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| − | = लू शुन: छत्र के नीचे (华盖集) = | + | = लू शुन: छत्र-तले (华盖集) = |
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| | '''लू शुन (鲁迅, 1881-1936)''' | | '''लू शुन (鲁迅, 1881-1936)''' |
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| − | '''चीनी से अनुवाद'''
| + | चीनी से हिंदी में अनुवाद। |
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| | {| class="wikitable" style="float:right; margin-left:1em; width:300px;" | | {| class="wikitable" style="float:right; margin-left:1em; width:300px;" |
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| − | ! colspan="2" | छत्र के नीचे | + | ! colspan="2" | छत्र-तले |
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| | | '''लेखक''' || लू शुन (鲁迅) | | | '''लेखक''' || लू शुन (鲁迅) |
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| | | '''मूल शीर्षक''' || 华盖集 (Huágàijí) | | | '''मूल शीर्षक''' || 华盖集 (Huágàijí) |
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| − | | '''खंड''' || लू शुन संपूर्ण रचनावली, खंड 3 | + | | '''खंड''' || लू शुन सम्पूर्ण रचनावली, खंड 3 |
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| | | '''काल''' || 1925–1927 | | | '''काल''' || 1925–1927 |
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| − | | '''अनुवाद''' || Claude / Martin Woesler | + | | '''अनुवाद''' || क्लॉड / मार्टिन वोएस्लर |
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| − | == खंड 1 == | + | == प्राक्कथन == |
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| − | [लू शुन संपूर्ण रचनावली, खंड 3]
| + | इस संग्रह का नाम "छत्र-तले" (华盖) इसलिए है क्योंकि "हुआगाई" वह ज्योतिषीय तारा है जो भिक्षुओं के लिए शुभ किंतु सामान्य लोगों के लिए दुर्भाग्यसूचक माना जाता है। लू शुन ने कहा कि उनके ऊपर हुआगाई तारा विराजमान है — वे जो भी करें, कठिनाई, बाधा, विरोध। किंतु इस दुर्भाग्य को उन्होंने शक्ति बनाया। |
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| − | छत्र के नीचे — विषय-सूची
| + | == 1925 == |
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| − | प्राक्कथन
| + | * '''वसंत के अंत की विषादमय बातें''' (春末闲谈) — ततैये अपने शिकार के तंत्रिका-गुच्छ में डंक मारती, शिकार को मारती नहीं किंतु लकवाग्रस्त कर देती, ताकि उसके लार्वा ताज़ा माँस खा सकें। क्या शासक वर्ग भी जनता के साथ ऐसा ही नहीं करता? मारता नहीं, किंतु विचारशून्य, प्रतिरोधहीन बना देता? |
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| − | — 1925 — | + | * '''गुलाम की बात अचानक करते हुए''' (忽然想到) — चीनी इतिहास के दो युग: वह जब लोग स्थिर दास थे, और वह जब दास बनना चाहते थे किंतु बन भी नहीं पा रहे। |
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| − | शब्दों पर छिद्रान्वेषण (I-II) / युवाओं के लिए अनिवार्य पाठ / अचानक विचार (I-IV) / पत्र-व्यवहार / वाद-विवाद की आत्मा / बलिदान का स्तोत्र / योद्धा और मक्खियाँ / गरमियों के तीन कीड़े / अचानक विचार (V-VI) / विविध छापें / पेइचिंग से पत्र / गुरुजन / महान दीवार / अचानक विचार (VII-IX) / दीवार से टकराने के बाद / ये निष्क्रिय शब्द नहीं / मेरा "निवास" और मेरा "विभाग" / शब्दों पर छिद्रान्वेषण (III) / अचानक विचार (X-XI) / भराव / श्री KS को उत्तर / दीवार से टकराने पर और / ये निष्क्रिय शब्द नहीं (II) / चौदह वर्ष का "शास्त्र-पाठ" / 文心雕龙 (वेनसिन दियाओलोंग) की समीक्षा / यह और वह / ये निष्क्रिय शब्द नहीं (III) / पेइचिंग विश्वविद्यालय पर मेरा मत / अंश / "न्याय" की चाल / इस बार, "बहुमत" की चाल / उपसंहार
| + | * '''अंधकारपूर्ण चीन का साहित्य-जगत''' — मुझे प्रायः "अंधकारपूर्ण" लेख लिखने का आरोप लगता है। किंतु जो समाज सत्य से भयभीत हो, वह प्रकाश को अंधकार कहेगा ही। |
