是一邪?若谓虽命犹当须药自济;何知相不须宅以自辅乎?若谓药可论而宅不可说,恐天下或有说之者矣。既曰寿夭不可求,甚于贵贱;而复曰善求寿强者,必先知夭 各本作灾,非 疾之所自来,然后可防也。然则寿夭果可求邪?不可求也?既曰彭祖三百,殇子之夭,皆性命自然;而复曰不知防疾,致寿去夭;求实于虚,故性命不遂。此为寿夭之来,生于用身,性命之遂,得于善求。然则夭短者,何得不谓之愚?寿延者,何得不谓之智?苟寿夭成于愚智,则自然之命不可求之论,奚所措之?凡此数事 各本作者 ,亦雅论之矛戟 惟程荣本与此合。他本俱作楯非 矣。 |
宅に吉凶なき摂生論 上を難ず |
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论曰:专气致柔,少私寡欲;直行情性之所宜,而合养生之正度。求之于怀抱之内,而得之矣。文曰:善养生者,和为尽矣。诚哉斯言!匪谓不然。但谓全生不尽此耳。夫危邦不入,所以避乱政之害。重门击柝,所以备 各本作避 狂暴之灾。居必爽垲,所以远气 各本作风 毒之患。凡事之在外能为害者,此未足以尽其数也。安在守一和 黄汪程本作利 而可以为尽乎?夫专静寡欲,莫过 各本作若 单豹,行年七十,而有童孺之色。可谓柔和之用矣。而一旦为虎所食,岂非恃内而忽外邪?若谓豹相正当给厨 二张本作虎 ,虽智不免,则寡欲何益?而云养生可得?若单豹以未尽善而致灾,则辅生之道,不止于一和。苟和 二字原夺。据各本补 未足保生,则外物之为患者,吾未知其所济 各本作齐 矣。 |
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论曰:师占成居则有验,使造新则无征。请问占成居而有验者,为但占墙屋邪?占居者之吉凶也?若占居者而知盛衰,此自占人,非占成居也。占成居而知吉凶,此为宅自有善恶,而居者从之。故占者观表,而得内也。苟宅能制人使从之 已上十七字各本夺 ,则当吉之人,受灾于凶宅;妖逆无道,获福于吉居。尔为吉凶之致,唯宅而已?更令 原作全。依各本改 由人也,新便无征邪?若吉凶故当由人,则虽成居,何得而后 各本作云 有验邪?若此,果可占邪?不可占也?果有宅邪?其无宅也? |
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论曰:宅犹卜筮,可以知吉凶,而不能为吉凶也。应曰:此相似而不同。卜者吉凶无豫,待物而应,将来之兆 各本讹地 也。相宅不问居者之贤愚,唯睹已然。有传者,已成之形也。犹睹龙颜,而知当贵。见纵理,而知当饿 旧校于下加死字。各本亦有。而无当字 。然各有由,不为暗中也。今见其同于得吉凶,因谓相宅,与卜不异,此犹见琴而谓之箜篌,非但不知琴也。纵如论宅与卜同,但能知而不能 四字原夺。据各本加 为,则吉凶已成,虽知何益?卜与不卜,了无所在;而吉人将有为,必曰问之龟筮吉,以定所由差,此岂徒也哉?此复吾之所疑也。武王营周,则云考卜唯王,宅是镐京。周公迁邑,乃卜涧,终惟洛食。又曰:卜其宅兆而安厝之,古人修之,于昔如彼;足下非之,于今如此。不知谁定可从? |
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论曰:为三公宅,而愚民必不为三公,可知也。或曰:愚民必不得久居公侯宅。然则果无宅也?应曰:不谓吉宅,能独成福,但谓君子既有贤才,又卜其居,顺履 二字各本作复顺 积德,乃享元吉。犹夫良农既怀善艺,又择沃土,复加耘耔,乃有盈仓之报耳。今见愚民不能得福于吉居,便谓宅无善恶,何异睹种 各本作田 者之无十千,而谓田无壤塉邪?良田虽美,而稼不独茂;卜宅虽吉,而功不独成。相须之理诚然,则宅之吉凶,未可惑也。今信征祥,则弃人理之所宜;守卜相则绝阴阳之凶吉 各本二字到 ;持智 原钞字夺。据旧校加。各本作知 力则忘天道之所存;此何异识时雨之生物,因垂拱 程本讹持 而望嘉谷乎?是故疑怪之论生,偏是之议兴,所托不一,乌能相通?若夫兼而善之者,得无半非冢宅邪。 |
それ善く寿強を求むる者は、必ず先ず夭疾の自ら来たるところを知り、然る後にその至るを防ぐべきなり。禍はここに起こりて、防ぐはかしこに為す。すなわち禍は自ら瘳ゆるなし。世に安宅・葬埋・陰陽・度数・刑徳の忌あり、これ何より生ずるか。性命を見ず、禍福を知らざるなり。見ざる故に妄りに求め、知らざる故に幸を干す。ここを以て善く生を執る者は、性命の宜しきところを見、禍福の来たるところを知る。故にこれを実に求め、これを信に防ぐ。それ多く飲みて走れば、すなわち澹支と為り、しばしば行きて風に当たれば、すなわち痒毒と為り、久しく湿に居れば、すなわち要疾偏枯し、内を好みて怠らざれば、すなわち昏喪して女疾す。かくのごときの類は、災の来たるゆえんにして、寿の去るゆえんなり。而して墓を掘り室を築き、日を費やし身を苦しめて以てこれを求む。疾は形に生じて、治は土木に加う。これ疾の瘳ゆる道なし。詩に云う、「恺悌の君子、福を求めて回らず」とは、謗議を避けて義然たるにあらざるなり。蓋し回は福を求むるところにあらざるを知ればなり。故に寿強なり。気を専らにして柔を致し、私を少なくして欲を寡くし、直ちに情性の宜しきところを行いて、養生の正度に合す。これを懐抱の内に求めて、これを得たり。かつて蚕を知らざる者あり、口を出だし手を動かすに、みな忌祟と為す。蚕を得ること滋ますます甚だしからず、忌祟のためにますます多し。なおみずから犯すと以為えるなり。蚕を知る者あり、これに教えて、蚕はもっぱら桑と火と寒暑燥湿にあるを知らしむれば、ここにおいて百忌おのずから息み、利すること十倍なり。何となれば、先ず然る所以を知らざれば、故に忌祟の情繁く、後に然る所以を知る者は、故にこれを求むるの術正し。故に忌祟は常に不知より生ず。性命を知ることなお蚕を知るがごとくならしめば、忌祟は立つところなし。多く食して消さざれば、黄丸を含みて筮祝し谴祟を祓い、あるいは胡に従いて福を求むる者は、およそ人の笑うところなり。何となれば、智もてその禍なきを達するを以てなり。忌祟のことごとく不知より生ずること、知る者よりこれを言えば、みな胡に乞うがごとし。設けて三公の宅と為し、愚民をしてこれに居らしめば、必ずしも三公と為らず。知るべきなり。それ寿夭の求むべからざること、貴賤よりも甚だし。然らば百年の宮を択びて殤子の寿を望み、魁罡を孤逆して彭祖の夭を速めんとすること、必ず幾からず。あるいは曰く、愚民は必ずしも久しく公侯の宅に居るを得ず、と。然らば果たして宅なきなり。これ性命は自然にして求むべからず。賊の方に至らんとするに、疾く逃げずして、独り須臾を安んぜば、遂に虜するところとなる。然らば禍を避け福に趣くは、理に縁るに過ぐるはなし。賊を避くるの理は、速く逃ぐるにしくはなし。すなわちこれ善なり。養生の道は、先ず知るにしくはなし。すなわち尽くすを為す。それ賊を避くるは速やかなるべきこと章々として然り。故に中人も睹るを難しとせず。禍を避くるの理は冥々として然り。故に明者も見ること易からず。その理に動くにおいては、妄りに求むべからず、一なり。孔子疾あり、医—— |
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论曰:时日谴祟,古盛王无之,季王之所好。听此言善矣,顾其不尽然。汤祷桑林,周公秉圭,不知是谴祟非也?吉日惟戊,既伯既祷,不知是时日非也?此皆足下家事,先师所立,而一朝背之,必若汤周未为盛王,幸更思 各本作详 之。又当校 各本字夺。旧校亦删 知二贤,何如足下邪? |
