Lu Xun Complete Works/zh-hi/Yao
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药 — औषधि (药)
| 中文 (Chinese) | हिंदी (Hindi) |
|---|---|
| नोट / 注意: इस रचना में चीनी में 3944 और हिंदी में 32 अनुच्छेद हैं। पूर्ण पाठ के लिए: 中文 और हिंदी। | |
| 怎么办呢? | == I == |
| 这几天,华西理·彼得略也夫前途失了希望,意气沮丧,好象在大雾里过活一般。 | शरद रात्रि के उत्तरार्ध में, चंद्रमा अस्त हो चुका था और सूर्य अभी नहीं उगा था; केवल गहरे नीले आकाश की एक पट्टी शेष थी। रात्रिचरों के अतिरिक्त, सब कुछ सोया हुआ था। हुआ परिवार के बूढ़े शुआन अचानक उठ बैठे, माचिस जलाई, और चिकने तेल से सना दीपक प्रज्वलित किया। चाय-घर के दो कमरे हल्के नीलाभ प्रकाश से भर गए। |
| 在三月革命终结之春的有一天,母亲威吓似的说道: | "छोटे शुआन के पिता, अभी जा रहे हो?" — एक वृद्ध स्त्री का स्वर। भीतरी कोठरी से खाँसी का दौरा सुनाई दिया। |
| “等着罢,等着罢,魔鬼们。一定还要同志们互相残杀的。” | "हूँ।" बूढ़े शुआन ने सुना, उत्तर दिया, और कुर्ता बंद किया। हाथ बढ़ाया: "दे दो मुझे।" |
| 阿,华西理那时笑得多么厉害呵? | श्रीमती हुआ ने बहुत देर तक तकिये के नीचे ढूँढ़ा और चाँदी के सिक्कों का एक पुड़िया निकालकर बूढ़े शुआन को दिया। उसने काँपते हाथों से लिया, जेब में ठूँसा, और बाहर से दो बार दबाया। फिर लालटेन जलाई, दीपक बुझाया, और भीतरी कमरे में गया। कुछ सरसराहट हुई, फिर खाँसी। बूढ़े शुआन ने शांत होने की प्रतीक्षा की, फिर धीरे से पुकारा: "छोटे शुआन... उठो मत। दुकान? तुम्हारी माँ सँभाल लेगी।" |
| “妈妈,你没有明白……到了现在,那里还会分裂成两面呢?” | जब बेटे से और कुछ न सुनाई दिया, मान लिया कि वह सो गया। दरवाज़ा खोलकर सड़क पर निकला। सड़क घुप्प अंधेरी और सुनसान; केवल एक धूसर-श्वेत राह स्पष्ट दिखती थी। लालटेन का प्रकाश उसके दो पैरों पर पड़ता — एक क़दम के पश्चात् दूसरा। कभी-कभी कुछ कुत्ते मिले, किंतु एक ने भी नहीं भौंका। हवा भीतर से कहीं अधिक ठंडी; तथापि बूढ़े शुआन को ताज़गी अनुभव हुई, मानो अचानक जवान हो गया हो, अलौकिक शक्ति और प्राणदान की क्षमता प्राप्त कर ली हो। उसके क़दम असाधारण ऊँचे और लंबे, सड़क अधिकाधिक स्पष्ट, आकाश अधिकाधिक उज्ज्वल। |
| “对的,我不明白,”母亲说。“母亲早已老发昏,什么也不明白了。只有你们,却聪明的了不得。……但是,看着罢,看着就是了。……” | चलने में पूर्णतः तल्लीन, बूढ़ा शुआन अचानक चौंका: सामने दूर एक तिराहा स्पष्ट दिखा। कुछ क़दम पीछे हटा, बंद दरवाज़े वाली एक दुकान मिली, छज्जे के नीचे दरवाज़े से टिककर खड़ा हो गया। बहुत देर बाद ठंड लगने लगी। |
| 现在母亲的话说中了……大家开始互相杀戮。伊凡进了白军,而旧友的工人——例如亚庚——却加入红军去。合同一致是破裂了。一样精神,一样境遇的兄弟们,都分离了去参加战斗。这是奇怪的不会有的事;这恐怖,还没有力量够来懂得它。…… | "हुंह, बूढ़ा।"
"ख़ुश लग रहा है..." |
| 伊凡去了。 | बूढ़ा शुआन फिर चौंका। आँखें खोलीं तो कई लोग सामने से गुज़र चुके थे। एक ने पीछे मुड़कर देखा — चेहरा स्पष्ट नहीं, किंतु दृष्टि भूखे व्यक्ति की भोजन देखने जैसी। बूढ़े शुआन ने लालटेन देखी: बुझ चुकी। जेब टटोली: कठोर गाँठ वहीं। दोनों ओर देखा — अनेक विचित्र आकृतियाँ, दो-दो, तीन-तीन, भूतों-सी भटकती। |
| 那一天,送了他去的华西理便伫立在街头很长久,听着远远的射击的声音。从地上弥漫开来的雾气,烟似的浓重地爬在地面上,沁入身子里,令人打起寒噤来。工人们集成队伍,肩着枪,腰挂弹药囊,足音响亮地前去了,但都穿着肮脏的破烂的衣服。恐怕是因为免得徒然弄坏了衣服,所以故意穿了顶坏的罢。 | शीघ्र ही कुछ सिपाही दिखे; वर्दी पर आगे-पीछे बड़े सफ़ेद गोले दूर से भी दिखते। पैरों की धमक, और पलक झपकते एक बड़ी भीड़ उमड़ आई, तिराहे के मुँह पर अर्धवृत्त में जम गई। |
| 他觉得这些破落汉的乌合之众,在武装着去破坏市街和文化了。他们大声谈天,任意骂詈。 | बूढ़ा शुआन भी उधर देखने लगा, किंतु केवल पीठों की दीवार; गर्दनें लंबी तनीं, मानो अदृश्य हाथ ने बत्तखों को ऊपर खींचा हो। एक क्षण का सन्नाटा, फिर कोई ध्वनि, भीड़ हिली; गर्जना के साथ पीछे हटी, बिखरती हुई बूढ़े शुआन तक पहुँची। |
| 一个高大的,留着带红色的疏疏的胡须的,两颊陷下的工人,夹在第一团里走过了。华西理认识他。他诨名卢邦提哈,在普列思那都知道,是酒鬼,又会偷,所以到处碰钉子,连工人们一伙里也都轻蔑他。然而现在卢邦提哈肩着枪,傲然走过去了。华西理不禁起了嘲笑之念。 | "ए! एक हाथ में पैसा, दूसरे में माल!" पूर्ण कृष्ण वस्त्रधारी एक पुरुष सामने खड़ा था, आँखें दो छुरियों-सी। एक बड़ा हाथ फैला; दूसरे में एक चमकीला रक्त-लाल मांतोऊ, जिससे लाल बूँदें अभी भी टपक रही थीं। |
| “连这样的都去……” | बूढ़े शुआन ने घबराकर चाँदी के सिक्के निकाले, किंतु वह वस्तु लेने का साहस नहीं हुआ। काले ने अधीर होकर चिल्लाया: "डर काहे का!" बूढ़ा हिचकिचाता रहा; काले ने लालटेन छीनी, काग़ज़ फाड़ा, मांतोऊ लपेटा, थमा दिया। चाँदी के सिक्के झपटे, पलटा, चला गया: "बूढ़ा मूर्ख..." |
| 然而和卢邦提哈一起去的,还有别的工人们——米罗诺夫和锡夫珂夫,他们是诚实的,可靠的,世评很好的正经的人们。米罗诺夫走近了华西理。 | बूढ़े शुआन का संपूर्ण अस्तित्व उस पुड़िये पर केंद्रित हो गया; उसे ऐसे पकड़े था मानो दस पीढ़ियों बाद जन्मा इकलौता पुत्र। इस पुड़िये में छिपे नए जीवन को अपने घर में रोपकर महान सुख काटना चाहता था। सूर्य उगा; सामने चौड़ी सड़क सीधे घर तक। |
| “同志彼得略也夫,为什么不和我们一道儿去的?打布尔乔亚去罢。” | == II == |
| 两手捏着枪,精神旺盛的他,便露出洁白的牙齿,微笑了。 | घर पहुँचा तो दुकान साफ़-सुथरी। केवल छोटा शुआन पिछली पंक्ति में बैठा खा रहा था। माथे पर पसीने की बड़ी बूँदें, कुर्ता रीढ़ से चिपका, कंधों की हड्डियाँ उभरकर उलटा आठ। बेटे को देखकर बूढ़े की भौंहें सिकुड़ गईं। पत्नी रसोई से दौड़ी, आँखें फैलीं, होंठ काँपते: "मिल गया?"
"हाँ।" |
| “不,我不去,”华西理用了无精打采的声音,回答说。 | रसोई में गए, विचार-विमर्श किया। श्रीमती हुआ ने कमल-पत्ता लाकर मेज़ पर फैलाया। बूढ़े शुआन ने रक्त-लाल वस्तु सावधानी से उस पर रखी। चूल्हे पर आग जलाई, भूना; लाल रंग काला पड़ गया, विचित्र गंध कमरे में भरी। |
| “不赞成么?那也没有什么,各有各的意见的。”米罗诺夫调和底地说,又静静地接下去道: | "खा ले! बीमारी दूर हो जाएगी।" |
| “但你可有新的报纸没有?……要不是我们的,不是布尔塞维克的,而是你们的……有么?给我罢。” | छोटे शुआन ने काला मांतोऊ उठाया, देखता रहा। बूढ़े शुआन ने तोड़कर मुँह में डाला। बच्चा चबाता रहा, दोनों माता-पिता एकटक देखते — मानो शरीर में चमत्कार प्रवेश करने वाला हो। |
| 华西理默着从衣袋里掏出昨天的报纸《劳动》来,将这递给了米罗诺夫。 | == III == |
| “多谢多谢。我们的报纸上登着各样的事情,可是真相总是不明白。看不明白……” | दोपहर को ग्राहक आने लगे। मूँछों वाला कांग चाचा: |
| 他接了报章,塞进衣袋里面去。 | "सुना? आज सुबह फाँसी हुई!"
"किसकी?" "शिया यू (夏瑜)! शिया परिवार का बेटा। क्रांतिकारी। कहता था 'यह देश हम सबका है।' आज सुबह..." "जेल में भी पागलपन! जेलर से कहता: 'तू भी ग़ुलाम!' जेलर ने दो थप्पड़ जड़े।" "अच्छा किया!" "और सुनो: सगे चाचा ने ही ख़बर दी। इनाम भी मिला!" |
| 华西理留神看时,他的大而粗糙的手,却在很快地揉掉那报章。 | बूढ़ा शुआन ने सब सुना, कुछ न बोला। भीतर गया — छोटा शुआन अभी भी खाँस रहा था, पहले से और ज़ोर से। |
| “那么,再见。将来真不知道怎样,”他笑着,又露一露雪白的牙齿,追着伙伴跑去了。 | == IV == |
| 工人们接连着过去。他们时时唱歌,高声说话,乱嚷乱叫。好象以为国内战争的结果,是成为自由放肆,无论说了怎样长的难听的话,也就毫无妨碍似的。 | अगले वर्ष, चिंगमिंग (清明) — मृतकों को श्रद्धांजलि का दिन। दो स्त्रियाँ क़ब्रिस्तान में मिलीं। |
| 连十六七岁的学徒工人也去了,而且那人数多,尤其是惹人注目样子。 | श्रीमती हुआ अपने बेटे छोटे शुआन की समाधि पर आई — वह "औषधि" काम नहीं आई। समाधि पर राख, काग़ज़, चावल का कटोरा रखा। |
| 智慧的人们和愚蠢的人们,卢邦提哈之辈和米罗诺夫之辈,都去了。 | थोड़ी दूर पर शिया यू की माँ खड़ी थी। उसके बेटे को — उस क्रांतिकारी को — उसी दिन फाँसी हुई जिस दिन छोटे शुआन के लिए "औषधि" ख़रीदी गई। |
| 战斗正剧烈,枪声不住地在响。 | दो माँएँ, दो समाधियाँ — बीच में एक पगडंडी। |
| 巴理夏耶·普列思那的角角落落上,聚集着许多人。店铺前面,来买粮食的人们排得成串,红军的一伙,便在这些人们里面消失了。 | शिया यू की माँ ने समाधि पर लाल और सफ़ेद फूलों की माला देखी। "कौन रख गया? कोई तो है जो उसे याद करता है..." |
| 华西理回了家。 | एक कौआ उड़ा और दूर किसी पेड़ पर बैठ गया। |
| 母亲到门边来迎接他,但在生气,沉着脸。 | दोनों स्त्रियों ने एक-दूसरे को देखा — और चुपचाप अपनी-अपनी राह चल दीं। |
| “走掉了?”她声气不相接地问。 | (अप्रैल 1919) |
| “走掉了。” | |
| 母亲垂下头,仿佛看着脚边的东西似的,不说什么。 | |
| “哦,”他于是拉长了语尾,默默地驼了背,就这样地离开门边,顿然成为渺小凄凉的模样了。 | |
| “今天又要哭一整天了罢,”华西理叹息着想。“玉亦有瑕。……”[24] | |
| 华尔华拉跑到门边来了。她用了一夜之间便已陷了下去的,发热的,试探一般的眼睛,凝视着华西理的脸。 | |
| “没有看见亚庚么?” | |
| “我没有走开去。单是送一送哥哥……” | |
| “那么,就是,他也去了?” | |
| “去了。……” | |
| 华尔华拉站起身,望一望街道。 | |
| “我就去,”她坚决地说。 | |
| “那里去呀?”华西理问道。 | |
| “寻亚庚去。我将他,拉到家里,剥他的脸皮。要进什么红军。该死的小鬼。害得我夜里睡不着。要发疯……他……他……他的模样总是映在我眼里……” | |
| 华尔华拉呜咽起来,用袖子掩了脸。 | |
| “亚克……亚庚谟式加,可怜的……唉唉,上帝呵……他在那里呢?” | |
| “但你先不要哭罢,该不会有什么事的。”华西理安慰说:“想是歇宿在什么地方了。” | |
| 然而是无力的安慰,连自己也豫感着不祥。 | |
| “寻去罢,”华尔华拉说,拭着眼睛,“库慈玛·华西理支肯同我去的。寻得着的罢。” | |
| 华西理要安慰这机织女工,也答应同她去寻觅了。 | |
| 一个钟头之后,三个人——和不放他出外的老婆吵了嘴,因而不高兴了的耶司排司,机织女工和华西理——便由普列思那往沙陀伐耶街去了。街上虽然还有许多看热闹的人,但比起昨天来,已经减少。抱着或背着包裹,箱箧,以及哭喊的孩子们的无路可走的人们,接连不断地从市街的中央走来。 | |
| 射击的声音,起于尼启德门的附近,勃隆那耶街,德威尔斯克列树路,波瓦尔司卡耶街这些处所,也听到在各处房屋的很远的那边。耶司排司看见到处有兵士和武装了的工人的队伍,便安慰机织女工道: | |
| “一定会寻着的,人不是小针儿……你用不着那么躁急就是。” | |
| 机织女工高兴起来,将精神一提,一瞥耶司排司,拖长了声音道: | |
| “上帝呵,你……” | |
| 她一个一个,遍跑了武装的工人的群,问他们看见红军兵士亚庚·罗卓夫没有。 | |
| “是的,十六岁孩子呵。穿发红的外套,戴灰色帽子的……可有那一位看见么?” | |
| 她睁了含着希望的眼,凝视着他们,然而无论那里,回答是一样的: | |
| “怎么会知道呢?因为人多得很。……” | |
| 有时也有人回问道: | |
| “但你寻他干什么呀?” | |
| 于是机织女工便忍住眼泪,讲述起来: | |
| “是我的儿子呵,我只有这一个,因为真还是一个小娃娃,所以我在担心的,生怕他会送了命。” | |
| “哦!但是,寻是不中用的,一定会回去。” | |
| 没心肝地开玩笑的人,有时也有: | |
| “如果活着,那就回来……” | |
| 机织女工因为不平,流着泪一段一段只是向前走,沉闷了的不中用的耶司排司一面走,一面慌慌张张回顾着周围,华西理跟在那后面。 | |
| 两三处断绝交通区域内,没有放进他们去。 | |
| “喂,那里去?回转!”兵士们向她喊道。“在这里走不得,要给打死的!” | |
| 三个人便都默然站住,等着能够通行的机会。站住的处所,大抵是在街的转角和角落里,这些地方,好象池中涌出的水一般,过路的和看热闹的成了群,默默地站在那里,仿佛不以为然似的看着兵士和红军的人们。 | |
| 站在诺文斯基列树路上时,有人用了尖利的声音,在他们身边大叫道: | |
| “擎起手来!” | |
| 机织女工吃了惊,回头看时,只见一个短小的,麻脸的兵士在叫着: | |
| “统统擎起手来!” | |
| 群众动摇着,擎了手。母亲带着要往什么地方去的一个七岁左右的男孩子,便裂帛似的大哭起来。 | |
| “这里来,同志们!”那兵士横捏着枪,叫道。“这里,这里这里……” | |
| 兵士和红军的人们,便从各方面跑到。 | |
| “怎了?什么?” | |
| 他们一面跑,一面捏好着枪,准备随时可开放。群众悚然,脸色变成青白了。 | |
| “有一个将校在这里,瞧罢!” | |
| 兵士说着,用枪柄指点了混在群众里面的一个人。别的兵士们便将一个穿厚外套,戴灰色帽,苍白色脸的汉子,拖到车路上。耶司排司看时,只见那穿外套的人脸色变成铁青,努着嘴。 | |
| 麻脸的兵士来剥掉他的外套。 | |
| “这是什么?瞧罢!” | |
| 外套底下,是将校用外套,挂着长剑和手枪。 | |
| “唔?他到那里去呀?”兵士愤愤地问道。“先生,您到那里去呢?”将校显出不自然的笑来。 | |
| “慢一慢罢,您不要这么着急。我是回家去的。” | |
| “哼?回家?正要捉拿你们哩,却回家!到克莱谟林去,到白军去的呵。我们知道。拿出证明书来瞧罢。” | |
| 将校取出一张纸片来,那麻子兵士就更加暴躁了: | |
| “除下手枪!交出剑来!” | |
| “且慢,这是什么理由呢?” | |
| “唔,理由?除下来!狗入的!……打死你!”兵士红得象茱萸一样,大喝道。 | |
| 将校变了颜色,神经底地勃然愤激起来,但围在他四面的兵士们,却突然抓住了他的两手。 | |
| “吓,要反抗么?同志们,走开!” | |
| 麻脸的兵士退了一步,同时也用枪抵住了将官的头……在谁——群众,兵士们,连将校自己——都来不及动弹之际,枪声一响,将校便向前一跄踉,又向后一退,即刻倒在地上,抖也不抖,动也不动了。从头上滚滚地流出鲜血来。 | |
| “唉唉,天哪!”群众里有谁发了尖利的声音,大家便如受了指挥一般,一齐拔步跑走了。最前面跑着长条子的耶司排司,在后面还响了几发的枪声。兵士们大声叫喊,想阻止逃走的群众,然而群众还是走。机织女工叹着气,喘着气,和华西理一直跑到了动物园。 | |
| EN: What Is to Be Done? | |
| These past few days, Vasily Petryakov had lost all hope for the future. He was despondent and dispirited, as though living in a thick fog. | |
| On a spring day as the March Revolution drew to its close, his mother said threateningly: "Just you wait, you devils. The comrades will yet slaughter each other." | |
| Ah, how heartily Vasily had laughed then! "Mama, you don't understand... How could there possibly be a split now?" | |
| "That's right, I don't understand," said the mother. "Mother is old and addled, doesn't understand anything anymore. Only you are all so terribly clever... But just wait and see..." | |
| Now mother's words had proved true. Everyone began killing each other. Ivan joined the White Army, while old friends among the workers, Agon for instance, joined the Reds. Unity was shattered. Brothers of the same spirit and circumstances parted ways to fight one another. It was a terror one had not yet the strength to comprehend. | |
| Ivan left. That day, having seen him off, Vasily stood in the street for a long time, listening to the distant sound of gunfire. The fog rising from the ground crept like heavy smoke along the earth, seeping into the body, making one shiver. Workers formed into columns, rifles on shoulders, ammunition pouches at waists, marching away with resounding footsteps, all wearing filthy, ragged clothes, presumably the worst they had, chosen deliberately to avoid ruining anything better. | |
| He felt this ragged mob was arming itself to destroy streets and civilization. They talked loudly and cursed freely. A tall worker with a sparse reddish beard and sunken cheeks marched past in the first detachment: Lubontikha, known throughout Presnaya as a drunkard and thief, despised even among workers. Yet now he carried his rifle proudly. Vasily could not help but think mockingly: "Even types like him are going..." | |
| But alongside Lubontikha were Mironov and Sivkov, honest, reliable, well-respected men. Mironov approached: "Comrade Petryakov, why not come with us? Come fight the bourgeoisie!" Full of vigor, he flashed his white teeth. "No, I'm not going," Vasily answered listlessly. "Don't agree? That's all right, everyone has his own opinion," Mironov said conciliatingly. "But do you have a newspaper? Not ours, but yours?" Vasily silently handed him yesterday's Labor. "Thank you. Our paper, the truth is never clear..." He stuffed it in his pocket, his rough hands quickly crumpling the paper. "Well then, goodbye. Who knows what the future holds." He laughed, flashed his snow-white teeth, and ran after his comrades. | |
