Difference between revisions of "Lu Xun Complete Works/hi/Fan Ainong"
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| − | = फ़ान | + | = फ़ान ऐनोंग (范爱农) = |
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| + | प्रचंड वायु और वर्षा के दिनों में, फ़ान ऐनोंग (范爱农) की याद आती है। | ||
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| + | लोमड़ियों ने अभी-अभी अपनी माँद छोड़ी; आड़ू-पुतले पहले ही मंच पर चढ़ गए। | ||
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| + | जन्मभूमि पर शीत काली घटाएँ; ज्वलंत आकाश में लंबी हिमशीत रातें। | ||
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| + | प्याला हाथ में लिए संसार पर चर्चा करता; गुरुजी विनम्र मद्यपायी थे। | ||
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| + | विशाल मंडली में अभी चाय की चुस्की ले रहा था; हल्के नशे में स्वयं ही डूब गया। | ||
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| + | यह विदाई शाश्वत हो गई; अब से सदैव के लिए अंतिम शब्द रुक गए। | ||
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| + | पुराने मित्र बादलों-से बिखर गए; मैं भी हल्की धूल के समान हो गया! | ||
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| + | ''गुआंग पिंग (广平) की टिप्पणी: उपर्युक्त ''नई कोंपलें'' (《新苗》) संख्या 13 से, श्री शांगसुई के लेख «स्मरण» (《怀旧》) के भीतर से लिप्यंतरित है। बाद में, ''ब्रह्मांड वायु'' (《宇宙风》) संख्या 67 में श्री झीतांग (知堂, अर्थात् झोउ ज़ुओरेन) ने अपने लेख «फ़ान ऐनोंग के बारे में» (《关于范爱农》) में तीन शोकगीत उद्धृत किए, शीर्षक «श्री फ़ान की स्मृति में तीन गीत» (《哀范君三章》), जिनमें कुछ अक्षर भिन्न हैं: प्रथम गीत में, 竟 को 遽 लिखा गया; द्वितीय में, 已 को 尽, 寒 को 彤, 黑 को 恶, 冷 को 冽, 涤 को 洗 पढ़ा गया; तृतीय में, 茗艼 को 酩酊 पढ़ा, और 成终 को उलटकर 终成 किया गया। तृतीय गीत पहले ''संकलन-बाह्य संग्रह'' (《集外集》) में प्रकाशित हो चुका था, किंतु "यह विदाई..." की पंक्तियाँ भिन्न होने के कारण पुनः प्रस्तुत है। «फ़ान ऐनोंग के बारे में» के पाठ में कहा गया: «शीर्षक के नीचे मूलतः वास्तविक नाम था, जिसे काटकर हुआंग जी (黄棘) दो अक्षर रखे गए। पांडुलिपि के अंत में चार संलग्न पंक्तियाँ हैं, जिनका पाठ है:'' | ||
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| + | ''«ऐनोंग की मृत्यु ने मुझे कई दिन व्यथित रखा और आज तक मैं मुक्त नहीं हो पाया। कल, अचानक, तीन कविताएँ रचीं और एक साँस में लिख डालीं, और सहसा कीड़ों के झगड़े की बात आ गई: सचमुच असाधारण, अद्भुत, वज्रपात जैसा... ऊपर लिखकर प्रस्तुत करता हूँ महान पारखी के मूल्यांकन हेतु; यदि आपत्तिजनक न हों, तो ''मिनशिंग'' (《民兴》) में प्रकाशित किए जा सकते हैं। यद्यपि संसार संभवतः इनकी उत्सुकता से प्रतीक्षा नहीं कर रहा था, क्या मैं अपने शब्दों को रोक सकता हूँ? तेईसवें दिन, शू (树) पुनः कहता है।»'' | ||
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| + | === श्री वू चीशान को समर्पित (赠邬其山) === | ||
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| + | बीस वर्ष शंघाई में रहकर, प्रतिदिन चीन देखता रहा। | ||
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| + | रोगी, औषधि नहीं खोजता; ऊबा, तभी पढ़ता है। | ||
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| + | जैसे ही कोई समृद्ध हो, चेहरा बदल जाता; कटे सिरों की संख्या बढ़ती है। | ||
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| + | अचानक, फिर से सन्यास लेता है: नमो अमिताभ (南无阿弥陀)! | ||
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| + | === शीर्षकहीन (无题) === | ||
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| + | '''I''' | ||
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| + | महा नदी दिवस-रात्रि पूर्व की ओर बहती; एकत्र हुए वीर फिर दूर यात्राओं पर निकलते हैं। | ||
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| + | छह राजवंशों के रेशम पुराने स्वप्न बन गए; प्रस्तर नगरी (石头城, नानजिंग) पर चंद्रमा अंकुश-सा है। | ||
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| + | '''II''' | ||