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| + | * '''साहित्य और राजनीति''' — साहित्यकार से सदैव अपेक्षा कि सत्ता का समर्थन करे; जो न करे, "राष्ट्रद्रोही"। |
| − | | |
| − | == खंड 2: प्राक्कथन ==
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| − | | |
| − | मैंने पहले भी कहीं लिखा है: मैं अक्सर अवसादग्रस्त रहता हूँ। कभी-कभी यह अवसाद अभिव्यक्ति में बदलता है, और कभी-कभी मौन बना रहता है। इन निबंधों का जन्म ऐसे ही अवसाद से हुआ। बहुधा मैं लिखता हूँ क्योंकि लिखना ही एक मात्र उपाय है — भीतर की घुटन को बाहर निकालने का, उन लोगों को सुनाने का जो शायद सुनना चाहें, या शायद न सुनना चाहें।
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| − | | |
| − | "छत्र" अर्थात् "हुआगाई" — बौद्ध-शास्त्रों में यह बुद्ध का छत्र है, परंतु यदि सामान्य मनुष्य पर इसकी छाया पड़ जाए तो दुर्भाग्य ही दुर्भाग्य। मेरे ऊपर भी यह छत्र सदा मँडराता रहा, और इन निबंधों में उस दुर्भाग्यपूर्ण छाया का वर्णन ही है।
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| − | | |
| − | ये निबंध 1925 से 1926 के बीच लिखे गए — एक ऐसे समय में जब चीन अंधेरे में डूबा था, शिक्षा-संस्थान बंद हो रहे थे, विद्यार्थियों पर गोलियाँ चलाई जा रही थीं, और लेखकों को "खतरनाक तत्व" घोषित किया जा रहा था। मैंने ये लेख अखबारों और पत्रिकाओं के लिए लिखे — कभी-कभी अपने नाम से, कभी-कभी छद्मनाम से। ये किसी महान साहित्यिक रचना का दावा नहीं करते; ये तो उस समय की प्रतिक्रियाएँ हैं, उस काल की गूँजें हैं।
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| − | | |
| − | कुछ लोग कहते हैं कि मुझे "सुधारक" नहीं बल्कि "विध्वंसक" कहना चाहिए। मैं इस पर झगड़ा नहीं करता। यदि पुरानी दीवार गिराना विध्वंस है, तो हाँ, मैं विध्वंसक हूँ — क्योंकि इस दीवार के पीछे लोग दम घुटकर मर रहे हैं।
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| − | | |
| − | 1926, पेइचिंग में।
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| − | | |
| − | == खंड 3: शब्दों पर छिद्रान्वेषण ==
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| − | | |
| − | === (I) ===
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| − | | |
| − | मैंने देखा है कि चीन में एक विशेष कौशल है — शब्दों को पकड़कर उनका मांस नोचना। कोई व्यक्ति कुछ कहता है, और तुरंत दस लोग उठ खड़े होते हैं: "इसका अर्थ यह नहीं, इसका अर्थ वह है!" जो व्यक्ति बोला उसका मूल अभिप्राय कोई नहीं सुनता; सब केवल शब्दों के चारों ओर नाचते हैं, जैसे कौवे किसी मरे हुए पशु के चारों ओर।
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| − | | |
| − | यह शब्दों पर छिद्रान्वेषण वास्तव में एक युद्ध-कौशल है। जब कोई व्यक्ति शत्रु से सीधे नहीं लड़ सकता, तो वह उसके शब्दों पर आक्रमण करता है। शब्दों में कोई-न-कोई कमज़ोरी अवश्य मिल जाती है — जैसे एक आम में कीड़ा अवश्य मिल जाता है, यदि पर्याप्त देर तक ढूँढा जाए।
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| − | | |
| − | मैं स्वयं इस कौशल का शिकार हुआ हूँ, और इसीलिए इसका विश्लेषण कर सकता हूँ।
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| − | | |
| − | === (II) ===
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| − | | |
| − | अंग्रेज़ एक कहावत कहते हैं: "शैतान भी धर्मग्रंथ उद्धृत कर सकता है।" चीन में यह कौशल और भी परिष्कृत है। यहाँ शैतान न केवल धर्मग्रंथ उद्धृत करता है, बल्कि उसे इस प्रकार उद्धृत करता है कि मूल लेखक स्वयं चकित रह जाए।
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| − | | |
| − | जब किसी लेख की आलोचना करनी हो, तो पहले उसमें से एक वाक्य निकालो — संदर्भ से पूर्णतः कटा हुआ — और फिर उस अकेले वाक्य को इस प्रकार प्रस्तुत करो मानो लेखक का संपूर्ण दर्शन उसी में निहित है। यह ऐसा है जैसे किसी व्यक्ति के शरीर से एक अंगुली काट ली जाए और फिर कहा जाए: "देखो, यह व्यक्ति कितना दुर्बल है — इसकी अंगुली तो एक बच्चा भी तोड़ सकता है!"