| Workers kept passing, singing, shouting, yelling, as if the civil war had brought freedom to say anything without consequence. Even sixteen- and seventeen-year-old apprentices went along. Wise and foolish, Lubontikhas and Mironovs, all went. Fighting raged fiercely, gunfire echoing ceaselessly. | |
| At every corner of Bolshaya Presnaya, crowds gathered. In front of shops, long queues formed for provisions, and Red Army detachments vanished among them. Vasily went home. His mother came to the door, angry-faced. "Has he gone?" "He's gone." She lowered her head, said nothing. Vasily hunched his back and moved away, suddenly looking small and forlorn. "She'll cry all day again," he thought with a sigh. | |
| Varvara rushed to the door, eyes sunken overnight: "Did you see Agon?" "I didn't go far, just saw my brother off..." "So he went too?" "Yes..." She looked at the street: "I'm going to find him. I'll drag him home. That cursed brat keeps me up at night..." She sobbed. "Agonmoshka, poor thing... Oh God, where is he?" | |
| "Don't cry, nothing will have happened," Vasily consoled weakly. An hour later, three of them set off from Presnaya toward Sadovaya Street. The weaver woman ran from group to group: "A sixteen-year-old boy, reddish coat, grey cap, has anyone seen him?" Everywhere the same answer: "How would we know?" She explained through tears: "He's my only son, still a child, I'm afraid he'll lose his life." | |
| At cordoned areas, soldiers shouted: "Turn back! You'll get killed!" On Novinsky Boulevard, suddenly: "Hands up!" A pockmarked soldier discovered an officer in the crowd. Under his coat: uniform, sword, and pistol. "Remove the pistol!" The officer resisted, and in that instant a shot rang out. The officer fell, blood pouring from his head. The crowd fled in panic. The weaver woman ran gasping with Vasily all the way to the Zoological Garden. | |
| DE: Was soll man tun? | |
| In diesen Tagen hatte Wassili Petrjakow alle Hoffnung auf die Zukunft verloren. Er war niedergeschlagen und mutlos, als lebe er in einem dichten Nebel. | |
| An einem Fruehlingstag, als die Maerzrevolution zu Ende ging, sagte seine Mutter drohend: "Wartet nur, ihr Teufel. Die Genossen werden sich noch gegenseitig abschlachten." | |
| Ach, wie sehr hatte Wassili damals gelacht! "Mama, du verstehst das nicht... Wie sollte es jetzt noch zu einer Spaltung kommen?" | |
| "Richtig, ich verstehe nichts", sagte die Mutter. "Die Mutter ist alt und verwirrt, versteht gar nichts mehr. Nur ihr seid so unglaublich klug... Aber wartet nur ab..." | |
| Nun hatte die Mutter recht behalten. Alle begannen, einander zu toeten. Iwan trat der Weissen Armee bei, waehrend alte Freunde unter den Arbeitern, wie Agon, sich der Roten Armee anschlossen. Die Einigkeit war zerbrochen. Brueder gleichen Geistes und gleichen Schicksals trennten sich zum Kampf gegeneinander. Es war ein Schrecken, den zu begreifen man noch nicht die Kraft hatte. | |
| Iwan ging fort. An jenem Tag stand Wassili, nachdem er ihn verabschiedet hatte, lange auf der Strasse und lauschte dem fernen Klang der Schuesse. Der Nebel kroch rauchschwer ueber die Erde und drang froestelnd in den Koerper. Die Arbeiter formierten sich zu Kolonnen, Gewehre geschultert, Munitionstaschen am Guertel, und marschierten mit hallenden Schritten davon, alle in schmutziger, zerlumpter Kleidung, vermutlich absichtlich die schlechtesten Sachen, um die besseren nicht zu ruinieren. | |
| Er empfand diese zerlumpte Bande als bewaffneten Mob, der auszog, Strassen und Kultur zu zerstoeren. Sie redeten laut und fluchten nach Belieben. Ein grosser Arbeiter mit roetlichem, duennem Bart und eingefallenen Wangen marschierte im ersten Trupp vorbei: Lubontika, in der ganzen Presnaja als Trunkenbold und Dieb bekannt, selbst unter Arbeitern verachtet. Doch jetzt trug er sein Gewehr hochmuetig auf der Schulter. Wassili konnte sich eines spoettischen Gedankens nicht erwehren: "Sogar solche gehen mit..." | |
| Aber neben Lubontika gingen auch Mironow und Siwkow, ehrliche, zuverlaessige, geachtete Menschen. Mironow trat heran: "Genosse Petrjakow, warum gehst du nicht mit? Komm, die Bourgeoisie schlagen!" Er zeigte laechelnd seine weissen Zaehne. "Nein, ich gehe nicht", antwortete Wassili lustlos. "Nicht einverstanden? Macht nichts, jeder hat seine eigene Meinung", sagte Mironow versooehnlich. "Aber hast du eine Zeitung? Nicht unsere bolschewistische, sondern eure?" Wassili reichte ihm schweigend die gestrige 'Arbeit'. "Vielen Dank. In unserer Zeitung bleibt die Wahrheit immer unklar..." Er steckte sie ein, seine rauen Haende zerknuellten das Papier. "Auf Wiedersehen. Wer weiss, wie es werden wird." Er lachte und lief den Kameraden nach. | |
| Die Arbeiter zogen weiter, singend, schreiend, laermend, als haette der Buergerkrieg die Freiheit gebracht, alles ungestraft sagen zu duerfen. Selbst sechzehn-, siebzehnjaehrige Lehrlinge marschierten mit. Kluge und Dumme, Lubontikas und Mironows, alle gingen. Die Kaempfe tobten, Schuesse hallten unaufhoerlich. | |
| An den Ecken der Bolschaja Presnaja sammelten sich viele Menschen. Vor den Geschaeften standen Schlangen fuer Lebensmittel, und Trupps der Roten Armee verschwanden in der Menge. Wassili ging heim. Die Mutter kam zur Tuer, aber sie war erzuernt. "Ist er fort?" "Fort." Die Mutter senkte den Kopf und schwieg. Wassili krummte den Ruecken und entfernte sich, ploetzlich klein und klaeglich. "Heute wird sie wohl wieder den ganzen Tag weinen", dachte er seufzend. | |
| Warwara lief zur Tuer, mit Augen, die ueber Nacht eingefallen waren: "Hast du Agon gesehen?" "Ich bin nicht weit gegangen, habe nur den Bruder verabschiedet..." "Also ist er auch gegangen?" "Ja..." Sie blickte auf die Strasse: "Ich gehe ihn suchen. Ich werde ihn nach Hause zerren. Dieser verdammte Bengel laesst mich nachts nicht schlafen..." Sie schluchzte. "Agonmoschka, der Arme... Wo ist er nur?" | |
| "Weine nicht, es wird schon nichts passiert sein", troestete Wassili kraftlos. Eine Stunde spaeter machten sich drei auf den Weg: Jespares, die Weberin und Wassili. Sie liefen von Gruppe zu Gruppe bewaffneter Arbeiter: "Ein sechzehnjaehriger Junge, roetlicher Mantel, graue Muetze, hat ihn jemand gesehen?" Ueberall die gleiche Antwort: "Woher sollen wir das wissen?" Die Weberin erzaehlte unter Traenen: "Es ist mein einziger Sohn, noch ein Kind, ich fuerchte um sein Leben." | |
| An Absperrungen riefen Soldaten: "Umkehren! Hier wird geschossen!" Am Nowinski-Boulevard ploetzlich: "Haende hoch!" Ein pockennarbiger Soldat entdeckte einen Offizier in der Menge. Unter seinem Mantel: Uniform, Degen und Pistole. "Pistole abnehmen!" Der Offizier widersetzte sich, und im selben Augenblick krachte ein Schuss. Der Offizier fiel, Blut stroemte aus seinem Kopf. Die Menge floh panisch. Die Weberin rannte mit Wassili keuchend bis zum Zoologischen Garten. | |
| FR: Que faire ? | |
| Ces derniers jours, Vassili Petriakov avait perdu tout espoir en l'avenir. Il etait abattu et decourage, comme s'il vivait dans un brouillard epais. | |
| Un jour de ce printemps ou la revolution de Mars touchait a sa fin, sa mere dit sur un ton menacant : "Attendez, demons. Les camarades finiront encore par s'entre-tuer." | |
| Ah, comme Vassili avait ri alors ! "Maman, tu ne comprends pas... Comment pourrait-il y avoir une scission maintenant ?" | |
| "C'est vrai, je ne comprends pas, dit la mere. La mere est vieille et radote, ne comprend plus rien. Il n'y a que vous qui etes si intelligents... Mais attendez voir..." | |
| Les paroles de la mere s'etaient averees. Tous commencerent a s'entretuer. Ivan rejoignit l'Armee blanche, tandis que de vieux amis parmi les ouvriers, comme Agon, s'engagerent dans l'Armee rouge. L'unite etait rompue. Des freres de meme esprit se separerent pour combattre les uns contre les autres. C'etait une terreur que l'on n'avait pas la force de comprendre. | |
| Ivan partit. Ce jour-la, Vassili resta longtemps dans la rue, ecoutant le bruit lointain des tirs. Le brouillard rampait sur la terre, penetrant dans le corps et faisant frissonner. Les ouvriers se formaient en colonnes, fusils sur l'epaule, cartouchieres a la ceinture, tous vetus d'habits sales et dechires, sans doute les pires, portes expres pour ne pas abimer les meilleurs. | |
| Il sentait que cette cohue de gueux s'armait pour detruire les rues et la civilisation. Ils parlaient fort et juraient a leur guise. Un grand ouvrier a la barbe roussatre et aux joues creusees passa dans le premier detachement: Loubontikha, connu dans toute la Presnia comme ivrogne et voleur, meprise meme parmi les ouvriers. Mais il portait fierement son fusil. Vassili ne put s'empecher de penser: "Meme ceux-la y vont..." | |
| Mais il y avait aussi Mironov et Sivkov, hommes honnetes et estimes. Mironov s'approcha : "Camarade Petriakov, pourquoi ne viens-tu pas ? Allons combattre la bourgeoisie !" Plein d'energie, il decouvrit ses dents blanches. "Non, je n'y vais pas", repondit Vassili. "Tu n'es pas d'accord ? Chacun a son opinion", dit Mironov. "Mais as-tu un journal recent ? Pas le notre, mais le votre ?" Vassili lui tendit Le Travail de la veille. "Merci. Notre journal, la verite y reste obscure..." Il le fourra dans sa poche, ses mains rugueuses froissant le papier. "Au revoir. On ne sait pas ce que l'avenir reserve." Il rit et courut rejoindre ses camarades. | |
| Les ouvriers defilaient, chantant, criant, braillant, comme si la guerre civile avait apporte la liberte de tout dire. Meme des apprentis de seize, dix-sept ans y allaient. Sages et sots, Loubontikhas et Mironovs, tous partaient. Les combats faisaient rage, les coups de feu retentissaient sans cesse. | |
| A chaque coin de la Bolchaia Presnia, des foules se rassemblaient. Devant les boutiques, des files d'attente, et des detachements de l'Armee rouge se perdaient parmi eux. Vassili rentra. Sa mere vint a la porte, le visage sombre. "Il est parti ?" "Parti." Elle baissa la tete, ne dit rien. Vassili se vouta et s'eloigna, soudain chetif et miserable. "Elle va encore pleurer toute la journee", pensa-t-il en soupirant. | |
| Varvara accourut, les yeux creuses : "As-tu vu Agon ?" "Je n'ai fait qu'accompagner mon frere..." "Il est parti lui aussi ?" "Oui..." Elle regarda la rue : "J'y vais. Je vais le trainer a la maison. Ce maudit gamin m'empeche de dormir..." Elle sanglota. "Agonmochka, le pauvre... Mon Dieu, ou est-il ?" | |
| "Ne pleure pas, il ne lui sera rien arrive", consola faiblement Vassili. Une heure plus tard, trois personnes partirent. La tisserande courait de groupe en groupe : "Un garcon de seize ans, manteau rougeatre, bonnet gris, l'avez-vous vu ?" Partout la meme reponse : "Comment savoir ?" Elle racontait en pleurant : "C'est mon unique fils, encore un enfant, j'ai peur qu'il ne perde la vie." | |