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| + | वर्षा-पुष्प वेदी (雨花台) के पास टूटे भाले पड़े; नो-सॉरो झील (莫愁湖) में हल्की तरंगें शेष। | ||
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| + | जिस सौंदर्य की मैं कामना करता हूँ, वह दिखाई नहीं देता; लौटकर नदी के आकाश को स्मरण करते हुए, एक भव्य गीत गाता हूँ। | ||
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| + | === श्री मासुदा वातारू को स्वदेश लौटते हुए विदाई (送增田涉君归国) === | ||
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| + | उगते सूर्य की भूमि (扶桑) में शरद जगमगाती; मेपल की पत्तियाँ, सिंदूर-सी लाल, नवीन शीतलता को प्रकाशित करतीं। | ||
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| + | तथापि मैं रोता विलो (बेंत) तोड़कर यात्री को विदा करता हूँ; मेरा हृदय पूर्व की ओर बहते चप्पू का अनुसरण करता, पुष्पित वर्षों को स्मरण करते हुए। | ||
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| + | === शीर्षकहीन (无题) === | ||
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| + | रक्त मध्य मैदान (中原) को सींचता और जंगली घास पालता; शीत विशाल धरती को जमाता और वसंत पुष्प उगाता। | ||
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| + | वीरों पर अनेक विपत्तियाँ, सलाहकार रोगग्रस्त; अश्रु छोंगलिंग (崇陵) की समाधियों पर छलकते जहाँ संध्या के कौवे काँवते हैं। | ||
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| + | === अकस्मात् रचना (偶成) === | ||
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| + | लेख धूल-से: कहाँ जाते हैं? पूर्व के मेघों को निहारता, स्वप्न याद करता। | ||
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| + | खेद है कि सुगंधित वन इतना सूना; वसंत-आर्किड और शरद-गुलदाउदी एक साथ नहीं खिलते। | ||
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| + | === श्री पेंगज़ी को समर्पित (赠蓬子) === | ||
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| + | अचानक नील आकाश से एक अमर अवतरित; दो मेघ-रथ विलक्षण बालकों को ले जाते। | ||
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| + | बेचारा पेंगज़ी (蓬子), जो स्वर्ग-पुत्र नहीं; इधर-उधर भागता, उत्तरी वायु निगलता! | ||
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| + | === 28 जनवरी के युद्ध के पश्चात् लिखा (一二八战后作) === | ||
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| + | युद्ध के मेघ अभी सिमटे, शेष वसंत बाकी; भारी तोपें और स्पष्ट गीत, दोनों मूक। | ||
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| + | मेरे पास भी विदाई नौका के लिए कविता नहीं; केवल हृदय की गहराई से शांति की कामना। | ||
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| + | === प्रोफ़ेसरों पर तीन व्यंग्य-छंद (教授杂咏三首) === | ||
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| + | '''I''' | ||
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| + | ऐसे नियम बनाना जो स्वयं पर लागू न हों, शांति से चालीस पार कर जाता। | ||
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| + | मोटा सिर दाँव पर लगाकर द्वंद्ववाद का खंडन करने से क्या फ़र्क? | ||
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| + | '''II''' | ||
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| + | बेचारी बुनकर तारा (织女星), चरवाहे (马郎) की पत्नी बन गई! | ||
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| + | शायद मैग्पाई न आएँ; दूर, दूर, आकाशगंगा (牛奶路) का मार्ग। | ||
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| + | '''III''' | ||
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| + | संसार में साहित्य है; युवतियों के कूल्हे विशाल। | ||
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| + | सूअर के बदले मुर्गी का शोरबा; और बेइशिन (北新) प्रकाशन ने अपने दरवाज़े बंद कर दिए। | ||
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| + | === जो सुना (所闻) === | ||