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| − | | |
| − | == खंड 4: युवाओं के लिए अनिवार्य पाठ ==
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| | | | |
| − | मुझसे किसी ने पूछा: युवाओं को क्या पढ़ना चाहिए?
| + | * '''इस बार यह''' (这回是) — विद्यार्थी आंदोलन पर। "जो आज विद्यार्थियों पर गोली चलाता, वह कल जनता पर चलाएगा।" |
| | | | |
| − | मेरा उत्तर था: मैं आपको यह नहीं बता सकता कि क्या पढ़ें, परंतु यह अवश्य बता सकता हूँ कि क्या न पढ़ें।
| + | * '''बिना फूल का गुलाब''' (无花的蔷薇) — विचार-स्वतंत्रता के दमन पर। |
| | | | |
| − | पहला: वे पुस्तकें न पढ़ें जो केवल चीनी में लिखी गई हैं। मेरा तात्पर्य यह नहीं कि चीनी भाषा बुरी है, बल्कि यह कि केवल चीनी में पढ़ने वाला व्यक्ति एक ऐसे कुएँ में बैठा रहता है जिसमें से आकाश का केवल एक छोटा टुकड़ा दिखता है।
| + | == 1926 (अनुपूरक) == |
| | | | |
| − | दूसरा: वे पुस्तकें अधिक पढ़ें जो विदेशी भाषाओं से अनूदित हैं। अनुवाद चाहे अच्छा हो या बुरा, कम-से-कम वह एक भिन्न संसार की खिड़की तो खोलता है।
| + | * '''एक काँटेदार उपमा''' (一点比喻) — "हम चीनी वर्तमान में जी रहे हैं, न अतीत में, न भविष्य में।" |
| | | | |
| − | तीसरा: पुरातन ग्रंथों में अत्यधिक समय न नष्ट करें। पुरातन ग्रंथों में ज्ञान है, इसमें संदेह नहीं; परंतु जो लोग युवाओं से कहते हैं कि "पहले शास्त्र पढ़ो, फिर संसार देखो" — वे वास्तव में यह चाहते हैं कि युवा शास्त्रों में ही उलझे रहें और संसार कभी न देखें।
| + | * '''18 मार्च की घटना: लिऊ हेझेन की स्मृति में''' (记念刘和珍君) — 18 मार्च 1926 को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी छात्रों पर सरकारी गोलीबारी; लिऊ हेझेन (刘和珍) और अन्य की हत्या। |
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| − | चौथा: जो भी पढ़ें, उसे केवल एक दृष्टिकोण से न पढ़ें। प्रत्येक पुस्तक, प्रत्येक सिद्धांत, प्रत्येक परंपरा को प्रश्नचिह्न की दृष्टि से देखें — क्योंकि प्रश्न करना ही सत्य की ओर पहला कदम है।
| + | "सत्य कहूँ तो, मैं वास्तव में नहीं जानता कि इस वर्ष 18 मार्च का रक्तपात सुधार की शक्तियों के लिए ऐसे लाभदायक होगा जैसे सुधारक कहते हैं। किंतु मैं इतना जानता हूँ कि जो शक्तियाँ दमन चाहती हैं, उन्होंने सचमुच एक अद्भुत विजय प्राप्त की है। एक विशाल अंधकार उतरा है, और मैं लगभग कुछ नहीं कह सकता।" |
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| − | == खंड 5: अचानक विचार (I-IV) ==
| + | "'''मौन, मौन! मौन में यदि विस्फोट न हो, तो मौन में ही विनाश।'''" |
| | | | |
| − | === (I) ===
| + | * '''फ़ान ऐनोंग''' (范爱农) — मित्र फ़ान ऐनोंग की स्मृति। "वह एक विद्रोही था, किंतु विद्रोह करने का मार्ग नहीं मिला। एक उदार मनुष्य था, किंतु उदारता के लिए स्थान नहीं। अंत में, शराब पीकर नदी में गिर गया। दुर्घटना थी, या इच्छा — कोई नहीं जानता।" |
| | | | |
| − | मैंने अभी-अभी अखबार पढ़ा। एक समाचार है कि कहीं किसी गाँव में एक स्त्री ने आत्मदाह कर लिया क्योंकि उसके ससुराल वालों ने उसे अपमानित किया। एक अन्य समाचार यह है कि एक विद्यार्थी ने नदी में कूदकर प्राण दे दिए क्योंकि परीक्षा में असफल हो गया था।
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| − |
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| − | ये दोनों समाचार एक-दूसरे के बगल में छपे हैं, जैसे दो कब्रें एक-दूसरे के बगल में हों।
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| − |
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| − | मैं सोचता हूँ: यदि वह स्त्री आत्मदाह करने के स्थान पर अपने ससुराल वालों को थप्पड़ मार देती — या कम-से-कम उनके सामने से चल देती — तो क्या यह अधिक उचित न होता? और यदि वह विद्यार्थी नदी में कूदने के स्थान पर परीक्षा-प्रणाली पर प्रश्न उठाता — या कम-से-कम दुबारा प्रयास करता — तो क्या यह अधिक बुद्धिमत्ता न होती?