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论曰:贼方至,以疾走为务;食不消,以黄为先。子徒知此为贤于安须臾,与求乞胡;而不知制贼病于无形,事功幽而无跌也。夫救火以水,虽自多于抱薪,而不知曲突之先物也 各本作矣 。况乎天下微事,言所不能及,数所不能分?是以古人存而不论,神而明之,遂知来物。故能独观于万化之前,收功于大顺之后。百姓谓之自然,而不知所以然。若此,岂常理之所逮邪?今形象著明,有数者,犹尚滞之;天地广远,品物多方,智之所知,未若所不知者众也。今执避贼消谷 四字各本作辟谷 之术,谓养生已备,至理已尽;驰心极观,齐此而还,意所不及,皆谓无之。欲据所见,以定古人之所难言,得无似蟪蛄之议冰雪邪?欲以所识 识下当夺六字。黄汪二张本作而□□□之所。程本而下作求今人。旧校作决古人。盖皆意补 弃,得无似戎 原作终。据各本改 人问布于中国,睹麻种而不事邪?吾怯于专断,进不敢定祸福于卜相,退不敢谓家无吉凶也。 |
第7節
| 中文 | 日本語 |
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第五篇 ,大旨悉同,当即此篇所本。明人汤显祖之《邯郸记》,则又本之此篇。既济文笔简炼,又多规诲之意,故事虽不经,尚为当时推重,比之韩愈《毛颖传》;间亦有病其俳谐者,则以作者尝为史官,因而绳以史法,失小说之意矣。既济又有《任氏传》 见《广记》四百五十二 一篇,言妖狐幻化,终于守志殉人,“虽今之妇人有不如者”,亦讽世之作也。 |
第五篇の大旨はすべて同じく、すなわちこの篇の典拠となったものである。明の湯顕祖の『邯鄲記』は、またこの篇に基づいている。既済の文筆は簡練で、かつ規誡の意が多く、故事は荒唐ではあるが、当時なお推重されて韓愈の『毛穎伝』に比せられた。たまに諧謔を病む者もあったが、それは作者がかつて史官であったため、史法をもってこれを律し、小説の本意を失ったのである。既済にはまた『任氏伝』(『広記』四百五十二に見える)一篇があり、妖狐の幻化を語り、ついに志を守って人に殉じ、「今の婦人にも及ばぬ者がある」と述べた、やはり世を諷する作である。 |
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“吴兴才人” 李贺语 沈亚之字下贤,元和十年进士第,太和初为德州行营使者柏耆判官,耆以罪贬,亚之亦谪南康尉,终郢州掾 约八世纪末至九世纪中 ,集十二卷,今存。亚之有文名,自谓“能创窈窕之思”,今集中有传奇文三篇 《沈下贤集》卷二卷四,亦见《广记》二百八十二及二百九十八 ,皆以华艳之笔,叙恍忽之情,而好言仙鬼复死,尤与同时文人异趣。《湘中怨》记郑生偶遇孤女,相依数年,一旦别去,自云“蛟宫之娣”,谪限已满矣,十余年后,又遥见之画舻中,含悲歌,而“风涛崩怒”,竟失所在。《异梦录》记邢凤梦见美人,示以“弓弯”之舞;及王炎梦侍吴王久,忽闻笳皷,乃葬西施,因奉教作挽歌,王嘉赏之。《秦梦记》则自述道经长安,客橐泉邸舍,梦为秦官有功,时弄玉婿箫史先死,因尚公主,自题所居曰翠微宫。穆公遇亚之亦甚厚,一日,公主忽无疾卒,穆公乃不复欲见亚之,遣之归。 |
「呉興の才人」(李賀の語)沈亜之は字を下賢といい、元和十年に進士に及第し、太和の初めに徳州行営使の柏耆の判官となったが、耆が罪を得て貶せられ、亜之もまた南康尉に左遷され、郢州の掾に終わった(およそ八世紀末から九世紀中頃)。集は十二巻、今も存する。亜之は文名があり、自ら「窈窕の思いを創り得る」と称した。今の集中に伝奇文が三篇あり(『沈下賢集』巻二・巻四、また『広記』二百八十二および二百九十八に見える)、いずれも華艶なる筆をもって恍惚たる情を叙し、仙鬼の復死を好んで語るところは、同時の文人と殊に趣を異にしている。『湘中怨』は鄭生がたまたま孤女に出会い、相依ること数年、ある日別れ去って、自ら「蛟宮の妹」と称し、謫限はすでに満ちたと言い、十余年後にまた遠くこれを画舫の中に見かけ、悲しげに歌うのを聞いたが、「風涛崩怒」して、ついにその所在を見失った。『異夢録』は邢鳳が夢に美人に見え、「弓弯」の舞を示されたこと、および王炎が夢に呉王に久しく仕え、にわかに笳鼓を聞けば西施の葬礼で、教えに従って挽歌を作ると、王がこれを嘉賞したことを記す。『秦夢記』は自ら長安を経て橐泉の邸舎に宿り、夢に秦の官となって功あり、時に弄玉の婿の蕭史がまず死んでいたため、公主を娶り、その居所を翠微宮と自ら題したことを述べる。穆公の亜之への待遇もまた甚だ厚かったが、ある日公主が突然無病にして卒し、穆公はもう亜之に会おうとせず、帰国させた。 |
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将去,公置酒高会,声秦声,舞秦舞,舞者击膊拊髀呜呜而音有不快,声甚怨。……既,再拜辞去,公复命至翠微宫与公主侍人别,重入殿内时,见珠翠遗碎青阶下,窗纱檀点依然,宫人泣对亚之。亚之感咽良久,因题宫门诗曰:“君王多感放东归,从此秦宫不复期,春景自伤秦丧主,落花如雨泪胭脂。”竟别去,……觉卧邸舍。明日,亚之与友人崔九万具道;九万,博陵人,谙古,谓余曰:“《皇览》云,‘秦穆公葬雍橐泉祈年宫下’,非其神灵凭乎?”亚之更求得秦时地志,说如九万云。呜呼!弄玉既仙矣,恶又死乎? |
去るに臨み、公は酒宴を大いに設け、秦の音を奏し、秦の舞を舞わせた。舞う者は膊を打ち髀を撫でて嗚嗚と声を発するも、音に快からぬものがあり、声は甚だ怨みがましかった。……やがて再拝して辞し去り、公はまた翠微宮に至って公主の侍人と別れよと命じた。殿内に再び入った時、珠翠の欠片が青い階の下に散乱し、窓紗の檀点は依然としてあり、宮人は亜之に向かって泣いた。亜之は感じ入って長く咽び、やがて宮門に詩を題して曰く、「君王多感にして東帰を放ち、此より秦宮また期すべからず、春景自ら秦の主を喪いしを傷み、落花雨の如く泪は胭脂なり」と。ついに別れ去り、……邸舎に覚めた。翌日、亜之は友人の崔九万にこの経緯を詳しく語った。九万は博陵の人で古事に通じており、余に謂って曰く、「『皇覧』に云う、『秦の穆公は雍の橐泉の祈年宮の下に葬る』と。その神霊の憑依したるにあらずや」と。亜之はさらに秦代の地誌を求め得たが、九万の言うとおりであった。ああ、弄玉はすでに仙人となったのに、どうしてまた死ぬことがあろうか。 |
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陈鸿为文,则辞意慷慨,长于吊古,追怀往事,如不胜情。鸿少学为史,贞元二十一年登太常第,始闲居遂志,乃修《大统纪》三十卷,七年始成 《唐文粹》九十五 ,在长安时,尝与白居易为友,为《长恨歌》作传 见《广记》四百八十六 。《新唐志》小说家类有陈鸿《开元升平源》一卷,注云“字大亮,贞元主客郎中”,或亦其人也 约八世纪后半至九世纪中叶 。所作又有《东城老父传》 见《广记》四百八十五 ,记贾昌于兵火之后,忆念太平盛事,荣华苓落,两相比照,其语甚悲。《长恨歌传》则作于元和初,亦追述开元中杨妃入宫以至死蜀本末,法与《贾昌传》相类。杨妃故事,唐人本所乐道,然鲜有条贯秩然如此传者,又得白居易作歌,故特为世间所知,清洪升撰《长生殿传奇》,即本此传及歌意也。传今有数本,《广记》及《文苑英华》 七百九十四 所录,字句已多异同,而明人附载《文苑英华》后之出于《丽情集》及《京本大曲》者尤异,盖后人 《丽情集》之撰者张君房? 又增损之。 |
陳鴻の文章は辞意慷慨にして、弔古を長じ、往事を追懐して情に勝えざるが如くであった。鴻は少くして史を学び、貞元二十一年に太常第に登り、初め閑居して志を遂げ、『大統紀』三十巻を修して七年にしてようやく成った(『唐文粋』九十五)。長安にあった時、かつて白居易と友となり、『長恨歌』のために伝を作った(『広記』四百八十六に見える)。『新唐志』小説家類に陳鴻『開元升平源』一巻があり、注に「字は大亮、貞元の主客郎中」とあるのは、あるいはまたこの人であろう(およそ八世紀後半から九世紀中葉)。その作にはまた『東城老父伝』(『広記』四百八十五に見える)があり、賈昌が兵火の後、太平の盛事を追憶し、栄華の零落を両相対照する、その語は甚だ悲しい。『長恨歌伝』は元和の初めに作られ、やはり開元中の楊妃の入宮から蜀に死するまでの顛末を追述し、法は『賈昌伝』に類する。楊妃の故事は唐人のもともと好んで語るところであるが、条理秩然としてこの伝のごとき者は稀であり、また白居易の歌を得たがゆえに、とりわけ世に知られることとなった。清の洪昇が『長生殿伝奇』を撰したのは、すなわちこの伝と歌の意に基づいたものである。伝には今いくつかの版本があり、『広記』と『文苑英華』(七百九十四)所録のものは字句にすでに異同が多いが、明人が『文苑英華』の後に付載した『麗情集』および『京本大曲』から出たものは殊に異なる。けだし後人(『麗情集』の撰者張君房か)がさらに増損したのであろう。 |