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| + | शानदार दीप खुले द्वार की हवेली में भोज प्रकाशित करते; सुंदर दासियाँ, कड़ी सज-धज में, जेड के प्याले परोसती हैं। | ||
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| + | अचानक जली हुई मिट्टी के नीचे अपनों को याद करता; दिखावा करता कि रेशम के मोज़े देख रहा, रोने के निशान छुपाने को। | ||
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| + | === शीर्षकहीन (无题) === | ||
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| + | '''I''' | ||
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| + | मेरी जन्मभूमि, अंधकारमय, काले मेघों में जकड़ी; दूर की रात और दूर का वसंत, विलग। | ||
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| + | वर्ष के अंत में, और विषाद कैसे सहें? बेहतर है प्याला उठाओ और फ़ुगू मछली खाओ। | ||
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| + | '''II''' | ||
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| + | वू (吴) की दासी, श्वेत दंतपंक्ति, «विलो शाखाएँ» गाती; मद्य समाप्त, लोग मौन, वसंत की समाप्ति पर। | ||
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| + | बिना कारण, एक पुराना स्वप्न नशे के अवशेष भगाता; अकेले, दीप की छाया के सामने, कोयल (子规) को स्मरण करता। | ||
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| + | === एक आगंतुक की आलोचना का उत्तर (答客诮) === | ||
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| + | कोई निर्विकार हो तो अनिवार्यतः वीर नहीं; संतान से प्रेम, यह पुरुष के लिए अगौरव कैसे? | ||
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| + | क्या नहीं जानते कि जो तूफ़ान उठाता और प्रचंड गर्जना करता, पीछे मुड़कर अपने नन्हें बाघ-शावक (於菟) को निहारता है? | ||
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| + | === चित्रकार को समर्पित (赠画师) === | ||
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| + | नानजिंग (白下) में वायु बहती और सहस्र वन अंधकारमय; कुहरा धूसर आकाश को सील करता और सब पुष्प नष्ट। | ||
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| + | चित्रकार से नवीन कल्पना माँगता हूँ: केवल लाल और काली स्याही पीसकर वसंत पर्वत चित्रित करे। | ||
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| + | === «युद्ध-नाद» पर लेख (题呐喊) === | ||
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| + | जो लेखनी चलाता, लेखनी के जाल में फँसता; जो संसार का सामना करता, संसार की भावनाओं का विरोधी बनता। | ||
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| + | संचित निंदा हड्डियाँ नष्ट कर सकती; केवल काग़ज़ पर एक रिक्त प्रतिध्वनि शेष। | ||
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| + | === यांग चुआन की स्मृति में (悼杨铨) === | ||
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| + | क्या पूर्वकाल-सा वीरोचित उत्साह बचा? पुष्प खिलते और झरते: सब अपने क्रम से। | ||
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| + | किसने सोचा था कि अश्रु जियांगनान (江南) की वर्षा के साथ बहेंगे? फिर एक बार इस जनता के एक साहसी के लिए रोता हूँ! | ||
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| + | === शीर्षकहीन (无题) === | ||
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| + | '''I''' | ||
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| + | यू (禹域, चीन) के प्रदेश में उड़न जनरलों की भरमार; घोंघे-घरों में केवल अवकाशी वैरागी शेष। | ||
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| + | रात को तालाब की तली के प्रतिबिंब को आमंत्रित करते; गहरी मदिरा से शाही कृपा का उत्सव मनाते। | ||
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| + | '''II''' | ||
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| + | शुद्ध सुरुचि की एक शाखा शियांग (湘灵) की आत्मा को सांत्वना देती; नौ खेतों की सत्यनिष्ठा अकेले जागने वाले को सांत्वना। | ||
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| + | अंततः, सघन मुगवॉर्ट (萧艾) से हार अपरिहार्य; इस प्रकार निर्वासित अपनी सुगंध बिखेरता। | ||