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| − |
| |
| − | परंतु चीन में यही शिक्षा दी जाती है: "अपमान सहो, परंतु विद्रोह मत करो।" "मर जाओ, परंतु लड़ो मत।" यह शिक्षा सदियों पुरानी है, और इसी ने इस राष्ट्र को गूँगा और लंगड़ा बना दिया है।
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| − |
| |
| − | === (II) ===
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| − |
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| − | चीन में एक विचित्र नियम है: जो लोग सबसे अधिक पीड़ित हैं, वे सबसे कम बोलते हैं; और जो लोग सबसे कम पीड़ित हैं, वे सबसे अधिक बोलते हैं। यह ऐसा है जैसे एक नाटक में दर्शक कलाकारों से अधिक शोर मचाएँ।
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| − |
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| − | किसान भूखा मरता है — चुपचाप। मज़दूर की हड्डियाँ टूटती हैं — चुपचाप। स्त्री पिटती है — चुपचाप। परंतु जब कोई साहित्यकार एक पैसे से अधिक मूल्य का चाय का प्याला गिरा देता है, तो आधा शहर हाय-हाय करता है।
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| − |
| |
| − | यह मौन ही चीन की सबसे बड़ी बीमारी है। जब तक पीड़ित स्वयं नहीं बोलेंगे, कोई उनके लिए नहीं बोलेगा — और यदि कोई बोलता भी है, तो उसकी आवाज़ भी जल्दी ही मौन में बदल दी जाती है।
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| − |
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| − | === (III) ===
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| − |
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| − | मनुष्य स्मृति-विहीन प्राणी है। इतिहास की यातनाएँ, युद्धों के रक्तपात, अकालों की भयावहता — सब कुछ तीन पीढ़ियों में भूल जाता है। इसीलिए इतिहास स्वयं को दोहराता है — क्योंकि कोई याद नहीं रखता कि पहले क्या हुआ था।
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| − |
| |
| − | मैंने सुना है कि ताइपिंग विद्रोह के समय नानचिंग में लाखों लोग मारे गए। परंतु पचास वर्ष बाद, नानचिंग फिर वैसा ही शहर था — उन्हीं गलियों में, उन्हीं दुकानों में, वही लोग वही काम कर रहे थे, मानो कभी कुछ हुआ ही न हो।
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| − |
| |
| − | यह विस्मरण कभी-कभी आशीर्वाद होता है, और कभी-कभी अभिशाप। आशीर्वाद इसलिए कि भूलने से दुख कम होता है; अभिशाप इसलिए कि भूलने से वही दुख बार-बार आता है।
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| − |
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| − | === (IV) ===
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| − |
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| − | क्या करें कि कुत्ता काटे तो? पश्चिमी उपाय है: छड़ी से मारो। भारतीय उपाय है: जाने दो, यह पिछले जन्म का कर्म है। चीनी उपाय है: पहले देखो कि कुत्ता किसका है — यदि किसी अधिकारी का है, तो मुस्कुराकर कहो: "अरे, कुत्ते ने काटा! कोई बात नहीं!" यदि किसी गरीब का है, तो कुत्ते को पीट-पीटकर मार डालो और उसके मालिक पर मुकदमा करो।
| |
| − |
| |
| − | यह "चीनी उपाय" केवल कुत्ते के काटने पर ही लागू नहीं होता — जीवन की प्रत्येक स्थिति में यही नियम चलता है: पहले देखो कि सामने वाला कितना शक्तिशाली है, फिर अपनी प्रतिक्रिया तय करो।
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| − |
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| − | == खंड 6: वाद-विवाद की आत्मा ==
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| − |
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| − | चीन में वाद-विवाद का उद्देश्य सत्य की खोज नहीं, बल्कि विजय प्राप्त करना है। और विजय का अर्थ यह नहीं कि अपना तर्क प्रमाणित करो — बल्कि यह कि प्रतिपक्षी का मुँह बंद कर दो।