| Aux barrages, les soldats criaient : "Demi-tour ! On tire ici !" Sur le boulevard Novinski, soudain : "Haut les mains !" Un soldat grele decouvrit un officier dans la foule. Sous son pardessus : uniforme, sabre et pistolet. "Enlevez le pistolet !" L'officier resista, et a l'instant un coup de feu retentit. L'officier tomba, le sang coulant de sa tete. La foule s'enfuit dans la panique. La tisserande courut haletante avec Vassili jusqu'au Jardin zoologique. | |
| (M.Malpighi)等精官品之理,而工业如故,交通未良,矿业亦无所进益,惟以机械学之结果,始见极粗之时辰表而已。至十八世纪中叶,英法德意诸国科学之士辈出,质学生学地学之进步,灿然可观,惟所以福社会者若何,则论者尚难于置对。迨酝酿既久,实益乃昭,当同世纪末叶,其效忽大著,举工业之械具资材,植物之滋殖繁养,动物之畜牧改良,无不蒙科学之泽,所谓十九世纪之物质文明,亦即胚胎于是时矣。洪波浩然,精神亦以振,国民风气,因而一新。顾治科学之桀士,则不以是婴心也,如前所言,盖仅以知真理为惟一之仪的,扩脑海之波澜,扫学区之荒秽,因举其身心时力,日探自然之大法而已。尔时之科学名家,无不如是,如侯失勒(J.Herschel)暨拉布拉(S.de Laplace)之于星学,扬俱(Th.Young)暨弗勒那尔(A.Fresnel)之于光学,欧思第德(H.C.Oersted)之于力学,兰麻克(J.de Lamarck)之于生学,迭亢陀耳(A.de Candolle)之于植物学,威那(A.G.Werner)之于矿物学,哈敦(J.Hutton)之于地学,瓦特(J.Watt)之于机械学,其尤著者也。试察所仪,岂在实利哉?然防火灯作矣,汽机出矣,矿术兴矣。而社会之耳目,乃独震惊有此点,日颂当前之结果,于学者独恝然而置之。倒果为因,莫甚于此。欲以求进,殆无异鼓鞭于马勒欤,夫安得如所期?第谓惟科学足以生实业,而实业更无利于科学,人皆慕科学之荣,则又不如是也。社会之事繁,分业之要起,人自不得不有所专,相互为援,于以两进。故实业之蒙益于科学者固多,而科学得实业之助者亦非鲜。今试置身于野人之中,显镜衡机不俟言,即醇酒玻璃,亦不可致,则科学者将何如,仅得运其思理而已。思理孤运,此雅典暨亚历山德府科学之所以中衰也。事多共其悲喜,盖亦诚言也夫。 | |
| 故震他国之强大,栗然自危,兴业振兵之说,日腾于口者,外状固若成然觉矣,按其实则仅眩于当前之物,而未得其真谛。夫欧人之来,最眩人者,固莫前举二事若,然此亦非本柢而特葩叶耳。寻其根源,深无底极,一隅之学,夫何力焉。顾著者于此,亦非谓人必以科学为先务,待其结果之成,始以振兵兴业也,特信进步有序,曼衍有源,虑举国惟枝叶之求,而无一二士寻其本,则有源者日长,逐末者仍立拨耳。居今之世,不与古同,尊实利可,摹方术亦可,而有不为大潮所漂泛,屹然当横流,如古贤人,能播将来之佳果于今兹,移有根之福祉于宗国者,亦不能不要求于社会,且亦当为社会要求者矣。丁达尔不云乎:止属目于外物,或但以政事之感,而误凡事之真者,每谓邦国安危,一系于政治之思想,顾至公之历史,则立证其不然。夫法之有今日也,宁有他因耶?特以科学之长,胜他国耳。千七百九十二年之变,全欧嚣然,争执干戈以攻法国,联军伺其外,内讧兴于中,武库空虚,战士多死,既不能以疲卒当锐兵,而又无粮以济守者,武人抚剑而视太空,政家饮泪而悲来日,束手衔恨,俟天运矣。而时之振作其国人者何人?震怖其外敌者又何人?曰,科学也。其时学者,无不尽其心力,竭其智能,见兵士不足,则补以发明,武具不足,则补以发明,当防守之际,即知有科学者在,而后之战胜必矣。然此犹可曰丁达尔自治科学,因阿所好而立言耳,然证以阿罗戈之所载书,乃益明其不妄,书所记曰,时公会征九十万人,盖御外敌之四集,实非此不胜用尔。而人不如数;众乃大惧。加以武库久空,战备不足,故目前之急,有非人力所能救者。盖时所必要,首为弹药,而原料硝石,曩悉来自印度,至此时遂穷。次为枪炮,而法地产铜不多,必仰俄英印度之给,至今亦绝。三为钢铁,然平日亦取诸外国,制造之术,无知之者。于是行最后之策,集通国学者,开会议之,其最要而最难得者为火药。政府使者皆知不能成,叹曰,硝石安在?声未绝,学者孟耆即起曰,有之。至适当之地,如马厩土仓中,有硝石无量,为汝所梦想不到者。氏禀天才,加以知识,爱国出于至诚,乃睥睨阖室曰,吾能集其土为之,不越三日,火药就矣,于是以至简之法,晓谕国中,老弱妇稚,悉能制造,俄顷间全法国如大工厂也。此外有质学家,以法化分钟铜,用作武器,而炼铁新法亦昉于是时,凡铸刀剑枪械,无不可用国产。柔皮术亦不日竟成,制履之韦,因以不匮。尔时所称异之气球暨空气中之电报,亦均改良扩张,用之争战,前者即摩洛将军乘之探敌阵,得其情实,因制殊胜者也。丁达尔乃论曰,法国尔时,实生二物,曰:科学与爱国。其至有力者,为孟耆(Monge)与加尔诺(Carnot),与有力者,为孚勒克洛,穆勒惠,暨巴列克黎之徒。大业之成,此其枢纽。故科学者,神圣之光,照世界者也,可以遏末流而生感动。时泰,则为人性之光;时危,则由其灵感,生整理者如加尔诺,生强者强于拿破仑之战将云。今试总观前例,本根之要,洞然可知。盖末虽亦能灿烂于一时,而所宅不坚,顷刻可以蕉萃,储能于初,始长久耳。顾犹有不可忽者,为当防社会入于偏,日趋而之一极,精神渐失,则破灭亦随之。盖使举世惟知识之崇,人生必大归于枯寂,如是既久,则美上之感情漓,明敏之思想失,所谓科学,亦同趣于无有矣。故人群所当希冀要求者,不惟奈端已也,亦希诗人如狭斯丕尔(Shakespeare);不惟波尔,亦希画师如洛菲罗(Raphaelo);既有康德,亦必有乐人如培得诃芬(Beethoven);既有达尔文,亦必有文人如嘉来勒(Carlyle)。凡此者,皆所以致人性于全,不使之偏倚,因以见今日之文明者也。嗟夫,彼人文史实之所垂示,固如是已! | |
| (一九○七年作。) | |
| 【文化偏至论】 | |
| 中国既以自尊大昭闻天下,善诋者,或谓之顽固;且将抱守残阙,以底于灭亡。近世人士,稍稍耳新学之语,则亦引以为愧,翻然思变,言非同西方之理弗道,事非合西方之术弗行,掊击旧物,惟恐不力,曰将以革前缪而图富强也。间尝论之:昔者帝轩辕氏之戡蚩尤而定居于华土也,典章文物,于以权舆,有苗裔之繁衍于兹,则更改张皇,益臻美大。其蠢蠢于四方者,胥蕞尔小蛮夷耳,厥种之所创成,无一足为中国法,是故化成发达,咸出于己而无取乎人。降及周秦,西方有希腊罗马起,艺文思理,灿然可观,顾以道路之艰,波涛之恶,交通梗塞,未能择其善者以为师资。洎元明时,虽有一二景教父师,以教理暨历算质学干中国,而其道非盛。故迄于海禁既开,晰人踵至之顷,中国之在天下,见夫四夷之则效上国,革面来宾者有之;或野心怒发,狡焉思逞者有之;若其文化昭明,诚足以相上下者,盖未之有也。屹然出中央而无校雠,则其益自尊大,宝自有而傲睨万物,固人情所宜然,亦非甚背于理极者矣。虽然,惟无校雠故,则宴安日久,苓落以胎,迫拶不来,上征亦辍,使人,使人屯,其极为见善而不思式。有新国林起于西,以其殊异之方术来向,一施吹拂,块然踣傹,人心始自危,而辁才小慧之徒,于是竞言武事。后有学于殊域者,近不知中国之情,远复不察欧美之实,以所拾尘芥,罗列人前,谓钩爪锯牙,为国家首事,又引文明之语,用以自文,征印度波兰,作之前鉴。夫以力角盈绌者,于文野亦何关?远之则罗马之于东西戈尔,迩之则中国之于蒙古女真,此程度之离距为何如,决之不待智者。然其胜负之数,果奈何矣?苟曰是惟往古为然,今则机械其先,非以力取,故胜负所判,即文野之由分也。则曷弗启人智而开发其性灵,使知罟获戈矛,不过以御豺虎,而喋喋誉白人肉攫之心,以为极世界之文明者又何耶?且使如其言矣,而举国犹孱,授之巨兵,奚能胜任,仍有僵死而已矣。嗟夫,夫子盖以习兵事为生,故不根本之图,而仅提所学以干天下;虽兜牟深隐其面,威武若不可陵,而干禄之色,固灼然现于外矣!计其次者,乃复有制造商估立宪国会之说。前二者素见重于中国青年间,纵不主张,治之者亦将不可缕数。盖国若一日存,固足以假力图富强之名,博志士之誉,即有不幸,宗社为墟,而广有金资,大能温饱,即使怙恃既失,或被虐杀如犹太遗黎,然善自退藏,或不至于身受;纵大祸垂及矣,而幸免者非无人,其人又适为己,则能得温饱又如故也。若夫后二,可无论已。中较善者,或诚痛乎外侮迭来,不可终日,自既荒陋,则不得已,姑拾他人之绪余,思鸠大群以抗御,而又飞扬其性,善能攘扰,见异己者兴,必借众以陵寡,托言众治,压制乃尤烈于暴君。此非独于理至悖也,即缘救国是图,不惜以个人为供献,而考索未用,思虑粗疏,茫未识其所以然,辄皈依于众志,盖无殊痼疾之人,去药石摄卫之道弗讲,而乞灵于不知之力,拜祷稽首于祝由之门者哉。至尤下而居多数者,乃无过假是空名,遂其私欲,不顾见诸实事,将事权言议,悉归奔走干进之徒,或至愚屯之富人,否亦善垄断之市侩,特以自长营搰,当列其班,况复掩自利之恶名,以福群之令誉,捷径在目,斯不惮竭蹶以求之耳。呜呼,古之临民者,一独夫也;由今之道,且顿变而为千万无赖之尤,民不堪命矣,于兴国究何与焉。顾若而人者,当其号召张皇,盖蔑弗托近世文明为后盾,有佛戾其说者起,辄谥之曰野人,谓为辱国害群,罪当甚于流放。第不知彼所谓文明者,将已立准则,慎施去取,指善美而可行诸中国之文明乎,抑成事旧章,咸弃捐不顾,独指西方文化而为言乎?物质也,众数也,十九世纪末叶文明之一面或在兹,而论者不以为有当。盖今所成就,无一不绳前时之遗迹,则文明必日有其迁流,又或抗往代之大潮,则文明亦不能无偏至。诚若为今立计,所当稽求既往,相度方来,掊物质而张灵明,任个人而排众数。人既发扬踔厉矣,则邦国亦以兴起。奚事抱枝拾叶,徒金铁国会立宪之云乎?夫势利之念昌狂于中,则是非之辨为之昧,措置张主,辄失其宜,况乎志行污下,将借新文明之名,以大遂其私欲者乎?是故今所谓识时之彦,为按其实,则多数常为盲子,宝赤菽以为玄珠,少数乃为巨奸,垂微饵以冀鲸鲵。即不若是,中心皆中正无瑕玷矣,于是拮据辛苦,展其雄才,渐乃志遂事成,终致彼所谓新文明者,举而纳之中国,而此迁流偏至之物,已陈旧于殊方者,馨香顶礼,吾又何为若是其芒芒哉!是何也?曰物质也,众数也,其道偏至。根史实而见于西方者不得已,横取而施之中国则非也。借曰非乎?请循其本—— | |
| EN: Malpighi and others investigated the principles of fine organs, yet industry remained unchanged, transport undeveloped, and mining made no progress; only through mechanics were the first crude clocks produced. By the mid-eighteenth century, distinguished scientists emerged in England, France, Germany, and Italy. Progress in chemistry, biology, and geology was brilliantly evident, yet what benefit they brought to society was still difficult for commentators to judge. After long fermentation, practical advantages finally became apparent, and toward the end of that same century, their effects suddenly manifested powerfully: industrial equipment and materials, the cultivation and propagation of plants, animal husbandry and improvement, all benefited from the blessings of science. The so-called material civilization of the nineteenth century was germinated at this time. Mighty waves arose, and the spirit was likewise invigorated; the customs of the nation were thereby renewed. Yet the outstanding scientists did not let this trouble their hearts; as stated before, they regarded the knowledge of truth as their sole aim, expanded the waves of their minds, cleared the wastelands of the scholarly world, and devoted body, mind, time, and strength to the daily exploration of nature's great laws. The eminent scientists of that era were all thus: Herschel and Laplace in astronomy, Young and Fresnel in optics, Oersted in mechanics, Lamarck in biology, de Candolle in botany, Werner in mineralogy, Hutton in geology, Watt in mechanical engineering. Examining their aims, practical utility was far from their minds. Yet the safety lamp was invented, the steam engine created, and mining revitalized. But society's attention fixed only on these results, praising immediate outcomes while remaining indifferent to the scholars themselves. Nowhere is the confusion of cause and effect greater than here. | |
| Therefore those who are shaken by the strength of other nations and tremble with fear, who daily speak of promoting industry and building armies, may appear outwardly awakened, yet in truth are merely dazzled by surface phenomena without grasping their true essence. The arrival of Europeans impresses most through two things, but these are not the root — merely flowers and leaves. If one seeks the origins, they are unfathomably deep, and partial study alone accomplishes nothing. Yet the author does not mean that science must always come first and that one must wait for its results before strengthening army and industry. Rather, he believes that progress has its order and development its source. If the entire nation grasps only at branches and leaves without one or two scholars searching for the root, then those with roots will grow daily, while those chasing secondary matters remain where they stand. | |
| Tyndall said: Those who focus only on external things or are misled by political sentiments into believing all matters depend on political thought — impartial history proves otherwise. That France exists today has no other cause than the superiority of its science over other nations. In 1792, when all Europe was in turmoil and attacked France with arms, when coalition forces lurked without and internal strife raged within, when arsenals were empty and many soldiers fallen, when exhausted troops could not face fresh enemies and provisions for defenders were lacking, the military looked at their swords and the sky, politicians wept over the future, helpless and resentful, awaiting fate. But who rallied the nation then? Who terrified the external foes? The answer: science. The scholars of that time deployed all their strength and intellect; where soldiers were lacking, inventions filled the gap; where weapons were insufficient, likewise. As long as scientifically trained men led the defense, future victory was assured. | |
| In conclusion: humanity's spiritual needs require not only a Newton but also a Shakespeare; not only a Bohr but also a Raphael; alongside Kant, a Beethoven; alongside Darwin, a Carlyle. All this serves to develop human nature in its fullness, preventing it from becoming one-sided, thus realizing the civilization of the present. Such is the lesson of human cultural history! | |
| (Written in 1907.) | |
| On Cultural Extremism | |
| China has long been known throughout the world for its arrogance. Sharp-tongued critics called it obstinate and prophesied that it would cling to its remnants until its destruction. People of more recent times, having heard a little of the new learning, felt ashamed and resolutely contemplated change. What did not accord with Western reason was not spoken; what did not follow Western methods was not practiced. They attacked the old things with all their might, saying they wished to eliminate past errors and achieve wealth and strength. | |
| DE: Malpighi und andere erforschten die Prinzipien der feinen Organe, doch die Industrie blieb unveraendert, der Verkehr unentwickelt, der Bergbau ohne Fortschritt; einzig durch die Mechanik wurden erste grobe Uhren hervorgebracht. Zur Mitte des achtzehnten Jahrhunderts traten in England, Frankreich, Deutschland und Italien bedeutende Wissenschaftler hervor. Die Fortschritte in Chemie, Biologie und Geologie waren glaenzend sichtbar, doch welchen Nutzen sie der Gesellschaft brachten, darueber konnten die Kommentatoren noch kaum urteilen. Nach langer Reifung zeigten sich schliesslich die praktischen Vorteile, und gegen Ende desselben Jahrhunderts traten ihre Wirkungen ploetzlich maechtig hervor: Industrielle Geraete und Materialien, die Zucht und Vermehrung von Pflanzen, die Viehzucht und Verbesserung der Tiere, alles profitierte von den Segnungen der Wissenschaft. Die sogenannte materielle Zivilisation des neunzehnten Jahrhunderts wurde hier in ihrem Keim angelegt. Maechtige Wellen erhoben sich, und auch der Geist wurde belebt; die Sitten der Nation erneuerten sich dadurch. Doch die herausragenden Wissenschaftler liessen sich davon nicht in ihrem Herzen beirren; wie bereits gesagt, betrachteten sie einzig die Erkenntnis der Wahrheit als ihr Ziel, erweiterten die Wellen ihres Geistes, raeumten die Oednis der Gelehrtenwelt auf und widmeten Koerper und Geist, Zeit und Kraft der taeglichen Erforschung der grossen Gesetze der Natur. Die bedeutenden Wissenschaftler jener Zeit waren alle so: Herschel und Laplace in der Astronomie, Young und Fresnel in der Optik, Oersted in der Mechanik, Lamarck in der Biologie, de Candolle in der Botanik, Werner in der Mineralogie, Hutton in der Geologie, Watt in der Maschinenbau. Betrachtet man ihre Ziele, lag ihnen der praktische Nutzen fern. Und doch wurde die Sicherheitslampe erfunden, die Dampfmaschine geschaffen, der Bergbau belebt. Die Ohren und Augen der Gesellschaft aber richteten sich nur auf diese Ergebnisse, priesen die unmittelbaren Resultate und blieben gleichgueltig gegenueber den Gelehrten selbst. Ursache und Wirkung zu verwechseln, das geschieht nirgends staerker als hier. | |
