Lu Xun Complete Works/zh-hi/Yijian Xiaoshi

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一件小事 — एक छोटी घटना (一件小事)

中文 (Chinese) हिंदी (Hindi)
नोट / 注意: इस रचना में चीनी में 488 और हिंदी में 19 अनुच्छेद हैं। पूर्ण पाठ के लिए: 中文 और हिंदी
【一件小事】 एक छोटी घटना
我从乡下跑到京城里,一转眼已经六年了。其间耳闻目睹的所谓国家大事,算起来也很不少;但在我心里,都不留甚么痕迹,倘要我寻出这些事的影响来说,便只是增长了我的坏脾气,——老实说,便是教我一天比一天的看不起人。 जब से मैं ग्रामीण क्षेत्र से राजधानी आया, पलक झपकते छह वर्ष बीत गए। इस अवधि में राष्ट्रीय महत्त्व के अनेक तथाकथित बड़े मामले सुने और देखे; किंतु किसी ने भी मेरे हृदय पर कोई छाप नहीं छोड़ी। यदि इन घटनाओं के प्रभाव की ओर संकेत करना हो, तो बस इतना कि उन्होंने मेरा स्वभाव और बिगाड़ा: स्पष्ट कहूँ तो, उन्होंने मुझे प्रतिदिन लोगों को कुछ और तुच्छ मानना सिखाया।
但有一件小事,却于我有意义,将我从坏脾气里拖开,使我至今忘记不得。 तथापि, एक छोटी घटना ने मेरे लिए महत्त्व रखा: उसने मुझे मेरे दुर्गुणों से झकझोर कर बाहर निकाला, और आज तक मैं उसे भूल नहीं पाया।
这是民国六年的冬天,大北风刮得正猛,我因为生计关系,不得不一早在路上走。一路几乎遇不见人,好容易才雇定了一辆人力车,教他拉到S门去。不一会,北风小了,路上浮尘早已刮净,剩下一条洁白的大道来,车夫也跑得更快。刚近S门,忽而车把上带着一个人,慢慢地倒了。 वह गणतंत्र के छठे वर्ष की शीत ऋतु थी। उत्तरी हवा प्रचंड वेग से बह रही थी। जीविका की आवश्यकता से विवश होकर मुझे प्रातः ही बाहर निकलना पड़ा। पूरे रास्ते मुश्किल से कोई दिखा। बड़ी कठिनाई से एक रिक्शा किराये पर मिला और मैंने रिक्शा-चालक से कहा कि एस-द्वार तक ले चले। कुछ देर में उत्तरी हवा शांत हुई। सड़क की धूल बह चुकी थी और एक स्वच्छ श्वेत सड़क दिखी। रिक्शा-चालक भी तेज़ दौड़ने लगा। ठीक जब हम एस-द्वार के निकट पहुँचे, कोई अचानक डंडों में अटक गया और धीरे-धीरे गिरा।
跌倒的是一个女人,花白头发,衣服都很破烂。伊从马路边上突然向车前横截过来;车夫已经让开道,但伊的破棉背心没有上扣,微风吹着,向外展开,所以终于兜着车把。幸而车夫早有点停步,否则伊定要栽一个大斤斗,跌到头破血出了。 गिरने वाली एक सफ़ेद बालों वाली, फटे-पुराने वस्त्र पहने वृद्ध स्त्री थी। वह अचानक सड़क के किनारे से रिक्शे के सामने आ गई थी। चालक ने मोड़ तो लिया था, किंतु उसका पुराना रुई-भरा बनियान खुला था और हवा ने उसे फैला दिया, जिससे वह डंडों में अटक गई। सौभाग्य से चालक ने गति कम कर दी थी, अन्यथा बुरी तरह गिरती और सिर फट जाता।
伊伏在地上;车夫便也立住脚。我料定这老女人并没有伤,又没有别人看见,便很怪他多事,要自己惹出是非,也误了我的路。 वह ज़मीन पर पड़ी थी; रिक्शा-चालक भी रुक गया। मुझे पूर्ण विश्वास था कि बूढ़ी को चोट नहीं लगी। चूँकि कोई देख भी नहीं रहा था, मुझे चिढ़ हुई कि वह अनावश्यक रूप से बीच में आई, अपने लिए मुसीबत मोल ली और मेरी यात्रा विलंबित की।
我便对他说,“没有什么的。走你的罢!” मैंने कहा: "कुछ नहीं हुआ। आगे चलो!"