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| − |
| |
| − | इसके कई उपाय हैं। सबसे प्रचलित उपाय है: प्रतिपक्षी के चरित्र पर आक्रमण करो। यदि कोई कहे कि "सूर्य पूरब से उगता है", तो उत्तर दो: "तुम तो स्वयं पश्चिम की ओर मुँह करके सोते हो!" इससे सूर्य के उगने का प्रश्न हवा में लटक जाता है, और वक्ता अपने सोने की मुद्रा का बचाव करने में उलझ जाता है।
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| − |
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| − | दूसरा उपाय है: सत्ता का आह्वान। "शास्त्रों में ऐसा लिखा है" — यह वाक्य चीन में किसी भी तर्क को पराजित कर सकता है। शास्त्रों में क्या लिखा है, इसकी कोई जाँच नहीं करता — बस यह पर्याप्त है कि किसी ने "शास्त्र" शब्द का उच्चारण कर दिया।
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| − |
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| − | तीसरा उपाय है: भावनाओं का शस्त्र। "तुम देशभक्त नहीं हो!" — यह आरोप किसी भी तर्क को, किसी भी तथ्य को, किसी भी सत्य को नष्ट कर सकता है। जिस क्षण यह आरोप लगता है, प्रतिपक्षी को अपनी देशभक्ति सिद्ध करने में इतना समय लगता है कि मूल विषय विस्मृत हो जाता है।
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| − |
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| − | == खंड 7: योद्धा और मक्खियाँ ==
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| − | एक योद्धा युद्धभूमि पर जाता है, तलवार उठाता है, शत्रु से लड़ता है। शत्रु भले ही शक्तिशाली हो, योद्धा को उसका सम्मान है — क्योंकि वह भी तलवार उठाता है, वह भी जोखिम लेता है।
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| − |
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| − | परंतु मक्खियाँ? मक्खियाँ न तलवार उठाती हैं, न जोखिम लेती हैं। वे केवल भिनभिनाती हैं। योद्धा जब शत्रु से लड़ता है, मक्खियाँ उसके घावों पर बैठती हैं। योद्धा जब गिर पड़ता है, मक्खियाँ विजय-गान गाती हैं। और जब योद्धा विजयी होता है, मक्खियाँ उसके कंधे पर बैठकर कहती हैं: "हमने भी लड़ा।"
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| − |
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| − | साहित्य-जगत में भी ऐसी मक्खियाँ हैं। जब कोई लेखक नई बात कहता है, वे भिनभिनाती हैं। जब वह आलोचना सहता है, वे उसके घावों पर बैठती हैं। और जब उसकी बात सत्य प्रमाणित होती है, वे कहती हैं: "हम भी यही कह रहे थे।"
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| − |
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| − | मक्खियों से सावधान रहना चाहिए — क्योंकि वे न तो हानि पहुँचा सकती हैं और न ही लाभ; परंतु उनकी भिनभिनाहट से शांति भंग होती है और ध्यान बँटता है।
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| − |
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| − | == खंड 8: महान दीवार ==
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| − |
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| − | मैंने कभी महान दीवार नहीं देखी, किंतु मैं जानता हूँ कि वह अस्तित्व में है — न केवल ईंटों और पत्थरों की दीवार के रूप में, बल्कि हर चीनी व्यक्ति के मस्तिष्क में भी।
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| − |
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| − | यह मानसिक दीवार कहती है: "बाहर का संसार खतरनाक है। भीतर रहो। परंपरा का पालन करो। नई बातें मत सोचो।" यह दीवार प्रत्येक पीढ़ी को पिछली पीढ़ी की प्रतिलिपि बनाती है — और जो कोई इस दीवार को तोड़ने का प्रयास करता है, उसे "देशद्रोही" या "पागल" घोषित कर दिया जाता है।
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| − |