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天宝末,兄国忠盗丞相位,愚弄国柄,及安禄山引兵向阙,以讨杨氏为词。潼关不守,翠华南幸,出咸阳,道次马嵬亭,六军徘徊,持戟不进,从官郎吏伏上马前,请诛晁错以谢天下,国忠奉氂缨盘水,死于道周。左右之意未快,上问之,当时敢言者请以贵妃塞天下怨,上知不免,而不忍见其死,反袂掩面,使牵之而去;仓皇展转,竟就死于尺组之下。 《文苑英华》所载 |
天宝の末、兄の国忠が丞相の位を僭し、国柄を愚弄し、安禄山が兵を率いて闕に向かい、楊氏を討つことを口実とした。潼関は守れず、翠華は南に幸し、咸陽を出て、道すがら馬嵬亭に次いだ。六軍は徘徊し、戟を持して進まず、従官郎吏は上の馬前に伏して、晁錯を誅して天下に謝せんと請うた。国忠は氂纓盤水を奉じて道の周に死した。左右の意はなお快からず、上がこれを問えば、当時敢えて言う者は貴妃をもって天下の怨みを塞がんと請うた。上は免れ得ぬことを知りながら、なおその死を見るに忍びず、袂を翻して面を掩い、牽いて去らしめた。倉皇として展転し、ついに尺組の下に死を就いた。(『文苑英華』所載) |
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天宝末,兄国忠盗丞相位,窃弄国柄,羯胡乱燕,二京连陷,翠华南幸,驾出都西门百余里,六师徘徊,拥戟不行,从官郎吏伏上马前,请诛错以谢之;国忠奉氂缨盘水,死于道周。左右之意未快,当时敢言者请以贵妃塞天下之怒,上惨容,但心不忍见其死,反袂掩面,使牵之而去。拜于上前,回眸血下,坠金钿翠羽于地,上自收之。呜呼,蕙心纨质,天王之爱,不得已而死于尺组之下,叔向母云“甚美必甚恶”,李延年歌曰“倾国复倾城”,此之谓也。 《丽情集》及《大曲》所载 |
天宝の末、兄の国忠が丞相の位を僭し、ひそかに国柄を弄し、羯胡が燕に乱を起こし、二京は連なって陥り、翠華は南に幸した。駕は都の西門を出ること百余里、六師は徘徊して戟を擁して行かず、従官郎吏は上の馬前に伏して、錯を誅してこれに謝せんと請うた。国忠は氂纓盤水を奉じて道の周に死した。左右の意はなお快からず、当時敢えて言う者は貴妃をもって天下の怒りを塞がんと請うた。上は惨容にしてただ心にその死を見るに忍びず、袂を翻して面を掩い、牽いて去らしめた。上の前に拝し、眸を回せば血の下り、金釵翠羽を地に墜とした。上はみずからこれを拾った。ああ、蕙心紈質、天王の愛なるも、やむを得ず尺組の下に死す。叔向の母は云う「甚だ美なれば必ず甚だ悪し」と、李延年は歌って曰う「国を傾け城を傾く」と、これの謂いなり。(『麗情集』および『大曲』所載) |
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白行简字知退,其先盖太原人,后家韩城,又徙下邽,居易之弟也,贞元末进士第,累迁司门员外郎主客郎中,宝历二年 八二六 冬病卒,年盖五十余,两《唐书》皆附见《居易传》。有集二十卷,今不存,而《广记》 四百八十四 收其传奇文一篇曰《李娃传》,言荥阳巨族之子溺于长安倡女李娃,贫病困顿,至流落为挽郎,复为李娃所拯,勉之学,遂擢第,官成都府参军。行简本善文笔,李娃事又近情而耸听,故缠绵可观;元人已本其事为《曲江池》,明薛近兖则以作《绣襦记》。行简又有《三梦记》一篇 见原本《说郛》四 ,举“彼梦有所往而此遇之者,或此有所为而彼梦之者,或两相通梦者”三事,皆叙述简质,而事特瑰奇,其第一事尤胜。 |
白行簡は字を知退といい、その先はけだし太原の人で、後に韓城に家し、また下邽に移り、居易の弟である。貞元の末に進士に及第し、累遷して司門員外郎・主客郎中に至り、宝暦二年(八二六)冬に病没、年はおよそ五十余。両『唐書』いずれも『居易伝』に附見されている。集二十巻があったが今は存せず、しかし『広記』(四百八十四)にその伝奇文一篇を収めて『李娃伝』と曰う。滎陽の巨族の子が長安の娼女李娃に溺れ、貧病に困頓し、挽郎に身を落とすまでに至ったが、また李娃に救われ、学に励まされて、ついに科挙に及第し、成都府の参軍となったことを語る。行簡はもともと文筆に長じ、李娃の事もまた人情に近くして聳聞であるから、纏綿として見るに堪える。元人はすでにその事を本として『曲江池』と為し、明の薛近兖はこれをもって『繡襦記』を作った。行簡にはまた『三夢記』一篇(原本『説郛』四に見える)があり、「かの者が夢に往くところありてこの者がこれに遇う者、あるいはこの者が為すところありてかの者がこれを夢見る者、あるいは二人が相い夢に通ずる者」の三事を挙げ、いずれも叙述は簡質であるが事は殊に瑰奇で、その第一事がもっとも勝れている。 |
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天后时,刘幽求为朝邑丞,尝奉使夜归,未及家十余里,适有佛寺,路出其侧,闻寺中歌笑欢洽。寺垣短缺,尽得睹其中。刘俯身窥之,见十数人儿女杂坐,罗列盘馔,环绕之而共食。见其妻在坐中语笑。刘初愕然,不测其故,久之,且思其不当至此,复不能舍之。又熟视容止言笑无异,将就察之,寺门闭不得入,刘掷瓦击之,中其罍洗,破迸散走,因忽不见。刘逾垣直入,与从者同视殿庑,皆无人,寺扃如故。刘讶益甚,遂驰归。比至其家,妻方寝,闻刘至,乃叙寒暄讫,妻笑曰:“向梦中与数十人同游一寺,皆不相识,会食于殿庭,有人自外以瓦砾投之,杯盘狼藉,因而遂觉。”刘亦具陈其见,盖所谓彼梦有所往而此遇之也。 |
天后の時、劉幽求は朝邑の丞であったが、かつて使いを奉じて夜帰る折、家に至るまであと十余里というところで、たまたま仏寺があり、路がその傍を過ぎていた。寺中に歌笑の歓洽する声を聞いた。寺垣は低く欠けて、中の様子がすべて見えた。劉は身を俯せてこれを窺い、十数人の男女が雑坐し、盤饌を羅列してこれを環繞して共に食すのを見た。その妻が座中にあって語笑するのが見えた。劉は初め愕然として、そのゆえを測りかねたが、しばらくして、妻がこの場所に来るはずがないと思い返しつつも、なお棄て去ることができなかった。さらに容姿言笑を熟視するに、まったく異なるところがなく、近づいて確かめようとしたが、寺門は閉ざされて入れなかった。劉は瓦を投げてこれを撃つと、その酒器に当たって破散し、人々は走り散って忽ち見えなくなった。劉は垣を越えてまっすぐに入り、従者とともに殿廡を見て回ったが、すべて人はなく、寺は元のまま閉ざされていた。劉はいよいよ怪しみ、馬を飛ばして帰った。家に着くと、妻はまさに寝ているところで、劉が着いたと聞いて寒暄を叙し終えると、妻は笑って曰く、「先ほど夢の中で十数人とある寺を遊んだのですが、みな知らない人ばかりでした。殿庭で会食していると、外から瓦礫を投げ込む者があり、杯盤は狼藉として、それで目が覚めたのです」と。劉もまたその見たことを詳しく述べた。けだしいわゆる「かの者が夢に往くところありてこの者がこれに遇う」ということであった。 |
第8節
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第9節
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第九篇 唐之传奇文(下)】 |