| Daher sind jene, die von der Staerke anderer Nationen erschuettert werden und in Furcht geraten, die taeglich von Industriefoerderung und Aufruestung reden, aeusserlich zwar scheinbar erwacht, doch in Wahrheit nur von den vordergrimndigen Dingen geblendet, ohne deren wahres Wesen erfasst zu haben. Die Ankunft der Europaeer beeindruckt am meisten durch zwei Dinge, doch diese sind nicht die Wurzel, sondern nur Blueten und Blaetter. Sucht man nach den Urspruengen, so sind sie unergrimndlich tief, und ein partielles Studium allein vermag nichts. Doch der Verfasser meint hiermit nicht, dass man die Wissenschaft stets voranstellen und auf ihre Ergebnisse warten muesse, bevor man Armee und Industrie staerkt. Er glaubt vielmehr, dass Fortschritt seine Ordnung hat und Entwicklung ihre Quelle. Wenn das ganze Land nur nach Zweigen und Blaettern greift, ohne dass ein oder zwei Gelehrte nach der Wurzel suchen, dann werden jene mit Wurzeln taeglich wachsen, waehrend die Verfolger der Nebensache auf der Stelle treten bleiben. | |
| Tyndall sagte: Wer nur auf aeussere Dinge blickt oder sich von politischen Empfindungen taeuschen laesst und alle Angelegenheiten als von politischem Denken abhaengig betrachtet, dem zeigt die unparteiische Geschichte, dass dies nicht so ist. Dass Frankreich heute besteht, hat keine andere Ursache als die Ueberlegenheit seiner Wissenschaft ueber andere Nationen. Im Jahre 1792, als ganz Europa in Aufruhr geriet und mit Waffen Frankreich angriff, als Koalitionstruppen von aussen lauerten und innere Zwietracht herrschte, die Waffenkammern leer und viele Soldaten gefallen waren, als man mit erschoepften Truppen nicht gegen frische Feinde bestehen konnte und es an Vorraeten fuer die Verteidiger mangelte, da blickten die Militaers auf ihre Schwerter und zum Himmel, die Politiker vergossen Traenen ueber die Zukunft, hilflos und voller Groll warteten sie auf das Schicksal. Doch wer richtete damals das Volk auf? Wer erschreckte die aeusseren Feinde? Die Antwort lautet: die Wissenschaft. Die Gelehrten jener Zeit setzten alle ihre Kraefte und ihren Verstand ein; wo Soldaten fehlten, wurde durch Erfindungen ergaenzt, wo Waffen fehlten, ebenso. Solange wissenschaftlich Gebildete die Verteidigung fuehrten, war der kuenftige Sieg gewiss. | |
| Zum Abschluss: Die geistigen Beduerfnisse der Menschheit verlangen nicht nur einen Newton, sondern auch einen Shakespeare; nicht nur einen Bohr, sondern auch einen Raffael; neben Kant auch einen Beethoven; neben Darwin auch einen Carlyle. All dies dient dazu, die menschliche Natur zur Gaenze zu entfalten, sie nicht einseitig werden zu lassen, und so die Zivilisation der Gegenwart zu verwirklichen. So lehrt uns die Geschichte der menschlichen Kultur! | |
| (Geschrieben 1907.) | |
| Ueber kulturelle Einseitigkeiten | |
| China ist seit jeher in der ganzen Welt fuer seinen Hochmut bekannt. Scharfzuengige Kritiker nannten es starrsinnig und prophezeiten, es werde an seinen Ueberresten festhalten bis zum Untergang. Menschen der neueren Zeit, die ein wenig von den neuen Lehren gehoert hatten, schaemten sich dessen und dachten entschlossen an Veraenderung. Was nicht der westlichen Vernunft entsprach, wurde nicht gesagt; was nicht der westlichen Methode folgte, wurde nicht getan. Sie griffen die alten Dinge an, mit aller Kraft, und sagten, sie wollten die alten Irrtumer beseitigen und Reichtum und Staerke erreichen. | |
| FR: Malpighi et d'autres explorerent les principes des organes fins, mais l'industrie resta inchangee, les transports peu developpes, et les mines ne firent aucun progres; seule la mecanique produisit les premieres horloges rudimentaires. Au milieu du dix-huitieme siecle, d'eminents savants apparurent en Angleterre, en France, en Allemagne et en Italie. Les progres en chimie, en biologie et en geologie etaient remarquables, mais quel bienfait ils apportaient a la societe, les commentateurs avaient encore peine a le dire. Apres une longue maturation, les avantages pratiques se manifesterent enfin, et vers la fin du meme siecle, leurs effets se revelerent soudain avec puissance : equipements et materiaux industriels, culture et multiplication des plantes, elevage et amelioration des animaux, tout profita des bienfaits de la science. La pretendue civilisation materielle du dix-neuvieme siecle fut ainsi concue en germe. De puissantes vagues se leverent, et l'esprit fut egalement vivifie ; les moeurs de la nation s'en trouverent renouvelees. Mais les savants eminents ne s'en laissaient pas troubler ; comme il a ete dit, ils ne consideraient que la connaissance de la verite comme leur unique but, elargissaient les horizons de leur esprit, deblayaient les friches du monde savant, et consacraient corps et ame, temps et force a l'exploration quotidienne des grandes lois de la nature. Les grands savants de cette epoque etaient tous ainsi : Herschel et Laplace en astronomie, Young et Fresnel en optique, Oersted en mecanique, Lamarck en biologie, de Candolle en botanique, Werner en mineralogie, Hutton en geologie, Watt en construction mecanique. Si l'on examine leurs buts, l'utilite pratique etait loin de leurs preoccupations. Et pourtant la lampe de surete fut inventee, la machine a vapeur creee, les mines revitalisees. Mais l'attention de la societe se fixa uniquement sur ces resultats, louant les effets immediats tout en restant indifferente aux savants eux-memes. Nulle part la confusion entre cause et effet n'est plus grande. | |
| C'est pourquoi ceux qui sont ebranles par la puissance d'autres nations et tremblent de peur, qui parlent quotidiennement de promouvoir l'industrie et de renforcer l'armee, peuvent sembler exterieurement eveilles, mais en verite ne sont qu'eblouis par les phenomenes de surface sans en saisir l'essence veritable. L'arrivee des Europeens impressionne surtout par deux choses, mais celles-ci ne sont pas la racine — seulement des fleurs et des feuilles. Si l'on cherche les origines, elles sont d'une profondeur insondable, et une etude partielle ne saurait suffire. | |
| Tyndall l'a dit : ceux qui ne regardent que les choses exterieures ou se laissent induire en erreur par les sentiments politiques, croyant que tout depend de la pensee politique — l'histoire impartiale prouve le contraire. Que la France existe aujourd'hui n'a pas d'autre cause que la superiorite de sa science sur les autres nations. En 1792, quand toute l'Europe en tumulte attaquait la France, quand les armees coalisees guettaient au-dehors et que la discorde regnait a l'interieur, quand les arsenaux etaient vides et les soldats tombes nombreux, quand les troupes epuisees ne pouvaient affronter des ennemis frais et que les provisions manquaient pour les defenseurs, qui alors releva la nation ? Qui effraya les ennemis exterieurs ? La reponse : la science. Les savants de cette epoque deployerent toutes leurs forces et leur intelligence ; ou les soldats manquaient, les inventions comblaient le vide ; ou les armes etaient insuffisantes, de meme. | |
| En conclusion : les besoins spirituels de l'humanite exigent non seulement un Newton mais aussi un Shakespeare ; non seulement un Bohr mais aussi un Raphael ; aux cotes de Kant, un Beethoven ; aux cotes de Darwin, un Carlyle. Tout cela sert a developper pleinement la nature humaine, a l'empecher de devenir unilaterale, et ainsi a realiser la civilisation du present. Tel est l'enseignement de l'histoire culturelle humaine ! | |
| (Ecrit en 1907.) | |
| Sur l'extremisme culturel | |
| La Chine est depuis longtemps connue dans le monde entier pour son arrogance. Des critiques acerbes la qualifiaient d'obstinee et prophetisaient qu'elle s'accrocherait a ses vestiges jusqu'a sa destruction. Les gens des temps recents, ayant entendu un peu des nouvelles doctrines, en eurent honte et penserent resolument au changement. Ce qui ne correspondait pas a la raison occidentale n'etait pas dit ; ce qui ne suivait pas les methodes occidentales n'etait pas pratique. Ils attaquaient les choses anciennes de toutes leurs forces, disant vouloir eliminer les erreurs passees et atteindre richesse et puissance. | |
| 夫世纪之元,肇于耶稣出世,历年既百,是为一期,大故若兴,斯即此世纪所有事,盖从历来之旧贯,而假是为区分,无奥义也。诚以人事连绵,深有本柢,如流水之必自原泉,卉木之茁于根茇,倏忽隐见,理之必无。故苟为寻绎其条贯本末,大都蝉联而不可离,若所谓某世纪文明之特色何在者,特举荦荦大者而为言耳。按之史实,乃如罗马统一欧洲以来,始生大洲通有之历史;已而教皇以其权力,制御全欧,使列国靡然受圈,如同社会,疆域之判,等于一区;益以梏亡人心,思想之自由几绝,聪明英特之士,虽摘发新理,怀抱新见,而束于教令,胥缄口结舌而不敢言。虽然,民如大波,受沮益浩,则于是始思脱宗教之系缚,英德二国,不平者多,法皇宫庭,实为怨府,又以居于意也,乃并意大利人而疾之。林林之民,咸致同情于不平者,凡有能阻泥教旨,抗拒法皇,无间是非,辄与赞和。时则有路德(M.Luther)者起于德,谓宗教根元,在乎信仰,制度戒法,悉其荣华,力击旧教而仆之。自所创建,在废弃阶级,黜法皇僧正诸号,而代以牧师,职宣神命,置身社会,弗殊常人;仪式祷祈,亦简其法。至精神所注,则在牧师地位,无所胜于平人也。转轮既始,烈栗遍于欧洲,受其改革者,盖非独宗教而已,且波及于其他人事,如邦国离合,争战原因,后兹大变,多基于是。加以束缚弛落,思索自由,社会蔑不有新色,则有尔后超形气学上之发见,与形气学上之发明。以是胚胎,又作新事:发隐地也,善机械也,展学艺而拓贸迁也,非去羁勒而纵人心,不有此也。顾世事之常,有动无定,宗教之改革已,自必益进而求政治之更张。溯厥由来,则以往者颠覆法皇,一假君主之权力,变革既毕,其力乃张,以一意孤临万民,在下者不能加之抑制,日夕孳孳,惟开拓封域是务,驱民纳诸水火,绝无所动于心:生计绌,人力耗矣。而物反于穷,民意遂动,革命于是见于英,继起于美,复次则大起于法朗西,扫荡门第,平一尊卑,政治之权,主以百姓,平等自由之念,社会民主之思,弥漫于人心。流风至今,则凡社会政治经济上一切权利,义必悉公诸众人,而风俗习惯道德宗教趣味好尚言语暨其他为作,俱欲去上下贤不肖之闲,以大归乎无差别。同是者是,独是者非,以多数临天下而暴独特者,实十九世纪大潮之一派,且曼衍入今而未有既者也。更举其他,则物质文明之进步是已。当旧教盛时,威力绝世,学者有见,大率默然,其有毅然表白于众者,每每获囚戮之祸。递教力堕地,思想自由,凡百学术之事,勃焉兴起,学理为用,实益遂生,故至十九世纪,而物质文明之盛,直傲睨前此二千余年之业绩。数其著者,乃有棉铁石炭之属,产生倍旧,应用多方,施之战斗制造交通,无不功越于往日;为汽为电,咸听指挥,世界之情状顿更,人民之事业益利。久食其赐,信乃弥坚,渐而奉为圭臬,视若一切存在之本根,且将以之范围精神界所有事,现实生活,胶不可移,惟此是尊,惟此是尚,此又十九世纪大潮之一派,且曼衍入今而未有既者也。虽然,教权庞大,则覆之假手于帝王,比大权尽集一人,则又颠之以众庶。理若极于众庶矣,而众庶果足以极是非之端也耶?宴安逾法,则矫之以教宗,递教宗淫用其权威,则又掊之以质力。事若尽于物质矣,而物质果足尽人生之本也耶?平意思之,必不然矣。然而大势如是者,盖如前言,文明无不根旧迹而演来,亦以矫往事而生偏至,缘督校量,其颇灼然,犹孑与躄焉耳。特其见于欧洲也,为不得已,且亦不可去,去孑与躄,斯失孑与躄之德,而留者为空无。不安受宝重之者奈何?顾横被之不相系之中国而膜拜之,又宁见其有当也?明者微睇,察逾众凡,大士哲人,乃蚤识其弊而生愤叹,此十九世纪末叶思潮之所以变矣。德人尼佉(Fr.Nietzsche)氏,则假察罗图斯德罗(Zarathustra)之言曰,吾行太远,孑然失其侣,返而观夫今之世,文明之邦国矣,斑斓之社会矣。特其为社会也,无确固之崇信;众庶之于知识也,无作始之性质。邦国如是,奚能淹留?吾见放于父母之邦矣!聊可望者,独苗裔耳。此其深思遐瞩,见近世文明之伪与偏,又无望于今之人,不得已而念来叶者也。 | |
| 然则十九世纪末思想之为变也,其原安在,其实若何,其力之及于将来也又奚若?曰言其本质,即以矫十九世纪文明而起者耳。盖五十年来,人智弥进,渐乃返观前此,得其通弊,察其黮暗,于是浡焉兴作,会为大潮,以反动破坏充其精神,以获新生为其希望,专向旧有之文明,而加之掊击扫荡焉。全欧人士,为之栗然震惊者有之,芒然自失者有之,其力之烈,盖深入于人之灵府矣。然其根柢,乃远在十九世纪初叶神思一派;递夫后叶,受感化于其时现实之精神,已而更立新形,起以抗前时之现实,即所谓神思宗之至新者也。若夫影响,则眇眇来世,臆测殊难,特知此派之兴,决非突见而靡人心,亦不至突灭而归乌有,据地极固,函义甚深。以是为二十世纪文化始基,虽云早计,然其为将来新思想之朕兆,亦新生活之先驱,则按诸史实所昭垂,可不俟繁言而解者已。顾新者虽作,旧亦未僵,方遍满欧洲,冥通其地人民之呼吸,余力流衍,乃扰远东,使中国之人,由旧梦而入于新梦,冲决嚣叫,状犹狂酲。夫方贱古尊新,而所得既非新,又至偏而至伪,且复横决,浩乎难收,则一国之悲哀亦大矣。今为此篇,非云已尽西方最近思想之全,亦不为中国将来立则,惟疾其已甚,施之抨弹,犹神思新宗之意焉耳。故所述止于二事:曰非物质,曰重个人。 | |