车夫毫不理会,——或者并没有听到,——却放下车子,扶那老女人慢慢起来,搀着臂膊立定,问伊说: रिक्शा-चालक ने मेरी ओर ध्यान ही नहीं दिया — या शायद सुना ही नहीं — बल्कि रिक्शा छोड़कर, बूढ़ी को धीरे-धीरे उठाया, बाँह से सहारा दिया और पूछा:
“你怎么啦?” "क्या हुआ आपको?"
“我摔坏了。” "मुझे चोट लगी है।"
我想,我眼见你慢慢倒地,怎么会摔坏呢,装腔作势罢了,这真可憎恶。车夫多事,也正是自讨苦吃,现在你自己想法去。 मैंने सोचा: मैंने तुम्हें धीरे-धीरे गिरते देखा... चोट कैसी? यह तो नाटक है, सचमुच घृणित। चालक बेवजह पंगा ले रहा है, अपना ही नुकसान कर रहा है। जो करना है करो।
车夫听了这老女人的话,却毫不踌躇,仍然搀着伊的臂膊,便一步一步的向前走。我有些诧异,忙看前面,是一所巡警分驻所,大风之后,外面也不见人,这车夫扶着那老女人,便正是向那大门走去。 रिक्शा-चालक ने बूढ़ी की बात सुनी किंतु एक क्षण भी नहीं हिचकिचाया। बाँह से सहारा देता हुआ क़दम-दर-क़दम आगे बढ़ता गया। मैं कुछ चकित हुआ और सामने देखा: एक मोहल्ला पुलिस चौकी थी। आँधी के बाद बाहर भी कोई नहीं दिखता था। चालक बूढ़ी को सीधे उस दरवाज़े की ओर ले गया।
我这时突然感到一种异样的感觉,觉得他满身灰尘的后影,刹时高大了,而且愈走愈大,须仰视才见。而且他对于我,渐渐的又几乎变成一种威压,甚而至于要榨出皮袍下面藏着的“小”来。 उस क्षण अचानक एक विचित्र अनुभूति ने मुझे घेर लिया। उसकी धूल-भरी पीठ की आकृति एक ही क्षण में विशाल हो गई और जितना आगे बढ़ती गई, उतनी बड़ी होती गई, यहाँ तक कि मुझे ऊपर देखना पड़ा। इसके अतिरिक्त, वह मुझ पर एक प्रकार का दबाव बनती गई, मानो मेरे ऊनी कोट के नीचे छिपी "लघुता" को निचोड़कर बाहर निकालना चाहती हो।
我的活力这时大约有些凝滞了,坐着没有动,也没有想,直到看见分驻所里走出一个巡警,才下了车。 उस क्षण मेरी जीवन-शक्ति जम गई। बैठा रहा, न हिला, न सोचा, जब तक चौकी से एक पुलिसकर्मी बाहर नहीं आया। तभी रिक्शे से उतरा।
巡警走近我说,“你自己雇车罢,他不能拉你了。” पुलिसकर्मी मेरे पास आया और बोला: "अब आप दूसरा रिक्शा ले लें। यह आदमी अब आपको नहीं ले जा सकता।"
我没有思索的从外套袋里抓出一大把铜元,交给巡警,说,“请你给他……” बिना सोचे मैंने कोट की जेब से ताँबे के सिक्कों का एक बड़ा मुट्ठा निकाला, पुलिसकर्मी को दिया और कहा: "कृपया इन्हें उसे दे दीजिए..."
