Lu Xun Complete Works/hi/Dixiong

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भाई (弟兄)

लू शुन (鲁迅, 1881-1936)

चीनी से हिंदी में अनुवाद।


खंड 1

[1924]

[फिर वही "प्राचीन काल में भी था"]

श्री ताइयान शिक्षा-सुधार समिति की वार्षिक सभा के मंच पर अचानक प्रकट हुए, "इतिहास अध्ययन का आग्रह" करने हेतु ताकि "राष्ट्रीय चरित्र संरक्षित" हो: शब्द सचमुच गहन उत्साह से भरे। तथापि, वे एक लाभ बताना भूल गए: इतिहास पढ़ने पर पता चलता है कि अनेक बातें "प्राचीन काल में भी थीं"।

श्री यीपिंग ने स्पष्टतः इतिहास का अधिक अध्ययन नहीं किया, इसीलिए विस्मयादिबोधक चिह्नों के अत्यधिक प्रयोग पर दंड का विचार एक "मज़ाक" मानते हैं। उनका आशय प्रतीत होता: ऐसा दंड संसार में अनसुना होगा। तथापि, वे नहीं जानते कि "प्राचीन काल में भी था"।

खंड 2

[भाई]

झांग पैजून (张沛君) ने अपने हाथ पर सुबह दस बजे का समय देखा। कार्यालय में अपना अंश पूरा किया; एक लेख की प्रतिलिपि बनाई, डाक का एक पत्र लिखा, "शिक्षा सुधार" पत्रिका की सामग्री सूची तैयार की और तीन शीर्षक तय किए। फिर भी जिस बात की प्रतीक्षा थी, वह अभी नहीं आई — यह श्री चिन यीतांग (秦益堂) की कहानी थी जो आज तक पहुँचनी चाहिए थी।

उन्होंने उस प्रतीक्षित कहानी के बारे में सोचा। चिन यीतांग ने वादा किया था कि "शिक्षा सुधार" के लिए एक लेख अवश्य लिखेंगे — बच्चों की शिक्षा पर। झांग पैजून प्रत्येक दिन प्रतीक्षा करते; प्रत्येक दिन चिन यीतांग कहते "कल तैयार हो जाएगा"। और यह "कल" अनेक "कल" बन चुका था।

"भाई जिंगफू (靖甫) की तबियत कैसी है?" एक सहकर्मी ने पूछा।

"वैसी ही — ज्वर उतरता नहीं। कल रात फिर तेज़ बुख़ार था।"

"चेचक हो सकती है, सावधान। बच्चों को दूर रखो।"

झांग पैजून ने सिर हिलाया। उनके छोटे भाई झांग जिंगफू (张靖甫) को एक सप्ताह से ज्वर था, और कोई निश्चित निदान नहीं हो रहा था। प्रत्येक चिकित्सक भिन्न कहता। एक ने कहा टाइफ़ॉइड, दूसरे ने चेचक, तीसरे ने साधारण ज्वर। उन्हें चिंता थी — यदि चेचक हो तो बच्चों को ख़तरा। यदि टाइफ़ॉइड, तो गंभीर।

दोपहर को कार्यालय से लौटे। जिंगफू बिस्तर पर पड़े थे, चेहरा लाल, आँखें चमकती। पत्नी ने बताया कि सुबह से तापमान और बढ़ा है। झांग पैजून ने उनके माथे पर हाथ रखा — जलता हुआ।

"भैया," जिंगफू ने कमज़ोर स्वर में कहा, "यदि मैं मर गया, तो मेरी पत्नी और बच्चों का ध्यान रखना।"

"ऐसी बात मत करो। तुम ठीक हो जाओगे।" किंतु भीतर से वे काँप गए।

उस रात झांग पैजून सो न सके। मन में अनेक विचार — यदि जिंगफू मर गया, तो उसकी पत्नी और दो बच्चे। उनका पालन-पोषण, शिक्षा — सब उनके कंधों पर। क्या वे यह बोझ उठा सकते हैं? उनकी अपनी पत्नी, अपने बच्चे — और फिर जिंगफू के परिवार की भी ज़िम्मेदारी? वेतन पहले ही अपर्याप्त।

किंतु तुरंत लज्जा अनुभव हुई — ऐसे समय में आर्थिक गणना! भाई मरणासन्न है और मैं पैसों की सोच रहा हूँ। उन्होंने स्वयं को धिक्कारा।

अगले दिन चिकित्सक आया। परीक्षण के बाद बोला: "चिंता की बात नहीं — साधारण ज्वर है, चेचक नहीं, टाइफ़ॉइड नहीं। कुछ दिन में ठीक हो जाएँगे।"

झांग पैजून ने राहत की साँस ली। चेहरे पर प्रसन्नता आई। तत्काल कार्यालय गए और सबको समाचार सुनाया।

दोपहर बाद जिंगफू का ज्वर वास्तव में उतरने लगा। शाम तक चेहरे का रंग सामान्य। अगले दिन उठकर बैठ गए।

किंतु झांग पैजून के मन में रात की वे गणनाएँ — भाई के न रहने पर बोझ के विचार — एक काँटे की तरह चुभती रहीं। क्या भ्रातृ-प्रेम की पवित्रता में उस रात एक दरार पड़ गई? या यह केवल मानवीय दुर्बलता थी जो संकट के क्षण में प्रकट होती है?

उन्होंने जिंगफू को देखा — स्वस्थ होता, मुस्कुराता, अपने बच्चों के साथ खेलता। और स्वयं भी मुस्कुराए। किंतु वह मुस्कान, पहले जैसी नहीं रही।


(1925.)