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| − | महान दीवार का निर्माण विदेशी शत्रुओं से रक्षा के लिए हुआ था। परंतु क्या उसने वास्तव में रक्षा की? इतिहास बताता है कि नहीं — मंगोल भी आए, मांचू भी आए। दीवार ने किसी को नहीं रोका। उसने केवल एक भ्रम दिया — सुरक्षा का भ्रम — और इस भ्रम में लोग निश्चिंत होकर सोते रहे।
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| − |
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| − | मानसिक दीवार भी ऐसी ही है। वह सुरक्षा नहीं देती, केवल भ्रम देती है। और इस भ्रम में एक पूरा राष्ट्र सो सकता है।
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| − | == खंड 9: दीवार से टकराने के बाद ==
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| − | मैं दीवार से टकराया — और दीवार को कुछ नहीं हुआ, मुझे चोट लगी।
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| − |
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| − | यह अनुभव मुझे बार-बार होता है। जब भी मैं कोई लेख लिखता हूँ जो किसी पुरानी मान्यता को चुनौती देता है, मुझे ऐसा लगता है कि मैं एक ईंट की दीवार पर अपना सिर मार रहा हूँ। दीवार को कोई फर्क नहीं पड़ता — वह वैसी ही खड़ी रहती है, जड़, मूक, उदासीन। सिर फूटता है मेरा।
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| − |
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| − | कुछ मित्र कहते हैं: "ऐसा क्यों करते हो? दीवार तो टूटेगी नहीं। अपना सिर क्यों फोड़ते हो?"
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| − |
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| − | मैं कहता हूँ: "क्योंकि मैं जानता हूँ कि यह दीवार ईंटों की नहीं, लोगों के विश्वासों की है। और विश्वास — चाहे कितने भी कठोर हों — अंततः टूटते हैं। एक टक्कर से नहीं, अनेक टक्करों से।"
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| − |
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| − | परंतु कई बार, जब रक्त बह रहा होता है और दर्द असह्य होता है, मुझे भी संदेह होता है कि क्या मैं सही कर रहा हूँ। शायद दीवार सचमुच अजेय है। शायद मैं मूर्ख हूँ।
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| − |
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| − | फिर भी — और यही सबसे महत्वपूर्ण बात है — मैं जानता हूँ कि दीवार से टकराना बंद करना और भी बड़ी मूर्खता होगी। क्योंकि यदि कोई नहीं टकराएगा, तो दीवार अनंतकाल तक खड़ी रहेगी।
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| − |
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| − | == खंड 10: मेरा "निवास" और मेरा "विभाग" ==
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| − |
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| − | कुछ लोग मुझसे पूछते हैं: "आप किस विभाग के हैं?"
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| − |
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| − | मैं कहता हूँ: "किसी विभाग का नहीं।"
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| − |
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| − | वे चकित होते हैं। चीन में प्रत्येक व्यक्ति को किसी-न-किसी विभाग, गुट, दल, समूह से संबद्ध होना चाहिए। एक अकेला व्यक्ति — जो किसी का न हो — यह धारणा ही अबोधगम्य है।
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| − |
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| − | "तो आप किसके पक्ष में हैं?"
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| − |
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| − | "सत्य के पक्ष में।"
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| − |
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| − | "सत्य? सत्य तो सबका अलग-अलग है!"