风全住了,路上还很静。我走着,一面想,几乎怕敢想到我自己。以前的事姑且搁起,这一大把铜元又是什么意思?奖他么?我还能裁判车夫么?我不能回答自己。 हवा पूर्णतः थम चुकी थी और सड़क पर सन्नाटा था। चलता गया और सोचता गया, लगभग अपने बारे में सोचने से डरता हुआ। अतीत को छोड़ भी दें, तो ताँबे के सिक्कों के उस बड़े मुट्ठे का क्या अर्थ था? उसे पुरस्कृत करना? क्या मैं रिक्शा-चालक का मूल्यांकन कर सकता था? अपने आप को उत्तर नहीं दे पाया।
这事到了现在,还是时时记起。我因此也时时熬了苦痛,努力的要想到我自己。几年来的文治武力,在我早如幼小时候所读过的“子曰诗云”一般,背不上半句了。独有这一件小事,却总是浮在我眼前,有时反更分明,教我惭愧,催我自新,并且增长我的勇气和希望。 यह घटना आज भी कभी-कभी मेरे स्मरण में आती है। और इसीलिए मैं प्रायः व्यथित होता हूँ और अपने विषय में चिंतन करने का प्रयास करता हूँ। नागरिक शासन और सैन्य शक्ति के वर्ष मेरे लिए बचपन में पढ़े "गुरु के वचनों और कवियों के छंदों" जैसे हो गए: आधी पंक्ति भी याद नहीं। केवल यह छोटी घटना मेरी आँखों के सामने तैरती रहती है, कभी-कभी और भी अधिक स्पष्ट, मुझे लज्जित करती, नवीनता की ओर प्रेरित करती, और मेरे साहस और आशा को बढ़ाती।
(一九二○年七月。) (जुलाई 1920)
【第八章】
乞乞科夫的农奴购买,已经成为市镇上谈话的对象了。人们争辩,交谈,还研究那为了移住的目的来购买农奴,到底是否有利。其中的许多讨论,是以确切和客观出色的:“自然有益,”一个说,“南省的地土,又好又肥,那是不消说得,但没有水,可教乞乞科夫的农奴怎么办呢?那地方是没有河的呀。”——“那倒还不要紧,就是没有河,也还不算什么的,斯台班·特密忒里维支;不过移民是一件很没把握的事情。谁都知道,农奴是怎么的:他搬到新地方去种地——那地方可是什么也没有——没有房屋,也没有庄园——我对你们说,他是要跑掉的,准得像二二如四一样,系好他的靴子,他走了,到找着他,您得费许多日子!”——“不不,请您原谅,亚历舍·伊凡诺维支,我可全不是您那样的见解。如果您说,农奴们是要从乞乞科夫那里逃走的。一个真的俄罗斯人,是什么事情都做得来,什么气候都住得惯的。您只要给他一双温暖的手套,那么,您要送他到那里去,就到那里去,就是一直到康木卡太也不要紧。他会跑一下,取点暖,捏起斧头,造一间新屋子的。”——“然而亲爱的伊凡·格力戈利也维支,你可把一件事情完全忘掉了:你竟全没想到,乞乞科夫买了去的是怎样的农奴。你全忘了一个地主,是决不肯这么轻易的放走一个好家伙的,如果不是酒鬼,醉汉,以及撒野,偷懒的东西,你拿我的脑袋去。”——“是了,这我也同意,没有人肯卖掉一个好家伙,乞乞科夫的人们大概多半是酒鬼,那自然是对的,但还应该想一想历来的道德:刚才也许确是一条懒虫,然而如果把他一迁移,就能突然变成一个诚实的奴仆。这在世界上,在历史上,也不是初见的例子了。”——“不——不然,”国立工厂的监督说。“您要相信我,这是决不然的,因为对于乞乞科夫的农奴,现有两个大敌在那里。第一敌——是和小俄罗斯的各省相近,那地方,谁都知道,卖酒是自由的。我敢对你们断定,只要两礼拜,他们便浸在酒里,成为游惰汉和偷懒的了。第二敌——是放浪生活的习惯和嗜好,这是他们从移住学来的。乞乞科夫必须看定,管住,他应该把他们管得严,每一件小事情,都要罚得重,什么也不托别人做,都是自己来,必要的时候,就给鞭子,打嘴巴。”——“为什么乞乞科夫要亲自去给鞭子呢?他可以用一个监督的。”——“好,您找得到很合适的监督吗?那简直都是骗子和流氓!”——“这是因为主人自己不内行,他们这才成为骗子的。”——“对啦,”许多人插嘴说。——“如果地主自己懂一点田产上的事务,明白他的人们——那么,他总能找到好监督。”然而国立工厂的监督抗议了,以为五千卢布以下,是找不到好监督的。审判厅长却指摘说,只用三千卢布;也就能够找一个,于是监督质问道:“您豫备从那里去找他呢?您能够从您的鼻子里挖出他来吗?”审判厅长的回答是:“鼻子里当然挖不出来的,那不成。不过这里,就在这区里,却是有一个,就是彼得·彼得洛维支·萨木倚罗夫,如果乞乞科夫要他来监督他的农奴,却正是合式的人物!”许多人试把自己置身在乞乞科夫的地位上和这一大群农奴移住到陌生地方去,就觉得忧愁,真是一件大难事;大家尤其害怕的是像乞乞科夫的农奴那样不稳当的材料,还会造起反来。这时警察局长注意说,造反倒是不足虑的;要阻止它,谢上帝幸而正有一个权力:就是审判厅长。审判厅长也全不必亲自出马,只要送了帽子去,这帽子,就足够使农奴们复归于理性,回心转意,静静的回到家里去了。对于乞乞科夫的农奴们所怀抱的造反性,许多人也发表了意见和重要的提议。那想头可实在非常两样。有主张过度的军营似的严厉和出格的苛酷的,但也有别的,表示着所谓温和。警察局长便加以注意,乞乞科夫现在是看见当面有着神圣的义务的;他可以作为自己的农奴们的父亲,而且,照他爱用的口气说,则是在他们之间,广施慈善的教化。趁这机会,他还把现代教育的兰凯斯太法,[65]大大的称赞了一通。