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| + | '''III''' | ||
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| + | धुआँ और जल: सामान्य बात; उजड़े गाँव में, एक अकेला मछुआरा। | ||
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| + | गहरी रात, नशे से जागता; सरकंडे और नरकट (菰蒲) खोजने को कहीं नहीं पाता। | ||
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| + | === मेरे मस्तिष्क-ज्वर की ख़बर पर विनोदपूर्ण रचना (报载患脑炎戏作) === | ||
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| + | क्या मेरी भृकुटी किसी दासी के सौंदर्य से प्रतिस्पर्धा करती? न सोचा था कि समस्त नारियों के हृदय का विरोध जारी रहेगा। | ||
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| + | अभिशाप अब विचित्र हो गए; किंतु, क्या करें? मेरा मस्तिष्क अभी भी हिम-सा शीतल। | ||
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| + | दस सहस्र घर काले मुखों के साथ झाड़ियों में विलीन; कौन साहस करे ऐसा विलाप गाने का जो धरती को कँपाए? | ||
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| + | हृदय के विचार, विशाल और अपार, समस्त ब्रह्मांड से जुड़ते; मौन के स्थान पर गर्जना सुनाई देती। | ||
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| + | === शरद रात्रि में चिंतन (秋夜有感) === | ||
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| + | रेशम के पर्दों के पार क्षणभंगुर प्रकाश विदा होता; सरो और शाहबलूत के पास अनुष्ठान मनाया जाता। | ||
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| + | सम्राट वांग (望帝) ने अंततः सुगंधित घास को रूपांतरण सिखाया; जगमगाती कँटीली झाड़ी विशाल खेतों के परित्याग को सजाती। | ||
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| + | कहाँ से आते पनीर-फल सहस्र बुद्धों को अर्पित करने हेतु? कठिन है लिऊ (六郎) सदृश सुंदर कमल पाना। | ||
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| + | मध्यरात्रि मुर्ग़ बाँग देता और वायु-वर्षा एकत्र होती; उठता हूँ, सिगरेट जलाता हूँ और नवीन शीतलता अनुभव करता हूँ। | ||
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| + | === सूअर वर्ष की शरद ऋतु में अकस्मात् रचना (亥年残秋偶作) === | ||
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| + | पूर्वकाल में शरद की कठोरता से चकित जो संसार पर टूटी; लेखनी की नोक पर वसंत की कोमलता भेजने का साहस नहीं। | ||
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| + | धूल-भरे सागर में, विशाल और अपार, सौ भावनाएँ डूबतीं; सुनहरी वायु, विषादपूर्ण, सहस्र अधिकारियों को भगाती। | ||
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| + | वृद्ध, लौटता महा दलदल में जहाँ सरकंडे समाप्त हो गए; स्वप्न रिक्त मेघों में गिरता, दंत और केश शीतल। | ||
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| + | खोए मुर्ग़ की बाँग सुनने को कान उठाता, किंतु सर्वत्र मौन; उठकर तारों को देखता, जो मुँडेर पर जगमगाते। | ||
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फ़ान ऐनोंग (范爱农)
लू शुन (鲁迅, Lǔ Xùn, 1881–1936)
चीनी से हिंदी में अनुवाद।
कविताएँ
अपने चित्र पर स्व-लेख (自题小像)
आत्मा की वेदी से दैवी बाण से बच नहीं सकता; वायु और वर्षा शिला-सी भारी, और मेरी जन्मभूमि अंधकारमय।
अपनी भावना शीत तारों को सौंपता हूँ, किंतु इंद्रधनुष उसे नहीं जानता; अपने रक्त से श्वानयुआन (轩辕) को अर्पण करता हूँ।
तीन शोकगीत (फ़ान ऐनोंग की स्मृति में, 悼范爱农)
I
प्रचंड वायु और वर्षा के दिनों में, फ़ान ऐनोंग (范爱农) की याद आती है।
श्वेत केश, मुरझाया और विरान; तिरस्कार भरी दृष्टि से कीड़ों को लड़ता देखता था।
संसार का स्वाद शरद की कासनी-सा कड़वा; मनुष्यों के बीच सीधा मार्ग समाप्त हो गया।
हाय, तीन मास का वियोग, और देखो वह अनोखा शरीर खो दिया!
II
समुद्री शैवाल जन्मभूमि के द्वारों पर हरियाली बिखेरती; कितने वर्ष विदेश में बूढ़ा हुआ।
लोमड़ियों ने अभी-अभी अपनी माँद छोड़ी; आड़ू-पुतले पहले ही मंच पर चढ़ गए।
जन्मभूमि पर शीत काली घटाएँ; ज्वलंत आकाश में लंबी हिमशीत रातें।
केवल स्वच्छ शीतल जल में डूब गया: क्या वे जल उसके शोकग्रस्त अंतर को धो सकेंगे?