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然传奇诸作者中,有特有关系者二人:其一,所作不多而影响甚大,名亦甚盛者曰元稹;其二,多所著作,影响亦甚大而名不甚彰者曰李公佐。 |
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元稹字微之,河南河内人,举明经,补校书郎,元和初应制策第一,除左拾遗,历监察御史,坐事贬江陵,又自虢州长史征入,渐迁至中书舍人承旨学士,进工部侍郎同平章事,未几罢相,出为同州刺史,又改越州,兼浙东观察使。太和初,入为尚书左丞检校户部尚书,兼鄂州刺史武昌军节度使,五年七月暴疾,一日而卒于镇,时年五十三 七七九——八三一 ,两《唐书》皆有传。稹自少与白居易唱和,当时言诗者称元白,号为“元和体”,然所传小说,止《莺莺传》 见《广记》四百八十八 一篇。 |
第九篇 唐の伝奇文(下)】 |
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《莺莺传》者,即叙崔张故事,亦名《会真记》者也。略谓贞元中,有张生者,性貌温美,非礼不动,年二十三未尝近女色。时生游于蒲,寓普救寺,适有崔氏孀妇将归长安,过蒲,亦寓兹寺,绪其亲则于张为异派之从母。会浑瑊薨,军人因丧大扰蒲人,崔氏甚惧,而生与蒲将之党有善,得将护之,十余日后廉使杜确来治军,军遂戢。崔氏由此甚感张生,因招宴,见其女莺莺,生惑焉,托崔之婢红娘以《春词》二首通意,是夕得彩笺,题其篇曰《明月三五夜》,辞云:“待月西厢下,迎风户半开,隔墙花影动,疑是玉人来。”张喜且骇,已而崔至,则端服严容,责其非礼,竟去,张自失者久之,数夕后,崔又至,将晓而去,终夕无一言。 |
しかるに伝奇の諸作者の中に、特に関係ある者が二人いる。その一は、作品は多くないが影響が甚だ大きく、名もまた甚だ高い者、元稹である。その二は、著作が多く影響もまた甚だ大きいが、名はそれほど顕著でない者、李公佐である。 |
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……张生辨色而兴,自疑曰:“岂其梦邪?”及明,睹妆在臂,香在衣,泪光荧荧然犹莹于茵席而已。是后又十余日,杳不复知。张生赋《会真诗》三十韵,未毕而红娘适至,因授之,以贻崔氏。自是复容之,朝隐而出,暮隐而入,同安于曩所谓西厢者几一月矣。张生常诘郑氏之情,则曰:“我不可奈何矣。”因欲就成之。无何,张生将至长安,先以情谕之,崔氏宛然无难词,然而愁怨之容动人矣。将行之夕,不可复见,而张生遂西下。…… |
元稹は字を微之といい、河南河内の人である。明経に挙げられて校書郎に補せられ、元和の初めに制策に応じて第一となり、左拾遺に除せられ、監察御史を歴任し、事に坐して江陵に貶せられ、また虢州長史より召し入れられ、漸く遷って中書舍人承旨学士に至り、工部侍郎同平章事に進んだが、まもなく罷相となり、同州刺史に出され、また越州に改められて浙東観察使を兼ねた。太和の初め、入って尚書左丞検校戸部尚書に至り、鄂州刺史兼武昌軍節度使となったが、五年七月に暴疾にかかり、一日にして鎮に卒した。時に年五十三(七七九——八三一)。両『唐書』にいずれも伝がある。稹は少くより白居易と唱和し、当時詩を論ずる者は元白と称し、「元和体」と号した。しかし伝わる小説は『鶯鶯伝』(『広記』四百八十八に見える)一篇のみである。 |
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明年,文战不利,张生遂止于京,贻书崔氏以广其意,崔报之,而生发其书于所知,由是为时人传说。杨巨源为赋《崔娘诗》,元稹亦续生《会真诗》三十韵,张之友闻者皆耸异,而张志亦绝矣。元稹与张厚,问其说,张曰: |
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“大凡天之所命尤物也,不妖其身,必妖于人。使崔氏子遇合富贵,秉娇宠,不为云为雨,则为蛟为螭,吾不知其变化矣。昔殷之辛,周之幽,据万乘之国,其势甚厚,然而一女子败之,溃其众,屠其身,至今为天下僇笑,予之德不足以胜妖孽,是用忍情。” |
『鶯鶯伝』とは、すなわち崔張の故事を叙したもので、また『会真記』とも名づけられる。略述すれば、貞元中、張生なる者あり、性は温美にして容貌端正、礼にあらざれば動かず、年二十三にしていまだ女色に近づいたことがなかった。時に生は蒲に遊び、普救寺に寓した。たまたま崔氏の寡婦が長安に帰ろうとして蒲を過ぎ、やはりこの寺に寓した。その親戚を辿れば、張にとっては異派の従母にあたる。折しも渾瑊が薨じ、軍人が喪に乗じて蒲の人々を大いに騒擾した。崔氏は甚だ恐れたが、生は蒲の将の党と親しかったため、これを護ることができ、十余日の後、廉使の杜確が来て軍を治め、軍はすなわち戢まった。崔氏はこれにより張生に甚だ感謝し、宴に招いた。その娘の鶯鶯に会うと、生は惑い、崔の婢の紅娘に託して『春詞』二首をもって意を通じた。その夕、彩箋を得て、その篇に題して『明月三五夜』と曰う。辞に云く、「月を待つ西廂の下、風を迎えて戸は半ば開く、隔壁の花影動き、疑うらくは玉人の来たるかと」。張は喜びかつ驚いたが、やがて崔が至ると、端服厳容にしてその非礼を責め、ついに去り、張は放心すること久しかった。数夕の後、崔がまた至り、暁になって去ったが、終夕一言もなかった。 |
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越岁余,崔已适人,张亦别娶,适过其所居,请以外兄见,崔终不出;后数日,张生将行,崔则赋诗一章以谢绝之云:“弃置今何道,当时且自亲,还将旧来意,怜取眼前人。”自是遂不复知。时人多许张为善补过者云。 |
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元稹以张生自寓,述其亲历之境,虽文章尚非上乘,而时有情致,固亦可观,惟篇末文过饰非,遂堕恶趣,而李绅、杨巨源辈既各赋诗以张之,稹又早有诗名,后秉节钺,故世人仍多乐道,宋赵德麟已取其事作《商调蝶恋花》十阕 见《侯鲭录》 ,金则有董解元《弦索西厢》,元则有王实甫《西厢记》,关汉卿《续西厢记》,明则有李日华《南西厢记》,陆采《南西厢记》等,其他曰《竟》曰《翻》曰《后》曰《续》者尤繁,至今尚或称道其事。唐人传奇留遗不少,而后来煊赫如是者,惟此篇及李朝威《柳毅传》而已。 |
……張生は色を弁じて起き、自ら疑って曰く「あに夢か」と。明くるに及び、化粧が臂にあり、香が衣にあり、涙光が瑩々として茵席に瑩いているのを睹た。これより後また十余日、杳として復た知れず。張生は『会真詩』三十韻を賦したが、未だ畢らざるに紅娘がたまたま至り、これを授けて崔氏に贈らしめた。これより復た容れられ、朝に隠れて出で、暮に隠れて入り、いわゆる西廂において安んずることほとんど一月であった。張生がつねに鄭氏の情を問えば、曰く「我はいかんともし難し」と。よってこれを成就しようとした。まもなく張生が長安に赴こうとし、まずその情を諭すと、崔氏は婉然として難色なく、しかし愁怨の容は人を動かした。出発の夕、もはや会うことが叶わず、張生はついに西に下った。…… |