市镇里在这样的谈论,商量,有些人还因为个人的趣向,把他们的意见传给了乞乞科夫,供给他妥善的忠告,也有愿作护卫,把农奴稳稳当当的送到目的地去的。对于忠告,乞乞科夫很谦恭的致了谢,声明他当随时施用,然而谢绝了护卫,说这完全是多余的事情;由他购买下来的农奴,全是特别驯良的性格。他们自愿一同迁移,心里非常高兴。造反,是无论如何不会有的。
凡有这些议论和谈天,都给乞乞科夫招致了他正在切望的极好的结果。传说散布开来了,说他是一个百万财产的富翁,不会多,可也不会少。在第一章上我们已经见过,对于乞乞科夫,本市的居民是即使没有这回的事,原也很是喜欢了他的。况且老实说:他们真的都是好人,彼此和善的往来,亲密的生活,他们的谈话上,也都打着极其诚实和温和的印记的:“敬爱的朋友,伊理亚·伊理支!”“听哪,安谛派多·萨哈略维支,我的好人!”“你撒谎,妈妈子,伊凡·格力戈利也维支!”向着叫作伊凡·安特来也维支的邮政局长,人往往说:“司泼列辛·齐·德意支[66],伊凡·安特来也维支?”
总而言之,那地方是过得很像家族一样的。许多人很有教养:审判厅长还暗记着当时还算十分时髦的修可夫斯基[67]的《路特米拉》,很有些读得非常巧妙,例如那诗句:“森林入睡,山谷就眠”就是,最出色的是从他嘴里读出“眠”字来,令人觉得好象真的看见山谷睡了觉;为要更加神似起见,到这时候,他还连自己也闭上了眼睛。邮政局长较倾向于哲学,整夜很用功的读着雍格[68]的《夜》和厄凯支好然[69]的《神奇启秘》,还做了很长的摘录;摘的是些什么呢,当然没有人能够分明决定。除此之外,他还是一个大滑稽家,他有华丽的言语,据他自己说,也喜欢把他的话“装饰”起来。而且他实在是用了一大批繁文把他的话装饰起来的,例如:“亲爱的先生,那是这样的,您可知道,您可明白,您可以想象出来的,大概,所谓”以及别的许许多,他都大有心得;另外他又很适当的用一种意味深长的眼,来装饰他的话,或者简直闭上一只眼睛,给人从他那讽刺的比喻里,觉出很凶的表现来。别的绅士们也大抵是很有教养,非常开通的人物:这一个看凯兰辛[70],那一个看《墨斯科新报》[71],第三个索性什么也不看。有一个,是大家叫作“睡帽”的,如果要他去做事,首先总得使劲的在他胁肋上冲一下,别一个却简直完全是懒骨头,一生都躺在熊皮上,想要推他起来罢,什么力气都白费,于是他也就总不起来了。看他们的外观,自然都是漂亮,体面,殷勤足以感人的人物——生肺病的,其中一个也没有。他们是全属于这一种人种里面的,在只有四只眼睛的温柔的互相爱抚的时候,往往用这样的话来称女人:我的胖儿,我的亲爱的大肚子,我的羔子,我的壶卢儿,我的叭儿之类。然而大抵是良善的种族,可爱的,大度的人物,一个人如果做过他们的客,或者同桌打过一夜牌,就很快的和他们亲密起来,十之九变成他们之一了。——在擅长妙法的乞乞科夫,就更加如此,因为他确是知道着令人喜爱的秘密的。他们热爱着他,至于使他决不定怎样离开这里的方法;他总只听见:“唉唉,只要再一礼拜;请您在我们这里再停一个礼拜罢,保甫尔·伊凡诺维支。”——一言以蔽之,如谚语所说,他成为掌珠了。然而出格的强有力,出格的显著,唔,非常之惊人,非常之奇特的,却是乞乞科夫对于闺秀们的印象。要说明一点这等事,我们是应该讲讲闺秀们本身,以及她们的社会之类,应该用活泼的辉煌的色彩,画出所谓她们的精神的特色来的:然而这在作者,却很难。一方面,是他在高官显宦的太太之前,怀着无限量的尊崇和敬畏的,而别方面……是的,别方面呢……就不过是难得很。却说N市的闺秀们……不,这不能,实在的,我怕。——在N市的闺秀们,什么是最值得注意的呢……不,奇怪得很,笔不肯动,它好象是一块铅块了。那么,也好:只好把描写她们的性格的事,让给在他的调色版上,比我更有鲜明灿烂的彩色的精粹的别人去;我们却单说一两句她们的外观,大体的表面就够。
EN: [A Small Incident]
Since I came from the countryside to the capital, six years have passed in the blink of an eye. During this time, I have heard and seen quite a number of so-called great national affairs; but none of them left any mark on my heart. If I were to identify the influence of these events, it would only be that they increased my bad temper -- to put it honestly, they taught me to despise people more and more with each passing day.