| 个人一语,入中国未三四年,号称识时之士,多引以为大诟,苟被其谥,与民贼同。意者未遑深知明察,而迷误为害人利己之义也欤?夷考其实,至不然矣。而十九世纪末之重个人,则吊诡殊恒,尤不能与往者比论。试案尔时人性,莫不绝异其前,入于自识,趣于我执,刚愎主己,于庸俗无所顾忌。如诗歌说部之所记述,每以骄蹇不逊者为全局之主人。此非操觚之士,独凭神思构架而然也,社会思潮,先发其朕,则移之载籍而已矣。盖自法朗西大革命以来,平等自由,为凡事首,继而普通教育及国民教育,无不基是以遍施。久浴文化,则渐悟人类之尊严;既知自我,则顿识个性之价值;加以往之习惯坠地,崇信荡摇,则其自觉之精神,自一转而之极端之主我。且社会民主之倾向,势亦大张,凡个人者,即社会之一分子,夷隆实陷,是为指归,使天下人人归于一致,社会之内,荡无高卑。此其为理想诚美矣,顾于个人殊特之性,视之蔑如,既不加之别分,且欲致之灭绝。更举黮暗,则流弊所至,将使文化之纯粹者,精神益趋于固陋,颓波日逝,纤屑靡存焉。盖所谓平社会者,大都夷峻而不湮卑,若信至程度大同,必在前此进步水平以下。况人群之内,明哲非多,伧俗横行,浩不可御,风潮剥蚀,全体以沦于凡庸。非超越尘埃,解脱人事,或愚屯罔识,惟众是从者,其能缄口而无言乎?物反于极,则先觉善斗之士出矣:德人斯契纳尔(M.Stirner)乃先以极端之个人主义现于世。谓真之进步,在于己之足下。人必发挥自性,而脱观念世界之执持。惟此自性,即造物主。惟有此我,本属自由;既本有矣,而更外求也,是曰矛盾。自由之得以力,而力即在乎个人,亦即资财,亦即权利。故苟有外力来被,则无间出于寡人,或出于众庶,皆专制也。国家谓吾当与国民合其意志,亦一专制也。众意表现为法律,吾即受其束缚,虽曰为我之舆台,顾同是舆台耳。去之奈何?曰:在绝义务。义务废绝,而法律与偕亡矣。意盖谓凡一个人,其思想行为,必以己为中枢,亦以己为终极:即立我性为绝对之自由者也。至勖宾霍尔(A.Schopenhauer),则自既以兀傲刚愎有名,言行奇觚,为世希有;又见夫盲瞽鄙倍之众,充塞两间,乃视之与至劣之动物并等,愈益主我扬己而尊天才也。至丹麦哲人契开迦尔(S.Kierkegaard)则愤发疾呼,谓惟发挥个性,为至高之道德,而顾瞻他事,胥无益焉。其后有显理伊勃生(Henrik Ibsen)见于文界,瑰才卓识,以契开迦尔之诠释者称。其所著书,往往反社会民主之倾向,精力旁注,则无间习惯信仰道德,苟有拘于虚而偏至者,无不加之抵排。更睹近世人生,每托平等之名,实乃愈趋于恶浊,庸凡凉薄,日益以深,顽愚之道行,伪诈之势逞,而气宇品性卓尔不群之士,乃反穷于草莽,辱于泥涂,个性之尊严,人类之价值,将咸归于无有,则常为慷慨激昂而不能自已也。如其《民敌》一书,谓有人宝守真理,不阿世媚俗,而不见容于人群,狡狯之徒,乃巍然独为众愚领袖,借多陵寡,植党自私,于是战斗以兴,而其书亦止:社会之象,宛然具于是焉。若夫尼佉,斯个人主义之至雄桀者矣,希望所寄,惟在大士天才;而以愚民为本位,则恶之不殊蛇蝎。意盖谓治任多数,则社会元气,一旦可隳,不若用庸众为牺牲,以冀一二天才之出世,递天才出而社会之活动亦以萌,即所谓超人之说,尝震惊欧洲之思想界者也。由是观之,彼之讴歌众数,奉若神明者,盖仅见光明一端,他未遍知,因加赞颂,使反而观诸黑暗,当立悟其不然矣。一梭格拉第也,而众希腊人鸩之,一耶稣基督也,而众犹太人磔之,后世论者,孰不云缪,顾其时则从众志耳。设留今之众志,移诸载籍,以俟评骘于来哲,则其是非倒置,或正如今人之视往古,未可知也。故多数相朋,而仁义之途,是非之端,樊然淆乱;惟常言是解,于奥义也漠然。常言奥义,孰近正矣?是故布鲁多既杀该撒,昭告市人,其词秩然有条,名分大义,炳如观火;而众之受感,乃不如安多尼指血衣之数言。于是方群推为爱国之伟人,忽见逐于域外。夫誉之者众数也,逐之者又众数也,一瞬息中,变易反复,其无特操不俟言;即观现象,已足知不祥之消息矣。故是非不可公于众,公之则果不诚;政事不可公于众,公之则治不郅。惟超人出,世乃太平。苟不能然,则在英哲。嗟夫,彼持无政府主义者,其颠覆满盈,铲除阶级,亦已至矣,而建说创业诸雄,大都以导师自命。夫一导众从,智愚之别即在斯。与其抑英哲以就凡庸,曷若置众人而希英哲?则多数之说,缪不中经,个性之尊,所当张大,盖揆之是非利害,已不待繁言深虑而可知矣。虽然,此亦赖夫勇猛无畏之人,独立自强,去离尘垢,排舆言而弗沦于俗囿者也。 | |
| EN: The beginning of a century is reckoned from the birth of Jesus; after a hundred years, one period is formed. Great events that arise belong to that century. This follows long-established custom and serves as a division, without deeper meaning. For human affairs are continuous and deeply rooted, like flowing water that must spring from its source, or plants that sprout from their roots. Sudden appearance and disappearance without reason cannot occur. If one traces the connections from beginning to end, they are mostly inseparably linked. What is called the characteristic of a century's civilization is merely the highlighting of the most prominent points. | |
| Examining historical facts, a shared history of the continent emerged only after Rome unified Europe. Then the Pope, wielding his power, controlled all of Europe, subjugating nations as if they were one society, and nearly extinguishing freedom of thought. Brilliant and outstanding minds who discovered new theories and harbored new ideas were silenced by church decrees. Yet the people, like a great wave, grew stronger the more they were suppressed, and began to seek freedom from the bonds of religion. In England and Germany, many were discontented. Martin Luther arose in Germany and declared that the foundation of religion lay in faith, while ceremonies and laws were mere outward splendor. He attacked the old church and brought it down. What he created was the abolition of hierarchy, replacing Pope and bishops with pastors who stood among society, no different from common people. | |
| The wheel began to turn, and tremors spread across all of Europe. The reform affected not only religion but also other human affairs: the separation and union of nations, the causes of wars, and great upheavals that followed. With the loosening of bonds and freedom of thought, society everywhere took on a new aspect. Thus came metaphysical discoveries and physical inventions. After religious reformation, the inevitable pursuit of political change followed. | |
| Revolution appeared first in England, then in America, and finally erupted on a grand scale in France, sweeping away class distinctions and leveling ranks. Political power was entrusted to the people, and the ideas of equality, liberty, and social democracy permeated hearts and minds. This current continues to this day: all rights in society, politics, and economy shall belong to the public, and customs, habits, morality, religion, taste, and language shall eliminate the differences between high and low, wise and foolish, to achieve complete equality. What is the same is right; what is unique is wrong. That the majority rules the world and suppresses the unique — this is one of the great currents of the nineteenth century, continuing into the present. | |
| Alongside this stands the progress of material civilization. When the old religion was powerful, scholars mostly had to remain silent. After the fall of church power and the liberation of thought, all sciences flourished. By the nineteenth century, the achievements of material civilization proudly surpassed the accomplishments of the preceding two thousand years. Cotton, iron, stone, and coal were produced in manifold quantities; steam and electricity obeyed command. The state of the world changed fundamentally, and people's enterprises became more profitable. After long enjoying these blessings, belief in them grew even firmer, and they came to be regarded as the foundation of all existence. | |
| Yet the German thinker Nietzsche, speaking through Zarathustra, proclaimed: I have gone too far, alone and without companions. Looking back upon the world of today, I see civilized nations and colorful societies. Yet this society has no firm belief; the masses possess no creative nature in regard to knowledge. Can such a nation endure? What can be hoped for are only the descendants. This is his deep foresight, his recognition of the falsity and one-sidedness of modern civilization; finding no hope in the people of the present, he was compelled to think of the future. | |
| (Written in 1907.) | |
| DE: Der Beginn eines Jahrhunderts faellt mit der Geburt Jesu zusammen; nach hundert Jahren bildet sich eine Periode. Grosse Ereignisse, die sich ergeben, gehoeren diesem Jahrhundert an. Dies folgt der alten Gewohnheit und dient als Einteilung, ohne tiefere Bedeutung. Denn die menschlichen Angelegenheiten sind ununterbrochen miteinander verwoben, tief verwurzelt wie fliessendes Wasser, das notwendig aus seiner Quelle entspringt, oder wie Pflanzen, die aus ihren Wurzeln spriessen. Ploetzliches Erscheinen und Verschwinden ohne Grund kann es nicht geben. Sucht man daher den Zusammenhang von Anfang bis Ende, so sind sie meist untrennbar verkettet. Was man als Besonderheit der Zivilisation eines Jahrhunderts bezeichnet, ist lediglich die Hervorhebung der herausragendsten Punkte. | |
| Betrachtet man die historischen Tatsachen, so entstand seit der Vereinigung Europas durch Rom eine gemeinsame Geschichte des Kontinents. Daraufhin beherrschte der Papst mit seiner Macht ganz Europa, unterwarf die Nationen wie eine einzige Gesellschaft und loeschte die Gedankenfreiheit beinahe aus. Kluge und herausragende Geister, die neue Theorien entdeckten und neue Ideen hegten, wurden durch Kirchengebote zum Schweigen gebracht. Doch das Volk, wie eine grosse Welle, wuchs, je mehr es zurueckgehalten wurde, und begann, sich von den Fesseln der Religion zu befreien. In England und Deutschland gab es viele Unzufriedene. Martin Luther erhob sich in Deutschland und erklaerte, die Grundlage der Religion sei der Glaube, waehrend Zeremonien und Gesetze nur aeusserer Glanz seien. Er bekaeampfte die alte Kirche und stuerzte sie. Was er schuf, war die Abschaffung der Hierarchie, die Ersetzung von Papst und Bischofen durch Pastoren, die inmitten der Gesellschaft standen, nicht verschieden vom gemeinen Volk. | |
| Das Rad begann sich zu drehen, ein Beben ging durch ganz Europa. Die Reform betraf nicht nur die Religion, sondern auch andere menschliche Angelegenheiten wie die Trennung und Vereinigung von Nationen, die Ursachen von Kriegen, und grosse Umwaelzungen, die darauf folgten. Mit dem Lockern der Fesseln und der Freiheit des Denkens nahm die Gesellschaft ueberall ein neues Gesicht an. So kam es zu metaphysischen Entdeckungen und physischen Erfindungen. Nach der Reformation der Religion strebte man zwangslaeuBig auch nach politischer Veraenderung. | |
| So zeigte sich die Revolution zuerst in England, dann in Amerika, und schliesslich brach sie in grossem Masse in Frankreich aus, fegt die Standesunterschiede hinweg und ebnete die Rangordnung ein. Die politische Macht wurde dem Volk uebertragen, und die Ideen von Gleichheit, Freiheit, Sozialdemokratie durchdrangen die Herzen der Menschen. Dieser Strom haelt bis heute an: alle Rechte in Gesellschaft, Politik und Wirtschaft sollen der Oeffentlichkeit gehoeren, und Sitten, Gewohnheiten, Moral, Religion, Geschmack und Sprache sollen die Unterschiede zwischen Hoch und Niedrig, Klug und Dumm beseitigen, um zu voelliger Gleichheit zu gelangen. Was gleich ist, gilt als richtig; was einzigartig ist, als falsch. Dass die Mehrheit die Welt beherrscht und das Einzigartige unterdrueckt, dies ist einer der grossen Stroeme des neunzehnten Jahrhunderts, der bis heute fortdauert. | |
| Daneben steht der Fortschritt der materiellen Zivilisation. Als die alte Religion maechtig war, mussten Gelehrte meist schweigen. Nach dem Fall der Kirchenmacht und der Befreiung des Denkens bluehten alle Wissenschaften auf. Bis zum neunzehnten Jahrhundert uebertrafen die Errungenschaften der materiellen Zivilisation stolz die Leistungen der vorangegangenen zweitausend Jahre. Baumwolle, Eisen, Stein und Kohle wurden in vielfacher Menge produziert, Dampf und Elektrizitaet gehorchten dem Befehl. Die Lage der Welt aenderte sich grundlegend, das Geschaeft der Menschen wurde vorteilhafter. Nachdem man lange diese Segnungen genossen hatte, wurde der Glaube daran noch fester, und man betrachtete dies als Grundlage aller Existenz. | |
| Doch der deutsche Denker Nietzsche liess durch die Worte Zarathustras verlauten: Ich bin zu weit gegangen, einsam und ohne Gefaehrten. Blicke ich auf die heutige Welt zurueck, so sehe ich zivilisierte Nationen und bunte Gesellschaften. Doch diese Gesellschaft hat keinen festen Glauben; die Massen haben in Bezug auf Wissen keine schoepferische Natur. Kann eine solche Nation Bestand haben? Was sich hoffen laesst, sind einzig die Nachkommen. Dies ist sein tiefes Vorausschauen, sein Erkennen der Falschheit und Einseitigkeit der modernen Zivilisation, und da er keine Hoffnung auf die Menschen der Gegenwart setzte, musste er unweigerlich an die Zukunft denken. | |
| (Geschrieben 1907.) | |
| FR: Le debut d'un siecle se compte a partir de la naissance de Jesus ; apres cent ans, une periode se forme. Les grands evenements qui surviennent appartiennent a ce siecle. Cela suit une coutume ancienne et sert de division, sans signification profonde. Car les affaires humaines sont continues et profondement enracinees, comme l'eau courante qui doit jaillir de sa source, ou comme les plantes qui poussent de leurs racines. L'apparition et la disparition soudaines sans raison ne sauraient exister. Si l'on retrace les connexions du debut a la fin, elles sont le plus souvent inseparablement liees. Ce que l'on appelle la caracteristique de la civilisation d'un siecle n'est que la mise en avant des points les plus saillants. | |