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李公佐字颛蒙,陇西人,尝举进士,元和中为江淮从事,后罢归长安 见所作《谢小娥传》中 。会昌初,又为杨府录事,大中二年,坐累削两任官 见《唐书·宣宗纪》 ,盖生于代宗时,至宣宗初犹在 约七七○——八五○ ,余事未详;《新唐书·宗室世系表》有千牛备身公佐,则别一人也。其著作今存四篇,《南柯太守传》 见《广记》四百七十五,题《淳于棼》,今据《唐语林》改正 最有名,传言东平淳于棼家广陵郡东十里,宅南有大槐一株,贞元七年九月因沉醉致疾,二友扶生归家,令卧东庑下,而自秣马濯足以俟之。生就枕,昏然若梦,见二紫衣使称奉王命相邀,出门登车,指古槐穴而去。使者驱车入穴,忽见山川,终入一大城,城楼上有金书题曰“大槐安国”。生既至,拜驸马,复出为南柯太守,守郡三十载,“风化广被,百姓歌谣,建功德碑,立生祠宇”,王甚重之,递迁大位,生五男二女,后将兵与檀萝国战,败绩,公主又薨。生罢郡,而威福日盛,王疑惮之,遂禁生游从,处之私第,已而送归。既醒,则“见家之童仆拥篲于庭,二客濯足于榻,斜日未隐于西垣,余樽尚湛于东牖,梦中倏忽,若度一世矣”。其立意与《枕中记》同,而描摹更为尽致,明汤显祖亦本之作传奇曰《南柯记》。篇末言命仆发穴,以究根源,乃见蚁聚,悉符前梦,则假实证幻,余韵悠然,虽未尽于物情,已非《枕中》之所及矣。 |
翌年、科挙に失敗し、張生はやむなく京に留まり、崔氏に書を贈った。崔はこれに返書した。しかし生はその書を知己に示したため、時の人の語り草となった。楊巨源はこのために『崔娘詩』を賦し、元稹もまた生の『会真詩』三十韻を続けた。張の友人でこれを聞いた者はみな驚き怪しんだが、張の志もまたすでに絶えていた。元稹は張と厚く、その話を問うと、張は曰く—— 「およそ天の命ずるところの尤物は、その身を妖せざれば、必ず人を妖す。もし崔氏の子が富貴に遇合し、嬌寵を恃めば、雲となり雨とならざれば、蛟となり螭となるであろう。吾はその変化を知らず。昔、殷の辛、周の幽は万乗の国に拠り、その勢は甚だ厚かった。しかるに一人の女子がこれを敗り、その衆を潰し、その身を屠り、今に至るまで天下の笑い者となっている。予の徳は妖孽に勝つに足らず、ゆえに情を忍ぶのだ。」 |
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……有大穴,根洞然明朗,可容一榻。上有积土壤以为城郭殿台之状,有蚁数斛,隐聚其中。中有小台,其色若丹,二大蚁处之,素翼朱首,长可三寸,左右大蚁数十辅之,诸蚁不敢近,此其王矣:即槐安国都是也。又穷一穴,直上南枝可四丈,宛转方中,亦有土城小楼,群蚁亦处其中:即生所领南柯郡也……追想前事,感叹于怀,……不欲令二客坏之,遽令掩塞如旧。……复念檀萝征伐之事,又请二客访迹于外,宅东一里有古涸涧,侧有大檀树一株,藤萝拥织,上不见日,旁有小穴,亦有群蚁隐聚其间。檀萝之国,岂非此耶?嗟乎!蚁之灵异犹不可穷,况山藏木伏之大者所变化乎?…… |
一年余りを過ぎて、崔はすでに他に嫁ぎ、張もまた別に妻を娶った。たまたまその住むところを過ぎ、外兄として面会を請うたが、崔はついに出なかった。後日、張生が去ろうとした時、崔は詩一章を賦して訣別の辞を送った。「棄置して今何ぞ道わん、当時はまた自ら親しめり、なお旧き意をもって取り来たり、眼前の人を憐れめ」と。これより遂に復た消息を知らなかった。時の人は多く張を善く過ちを補う者と称したという。 |
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《谢小娥传》 见《广记》四百九十一 言小娥姓谢,豫章人,八岁丧母,后嫁历阳侠士段居贞。夫妇与父皆习贾,往来江湖间,为盗所杀,小娥亦折足堕水,他船拯起之,流转至上元县,依妙果寺尼以居。初,小娥尝梦父告以仇人为“車中猴東門草”,又梦夫告以仇人为“禾中走一日夫”,广求智者,皆不能解,至公佐乃辨之曰:“車中猴,車字去上下各一画,是申字,又申属猴,故曰車中猴;草下有門,門中有東,乃蘭字也。又禾中走是穿田过,亦是申字也;一日夫者,夫上更一画,下有日,是春字也。杀汝父是申蘭,杀汝夫是申春,足可明矣。”小娥乃变男子服为佣保,果遇二贼于浔阳,刺杀之,并闻于官,擒其党,而小娥得免死。解谜获贼,甚乏理致,而当时亦盛传,李复言已演其文入《续玄怪录》,明人则本之作平话。 见《拍案惊奇》十九 |
元稹は張生に自らを託し、その親しく経験した境を述べている。文章はなお上乗とは言えないが、時に情致があり、もとより見るに堪える。ただ篇末に文をもって非を飾り、遂に悪趣に堕した。しかし李紳・楊巨源の輩がおのおの詩を賦してこれを助け、稹もまた早くから詩名があり、後に節鉞を秉ったため、世人はなお多くこれを好んで語った。宋の趙徳麟はすでにその事を取って『商調蝶恋花』十闋を作り(『侯鯖録』に見える)、金には董解元の『弦索西廂』があり、元には王実甫の『西廂記』、関漢卿の『続西廂記』があり、明には李日華の『南西廂記』、陸采の『南西廂記』等がある。その他「竟」「翻」「後」「続」と題するものはさらに繁多で、今に至るまでなおその事を称道する者がいる。唐人の伝奇は遺存するもの少なくないが、後世これほど煊赫たるは、ただこの篇と李朝威の『柳毅伝』のみである。 |
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所余二篇,其一未详原题,《广记》则题曰《庐江冯媪》 三百四十三 ,记董江妻亡更娶,而媪见有女泣路隅一室中,后乃知即亡人之墓,董闻则罪以妖妄,逐媪去之,其事甚简,故文亦不华。其一曰《古岳渎经》 见《广记》四百六十七,题曰《李汤》 ,有李汤者,永泰时楚州刺史,闻渔人见龟山下水中有大铁锁,乃以人牛曳出之,风涛陡作,“一兽状有如猿,白首长鬐,雪牙金爪,闯然上岸,高五丈许,蹲踞之状若猿猴,但两目不能开,兀若昏昧,……久乃引颈伸欠,双目忽开,光彩若电,顾视人焉,欲发狂怒,观者奔走,兽亦徐徐引锁曳牛入水去,竟不复出。”当时汤与楚州知名之士,皆错愕不知其由。后公佐访古东吴,泛洞庭,登包山,入灵洞,探仙书,于石穴间得《古岳渎经》第八卷,乃得其故,而其经文字奇古,编次蠹毁,颇不能解,公佐与道士焦君共详读之,如下文: |
李公佐は字を颛蒙といい、隴西の人である。かつて進士に挙げられ、元和中に江淮の従事となり、後に罷めて長安に帰った(所作の『謝小娥伝』中に見える)。会昌の初め、またも楊府の録事となり、大中二年に累に坐して二任の官を削られた(『唐書・宣宗紀』に見える)。けだし代宗の時に生まれ、宣宗の初めになお在世していた(およそ七七〇——八五〇)。余事は未詳。『新唐書・宗室世系表』にある千牛備身公佐は、別人である。その著作は今四篇存し、『南柯太守伝』(『広記』四百七十五に見え、『淳于棼』と題する。今は『唐語林』に拠って改正する)が最も有名である。伝に言う、東平の淳于棼は家が広陵郡の東十里にあり、宅の南に大槐が一株あった。貞元七年九月、沈酔により疾を致し、二人の友が生を扶けて家に帰らせ、東廡の下に臥せしめた。生は枕に就くと昏然として夢のごとく、二人の紫衣の使者が王命をもって招くのを見た。門を出て車に乗り、古い槐の穴を指して入っていった。使者は車を駆って穴に入ると、忽ち山川が見え、ついに一大城に入った。城楼の上に金書で「大槐安国」と題されていた。生は至って駙馬を拝し、復た南柯太守に出された。郡を守ること三十年、「風化は広く及び、百姓は歌謡し、功徳碑を建て、生祠を立てた」。王は甚だこれを重んじ、次々と大位に遷した。生に五男二女があったが、後に兵を率いて檀蘿国と戦い、敗績した。公主もまた薨じた。生は郡を罷められたが、威福は日に盛んで、王は疑い憚り、遂に生の遊従を禁じ、私第に処した。やがて送り帰された。覚めてみれば、「家の童僕が庭で箒を揮っており、二客は榻で足を濯い、斜日はまだ西垣に隠れず、余樽はなお東牖に湛えていた。夢中の忽忽は、一生を過ごしたかのようであった」。その立意は『枕中記』と同じだが、描写はいっそう尽くされている。明の湯顕祖もまたこれに基づいて伝奇『南柯記』を作った。篇末に穴を掘って根源を究めたところ、蟻が群がっており、すべて前の夢に符合したと記す。実証をもって幻を証したもので、余韻悠然、物情を尽くしたとは言えないが、すでに『枕中記』の及ぶところではない。 |