Yet one small incident was meaningful to me: it pulled me out of my bad temper, and I cannot forget it to this day.
It was the winter of the sixth year of the Republic. A fierce north wind was blowing hard. Because of my livelihood, I had to be out on the road early. Along the way, I could hardly see a soul. With great difficulty, I finally hired a rickshaw and told the puller to take me to the S Gate. Before long, the north wind died down. The dust on the road had long been swept away, leaving a clean white road. The rickshaw puller ran faster too. Just as we neared the S Gate, someone suddenly got caught on the shafts and slowly fell down.
The fallen person was a woman with graying hair in tattered clothes. She had suddenly darted across from the roadside in front of the rickshaw. The puller had already swerved aside, but her old cotton vest was unbuttoned, and the breeze blew it open, so it finally caught on the shafts. Fortunately, the puller had already slowed down somewhat, otherwise she would have taken a bad tumble and cracked her head open.
She lay on the ground; the rickshaw puller also stopped. I was certain the old woman was not injured. Since no one else was watching, I was annoyed that he was making trouble for himself, inviting problems, and also delaying my journey.
I said to him, "It's nothing. Go on!"
The rickshaw puller paid me no attention -- or perhaps did not hear me -- but set down the rickshaw, helped the old woman slowly to her feet, steadied her by the arm, and asked her:
"What happened to you?"
"I've hurt myself."
I thought: I saw you fall slowly -- how could you be hurt? You're just putting on an act. How detestable. The puller is making unnecessary trouble, bringing suffering on himself. Figure it out yourself.
The rickshaw puller heard the old woman's words but did not hesitate for a moment. Still supporting her by the arm, he walked forward step by step. I was somewhat startled and looked ahead -- there was a police substation. After the wind, no one was outside. The puller was leading the old woman straight toward that gate.