III
प्याला हाथ में लिए संसार पर चर्चा करता; गुरुजी विनम्र मद्यपायी थे।
विशाल मंडली में अभी चाय की चुस्की ले रहा था; हल्के नशे में स्वयं ही डूब गया।
यह विदाई शाश्वत हो गई; अब से सदैव के लिए अंतिम शब्द रुक गए।
पुराने मित्र बादलों-से बिखर गए; मैं भी हल्की धूल के समान हो गया!
गुआंग पिंग (广平) की टिप्पणी: उपर्युक्त नई कोंपलें (《新苗》) संख्या 13 से, श्री शांगसुई के लेख «स्मरण» (《怀旧》) के भीतर से लिप्यंतरित है। बाद में, ब्रह्मांड वायु (《宇宙风》) संख्या 67 में श्री झीतांग (知堂, अर्थात् झोउ ज़ुओरेन) ने अपने लेख «फ़ान ऐनोंग के बारे में» (《关于范爱农》) में तीन शोकगीत उद्धृत किए, शीर्षक «श्री फ़ान की स्मृति में तीन गीत» (《哀范君三章》), जिनमें कुछ अक्षर भिन्न हैं: प्रथम गीत में, 竟 को 遽 लिखा गया; द्वितीय में, 已 को 尽, 寒 को 彤, 黑 को 恶, 冷 को 冽, 涤 को 洗 पढ़ा गया; तृतीय में, 茗艼 को 酩酊 पढ़ा, और 成终 को उलटकर 终成 किया गया। तृतीय गीत पहले संकलन-बाह्य संग्रह (《集外集》) में प्रकाशित हो चुका था, किंतु "यह विदाई..." की पंक्तियाँ भिन्न होने के कारण पुनः प्रस्तुत है। «फ़ान ऐनोंग के बारे में» के पाठ में कहा गया: «शीर्षक के नीचे मूलतः वास्तविक नाम था, जिसे काटकर हुआंग जी (黄棘) दो अक्षर रखे गए। पांडुलिपि के अंत में चार संलग्न पंक्तियाँ हैं, जिनका पाठ है:
«ऐनोंग की मृत्यु ने मुझे कई दिन व्यथित रखा और आज तक मैं मुक्त नहीं हो पाया। कल, अचानक, तीन कविताएँ रचीं और एक साँस में लिख डालीं, और सहसा कीड़ों के झगड़े की बात आ गई: सचमुच असाधारण, अद्भुत, वज्रपात जैसा... ऊपर लिखकर प्रस्तुत करता हूँ महान पारखी के मूल्यांकन हेतु; यदि आपत्तिजनक न हों, तो मिनशिंग (《民兴》) में प्रकाशित किए जा सकते हैं। यद्यपि संसार संभवतः इनकी उत्सुकता से प्रतीक्षा नहीं कर रहा था, क्या मैं अपने शब्दों को रोक सकता हूँ? तेईसवें दिन, शू (树) पुनः कहता है।»
श्री वू चीशान को समर्पित (赠邬其山)
बीस वर्ष शंघाई में रहकर, प्रतिदिन चीन देखता रहा।
रोगी, औषधि नहीं खोजता; ऊबा, तभी पढ़ता है।
जैसे ही कोई समृद्ध हो, चेहरा बदल जाता; कटे सिरों की संख्या बढ़ती है।
अचानक, फिर से सन्यास लेता है: नमो अमिताभ (南无阿弥陀)!