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“禹理水,三至桐柏山,惊风走雷,石号木鸣,土伯拥川,天老肃兵,功不能兴。禹怒,召集百灵,授命夔龙,桐柏等山君长稽首请命,禹因囚鸿蒙氏、章商氏、兜卢氏、犁娄氏,乃获淮涡水神名无支祁,善应对言语,辨江淮之浅深,原隰之远近,形若猿猴,缩鼻高额,青躯白首,金目雪牙,颈伸百尺,力逾九象,搏击腾踔疾奔,轻利倏忽,闻视不可久。禹授之童律,不能制;授之乌木由,不能制;授之庚辰,能制。鸱脾桓胡木魅水灵山祅石怪奔号聚绕,以数千载,庚辰以战 一作戟 逐去,颈锁大索,鼻穿金铃,徙淮阴之龟山之足下,俾淮水永安流注海也。庚辰之后,皆图此形者,免淮涛风雨之难。” |
……大きな穴があり、根の洞は明朗として一榻を容れるに足りた。上に積土壌をもって城郭殿台の状を為し、蟻が数斛も隠れ集まっていた。中に小さな台があり、その色は丹の如く、二匹の大蟻がそこにおり、素翼朱首、長さ三寸ばかり、左右に大蟻数十匹がこれを輔け、諸蟻は敢えて近づかなかった。これがその王であり、すなわち槐安国の都である。さらに一穴を極めると、まっすぐに南枝を上ること四丈ばかり、宛転として方形の中にやはり土城小楼があり、蟻の群れもまたそこに住んでいた。すなわち生が領した南柯郡である。……前事を追想し、感嘆の懐いを抱き、……二客にこれを壊させたくなく、にわかに掩塞して旧に復せしめた。……さらに檀蘿征伐のことを念じ、また二客にその跡を外に訪ねてもらうと、宅の東一里に古い涸れた澗があり、側に大きな檀の木が一株あって、藤蘿が擁織し、上に日を見ず、傍らに小さな穴があり、やはり蟻の群れが隠れ集まっていた。檀蘿の国とは、これではなかろうか。ああ、蟻の霊異すらなお窮め尽くせないのだ、まして山に潜み木に隠れた大いなるものの変化においておや。…… |
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宋朱熹 《楚辞辨证》中 尝斥僧伽降伏无支祁事为俚说,罗泌 《路史》 有《无支祁辩》,元吴昌龄《西游记》杂剧中有“无支祁是他姊妹”语,明宋濂亦隐括其事为文,知宋元以来,此说流传不绝,且广被民间,致劳学者弹纠,而实则仅出于李公佐假设之作而已。惟后来渐误禹为僧伽或泗洲大圣,明吴承恩演《西游记》,又移其神变奋迅之状于孙悟空,于是禹伏无支祁故事遂以堙昧也。 |
『謝小娥伝』(『広記』四百九十一に見える)は、小娥が姓は謝、豫章の人で、八歳にして母を喪い、後に歴陽の侠士段居貞に嫁いだことを語る。夫婦と父はいずれも商いを習い、江湖を往来する間に盗賊に殺され、小娥もまた足を折って水に堕ちたが、他の船に救い上げられた。初め、小娥はかつて夢に父が仇人は「車中猴東門草」と告げるのを見、また夢に夫が仇人は「禾中走一日夫」と告げるのを見た。広く智者を求めたが、みな解けなかった。公佐に至ってようやくこれを弁じて曰く、「車中猴とは、車の字の上下各一画を去れば申の字であり、草の下に門があり門の中に東がある、これは蘭の字である。また禾中走は田を穿って過ぎることで、やはり申の字である。一日夫とは、夫の上にさらに一画あり下に日がある、これは春の字だ。汝の父を殺したのは申蘭、汝の夫を殺したのは申春である」と。小娥はそこで男装して傭保となり、果たして潯陽で二賊に遭い、これを刺殺し、さらに官に告げてその一党を捕えた。謎解きによって賊を捕えるという筋は、甚だ理致に乏しいが、当時もまた盛んに伝えられた。 |
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传奇之文,此外尚夥,其较显著者,有陇西李朝威作《柳毅传》 见《广记》四百十九 ,记毅以下第将归湘滨,道经泾阳,遇牧羊女子言是龙女,为舅姑及婿所贬,托毅寄书于父洞庭君,洞庭君有弟钱塘君性刚暴,杀婿取女归,欲以配毅,因毅严拒而止。后毅丧妻,徙家金陵,娶范阳卢氏,则龙女也,又徙南海,复归洞庭,其表弟薛嘏尝遇之于湖中,得仙药五十丸,此后遂绝影响。金人已取其事为杂剧 语见董解元《弦索西厢》中 ,元尚仲贤则作《柳毅传书》,翻案而为《张生煮海》,清李渔又折衷之而成《蜃中楼》。又有蒋防作《霍小玉传》 见《广记》四百八十七 ,言李益年二十擢进士第,入长安,思得名妓,乃遇霍小玉,寓于其家,相从者二年,其后年,生授郑县主簿,则坚约婚姻而别。及生觐母,始知已订婚卢氏,母又素严,生不敢拒,遂与小玉绝。小玉久不得生音问,竟卧病,踪迹招益,益亦不敢往。一日益在崇敬寺,忽有黄衫豪士强邀之,至霍氏家,小玉力疾相见,数其负心,长恸而卒。益为之缟素,旦夕哭泣甚哀,已而婚于卢氏,然为怨鬼所祟,竟以猜忌出其妻,至于三娶,莫不如是。杜甫《少年行》有云:“黄衫年少宜来数,不见堂前东逝渡”,谓此也。又有许尧佐作《柳氏传》 见《广记》四百八十五 ,记诗人韩翃得李生艳姬柳氏,会安禄山反,因寄柳于法灵寺而自为淄青节度使书记,乱平复来,则柳已为蕃将沙吒利所取,淄青诸将中有侠士许虞候者,劫以还翃。其事又见于孟棨《本事诗》,盖亦实录矣。他如柳珵 《广记》二百七十五《上清传》 薛调 又四百八十六《无双传》 皇甫枚 又四百九十一《非烟传》 房千里 同上《杨娼传》 等,亦皆有造作。而杜光庭之《虬髯客传》 见《广记》一百九十三 流传乃独广,光庭为蜀道士,事王衍,多所著述,大抵诞谩,此传则记杨素妓人之执红拂者识李靖于布衣时,相约遁去,道中又逢虬髯客,知其不凡,推资财,授兵法,令佐太宗兴唐,而自率海贼入扶余国杀其主,自立为王云。后世乐此故事,至作画图,谓之三侠;在曲则明凌初成有《虬髯翁》,张凤翼张太和皆有《红拂记》。 |
残る二篇のうち、その一つは原題が未詳で、『広記』では『廬江馮媼』と題する。事は甚だ簡素で、ゆえに文もまた華やかではない。もう一つは『古岳瀆経』(『広記』四百六十七に見える)という。李湯なる者が、永泰の時の楚州刺史で、漁人が亀山の水中に大鉄鎖を見たと聞き、人と牛でこれを引き出した。風涛はにわかに起こり、「一獣、状は猿の如く、白首長鬐、雪牙金爪」が岸に上がった。後に公佐は古の東呉を訪ね、石穴の間に『古岳瀆経』第八巻を得て、禹が水を治めんとして桐柏山に至り、ついに淮渦の水神、無支祁を獲えた故事を知った。宋元以来、この説が流伝して絶えず、民間に広まった。ただ後に次第に禹を僧伽あるいは泗洲大聖と誤り、明の呉承恩が『西遊記』を演ずるにあたって、その神変奮迅の状を孫悟空に移したため、禹が無支祁を伏した故事は遂に埋没するに至った。 伝奇の文は、このほかなお多い。著名なものとしては、李朝威の『柳毅伝』(『広記』四百十九に見える)がある。毅が科挙に落第して湘浜に帰ろうとする途中、龍女に出会い、手紙を洞庭君に届けた話である。また蒋防の『霍小玉伝』(『広記』四百八十七に見える)、許堯佐の『柳氏伝』(『広記』四百八十五に見える)等もまたみな造作がある。しかし杜光庭の『虬髯客伝』(『広記』一百九十三に見える)は、流伝がとりわけ広い。楊素の妓人にして紅拂を執る者が李靖を布衣の時に見出し、虬髯客と出会い、三侠と称されるに至った故事を記す。後世この故事を好み、画図まで作った。 以上に挙げたもののほか、なお作者不明の『李衛公別伝』『李林甫外伝』、郭湜の『高力士外伝』、姚汝能の『安禄山事迹』等がある。著述の本意は幽隠を顕揚するにあり、伝奇のためではないが、文の枝蔓なること、事の瑣屑なることにより、後人もまたしばしば小説と見なしたのである。 |
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上来所举之外,尚有不知作者之《李卫公别传》,《李林甫外传》,郭湜之《高力士外传》,姚汝能之《安禄山事迹》等,惟著述本意,或在显扬幽隐,非为传奇,特以行文枝蔓,或拾事琐屑,故后人亦每以小说视之。 |
第10節
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第11節
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第十篇 唐之传奇集及杂俎】 |