At that moment, I was suddenly seized by a strange feeling. His dusty figure from behind seemed to grow tall in an instant, and the further he walked, the larger he became, until I had to look up to see him. Moreover, he gradually became almost a kind of pressure upon me, even pressing out the "smallness" hidden beneath my fur gown.
My vitality seemed somewhat frozen at that moment. I sat without moving, without thinking, until I saw a policeman come out of the station. Only then did I get down.
The policeman approached me and said, "Hire yourself another rickshaw. He can't pull you anymore."
Without thinking, I grabbed a large handful of copper coins from my coat pocket, handed them to the policeman, and said, "Please give these to him..."
The wind had completely died down, and the road was still quiet. I walked along, thinking, almost afraid to think about myself. Setting aside earlier matters, what did that large handful of copper coins mean? To reward him? Could I still judge the rickshaw puller? I could not answer myself.
This incident still comes to mind from time to time even now. And because of it, I often endure anguish and strive to think about myself. The years of civil administration and military force have long since become like the "sayings of the Master and verses of the poets" I read as a child -- I cannot recite even half a sentence. Only this one small incident keeps floating before my eyes, sometimes even more vividly, making me feel ashamed, urging me to renew myself, and increasing my courage and hope.
(July 1920.)
[Chapter Eight]
Chichikov's purchase of serfs had already become the topic of conversation throughout the town. People debated, conversed, and examined whether it was actually profitable to buy serfs for the purpose of resettlement. Many of the discussions were remarkably precise and objective: "Of course it's profitable," said one, "the soil in the southern provinces is good and fertile, that goes without saying. But there is no water -- what are Chichikov's serfs supposed to do? There are no rivers there!" -- "That wouldn't be so bad; even without a river, it's not the worst, Stepan Dmitrievich; but resettlement is a very uncertain business. Everyone knows what a serf is like: he moves to a new place to farm -- but there's nothing there -- no house, no estate -- I tell you, he'll run away, as sure as two times two makes four. He'll lace up his boots and be off; finding him will take you many days!" -- "No, no, pardon me, Alexei Ivanovich, I hold a quite different view. If you say the serfs will flee from Chichikov -- a true Russian can do anything and get used to any climate. Just give him a pair of warm gloves, and you can send him anywhere you like, even to Kamchatka. He'll run around a bit, warm himself up, grab an axe, and build a new house." -- "But, dear Ivan Grigorievich, you've completely forgotten one thing: you haven't at all considered what kind of serfs Chichikov has bought. You've quite forgotten that no landowner would so easily let go of a good man. If they're not drunkards, topers, brawlers, and loafers, I'll stake my head on it!" -- "Very well, I agree with that too. No one sells a good man. Chichikov's people are probably mostly drunkards, that's certainly true. But one should also consider the lessons of history: just now one may indeed have been a layabout, but if you resettle him, he can suddenly become an honest servant. Such cases are not unprecedented in the world or in history." -- "No, no," said the superintendent of the state factory, "believe me, that's absolutely impossible, because Chichikov's serfs face two great enemies. The first enemy is the proximity to the Little Russian provinces, where, as everyone knows, liquor is sold freely. I dare assure you, within two weeks they'll be drowned in drink, turned into idlers and loafers. The second enemy is the habit and taste for dissolute living, which they pick up from the resettlement. Chichikov must keep watch, hold them firmly, govern them strictly. He must punish every trifle severely, entrust nothing to others, do everything himself, and when necessary, apply the whip and slaps." -- "Why should Chichikov personally wield the whip? He can use an overseer." -- "Very well, but where will you find a suitable overseer? They're all swindlers and scoundrels!" -- "That's because the masters themselves are ignorant of the business, and that's why the overseers become swindlers." -- "Exactly," chimed in many. -- "If the landowner himself understands something about estate management and knows his people, he can always find a good overseer." The factory superintendent protested, however, insisting that no good overseer could be found for less than five thousand rubles. The court president objected that one could be found for three thousand. The superintendent then asked, "And where do you intend to find him? Can you dig him out of your nose?" The court president replied: "Out of the nose, of course not, that won't do. But right here, in this district, there is one -- Peter Petrovich Samoilov. If Chichikov were to hire him to oversee his serfs, he would be exactly the right man!" Many tried to put themselves in Chichikov's position, moving with a whole horde of serfs to a strange place, and felt dismayed -- truly a great difficulty. Everyone especially feared that such unreliable material as Chichikov's serfs might even raise a rebellion. The police chief then remarked that rebellion was not to be feared; to prevent it, thank God, there existed an authority: the court president. The court president need not even appear in person; it would suffice to send his cap -- that cap alone would be enough to bring the serfs to their senses, make them change their minds, and return quietly home. Many also expressed opinions and important proposals regarding the rebellious nature of Chichikov's serfs. The ideas were very divergent. Some advocated excessive military severity and extraordinary harshness, while others expressed so-called mildness. The police chief then remarked that Chichikov now faced a sacred duty: he could serve as a father to his own serfs and, as he liked to put it, spread charitable education among them. Seizing the opportunity, he also lavishly praised the modern Lancaster method of education.