शीर्षकहीन (无题)
I
महा नदी दिवस-रात्रि पूर्व की ओर बहती; एकत्र हुए वीर फिर दूर यात्राओं पर निकलते हैं।
छह राजवंशों के रेशम पुराने स्वप्न बन गए; प्रस्तर नगरी (石头城, नानजिंग) पर चंद्रमा अंकुश-सा है।
II
वर्षा-पुष्प वेदी (雨花台) के पास टूटे भाले पड़े; नो-सॉरो झील (莫愁湖) में हल्की तरंगें शेष।
जिस सौंदर्य की मैं कामना करता हूँ, वह दिखाई नहीं देता; लौटकर नदी के आकाश को स्मरण करते हुए, एक भव्य गीत गाता हूँ।
श्री मासुदा वातारू को स्वदेश लौटते हुए विदाई (送增田涉君归国)
उगते सूर्य की भूमि (扶桑) में शरद जगमगाती; मेपल की पत्तियाँ, सिंदूर-सी लाल, नवीन शीतलता को प्रकाशित करतीं।
तथापि मैं रोता विलो (बेंत) तोड़कर यात्री को विदा करता हूँ; मेरा हृदय पूर्व की ओर बहते चप्पू का अनुसरण करता, पुष्पित वर्षों को स्मरण करते हुए।
शीर्षकहीन (无题)
रक्त मध्य मैदान (中原) को सींचता और जंगली घास पालता; शीत विशाल धरती को जमाता और वसंत पुष्प उगाता।
वीरों पर अनेक विपत्तियाँ, सलाहकार रोगग्रस्त; अश्रु छोंगलिंग (崇陵) की समाधियों पर छलकते जहाँ संध्या के कौवे काँवते हैं।
अकस्मात् रचना (偶成)
लेख धूल-से: कहाँ जाते हैं? पूर्व के मेघों को निहारता, स्वप्न याद करता।
खेद है कि सुगंधित वन इतना सूना; वसंत-आर्किड और शरद-गुलदाउदी एक साथ नहीं खिलते।
श्री पेंगज़ी को समर्पित (赠蓬子)
अचानक नील आकाश से एक अमर अवतरित; दो मेघ-रथ विलक्षण बालकों को ले जाते।
बेचारा पेंगज़ी (蓬子), जो स्वर्ग-पुत्र नहीं; इधर-उधर भागता, उत्तरी वायु निगलता!
28 जनवरी के युद्ध के पश्चात् लिखा (一二八战后作)
युद्ध के मेघ अभी सिमटे, शेष वसंत बाकी; भारी तोपें और स्पष्ट गीत, दोनों मूक।
मेरे पास भी विदाई नौका के लिए कविता नहीं; केवल हृदय की गहराई से शांति की कामना।
प्रोफ़ेसरों पर तीन व्यंग्य-छंद (教授杂咏三首)
I
ऐसे नियम बनाना जो स्वयं पर लागू न हों, शांति से चालीस पार कर जाता।
मोटा सिर दाँव पर लगाकर द्वंद्ववाद का खंडन करने से क्या फ़र्क?
II
बेचारी बुनकर तारा (织女星), चरवाहे (马郎) की पत्नी बन गई!
शायद मैग्पाई न आएँ; दूर, दूर, आकाशगंगा (牛奶路) का मार्ग।
III
संसार में साहित्य है; युवतियों के कूल्हे विशाल।
सूअर के बदले मुर्गी का शोरबा; और बेइशिन (北新) प्रकाशन ने अपने दरवाज़े बंद कर दिए।
जो सुना (所闻)
शानदार दीप खुले द्वार की हवेली में भोज प्रकाशित करते; सुंदर दासियाँ, कड़ी सज-धज में, जेड के प्याले परोसती हैं।
अचानक जली हुई मिट्टी के नीचे अपनों को याद करता; दिखावा करता कि रेशम के मोज़े देख रहा, रोने के निशान छुपाने को।
शीर्षकहीन (无题)
I
मेरी जन्मभूमि, अंधकारमय, काले मेघों में जकड़ी; दूर की रात और दूर का वसंत, विलग।
वर्ष के अंत में, और विषाद कैसे सहें? बेहतर है प्याला उठाओ और फ़ुगू मछली खाओ।
II
वू (吴) की दासी, श्वेत दंतपंक्ति, «विलो शाखाएँ» गाती; मद्य समाप्त, लोग मौन, वसंत की समाप्ति पर।
बिना कारण, एक पुराना स्वप्न नशे के अवशेष भगाता; अकेले, दीप की छाया के सामने, कोयल (子规) को स्मरण करता।
एक आगंतुक की आलोचना का उत्तर (答客诮)
कोई निर्विकार हो तो अनिवार्यतः वीर नहीं; संतान से प्रेम, यह पुरुष के लिए अगौरव कैसे?
क्या नहीं जानते कि जो तूफ़ान उठाता और प्रचंड गर्जना करता, पीछे मुड़कर अपने नन्हें बाघ-शावक (於菟) को निहारता है?