| En examinant les faits historiques, une histoire commune du continent n'est apparue qu'apres l'unification de l'Europe par Rome. Puis le pape, exercant son pouvoir, controla toute l'Europe, soumettant les nations comme si elles formaient une seule societe, et eteignant presque la liberte de pensee. Des esprits brillants et remarquables qui decouvraient de nouvelles theories et nourrissaient de nouvelles idees furent reduits au silence par les decrets de l'Eglise. Mais le peuple, comme une grande vague, devint plus fort a mesure qu'il etait reprime, et commenca a chercher la liberte des liens de la religion. En Angleterre et en Allemagne, beaucoup etaient mecontents. Martin Luther se leva en Allemagne et declara que le fondement de la religion residait dans la foi, tandis que les ceremonies et les lois n'etaient que splendeur exterieure. Il attaqua l'ancienne Eglise et la renversa. Ce qu'il crea fut l'abolition de la hierarchie, remplacant pape et eveques par des pasteurs qui se tenaient au sein de la societe, pas differents du commun des mortels. | |
| La roue se mit a tourner, et des tremblements se repandirent a travers toute l'Europe. La reforme toucha non seulement la religion mais aussi d'autres affaires humaines : la separation et l'union des nations, les causes des guerres, et de grands bouleversements qui suivirent. Avec le relachement des liens et la liberte de pensee, la societe prit partout un visage nouveau. Ainsi vinrent les decouvertes metaphysiques et les inventions physiques. Apres la reformation religieuse, la poursuite inevitable du changement politique suivit. | |
| La revolution apparut d'abord en Angleterre, puis en Amerique, et finalement eclata a grande echelle en France, balayant les distinctions de classe et nivelant les rangs. Le pouvoir politique fut confie au peuple, et les idees d'egalite, de liberte et de democratie sociale impregnerent les coeurs et les esprits. Ce courant perdure jusqu'a aujourd'hui : tous les droits en societe, en politique et en economie doivent appartenir au public, et les coutumes, habitudes, morale, religion, gout et langue doivent eliminer les differences entre le haut et le bas, le sage et le sot, pour atteindre l'egalite complete. Ce qui est semblable est juste ; ce qui est unique est faux. Que la majorite gouverne le monde et opprime l'unique, voila l'un des grands courants du dix-neuvieme siecle, qui perdure jusqu'a nos jours. | |
| A cote de cela se tient le progres de la civilisation materielle. Quand l'ancienne religion etait puissante, les savants devaient pour la plupart garder le silence. Apres la chute du pouvoir ecclesiastique et la liberation de la pensee, toutes les sciences fleurirent. Au dix-neuvieme siecle, les realisations de la civilisation materielle surpasserent fierement les accomplissements des deux mille annees precedentes. Coton, fer, pierre et charbon furent produits en quantites multipliees ; vapeur et electricite obeirent au commandement. L'etat du monde changea fondamentalement, et les affaires des hommes devinrent plus profitables. | |
| Cependant, le penseur allemand Nietzsche, parlant par la bouche de Zarathoustra, proclama : Je suis alle trop loin, seul et sans compagnons. Regardant le monde d'aujourd'hui, je vois des nations civilisees et des societes bigarrees. Mais cette societe n'a pas de croyance ferme ; les masses n'ont pas de nature creatrice en matiere de connaissance. Une telle nation peut-elle perdurer ? Ce que l'on peut esperer, ce sont uniquement les descendants. Telle est sa vision profonde, sa reconnaissance de la faussete et de l'unilateralite de la civilisation moderne ; ne trouvant aucun espoir dans les hommes du present, il fut contraint de penser a l'avenir. | |
| (Ecrit en 1907.) | |
| 若夫非物质主义者,犹个人主义然,亦兴起于抗俗。盖唯物之倾向,固以现实为权舆,浸润人心,久而不止。故在十九世纪,爰为大潮,据地极坚,且被来叶,一若生活本根,舍此将莫有在者。不知纵令物质文明,即现实生活之大本,而崇奉逾度,倾向偏趋,外此诸端,悉弃置而不顾,则按其究竟,必将缘偏颇之恶因,失文明之神旨,先以消耗,终以灭亡,历世精神,不百年而具尽矣。递夫十九世纪后叶,而其弊果益昭,诸凡事物,无不质化,灵明日以亏蚀,旨趣流于平庸,人惟客观之物质世界是趋,而主观之内面精神,乃舍置不之一省。重其外,放其内,取其质,遗其神,林林众生,物欲来蔽,社会憔悴,进步以停,于是一切诈伪罪恶,蔑弗乘之而萌,使性灵之光,愈益就于黯淡:十九世纪文明一面之通弊,盖如此矣。时乃有新神思宗徒出,或崇奉主观,或张皇意力,匡纠流俗,厉如电霆,使天下群伦,为闻声而摇荡。即其他评骘之士,以至学者文家,虽意主和平,不与世,而见此唯物极端,且杀精神生活,则亦悲观愤叹,知主观与意力主义之兴,功有伟于洪水之有方舟者焉。主观主义者,其趣凡二:一谓惟以主观为准则,用律诸物;一谓视主观之心灵界,当较客观之物质界为尤尊。前者为主观倾向之极端,力特著于十九世纪末叶,然其趋势,颇与主我及我执殊途,仅于客观之习惯,无所盲从,或不置重,而以自有之主观世界为至高之标准而已。以是之故,则思虑动作,咸离外物,独往来于自心之天地,确信在是,满足亦在是,谓之渐自省其内曜之成果可也。若夫兴起之由,则原于外者,为大势所向,胥在平庸之客观习惯,动不由己,发如机缄,识者不能堪,斯生反动;其原于内者,乃实以近世人心,日进于自觉,知物质万能之说,且逸个人之情意,使独创之力,归于槁枯,故不得不以自悟者悟人,冀挽狂澜于方倒耳。如尼佉伊勃生诸人,皆据其所信,力抗时俗,示主观倾向之极致;而契开迦尔则谓真理准则,独在主观,惟主观性,即为真理,至凡有道德行为,亦可弗问客观之结果若何,而一任主观之善恶为判断焉。其说出世,和者日多,于是思潮为之更张,骛外者渐转而趣内,渊思冥想之风作,自省抒情之意苏,去现实物质与自然之樊,以就其本有心灵之域;知精神现象实人类生活之极颠,非发挥其辉光,于人生为无当;而张大个人之人格,又人生之第一义也。然尔时所要求之人格,有甚异于前者。往所理想,在知见情操,两皆调整,若主智一派,则在聪明睿智,能移客观之大世界于主观之中者。如是思惟,迨黑该尔(F.Hegel)出而达其极。若罗曼暨尚古一派,则息孚支培黎(Shaftesbury)承卢骚(J.Rousseau)之后,尚容情感之要求,特必与情操相统一调和,始合其理想之人格。而希籁(Fr.Schiller)氏者,乃谓必知感两性,圆满无间,然后谓之全人。顾至十九世纪垂终,则理想为之一变。明哲之士,反省于内面者深,因以知古人所设具足调协之人,决不能得之今世;惟有意力轶众,所当希求,能于情意一端,处现实之世,而有勇猛奋斗之才,虽屡踣屡僵,终得现其理想:其为人格,如是焉耳。故如勖宾霍尔所张主,则以内省诸己,豁然贯通,因曰意力为世界之本体也;尼佉之所希冀,则意力绝世,几近神明之超人也;伊勃生之所描写,则以更革为生命,多力善斗,即万众不慑之强者也。夫诸凡理想,大致如斯者,诚以人丁转轮之时,处现实之世,使不若是,每至舍己从人,沉溺逝波,莫知所届,文明真髓,顷刻荡然;惟有刚毅不挠,虽遇外物而弗为移,始足作社会桢干。排斥万难,黾勉上征,人类尊严,于此攸赖,则具有绝大意力之士贵耳。虽然,此又特其一端而已。试察其他,乃亦以见末叶人民之弱点,盖往之文明流弊,浸灌性灵,众庶率纤弱颓靡,日益以甚,渐乃反观诸己,为之欿然,于是刻意求意力之人,冀倚为将来之柱石。此正犹洪水横流,自将灭顶,乃神驰彼岸,出全力以呼善没者尔,悲夫! | |
| 由是观之,欧洲十九世纪之文明,其度越前古,凌驾亚东,诚不俟明察而见矣。然既以改革而胎,反抗为本,则偏于一极,固理势所必然。洎夫末流,弊乃自显。于是新宗蹶起,特反其初,复以热烈之情,勇猛之行,起大波而加之涤荡。直至今日,益复浩然。其将来之结果若何,盖未可以率测。然作旧弊之药石,造新生之津梁,流衍方长,曼不遽已,则相其本质,察其精神,有可得而征信者。意者文化常进于幽深,人心不安于固定,二十世纪之文明,当必沉邃庄严,至与十九世纪之文明异趣。新生一作,虚伪道消,内部之生活,其将愈深且强欤?精神生活之光耀,将愈兴起而发扬欤?成然以觉,出客观梦幻之世界,而主观与自觉之生活,将由是而益张欤?内部之生活强,则人生之意义亦愈邃,个人尊严之旨趣亦愈明,二十世纪之新精神,殆将立狂风怒浪之间,恃意力以辟生路者也。中国在今,内密既发,四邻竞集而迫拶,情状自不能无所变迁。夫安弱守雌,笃于旧习,固无以争存于天下。第所以匡救之者,缪而失正,则虽日易故常,哭泣叫号之不已,于忧患又何补矣?此所为明哲之士,必洞达世界之大势,权衡校量,去其偏颇,得其神明,施之国中,翕合无间。外之既不后于世界之思潮,内之仍弗失固有之血脉,取今复古,别立新宗,人生意义,致之深邃,则国人之自觉至,个性张,沙聚之邦,由是转为人国。人国既建,乃始雄厉无前,屹然独见于天下,更何有于肤浅凡庸之事物哉?顾今者翻然思变,历岁已多,青年之所思惟,大都归罪恶于古之文物,甚或斥言文为蛮野,鄙思想为简陋,风发浡起,皇皇焉欲进欧西之物而代之,而于适所言十九世纪末之思潮,乃漠然不一措意。凡所张主,惟质为多,取其质犹可也,更按其实,则又质之至伪而偏,无所可用。虽不为将来立计,仅图救今日之阽危,而其术其心,违戾亦已甚矣。况乎凡造言任事者,又复有假改革公名,而阴以遂其私欲者哉?今敢问号称志士者曰,将以富有为文明欤,则犹太遗黎,性长居积,欧人之善贾者,莫与比伦,然其民之遭遇何如矣?将以路矿为文明欤,则五十年来非澳二洲,莫不兴铁路矿事,顾此二洲土著之文化何如矣?将以众治为文明欤,则西班牙波陀牙二国,立宪且久,顾其国之情状又何如矣?若曰惟物质为文化之基也,则列机括,陈粮食,遂足以雄长天下欤?曰惟多数得是非之正也,则以一人与众禺处,其亦将木居而芧食欤?此虽妇竖,必否之矣。然欧美之强,莫不以是炫天下者,则根柢在人,而此特现象之末,本原深而难见,荣华昭而易识也。是故将生存两间,角逐列国是务,其首在立人,人立而后凡事举;若其道术,乃必尊个性而张精神。假不如是,槁丧且不俟夫一世。夫中国在昔,本尚物质而疾天才矣,先王之泽,日以殄绝,逮蒙外力,乃退然不可自存。而辁才小慧之徒,则又号召张皇,重杀之以物质而囿之以多数,个人之性,剥夺无余。往者为本体自发之偏枯,今则获以交通传来之新疫,二患交伐,而中国之沉沦遂以益速矣。呜呼,眷念方来,亦已焉哉! | |
| (一九○七年作。) | |
| 【未有天才之前
——一九二四年一月十七日在北京师范大学附属中学 校友会讲】 |
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| 我自己觉得我的讲话不能使诸君有益或者有趣,因为我实在不知道什么事,但推托拖延得太长久了,所以终于不能不到这里来说几句。 | |
| 我看现在许多人对于文艺界的要求的呼声之中,要求天才的产生也可以算是很盛大的了,这显然可以反证两件事:一是中国现在没有一个天才,二是大家对于现在的艺术的厌薄。天才究竟有没有?也许有着罢,然而我们和别人都没有见。倘使据了见闻,就可以说没有;不但天才,还有使天才得以生长的民众。 | |
| 天才并不是自生自长在深林荒野里的怪物,是由可以使天才生长的民众产生,长育出来的,所以没有这种民众,就没有天才。有一回拿破仑过Alps山,说,“我比Alps山还要高!”这何等英伟,然而不要忘记他后面跟着许多兵;倘没有兵,那只有被山那面的敌人捉住或者赶回,他的举动,言语,都离了英雄的界线,要归入疯子一类了。所以我想,在要求天才的产生之前,应该先要求可以使天才生长的民众。——譬如想有乔木,想看好花,一定要有好土;没有土,便没有花木了;所以土实在较花木还重要。花木非有土不可,正同拿破仑非有好兵不可一样。 | |
| 然而现在社会上的论调和趋势,一面固然要求天才,一面却要他灭亡,连预备的土也想扫尽。举出几样来说: | |
| 其一就是“整理国故”。自从新思潮来到中国以后,其实何尝有力,而一群老头子,还有少年,却已丧魂失魄的来讲国故了,他们说,“中国自有许多好东西,都不整理保存,倒去求新,正如放弃祖宗遗产一样不肖。”抬出祖宗来说法,那自然是极威严的,然而我总不信在旧马褂未曾洗净迭好之前,便不能做一件新马褂。就现状而言,做事本来还随各人的自便,老先生要整理国故,当然不妨去埋在南窗下读死书,至于青年,却自有他们的活学问和新艺术,各干各事,也还没有大妨害的,但若拿了这面旗子来号召,那就是要中国永远与世界隔绝了。倘以为大家非此不可,那更是荒谬绝伦!我们和古董商人谈天,他自然总称赞他的古董如何好,然而他决不痛骂画家,农夫,工匠等类,说是忘记了祖宗:他实在比许多国学家聪明得远。 | |
| 其一是“崇拜创作”。从表面上看来,似乎这和要求天才的步调很相合,其实不然。那精神中,很含有排斥外来思想,异域情调的分子,所以也就是可以使中国和世界潮流隔绝的。许多人对于托尔斯泰,都介涅夫,陀思妥夫斯奇的名字,已经厌听了,然而他们的著作,有什么译到中国来?眼光囚在一国里,听谈彼得和约翰就生厌,定须张三李四才行,于是创作家出来了,从实说,好的也离不了刺取点外国作品的技术和神情,文笔或者漂亮,思想往往赶不上翻译品,甚者还要加上些传统思想,使他适合于中国人的老脾气,而读者却已为他所牢笼了,于是眼界便渐渐的狭小,几乎要缩进旧圈套里去。作者和读者互相为因果,排斥异流,抬上国粹,那里会有天才产生?即使产生了,也是活不下去的。 | |
| 这样的风气的民众是灰尘,不是泥土,在他这里长不出好花和乔木来! | |
| 还有一样是恶意的批评。大家的要求批评家的出现,也由来已久了,到目下就出了许多批评家。可惜他们之中很有不少是不平家,不像批评家,作品才到面前,便恨恨地磨墨,立刻写出很高明的结论道,“唉,幼稚得很。中国要天才!”到后来,连并非批评家也这样叫喊了,他是听来的。其实即使天才,在生下来的时候的第一声啼哭,也和平常的儿童的一样,决不会就是一首好诗。因为幼稚,当头加以戕贼,也可以萎死的。我亲见几个作者,都被他们骂得寒噤了。那些作者大约自然不是天才,然而我的希望是便是常人也留着。 | |
| 恶意的批评家在嫩苗的地上驰马,那当然是十分快意的事;然而遭殃的是嫩苗——平常的苗和天才的苗。幼稚对于老成,有如孩子对于老人,决没有什么耻辱;作品也一样,起初幼稚,不算耻辱的。因为倘不遭了戕贼,他就会生长,成熟,老成;独有老衰和腐败,倒是无药可救的事!我以为幼稚的人,或者老大的人,如有幼稚的心,就说幼稚的话,只为自己要说而说,说出之后,至多到印出之后,自己的事就完了,对于无论打着什么旗子的批评,都可以置之不理的! | |
| 就是在座的诸君,料来也十之九愿有天才的产生罢,然而情形是这样,不但产生天才难,单是有培养天才的泥土也难。我想,天才大半是天赋的;独有这培养天才的泥土,似乎大家都可以做。做土的功效,比要求天才还切近;否则,纵有成千成百的天才,也因为没有泥土,不能发达,要像一碟子绿豆芽。 | |
| 做土要扩大了精神,就是收纳新潮,脱离旧套,能够容纳,了解那将来产生的天才;又要不怕做小事业,就是能创作的自然是创作,否则翻译,介绍,欣赏,读,看,消闲都可以。以文艺来消闲,说来似乎有些可笑,但究竟较胜于戕贼他。 | |
| 泥土和天才比,当然是不足齿数的,然而不是坚苦卓绝者,也怕不容易做;不过事在人为,比空等天赋的天才有把握。这一点,是泥土的伟大的地方,也是反有大希望的地方。而且也有报酬,譬如好花从泥土里出来,看的人固然欣然的赏鉴,泥土也可以欣然的赏鉴,正不必花卉自身,这才心旷神怡的——假如当作泥土也有灵魂的说。 | |
| 【再论雷峰塔的倒掉】 | |
| 从崇轩先生的通信(二月份《京报副刊》)里,知道他在轮船上听到两个旅客谈话,说是杭州雷峰塔之所以倒掉,是因为乡下人迷信那塔砖放在自己的家中,凡事都必平安,如意,逢凶化吉,于是这个也挖,那个也挖,挖之久久,便倒了。一个旅客并且再三叹息道:西湖十景这可缺了呵! | |
| EN: As for anti-materialism, it arose, like individualism, in resistance against convention. For the materialist tendency, rooted in reality, permeated the human heart over a long period. In the nineteenth century, it became a mighty current, gaining solid ground and reaching into the next generation, as if it were the sole foundation of life without which nothing could exist. Yet consider: even if material civilization is indeed the essential basis of real life, its excessive veneration and one-sided orientation, neglecting all other aspects, must inevitably lead to the loss of civilization's spirit through this very imbalance, first through exhaustion, finally through destruction. The spiritual achievements accumulated over centuries would perish in less than a hundred years. Toward the end of the nineteenth century, these harms became increasingly apparent: all things were materialized, the spirit daily darkened, taste and aspiration sank to mediocrity. | |
| Then advocates of a new idealism appeared, sometimes glorifying the subjective, sometimes emphasizing willpower, to correct the current of the times with a force like thunder and lightning that stirred the masses. Even other critics and scholars, who were originally peacefully inclined, recognized in the extreme materialism a threat to spiritual life and understood that the rise of subjectivism and will was more important than the ark in the deluge. | |
| Viewing Europe from this perspective, the civilization of the nineteenth century undoubtedly surpassed earlier times and the East. However, since it arose through reform and was founded on resistance, one-sided development was inevitable. In the end, the disadvantages revealed themselves. Thereupon a new school of thought arose, contradicting the origin, and with passionate feeling and bold action created a great wave of cleansing and purification. Its future results are difficult to predict, but as a remedy for old ills and a bridge to new life, its effects will endure for a long time. | |
| (Written in 1907.) | |
| Before the Genius Appears -- Lecture delivered on January 17, 1924 at the Middle School of Peking Normal University | |
| I myself feel that my words can neither benefit nor interest those present, for I truly know nothing. But since I have evaded and postponed for too long, I must finally come here and say a few words. | |
| Among the many demands upon the literary world, the call for the appearance of a genius has become quite loud. This obviously proves two things: first, that China currently has no genius, and second, that people despise current art. Whether a genius exists? Perhaps, but neither we nor others have seen one. If one may rely on observation, one can say there is none; and not only no genius, but also no populace capable of producing one. | |