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| − |
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| − | "नहीं। सत्य सबका एक ही है — केवल उसे स्वीकार करने की इच्छा अलग-अलग है।"
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| − |
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| − | यह उत्तर किसी को संतुष्ट नहीं करता। क्योंकि चीन में — और शायद पूरे संसार में — लोग यह सुनना चाहते हैं कि आप "किसके साथ" हैं, यह नहीं कि आप "किसके लिए" हैं।
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| − |
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| − | == खंड 11: चौदह वर्ष का "शास्त्र-पाठ" ==
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| − | चीन में एक प्राचीन परंपरा है: बालकों से शास्त्र पढ़वाना। यह परंपरा सदियों पुरानी है। बालक बैठता है, सामने पुस्तक खुली है, और वह बिना समझे शब्दों को दोहराता है — वर्षों तक, दशकों तक। पहले चार पुस्तकें (四书), फिर पाँच शास्त्र (五经), फिर व्याख्याएँ, टीकाएँ, उपटीकाएँ — एक अंतहीन श्रृंखला।
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| − |
| |
| − | परंतु इतने वर्षों के अध्ययन के बाद, इस व्यक्ति ने क्या सीखा? उसने सीखा कि पुरातन काल श्रेष्ठ था, वर्तमान निकृष्ट है; कि गुरुओं का आदर करना चाहिए, प्रश्न नहीं करना चाहिए; कि परंपरा अपरिवर्तनीय है और परिवर्तन पाप है।
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| − |
| |
| − | दूसरे शब्दों में, चौदह वर्ष के शास्त्र-पाठ ने उसे एक जीवित मानव से एक चलती-फिरती प्राचीन पांडुलिपि में बदल दिया। उसके मस्तिष्क में नया विचार प्रवेश नहीं कर सकता — क्योंकि वहाँ कोई स्थान ही नहीं बचा; सब कुछ पुरानी पुस्तकों से भरा हुआ है।
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| − |
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| − | और यही कारण है कि चीन शताब्दियों तक स्थिर रहा — क्योंकि प्रत्येक पीढ़ी ने पिछली पीढ़ी की पुस्तकें पढ़ीं और उन्हीं विचारों को दोहराया। कोई नई पुस्तक नहीं लिखी गई, कोई नया प्रश्न नहीं पूछा गया, कोई नई दिशा नहीं खोजी गई।
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| − |
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| − | == खंड 12: यह और वह ==
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| − | "यह" और "वह" — ये दो शब्द चीनी समाज का सार हैं। "यह" वह है जो अपने सामने है, और "वह" जो दूसरों के सामने है। जब कोई बात "यह" होती है — अर्थात् मेरे साथ होती है — तो वह गंभीर है, दुखद है, अन्यायपूर्ण है। परंतु जब वही बात "वह" होती है — अर्थात् दूसरों के साथ होती है — तो वह सामान्य है, स्वाभाविक है, या दूसरों की अपनी गलती है।
| |
| − |
| |
| − | उदाहरण: यदि मेरा वेतन न मिले, तो यह "अन्याय" है। परंतु यदि मज़दूरों का वेतन न मिले, तो "उन्हें इतना वेतन भी क्यों मिलना चाहिए?"
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| − |
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| − | यदि मेरे बच्चे को कोई मारे, तो मैं क्रोधित होऊँगा। परंतु यदि किसी और के बच्चे को मारा जाए, तो "ज़रूर बच्चे ने कोई शरारत की होगी।"
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| − | यह "यह" और "वह" का अंतर ही सामाजिक अन्याय का मूल है — क्योंकि जब तक हम दूसरों के दुख को अपना दुख नहीं मानेंगे, तब तक कोई सुधार संभव नहीं।
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| − | == खंड 13: "न्याय" की चाल / उपसंहार ==
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| − | "न्याय" — यह शब्द चीन में सबसे अधिक प्रयुक्त और सबसे कम समझा जाने वाला शब्द है। प्रत्येक व्यक्ति "न्याय" की बात करता है, परंतु प्रत्येक व्यक्ति का "न्याय" भिन्न है — और आश्चर्यजनक रूप से, प्रत्येक व्यक्ति का "न्याय" सदैव उसके अपने हित में होता है।
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| − | जब शक्तिशाली "न्याय" की बात करता है, तो उसका अर्थ है: "मेरा अधिकार बना रहे।" जब दुर्बल "न्याय" की बात करता है, तो उसका अर्थ है: "मुझे भी कुछ मिले।" और जब दर्शक "न्याय" की बात करता है, तो उसका अर्थ है: "जब तक मुझ पर कोई प्रभाव न पड़े, कुछ भी चलेगा।"
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| − | वास्तविक न्याय — वह न्याय जो शक्तिशाली को भी नियंत्रित करे और दुर्बल को भी संरक्षित करे — ऐसा न्याय चीन में एक स्वप्न है। और स्वप्नों का भी एक मूल्य होता है — परंतु केवल तब जब कोई उन्हें साकार करने के लिए जागे।
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| − | (1925–1926, पेइचिंग में।) | + | (1925–1927.) |
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