चित्रकार को समर्पित (赠画师)
नानजिंग (白下) में वायु बहती और सहस्र वन अंधकारमय; कुहरा धूसर आकाश को सील करता और सब पुष्प नष्ट।
चित्रकार से नवीन कल्पना माँगता हूँ: केवल लाल और काली स्याही पीसकर वसंत पर्वत चित्रित करे।
«युद्ध-नाद» पर लेख (题呐喊)
जो लेखनी चलाता, लेखनी के जाल में फँसता; जो संसार का सामना करता, संसार की भावनाओं का विरोधी बनता।
संचित निंदा हड्डियाँ नष्ट कर सकती; केवल काग़ज़ पर एक रिक्त प्रतिध्वनि शेष।
यांग चुआन की स्मृति में (悼杨铨)
क्या पूर्वकाल-सा वीरोचित उत्साह बचा? पुष्प खिलते और झरते: सब अपने क्रम से।
किसने सोचा था कि अश्रु जियांगनान (江南) की वर्षा के साथ बहेंगे? फिर एक बार इस जनता के एक साहसी के लिए रोता हूँ!
शीर्षकहीन (无题)
I
यू (禹域, चीन) के प्रदेश में उड़न जनरलों की भरमार; घोंघे-घरों में केवल अवकाशी वैरागी शेष।
रात को तालाब की तली के प्रतिबिंब को आमंत्रित करते; गहरी मदिरा से शाही कृपा का उत्सव मनाते।
II
शुद्ध सुरुचि की एक शाखा शियांग (湘灵) की आत्मा को सांत्वना देती; नौ खेतों की सत्यनिष्ठा अकेले जागने वाले को सांत्वना।
अंततः, सघन मुगवॉर्ट (萧艾) से हार अपरिहार्य; इस प्रकार निर्वासित अपनी सुगंध बिखेरता।
III
धुआँ और जल: सामान्य बात; उजड़े गाँव में, एक अकेला मछुआरा।
गहरी रात, नशे से जागता; सरकंडे और नरकट (菰蒲) खोजने को कहीं नहीं पाता।
मेरे मस्तिष्क-ज्वर की ख़बर पर विनोदपूर्ण रचना (报载患脑炎戏作)
क्या मेरी भृकुटी किसी दासी के सौंदर्य से प्रतिस्पर्धा करती? न सोचा था कि समस्त नारियों के हृदय का विरोध जारी रहेगा।
अभिशाप अब विचित्र हो गए; किंतु, क्या करें? मेरा मस्तिष्क अभी भी हिम-सा शीतल।
शीर्षकहीन (无题)
दस सहस्र घर काले मुखों के साथ झाड़ियों में विलीन; कौन साहस करे ऐसा विलाप गाने का जो धरती को कँपाए?
हृदय के विचार, विशाल और अपार, समस्त ब्रह्मांड से जुड़ते; मौन के स्थान पर गर्जना सुनाई देती।
शरद रात्रि में चिंतन (秋夜有感)
रेशम के पर्दों के पार क्षणभंगुर प्रकाश विदा होता; सरो और शाहबलूत के पास अनुष्ठान मनाया जाता।
सम्राट वांग (望帝) ने अंततः सुगंधित घास को रूपांतरण सिखाया; जगमगाती कँटीली झाड़ी विशाल खेतों के परित्याग को सजाती।
कहाँ से आते पनीर-फल सहस्र बुद्धों को अर्पित करने हेतु? कठिन है लिऊ (六郎) सदृश सुंदर कमल पाना।
मध्यरात्रि मुर्ग़ बाँग देता और वायु-वर्षा एकत्र होती; उठता हूँ, सिगरेट जलाता हूँ और नवीन शीतलता अनुभव करता हूँ।
सूअर वर्ष की शरद ऋतु में अकस्मात् रचना (亥年残秋偶作)
पूर्वकाल में शरद की कठोरता से चकित जो संसार पर टूटी; लेखनी की नोक पर वसंत की कोमलता भेजने का साहस नहीं।
धूल-भरे सागर में, विशाल और अपार, सौ भावनाएँ डूबतीं; सुनहरी वायु, विषादपूर्ण, सहस्र अधिकारियों को भगाती।
वृद्ध, लौटता महा दलदल में जहाँ सरकंडे समाप्त हो गए; स्वप्न रिक्त मेघों में गिरता, दंत और केश शीतल।
खोए मुर्ग़ की बाँग सुनने को कान उठाता, किंतु सर्वत्र मौन; उठकर तारों को देखता, जो मुँडेर पर जगमगाते।