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造传奇之文,会萃为一集者,在唐代多有,而煊赫莫如牛僧孺之《玄怪录》。僧孺字思黯,本陇西狄道人,居宛叶间,元和初以贤良方正对策第一,条指失政,鲠讦不避宰相,至考官皆调去,僧孺则调伊阙尉,穆宗即位,渐至御史中丞,后以户部侍郎同中书门下平章事,武宗时累贬循州长史,宣宗立,乃召还为太子少师,大中二年卒,赠太尉,年六十九 七八○——八四八 ,曰文简,有传在两《唐书》。僧孺性坚僻,而颇嗜志怪,所撰《玄怪录》十卷,今已佚,然《太平广记》所引尚三十一篇,可以考见大概。其文虽与他传奇无甚异,而时时示人以出于造作,不求见信;盖李公佐李朝威辈,仅在显扬笔妙,故尚不肯言事状之虚,至僧孺乃并欲以构想之幻自见,因故示其诡设之迹矣。《元无有》即其一例: |
第十篇 唐の伝奇集および雑俎】 伝奇の文を造り、一集に会萃した者は、唐代に多くあったが、煊赫たること牛僧孺の『玄怪録』に及ぶものはない。僧孺は字を思黯といい、もと隴西狄道の人で、宛葉の間に居した。元和の初めに賢良方正の対策で第一となり、失政を条指して鯁諤して宰相すら避けなかったため、考官はみな調去され、僧孺もまた伊闕尉に調せられた。穆宗が即位すると漸く御史中丞に至り、後に戸部侍郎同中書門下平章事となったが、武宗の時に累貶されて循州長史となった。宣宗が立つと召し還されて太子少師となり、大中二年に卒し、太尉を贈られた。年六十九(七八〇——八四八)。文簡と諡され、両『唐書』に伝がある。僧孺の性は堅僻にしてかなり志怪を嗜み、撰した『玄怪録』十巻は今はすでに散逸しているが、『太平広記』に引くところなお三十一篇あり、大概を考見することができる。その文は他の伝奇と大きな違いはないが、時々に造作から出たことを示して信を求めない。けだし李公佐・李朝威の輩は筆妙を顕揚するのに急であったため、なお事状の虚なることを言おうとしなかったが、僧孺に至っては構想の幻をもってみずから見えんと欲し、ゆえにことさらにその詭設の跡を示したのである。『元無有』はその一例である—— |
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宝应中,有元无有,常以仲春末独行维扬郊野。值日晚,风雨大至,时兵荒后,人户多逃,遂入路旁空庄。须臾霁止,斜月方出,无有坐北窗,忽闻西廊有行人声,未几见月中有四人,衣冠皆异,相与谈谐吟咏甚畅,乃云:“今夕如秋,风月若此,吾辈岂得不为一言,以展平生之事也?”……吟咏既朗,无有听之具悉。其一衣冠长人即先吟曰:“齐纨鲁缟如霜雪,寥亮高声予所发。”其二黑衣冠短陋人诗曰:“嘉宾良会清夜时,煌煌灯烛我能持。”其三故弊黄衣冠人,亦短陋,诗曰:“清冷之泉候朝汲,桑绠相牵常出入。”其四故黑衣冠人诗曰:“爨薪贮泉相煎熬,充他口腹我为劳。”无有亦不以四人为异,四人亦不虞无有之在堂隍也,递相褒赏,观其自负,则虽阮嗣宗《咏怀》,亦若不能加矣。四人迟明乃归旧所;无有就寻之,堂中惟有故杵灯台水桶破铛:乃知四人即此物所为也。 《广记》三百六十九 |
宝応中、元無有なる者あり、常に仲春の末に独り維揚の郊野を行く。日暮に遇い、風雨大いに至った。時に兵荒の後で、人家は多く逃げ去っていたため、路傍の空き家に入った。しばらくして雨が止み、斜月がまさに出たところ、無有は北窓に座していると、忽ち西廊に人の歩く音が聞こえた。まもなく月光の中に四人が見えた。衣冠はみな異様で、互いに談笑吟詠すること甚だ暢達であった。……吟詠は朗々として、無有はこれを聴くに具さに悉った。その一の詩は「斉の紈魯の縞、霜雪の如し」、その二は「煌煌たる灯燭は我よく持つ」、その三は「清冷の泉、朝の汲みを候つ」、その四は「爨薪泉を貯えて相い煎熬す」と。四人は暁近くなってようやく元の場所に戻った。無有がこれを探ると、堂中にあるのは古い杵と灯台と水桶と壊れた鉄鍋のみであった。すなわち四人はこれらの物が化けたものだったのである。(『広記』三百六十九) 牛僧孺は朝廷にあって李徳裕と互いに門戸を立てて党争をなした。その小説好きのゆえに、李の門客韋瓘がそこで僧孺の名を騙って『周秦行紀』を撰し、これを誣した。德裕はこのために論を作り、僧孺の姓は図讖に応じ、『玄怪録』にまた多く隠語を造っており、民を惑わさんとする意があるとし、「須らく太牢をもって少長ともに法に置くべし」と述べた。古来、小説を仮りて人を排陷するは、これをもって最も怪となす。しかし当時その説は行われなかった。ただ僧孺にはすでに才名があり、また高位を歴たため、その著作は世に盛んに伝えられた。模倣者もまた少なくなく、李復言に『続玄怪録』十巻があり、薛漁思に『河東記』三巻があった。 |
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牛僧孺在朝,与李德裕各立门户,为党争,以其好作小说,李之门客韦瓘遂托僧孺名撰《周秦行纪》以诬之。记言自以举进士落第将归宛叶,经伊阙鸣皋山下,因暮失道,遂止薄太后庙中,与汉唐妃嫔燕饮。太后问今天子为谁?则对曰:“‘今皇帝先帝长子。’太真笑曰:‘沈婆儿作天子也。大奇!’”复赋诗,终以昭君侍寝,至明别去,“竟不知其何如” 详见《广记》四百八十九 。德裕因作论,谓僧孺姓应图谶,《玄怪录》又多造隐语,意在惑民,《周秦行纪》则以身与后妃冥遇,欲证其身非人臣相,“及至戏德宗为沈婆儿,以代宗皇后为沈婆,令人骨战,可谓无礼于其君甚矣!”作逆若非当代,必在子孙,故“须以‘太牢’少长成置于法,则刑罚中而社稷安”也 详见《李卫公外集》四 。自来假小说以排陷人,此为最怪,顾当时说亦不行。惟僧孺既有才名,又历高位,其所著作,世遂盛传。而摹拟者亦不鲜,李复言有《续玄怪录》十卷,“分仙术感应二门”,薛渔思有《河东记》三卷,“亦记谲怪事,序云续牛僧孺之书” 皆见宋晁公武《郡斋读书志》十三 ;又有撰《宣室志》十卷,以记仙鬼灵异事迹者,曰张读字圣朋,则张之裔而牛僧孺之外孙也 见《唐书·张荐传》 ,后来亦疑为“少而习见,故沿其流波” 清《四库提要》子部小说家类三 云。 |
ほかに蘇鶚に『杜陽雑編』、高彦休に『唐闕史』がある。康駢の『劇談録』に至っては漸く世務が多くなり、孫棨の『北里志』は専ら狭邪を叙し、范摅の『雲渓友議』は特に歌詠を重んじている。裴鉶に至って書を著し、直に『伝奇』と称したが、神仙の怪譎なる事を盛んに述べ、多く崇飾して観る者を惑わそうとした。聶隠娘が妙手空空児に勝つ事はまさにこの書から出たもので、明人がこれを取って偽作の段成式『剣侠伝』に入れたため、流伝がことに広まった。 段成式は字を柯古といい、斉州臨淄の人で、宰相文昌の子である。成式の家には奇篇秘籍が多く、博学強記にして仏書に殊に深かった。その小説『酉陽雑俎』二十巻は全三十篇で今も具さに存し、さらに『続集』十巻がある。秘書を録し、異事を叙し、仙仏人鬼から動植に至るまで載せないものはなく、類をもって相い聚め、類書の如きものがある。各篇にはそれぞれ題目があるが、隠僻で、道術を記すものは『壺史』と曰い、怪異を志すものは『諾皋記』と曰い、抉択記叙もまた多く古艶穎異にして、その目に副うものである。 夏の啓は東明公、文王は西明公、邵公は南明公、季札は北明公となり、四時は四方の鬼を主る。至忠至孝の人は、命終わればみな地下の主者となる。(巻二『玉格』) |
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他如武功人苏鹗有《杜阳杂编》,记唐世故事,而多夸远方珍异,参寥子高彦休有《唐阙史》,虽间有实录,而亦言见梦升仙,故皆传奇,但稍迁变。至于康骈《剧谈录》之渐多世务,孙棨《北里志》之专叙狭邪,范摅《云溪友议》之特重歌咏,虽若弥近人情,远于灵怪,然选事则新颖,行文则逶迤,固仍以传奇为骨者也。迨裴铏著书,径称《传奇》,则盛述神仙怪谲之事,又多崇饰,以惑观者。铏为淮南节度副大使高骈从事,骈后失志,尤好神仙,卒以叛死,则此或当时谀导之作,非由本怀。聂隐娘胜妙手空空儿事即出此书 文见《广记》一百九十四 ,明人取以入伪作之段成式《剑侠传》,流传遂广,迄今犹为所谓文人者所乐道也。 |