| A genius does not grow by itself in deep forests or wild wilderness like a monster. It is produced and nurtured by a populace capable of nurturing genius. Without such people, there is no genius. When Napoleon once crossed the Alps, he said: "I am higher than the Alps!" How heroic! But do not forget that many soldiers followed behind him. Without soldiers, he would only have been captured or driven back, and his deeds and words would have crossed the bounds of heroism into the category of madness. Therefore I think that before demanding the appearance of a genius, one should first demand a populace capable of producing one. | |
| Yet present society demands genius on one hand and seeks to destroy it on the other, even wanting to sweep away the preparatory soil. Some examples: | |
| First, "preserving the national heritage." Since new thought came to China, some old gentlemen and even young ones have begun in alarm to discuss the national heritage. For the youth, however, there is living learning and new art. But if one waves this banner and summons everyone, it means cutting China off from the world forever. | |
| Second, the "worship of originality." People are tired of hearing the names Tolstoy, Turgenev, and Dostoevsky, yet what of their works has been translated into Chinese? The eye, imprisoned within the nation, cannot bear hearing of Peter and John but demands Zhang San and Li Si, and so native authors appear, whose writings may be elegant but whose thoughts lag behind the translations. | |
| Such a populace is dust, not soil; in it, no beautiful flowers and no fine trees will grow! | |
| Then there is malicious criticism. Hardly has a work appeared when the ink is ground and a lofty verdict pronounced: "Oh, how immature! China needs geniuses!" But even a genius cries at birth just like an ordinary child. | |
| The soil may not be worth mentioning compared to genius, but it is not easy to create for anyone lacking iron perseverance. Yet the matter lies in human hands, and that is more reliable than waiting for a heaven-sent genius. Therein lies the greatness of the soil, and therein lies the great hope. | |
| Once More on the Collapse of Leifeng Pagoda | |
| From a letter by Mr. Chongxuan, I learned that country folk superstitiously believed that bricks from Leifeng Pagoda in Hangzhou would bring them luck. So one dug here and another there, until the pagoda finally collapsed. A traveler sighed repeatedly: "Of the Ten Views of West Lake, one is now missing!" | |
| This news made me somewhat glad, though taking pleasure in others' misfortune is not the way of a gentleman -- but since I am not one, there is nothing I can do about it. | |
| DE: Was den Anti-Materialismus betrifft, so erhob er sich, aehnlich dem Individualismus, im Widerstand gegen die Konventionen. Denn die materialistische Tendenz, die auf der Wirklichkeit fusste, durchdrang das menschliche Herz ueber lange Zeit. Im neunzehnten Jahrhundert wurde sie zu einer maechtigen Stroemung, die festen Boden gewann und auch die naechste Generation erfasste, als sei sie die einzige Grundlage des Lebens, ohne die nichts bestehen koenne. Man bedenke jedoch: Selbst wenn die materielle Zivilisation tatsaechlich die wesentliche Grundlage des realen Lebens ist, fuehrt ihre uebertriebene Verehrung und einseitige Ausrichtung, die alle anderen Aspekte vernachlaessigt, zwangslaeuBig dazu, dass durch diese Einseitigkeit der Geist der Zivilisation verloren geht, zunachst durch Erschoepfung, schliesslich durch Untergang. Die ueber Jahrhunderte angesammelten geistigen Errungenschaften wuerden in weniger als hundert Jahren zugrunde gehen. Gegen Ende des neunzehnten Jahrhunderts zeigten sich diese Schaeden immer deutlicher: Alle Dinge wurden materialisiert, der Geist verfinsterte sich taeglich, Geschmack und Streben sanken zur Mittelmassigkeit herab. | |
| Da traten Verfechter eines neuen Idealismus auf, die mal das Subjektive verherrlichten, mal die Willenskraft betonten, um die Stroemung der Zeit zu korrigieren, mit einer Gewalt wie Blitz und Donner, die die Massen in Aufregung versetzte. Sogar andere Kritiker und Gelehrte, die eigentlich friedlich gesinnt waren, erkannten im aeussersten Materialismus eine Bedrohung fuer das geistige Leben und verstanden, dass der Aufstieg des Subjektivismus und des Willens wichtiger war als die Arche in der Sintflut. | |
| Betrachtet man Europa aus dieser Perspektive, so hat die Zivilisation des neunzehnten Jahrhunderts die frueheren Zeiten und den Osten zweifellos uebertroffen. Da sie jedoch durch Reform entstand und auf Widerstand gruendete, war eine einseitige Entwicklung zwangslaeuBig. Am Ende zeigten sich die Nachteile von selbst. Daraufhin erhob sich eine neue Denkschule, die dem Ursprung widersprach und mit leidenschaftlichem Gefuehl und kuehn em Handeln eine grosse Welle erzeugte, um zu reinigen und zu laeutern. Ihre kuenftigen Ergebnisse sind schwer vorherzusagen. Doch als Heilmittel gegen alte Uebel und als Bruecke zu neuem Leben wird ihre Wirkung noch lange anhalten. | |
| (Geschrieben 1907.) | |
| Bevor der Genius erscheint -- Vortrag am 17. Januar 1924 an der Mittelschule der Peking Normal University | |
| Ich selbst habe das Gefuehl, dass meine Worte den Anwesenden weder nuetzen noch interessieren koennen, denn ich weiss wirklich nichts. Aber da ich schon zu lange ausgewichen und aufgeschoben habe, muss ich schliesslich doch hierherkommen und einige Worte sagen. | |
| Unter den vielen Forderungen an die literarische Welt ist auch der Ruf nach dem Erscheinen eines Genies recht laut geworden. Dies beweist offensichtlich zweierlei: erstens, dass China derzeit kein Genie hat, und zweitens, dass man die gegenwaertige Kunst verachtet. Ob es ein Genie gibt? Vielleicht, aber weder wir noch andere haben eines gesehen. Wenn man sich auf Augenschein verlassen kann, darf man sagen: Es gibt keines; und nicht nur kein Genie, sondern auch keine Bevoelkerung, die ein Genie hervorbringen koennte. | |
| Ein Genie waechst nicht von selbst in tiefen Waeldern oder wilder Wildnis heran wie ein Ungeheuer. Es wird von einer Bevoelkerung hervorgebracht und grossgezogen, die in der Lage ist, ein Genie zu naehren. Ohne solche Menschen gibt es kein Genie. Als Napoleon einst die Alpen ueberquerte, sagte er: "Ich bin hoeher als die Alpen!" Wie heldenhaft! Aber man vergesse nicht, dass ihm viele Soldaten folgten. Ohne Soldaten waere er nur gefangen oder zurueckgetrieben worden, und seine Taten und Worte haetten die Grenzen des Heroischen ueberschritten und waeren in die Kategorie des Wahnsinns gefallen. Deshalb denke ich, bevor man das Erscheinen eines Genies fordert, sollte man zuerst eine Bevoelkerung fordern, die ein Genie hervorbringen kann. | |
| Doch die gegenwaertige Gesellschaft verlangt einerseits nach Genies und will sie andererseits vernichten, ja sogar den vorbereitenden Boden hinwegfegen. Einige Beispiele: | |
| Erstens die "Pflege des nationalen Erbes". Seitdem neues Denken nach China kam, haben manche alten und auch jungen Herren entsetzt begonnen, ueber nationales Erbe zu reden. Fuer die Jugend dagegen gibt es lebendige Wissenschaft und neue Kunst. Aber wenn man diese Fahne schwenkt und alle dazu aufruft, dann bedeutet das, China fuer immer von der Welt abzuschneiden. | |
| Zweitens die "Vergoetterung der Originalitaet". Man ist es leid, die Namen Tolstoi, Turgenjew und Dostojewski zu hoeren, doch was ist von ihren Werken nach China uebersetzt worden? Der Blick, gefangen im eigenen Land, ertraegt nur Zhang San und Li Si, und so treten einheimische Autoren hervor, deren Werke zwar elegant geschrieben, aber gedanklich hinter den Uebersetzungen zurueckbleiben. | |
| Eine solche Bevoelkerung ist Staub, nicht Erde; in ihr werden keine schoenen Blumen und keine stattlichen Baeume wachsen! | |
| Dann gibt es noch die boeswillige Kritik. Kaum liegt ein Werk vor, da wird schon die Feder gewetzt und ein hochmuetiges Urteil gefaellt: "Ach, wie unreif! China braucht Genies!" Aber selbst ein Genie weint bei seiner Geburt genauso wie ein gewoehnliches Kind. | |
| Die Erde mag im Vergleich zum Genie nicht der Rede wert sein, aber sie ist nicht leicht zu schaffen fuer jemanden, der nicht eiserne Ausdauer besitzt. Doch die Sache liegt in Menschenhand, und das ist zuverlaessiger als auf ein vom Himmel geschenktes Genie zu warten. Darin liegt die Groesse der Erde, und darin liegt auch die grosse Hoffnung. | |
| Nochmals ueber den Einsturz der Leifeng-Pagode | |
| Aus dem Briefwechsel des Herrn Chongxuan erfuhr ich, dass Bauern aberglaeuBisch glaubten, Ziegel aus der Leifeng-Pagode in Hangzhou braechten ihnen Glueck. So grub einer hier und einer dort, bis die Pagode schliesslich einstuerzte. Ein Reisender seufzte wiederholt: "Von den Zehn Aussichten des Westsees fehlt nun eine!" | |
| Diese Nachricht machte mich ein wenig froh, obwohl Schadenfreude nicht die Art eines Gentleman ist -- aber da ich keiner bin, kann ich nichts daran aendern. | |
| FR: Quant a l'anti-materialisme, il s'est eleve, comme l'individualisme, en resistance contre les conventions. Car la tendance materialiste, enracinee dans la realite, impregna le coeur humain pendant longtemps. Au dix-neuvieme siecle, elle devint un courant puissant, gagnant un terrain solide et se prolongeant dans la generation suivante, comme si elle etait le seul fondement de la vie sans lequel rien ne pourrait exister. Pourtant, considerons ceci : meme si la civilisation materielle est effectivement la base essentielle de la vie reelle, sa veneration excessive et son orientation unilaterale, qui neglige tous les autres aspects, doit inevitablement conduire a la perte de l'esprit de la civilisation par cette meme partialite, d'abord par l'epuisement, enfin par la destruction. Les acquis spirituels accumules pendant des siecles periraient en moins de cent ans. Vers la fin du dix-neuvieme siecle, ces maux devinrent de plus en plus manifestes : toutes choses furent materialisees, l'esprit s'obscurcit quotidiennement, le gout et les aspirations tomberent dans la mediocrite. | |
| Alors apparurent des partisans d'un nouvel idealisme, tantot glorifiant le subjectif, tantot soulignant la force de la volonte, pour corriger le courant de l'epoque avec une force semblable au tonnerre et a l'eclair. Meme d'autres critiques et savants, d'esprit pacifique, reconnurent dans le materialisme extreme une menace pour la vie spirituelle et comprirent que la montee du subjectivisme et de la volonte etait plus importante que l'arche dans le deluge. | |
| En considerant l'Europe de cette perspective, la civilisation du dix-neuvieme siecle a sans doute depasse les temps anterieurs et l'Orient. Cependant, nee de la reforme et fondee sur la resistance, un developpement unilateral etait inevitable. A la fin, les inconvenients se revelerent d'eux-memes. Alors une nouvelle ecole de pensee surgit, contredisant l'origine, et avec un sentiment passionne et une action audacieuse crea une grande vague de purification. Ses resultats futurs sont difficiles a prevoir, mais comme remede aux anciens maux et pont vers une vie nouvelle, ses effets perdureront longtemps. | |
| (Ecrit en 1907.) | |
| Avant l'apparition du genie -- Conference prononcee le 17 janvier 1924 a l'Ecole Secondaire de l'Universite Normale de Pekin | |
| J'ai moi-meme le sentiment que mes paroles ne peuvent ni profiter ni interesser les personnes presentes, car je ne sais veritablement rien. Mais comme j'ai trop longtemps esquive et reporte, je dois finalement venir ici et dire quelques mots. | |
| Parmi les nombreuses exigences adressees au monde litteraire, l'appel a l'apparition d'un genie est devenu assez fort. Cela prouve evidemment deux choses : premierement, que la Chine n'a actuellement aucun genie, et deuxiemement, que l'on meprise l'art actuel. Existe-t-il un genie ? Peut-etre, mais ni nous ni d'autres n'en avons vu un. Si l'on peut se fier a l'observation, on peut dire qu'il n'y en a pas ; et non seulement pas de genie, mais pas non plus de peuple capable d'en produire un. | |
| Un genie ne pousse pas tout seul dans les forets profondes ou les contrees sauvages comme un monstre. Il est produit et nourri par un peuple capable de nourrir le genie. Sans un tel peuple, il n'y a pas de genie. Quand Napoleon franchit un jour les Alpes, il dit : "Je suis plus haut que les Alpes !" Comme c'est heroique ! Mais n'oublions pas que de nombreux soldats le suivaient. Sans soldats, il n'aurait ete que capture ou refoule, et ses actes et paroles auraient franchi les limites de l'heroisme pour tomber dans la categorie de la folie. C'est pourquoi je pense qu'avant d'exiger l'apparition d'un genie, il faut d'abord exiger un peuple capable d'en produire un. | |
| Pourtant, la societe actuelle exige d'un cote des genies et cherche de l'autre a les detruire, voulant meme balayer le sol preparatoire. Quelques exemples : | |
| D'abord, la "preservation du patrimoine national". Depuis que la pensee nouvelle est arrivee en Chine, certains vieux messieurs et meme des jeunes ont commence, alarmes, a disserter sur le patrimoine national. Mais pour la jeunesse, il existe un savoir vivant et un art nouveau. Si l'on brandit ce drapeau et convoque tout le monde, cela signifie couper la Chine du monde pour toujours. | |
| Ensuite, le "culte de l'originalite". On est fatigue d'entendre les noms de Tolstoi, Tourgueniev et Dostoievski, mais qu'a-t-on traduit de leurs oeuvres en chinois ? Le regard, emprisonne dans la nation, ne supporte que Zhang San et Li Si, et ainsi apparaissent des auteurs indigenes dont les ecrits sont peut-etre elegants mais dont les pensees restent en deca des traductions. | |
| Un tel peuple est de la poussiere, pas de la terre ; en lui ne pousseront ni belles fleurs ni beaux arbres ! | |
| Il y a aussi la critique malveillante. A peine une oeuvre est-elle parue que l'encre est broyee et un verdict hautain prononce : "Oh, que c'est immature ! La Chine a besoin de genies !" Mais meme un genie pleure a sa naissance tout comme un enfant ordinaire. | |
| La terre peut ne pas meriter d'etre mentionnee comparee au genie, mais elle n'est pas facile a creer pour quiconque manque d'une perseverance de fer. Pourtant la chose est entre les mains des hommes, et c'est plus fiable que d'attendre un genie envoye du ciel. La reside la grandeur de la terre, et la reside aussi le grand espoir. | |
| Encore une fois sur l'effondrement de la Pagode Leifeng | |
| Par une lettre de M. Chongxuan, j'appris que les paysans croyaient superstitieusement que les briques de la Pagode Leifeng de Hangzhou leur porteraient bonheur. Ainsi l'un creusa ici et l'autre la, jusqu'a ce que la pagode s'effondrat. Un voyageur soupira a plusieurs reprises : "Des Dix Vues du Lac de l'Ouest, il en manque une desormais !" | |
| Cette nouvelle me rendit quelque peu joyeux, bien que se rejouir du malheur d'autrui ne soit pas la maniere d'un gentleman -- mais puisque je n'en suis pas un, je n'y puis rien. | |
| 这消息,可又使我有点畅快了,虽然明知道幸灾乐祸,不像一个绅士,但本来不是绅士的,也没有法子来装潢。 | |
| 我们中国的许多人,——我在此特别郑重声明:并不包括四万万同胞全部!——大抵患有一种“十景病”,至少是“八景病”,沉重起来的时候大概在清朝。凡看一部县志,这一县往往有十景或八景,如“远村明月”“萧寺清钟”“古池好水”之类。而且,“十”字形的病菌,似乎已经侵入血管,流布全身,其势力早不在“!”形惊叹亡国病菌之下了。点心有十样锦,菜有十碗,音乐有十番,阎罗有十殿,药有十全大补,猜拳有全福手福手全,连人的劣迹或罪状,宣布起来也大抵是十条,仿佛犯了九条的时候总不肯歇手。现在西湖十景可缺了呵!“凡为天下国家有九经”,九经固古已有之,而九景却颇不习见,所以正是对于十景病的一个针砭,至少也可以使患者感到一种不平常,知道自己的可爱的老病,忽而跑掉了十分之一了。 | |
| 但仍有悲哀在里面。 | |
| 其实,这一种势所必至的破坏,也还是徒然的。畅快不过是无聊的自欺。雅人和信士和传统大家,定要苦心孤诣巧语花言地再来补足了十景而后已。 | |
| 无破坏即无新建设,大致是的;但有破坏却未必即有新建设。卢梭,斯谛纳尔,尼采,托尔斯泰,伊孛生等辈,若用勃兰兑斯的话来说,乃是“轨道破坏者”。其实他们不单是破坏,而且是扫除,是大呼猛进,将碍脚的旧轨道不论整条或碎片,一扫而空,并非想挖一块废铁古砖挟回家去,预备卖给旧货店。中国很少这一类人,即使有之,也会被大众的唾沫淹死。孔丘先生确是伟大,生在巫鬼势力如此旺盛的时代,偏不肯随俗谈鬼神;但可惜太聪明了,“祭如在祭神如神在”,只用他修《春秋》的照例手段以两个“如”字略寓“俏皮刻薄”之意,使人一时莫明其妙,看不出他肚皮里的反对来。他肯对子路赌咒,却不肯对鬼神宣战,因为一宣战就不和平,易犯骂人——虽然不过骂鬼——之罪,即不免有《衡论》(见一月份《晨报副镌》)作家TY先生似的好人,会替鬼神来奚落他道:为名乎?骂人不能得名。为利乎?骂人不能得利。想引诱女人乎?又不能将蚩尤的脸子印在文章上。何乐而为之也欤? | |
| 孔丘先生是深通世故的老先生,大约除脸子付印问题以外,还有深心,犯不上来做明目张胆的破坏者,所以只是不谈,而决不骂,于是乎俨然成为中国的圣人,道大,无所不包故也。否则,现在供在圣庙里的,也许不姓孔。 | |
| 不过在戏台上罢了,悲剧将人生的有价值的东西毁灭给人看,喜剧将那无价值的撕破给人看。讥讽又不过是喜剧的变简的一支流。但悲壮滑稽,却都是十景病的仇敌,因为都有破坏性,虽然所破坏的方面各不同。中国如十景病尚存,则不但卢梭他们似的疯子决不产生,并且也决不产生一个悲剧作家或喜剧作家或讽刺诗人。所有的,只是喜剧底人物或非喜剧非悲剧底人物,在互相模造的十景中生存,一面各各带了十景病。 | |
| 然而十全停滞的生活,世界上是很不多见的事,于是破坏者到了,但并非自己的先觉的破坏者,却是狂暴的强盗,或外来的蛮夷。狁早到过中原,五胡来过了,蒙古也来过了;同胞张献忠杀人如草,而满洲兵的一箭,就钻进树丛中死掉了。有人论中国说,倘使没有带着新鲜的血液的野蛮的侵入,真不知自身会腐败到如何!这当然是极刻毒的恶谑,但我们一翻历史,怕不免要有汗流浃背的时候罢。外寇来了,暂一震动,终于请他作主子,在他的刀斧下修补老例;内寇来了,也暂一震动,终于请他做主子,或者别拜一个主子,在自己的瓦砾中修补老例。再来翻县志,就看见每一次兵燹之后,所添上的是许多烈妇烈女的氏名。看近来的兵祸,怕又要大举表扬节烈了罢。许多男人们都那里去了? | |
| 凡这一种寇盗式的破坏,结果只能留下一片瓦砾,与建设无关。 | |
| 但当太平时候,就是正在修补老例,并无寇盗时候,即国中暂时没有破坏么?也不然的,其时有奴才式的破坏作用常川活动着。 | |
| 雷峰塔砖的挖去,不过是极近的一条小小的例。龙门的石佛,大半肢体不全,图书馆中的书籍,插图须谨防撕去,凡公物或无主的东西,倘难于移动,能够完全的即很不多。但其毁坏的原因,则非如革除者的志在扫除,也非如寇盗的志在掠夺或单是破坏,仅因目前极小的自利,也肯对于完整的大物暗暗的加一个创伤。人数既多,创伤自然极大,而倒败之后,却难于知道加害的究竟是谁。正如雷峰塔倒掉以后,我们单知道由于乡下人的迷信。共有的塔失去了,乡下人的所得,却不过一块砖,这砖,将来又将为别一自利者所藏,终究至于灭尽。倘在民康物阜时候,因为十景病的发作,新的雷峰塔也会再造的罢。但将来的运命,不也就可以推想而知么?如果乡下人还是这样的乡下人,老例还是这样的老例。 | |
| 这一种奴才式的破坏,结果也只能留下一片瓦砾,与建设无关。 | |
| 岂但乡下人之于雷峰塔,日日偷挖中华民国的柱石的奴才们,现在正不知有多少! | |
| 瓦砾场上还不足悲,在瓦砾场上修补老例是可悲的。我们要革新的破坏者,因为他内心有理想的光。我们应该知道他和寇盗奴才的分别;应该留心自己堕入后两种。这区别并不烦难,只要观人,省己,凡言动中,思想中,含有借此据为己有的联兆者是寇盗,含有借此占些目前的小便宜的朕兆者是奴才,无论在前面打着的是怎样鲜明好看的旗子。 | |
| (一九二五年二月六日。) | |
| 【春末闲谈】 | |
| 北京正是春末,也许我过于性急之故罢,觉着夏意了,于是突然记起故乡的细腰蜂。那时候大约是盛夏,青蝇密集在凉棚索子上,铁黑色的细腰蜂就在桑树间或墙角的蛛网左近往来飞行,有时衔一支小青虫去了,有时拉一个蜘蛛。青虫或蜘蛛先是抵抗着不肯去,但终于乏力,被衔着腾空而去了,坐了飞机似的。 | |
| 老前辈们开导我,那细腰蜂就是书上所说的果蠃,纯雌无雄,必须捉螟蛉去做继子的。她将小青虫封在窠里,自己在外面日日夜夜敲打着,祝道“像我像我”,经过若干日,我记不清了,大约七七四十九日罢,——那青虫也就成了细腰蜂了,所以《诗经》里说:“螟蛉有子,果蠃负之。”螟蛉就是桑上小青虫。蜘蛛呢?他们没有提。——我记得有几个考据家曾经立过异说,以为她其实自能生卵;其捉青虫,乃是填在窠里,给孵化出来的幼蜂做食料的。但我所遇见的前辈们都不采用此说,还道是拉去做女儿。我们为存留天地间的美谈起见,倒不如这样好。当长夏无事,遣暑林荫,瞥见二虫一拉一拒的时候,便如睹慈母教女,满怀好意,而青虫的宛转抗拒,则活像一个不识好歹的毛鸦头。 | |
| 但究竟是夷人可恶,偏要讲什么科学。科学虽然给我们许多惊奇,但也搅坏了我们许多好梦。自从法国的昆虫学大家发勃耳(Fabre)仔细观察之后,给幼蜂做食料的事可就证实了。而且,这细腰蜂不但是普通的凶手,还是一种很残忍的凶手,又是一个学识技术都极高明的解剖学家。她知道青虫的神经构造和作用,用了神奇的毒针,向那运动神经球上只一螫,它便麻痹为不死不活状态,这才在它身上生下蜂卵,封入窠中。青虫因为不死不活,所以不动,但也因为不活不死,所以不烂,直到她的子女孵化出来的时候,这食料还和被捕当日一样的新鲜。 | |
| 三年前,我遇见神经过敏的俄国的E君,有一天他忽然发愁道,不知道将来的科学家,是否不至于发明一种奇妙的药品,将这注射在谁的身上,则这人即甘心永远去做服役和战争的机器了?那时我也就皱眉叹息,装作一齐发愁的模样,以示“所见略同”之至意,殊不知我国的圣君,贤臣,圣贤,圣贤之徒,却早已有过这一种黄金世界的理想了。不是“唯辟作福,唯辟作威,唯辟玉食”么?不是“君子劳心,小人劳力”么?不是“治于人者食(去声)人,治人者食于人”么?可惜理论虽已卓然,而终于没有发明十全的好方法。要服从作威就须不活,要贡献玉食就须不死;要被治就须不活,要供养治人者又须不死。人类升为万物之灵,自然是可贺的,但没有了细腰蜂的毒针,却很使圣君,贤臣,圣贤,圣贤之徒,以至现在的阔人,学者,教育家觉得棘手。将来未可知,若已往,则治人者虽然尽力施行过各种麻痹术,也还不能十分奏效,与果蠃并驱争先。即以皇帝一伦而言,便难免时常改姓易代,终没有“万年有道之长”;《二十四史》而多至二十四,就是可悲的铁证。现在又似乎有些别开生面了,世上挺生了一种所谓“特殊知识阶级”的留学生,在研究室中研究之结果,说医学不发达是有益于人种改良的,中国妇女的境遇是极其平等的,一切道理都已不错,一切状态都已够好。E君的发愁,或者也不为无因罢,然而俄国是不要紧的,因为他们不像我们中国,有所谓“特别国情”,还有所谓“特殊知识阶级”。 | |
| 但这种工作,也怕终于像古人那样,不能十分奏效的罢,因为这实在比细腰蜂所做的要难得多。她于青虫,只须不动,所以仅在运动神经球上一螫,即告成功。而我们的工作,却求其能运动,无知觉,该在知觉神经中枢,加以完全的麻醉的。但智觉一失,运动也就随之失却主宰,不能贡献玉食,恭请上自“极峰”下至“特殊知识阶级”的赏收享用了。就现在而言,窃以为除了遗老的圣经贤传法,学者的进研究室主义,文学家和茶摊老板的莫谈国事律,教育家的勿视勿听勿言勿动论之外,委实还没有更好,更完全,更无流弊的方法。便是留学生的特别发见,其实也并未轶出了前贤的范围。 | |
| 那么,又要“礼失而求诸野”了。夷人,现在因为想去取法,姑且称之为外国,他那里,可有较好的法子么?可惜,也没有。所有者,仍不外乎不准集会,不许开口之类,和我们中华并没有什么很不同。然亦可见至道嘉猷,人同此心,心同此理,固无华夷之限也。猛兽是单独的,牛羊则结队;野牛的大队,就会排角成城以御强敌了,但拉开一匹,定只能牟牟地叫。人民与牛马同流,——此就中国而言,夷人别有分类法云,——治之之道,自然应该禁止集合:这方法是对的。其次要防说话。人能说话,已经是祸胎了,而况有时还要做文章。所以苍颉造字,夜有鬼哭。鬼且反对,而况于官?猴子不会说话,猴界即向无风潮,——可是猴界中也没有官,但这又作别论,——确应该虚心取法,反朴归真,则口且不开,文章自灭:这方法也是对的。然而上文也不过就理论而言,至于实效,却依然是难说。最显著的例,是连那么专制的俄国,而尼古拉二世“龙御上宾”之后,罗马诺夫氏竟已“覆宗绝祀”了。要而言之,那大缺点就在虽有二大良法,而还缺其一,便是:无法禁止人们的思想。 | |
| 于是我们的造物主——假如天空真有这样的一位“主子”——就可恨了:一恨其没有永远分清“治者”与“被治者”;二恨其不给治者生一枝细腰蜂那样的毒针;三恨其不将被治者造得即使砍去了藏着的思想中枢的脑袋而还能动作——服役。三者得一,阔人的地位即永久稳固,统御也永久省了气力,而天下于是乎太平。今也不然,所以即使单想高高在上,暂时维持阔气,也还得日施手段,夜费心机,实在不胜其委屈劳神之至……。 | |
| 假使没有了头颅,却还能做服役和战争的机械,世上的情形就何等地醒目呵!这时再不必用什么制帽勋章来表明阔人和窄人了,只要一看头之有无,便知道主奴,官民,上下,贵贱的区别。并且也不至于再闹什么革命,共和,会议等等的乱子了,单是电报,就要省下许多许多来。古人毕竟聪明,仿佛早想到过这样的东西,《山海经》上就记载着一种名叫“刑天”的怪物。他没有了能想的头,却还活着,“以乳为目,以脐为口”,——这一点想得很周到,否则他怎么看,怎么吃呢,——实在是很值得奉为师法的。假使我们的国民都能这样,阔人又何等安全快乐?但他又“执干戚而舞”,则似乎还是死也不肯安分,和我那专为阔人图便利而设的理想底好国民又不同。陶潜先生又有诗道:“刑天舞干戚,猛志固常在。”连这位貌似旷达的老隐士也这么说,可见无头也会仍有猛志,阔人的天下一时总怕难得太平的了。但有了太多的“特殊知识阶级”的国民,也许有特在例外的希望;况且精神文明太高了之后,精神的头就会提前飞去,区区物质的头的有无也算不得什么难问题。 | |
| (一九二五年四月二十二日。) | |
| 【杂忆】 | |
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| EN: 这消息, 可又使我有点畅快了, 虽然明知道幸灾乐祸, 不像一个绅士, 但本来不是绅士的, 也没有法子来装潢. | |
| 我们中国的许多人, -- 我在此特别郑重声明: 并不包括四万万同胞全部! -- 大抵患有一种"十景病", 至少是"八景病", 沉重起来的时候大概在清朝. 凡看一部县志, 这一县往往有十景或八景, 如"远村明月""萧寺清钟""古池好水"之类. 而且, "十"字形的病菌, 似乎已经侵入血管, 流布全身, 其势力早不在"! "形惊叹亡国病菌之下了. 点心有十样锦, 菜有十碗, 音乐有十番, 阎罗有十殿, 药有十全大补, 猜拳有全福手福手全, 连人的劣迹或罪状, 宣布起来也大抵是十条, 仿佛犯了九条的时候总不肯歇手. 现在西湖十景可缺了呵! "凡为天下国家有九经", 九经固古已有之, 而九景却颇不习见, 所以正是对于十景病的一个针砭, 至少也可以使患者感到一种不平常, 知道自己的可爱的老病, 忽而跑掉了十分之一了. | |
| 但仍有悲哀在里面. | |
| 其实, 这一种势所必至的破坏, 也还是徒然的. 畅快不过是无聊的自欺. 雅人和信士和传统大家, 定要苦心孤诣巧语花言地再来补足了十景而后已. | |
| 无破坏即无新建设, 大致是的; 但有破坏却未必即有新建设. 卢梭, 斯谛纳尔, 尼采, 托尔斯泰, 伊孛生等辈, 若用勃兰兑斯的话来说, 乃是"轨道破坏者". 其实他们不单是破坏, 而且是扫除, 是大呼猛进, 将碍脚的旧轨道不论整条或碎片, 一扫而空, 并非想挖一块废铁古砖挟回家去, 预备卖给旧货店. 中国很少这一类人, 即使有之, 也会被大众的唾沫淹死. 孔丘先生确是伟大, 生在巫鬼势力如此旺盛的时代, 偏不肯随俗谈鬼神; 但可惜太聪明了, "祭如在祭神如神在", 只用他修"春秋"的照例手段以两个"如"字略寓"俏皮刻薄"之意, 使人一时莫明其妙, 看不出他肚皮里的反对来. 他肯对子路赌咒, 却不肯对鬼神宣战, 因为一宣战就不和平, 易犯骂人 -- 虽然不过骂鬼 -- 之罪, 即不免有"衡论"(见一月份"晨报副镌")作家TY先生似的好人, 会替鬼神来奚落他道: 为名乎? 骂人不能得名. 为利乎? 骂人不能得利. 想引诱女人乎? 又不能将蚩尤的脸子印在文章上. 何乐而为之也欤? | |
| 孔丘先生是深通世故的老先生, 大约除脸子付印问题以外, 还有深心, 犯不上来做明目张胆的破坏者, 所以只是不谈, 而决不骂, 于是乎俨然成为中国的圣人, 道大, 无所不包故也. 否则, 现在供在圣庙里的, 也许不姓孔. | |
| 不过在戏台上罢了, 悲剧将人生的有价值的东西毁灭给人看, 喜剧将那无价值的撕破给人看. 讥讽又不过是喜剧的变简的一支流. 但悲壮滑稽, 却都是十景病的仇敌, 因为都有破坏性, 虽然所破坏的方面各不同. 中国如十景病尚存, 则不但卢梭他们似的疯子决不产生, 并且也决不产生一个悲剧作家或喜剧作家或讽刺诗人. 所有的, 只是喜剧底人物或非喜剧非悲剧底人物, 在互相模造的十景中生存, 一面各各带了十景病. | |
| 然而十全停滞的生活, 世界上是很不多见的事, 于是破坏者到了, 但并非自己的先觉的破坏者, 却是狂暴的强盗, 或外来的蛮夷. 狁早到过中原, 五胡来过了, 蒙古也来过了; 同胞张献忠杀人如草, 而满洲兵的一箭, 就钻进树丛中死掉了. 有人论中国说, 倘使没有带着新鲜的血液的野蛮的侵入, 真不知自身会腐败到如何! 这当然是极刻毒的恶谑, 但我们一翻历史, 怕不免要有汗流浃背的时候罢. 外寇来了, 暂一震动, 终于请他作主子, 在他的刀斧下修补老例; 内寇来了, 也暂一震动, 终于请他做主子, 或者别拜一个主子, 在自己的瓦砾中修补老例. 再来翻县志, 就看见每一次兵燹之后, 所添上的是许多烈妇烈女的氏名. 看近来的兵祸, 怕又要大举表扬节烈了罢. 许多男人们都那里去了? | |
| 凡这一种寇盗式的破坏, 结果只能留下一片瓦砾, 与建设无关. | |
| 但当太平时候, 就是正在修补老例, 并无寇盗时候, 即国中暂时没有破坏么? 也不然的, 其时有奴才式的破坏作用常川活动着. | |
| 雷峰塔砖的挖去, 不过是极近的一条小小的例. 龙门的石佛, 大半肢体不全, 图书馆中的书籍, 插图须谨防撕去, 凡公物或无主的东西, 倘难于移动, 能够完全的即很不多. 但其毁坏的原因, 则非如革除者的志在扫除, 也非如寇盗的志在掠夺或单是破坏, 仅因目前极小的自利, 也肯对于完整的大物暗暗的加一个创伤. 人数既多, 创伤自然极大, 而倒败之后, 却难于知道加害的究竟是谁. 正如雷峰塔倒掉以后, 我们单知道由于乡下人的迷信. 共有的塔失去了, 乡下人的所得, 却不过一块砖, 这砖, 将来又将为别一自利者所藏, 终究至于灭尽. 倘在民康物阜时候, 因为十景病的发作, 新的雷峰塔也会再造的罢. 但将来的运命, 不也就可以推想而知么? 如果乡下人还是这样的乡下人, 老例还是这样的老例. | |
| 这一种奴才式的破坏, 结果也只能留下一片瓦砾, 与建设无关. | |
| 岂但乡下人之于雷峰塔, 日日偷挖中华民国的柱石的奴才们, 现在正不知有多少! | |
| 瓦砾场上还不足悲, 在瓦砾场上修补老例是可悲的. 我们要革新的破坏者, 因为他内心有理想的光. 我们应该知道他和寇盗奴才的分别; 应该留心自己堕入后两种. 这区别并不烦难, 只要观人, 省己, 凡言动中, 思想中, 含有借此据为己有的联兆者是寇盗, 含有借此占些目前的小便宜的朕兆者是奴才, 无论在前面打着的是怎样鲜明好看的旗子. | |
| (一九二五年二月六日. ) | |
| [春末闲谈] | |