初めて天に生まれた者に五相あり、一に光が身を覆うも衣なし、二に物を見て希有の心を生ず、三に顔色弱く、四に疑い、五に怖る。(巻三『貝編』) 天翁は姓を張、名を堅、字を刺渇といい、漁陽の人である。少くして不羈にして拘忌するところなし。常に羅を張って一羽の白雀を得、愛してこれを養った。夢に劉天翁が怒りを責め、しばしばこれを殺さんと欲したが、白雀はそのたびに堅に報せた。天翁は遂に自ら下って来て観たが、堅はひそかに天翁の車に騎り、白龍に乗って天に登った。天翁は追ったが及ばなかった。堅は玄宮に至ると百官を易え、北門を杜塞し、白雀を上卿侯に封じた。劉翁は治を失い、五岳を徘徊して災いを作した。堅はこれを患い、劉翁を太山太守として生死の籍を主らしめた。(巻十四『諾皋記』) |
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段成式字柯古,齐州临淄人,宰相文昌子也,以荫为校书郎,累迁至吉州刺史,大中中归京,仕至太常少卿,咸通四年 八六三 六月卒,《新唐书》附见段志玄传末 余见《酉阳杂俎》及《南楚新闻》 。成式家多奇篇秘籍,博学强记,尤深于佛书,而少好畋猎,亦早有文名,词句多奥博,世所珍异,其小说有《庐陵官下记》二卷,今佚;《酉阳杂俎》二十卷凡三十篇,今具在,并有《续集》十卷:卷一篇,或录秘书,或叙异事,仙佛人鬼以至动植,弥不毕载,以类相聚,有如类书,虽源或出于张华《博物志》,而在唐时,则犹之独创之作矣。每篇各有题目,亦殊隐僻,如纪道术者曰《壶史》,钞释典者曰《贝编》,述丧葬者曰《尸窀》,志怪异者曰《诺皋记》,而抉择记叙,亦多古艳颖异,足副其目也。 |
また文身の事を集めたものは『黥』と曰い、鷹の養い方を述べたものは『肉攫部』と曰う。渉るところ既に広ければ、珍異も多く、世に愛玩されて伝奇と並び駆けて先を争った。 成式は詩をよくし、幽渋繁縟であった。時に温庭筠・李商隠もまた同様で互いに誇り、「三十六体」と号した。温庭筠にも小説三巻『乾巛子』があるが、簡率にして見るべきものなし。李には『義山雑纂』一巻があり、俚俗の常談鄙事を集めたもので、瑣綴に止まるとはいえ、世務の幽隠を穿つものがある。 |
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夏启为东明公,文王为西明公,邵公为南明公,季札为北明公,四时主四方鬼。至忠至孝之人,命终皆为地下主者,一百四十年,乃授下仙之教,授以大道。有上圣之德,命终受三官书,为地下主者,一千年乃转三官之五帝,复一千四百年方得游行太清,为九宫之中仙。 卷二《玉格》 |
殺風景 |
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始生天者五相,一光覆身而无衣,二见物生希有心,三弱颜,四疑,五怖。 卷三《贝编》 |
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国初僧玄奘往五印取经,西域敬之。成式见倭国僧金刚三昧,言尝至中天寺,寺中多画玄奘麻屩及匙箸,以彩云乘之,盖西域所无者,每至斋日,辄膜拜焉。 同上 |
松の下で喝道する 花を看て涙を下す 苔の上に蓆を敷く 垂柳を斫る 花の下に褌を晒す |
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天翁姓张,名坚,字刺渴,渔阳人,少不羁,无所拘忌。常张罗得一白雀,爱而养之,梦刘天翁责怒,每欲杀之,白雀辄以报坚,坚设诸方待之,终莫能害。天翁遂下观之,坚盛设宾主,乃窃骑天翁车,乘白龙,振策登天,天翁乘余龙追之,不及。坚既到玄宫,易百官,杜塞北门,封白雀为上卿侯,改白雀之胤不产于下土。刘翁失治,徘徊五岳作灾,坚患之,以刘翁为太山太守,主生死之籍。 卷十四《诺皋记》 |
遊春に重載する 石筍に馬を繋ぐ 月の下に松明を持つ 歩行の将軍 山に背いて楼を起てる |
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大历中,有士人庄在渭南,遇疾卒于京,妻柳氏因庄居。……士人祥斋日,暮,柳氏露坐逐凉,有胡蜂绕其首面,柳氏以扇击堕地,乃胡桃也。柳氏遽取,玩之掌中;遂长,初如拳,如碗,惊顾之际,已如盘矣。曝然分为两扇,空中轮转,声如分蜂,忽合于柳氏首。柳氏碎首,齿著于树。其物因飞去,竟不知何怪也。 同上 |
果樹園に菜を植える 花棚の下に鶏鴨を養う |
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又有聚文身之事者曰《黥》,述养鹰之法者曰《肉攫部》,《续集》则有《贬误》以收考证,有《寺塔记》以志伽蓝,所涉既广,遂多珍异,为世爱玩,与传奇并驱争先矣。 |
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成式能诗,幽涩繁缛如他著述,时有祁人温庭筠字飞卿,河内李商隐字义山,亦俱用是相夸,号“三十六体”。温庭筠亦有小说三卷曰《乾子》,遗文见于《广记》,仅录事略,简率无可观,与其诗赋之艳丽者不类。李于小说无闻,今有《义山杂纂》一卷,《新唐志》不著录,宋陈振孙 《直斋书录解题》十一 以为商隐作,书皆集俚俗常谈鄙事,以类相从,虽止于琐缀,而颇亦穿世务之幽隐,盖不特聊资笑噱而已。 |
悪模様 |
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杀风景 |
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松下喝道 看花泪下 苔上铺席 斫却垂杨 花下晒裩 |
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游春重载 石笋系马 月下把火 步行将军 背山起楼 |
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果园种菜 花架下养鸡鸭 |
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恶模样 |
客となって人と口喧嘩する …… 客として台や卓をひっくり返す …… 舅姑の前で艶曲を歌う |
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作客与人相争骂 …… 做客踏翻台桌 …… 对丈人丈母唱艳曲 |
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嚼残鱼肉归盘上 对众倒卧 横箸在羹碗上 |
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十诫 |
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不得饮酒至醉 不得暗黑处惊人 不得阴损于人 不得独入寡妇人房 不得开人家书 不得戏取物不令人知 不得暗黑独自行 不得与无赖子弟往还 不得借人物用 了经旬不还 原缺一则 |
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中和年间有李就今字袞求,为临晋令,亦号义山,能诗,初举时恒游倡家,见孙棨《北里志》,则《杂纂》之作,或出此人,未必定属商隐,然他无显证,未能定也。后亦时有仿作者,宋有续,称王君玉,有再续,称苏东坡,明有三续,为黄允交。 |
噛み残した魚肉を皿に戻す 衆人の前で横になる 箸を椀の上に横たえる |