The town thus debated and deliberated. Some, out of personal interest, passed their opinions on to Chichikov, offered him reliable advice, and some even volunteered to escort the serfs safely to their destination. For the advice, Chichikov thanked them very humbly, declaring he would apply it at any time. The escort, however, he declined, saying it was entirely unnecessary. The serfs he had purchased were of an especially docile nature. They wished voluntarily to resettle together and were very happy in their hearts. A rebellion was absolutely out of the question.
All these discussions and conversations brought Chichikov the excellent results he had so eagerly desired. The rumor spread that he was a millionaire, no more and no less. Already in the first chapter we saw that the town's residents had been quite fond of Chichikov even without this affair. And honestly speaking, they really were all good people who treated each other kindly and lived together intimately. Their conversations bore the stamp of utmost honesty and warmth: "Esteemed friend, Ilya Ilyich!" "Listen, Antipater Sakharievich, my good fellow!" "You're lying, dear mama, Ivan Grigorievich!" To the postmaster, whose name was Ivan Andreevich, people often said: "Sprechen Sie Deutsch, Ivan Andreevich?"
In short, people there lived quite like a family. Many were well-educated: the court president still knew by heart the then quite fashionable Zhukovsky's "Ludmila" and recited some passages with great skill -- for instance the verse "The forest sleeps, the valley slumbers." Particularly masterly was the way the word "slumbers" sounded from his lips -- one really felt as though the valley had gone to sleep. To enhance the effect further, he even closed his own eyes at that point. The postmaster leaned more toward philosophy, reading diligently all night Young's "Night Thoughts" and Eckartshausen's "The Key to the Mysteries of Nature." He also made very long excerpts; what exactly he excerpted, naturally no one could clearly determine. Besides this, he was a great wit with a florid manner of speech, which he himself said he liked to "embellish." And indeed he embellished his speech with a great profusion of phrases, such as: "Dear sir, it is thus, you know, you understand, you can imagine, probably, so to speak" and many more, in which he had great practice. Additionally, he embellished his speech quite aptly with a meaningful look, or simply closed one eye, making people sense a rather fierce expression in his satirical comparisons. The other gentlemen were also mostly well-educated, very enlightened personages: one read Karamzin, another the "Moscow Gazette," a third read nothing at all. One, whom everyone called "the nightcap," always had to be given a good shove in the ribs before he would do anything. Another was simply a complete lazybones who lay on a bearskin all his life -- push him as hard as you might, he simply would not get up. As for their appearance, they were naturally all handsome, decent, and obliging folk -- not a consumptive among them. They all belonged to that class of men who, during tender endearments when only four eyes were present, liked to call their women: my little fatty, my dear big-belly, my lambkin, my little gourd, my little pug, and the like. But for the most part they were good-natured, lovable, generous folk. Anyone who had been their guest or played cards with them for a night quickly became intimate with them, nine times out of ten becoming one of their own. With the masterful Chichikov, this was even more the case, for he truly knew the secret of making himself likeable. They loved him so much that he simply could not find a way to leave. He kept hearing: "Oh, just one more week; do stay another week with us, Pavel Ivanovich!" -- In short, as the proverb says, he became the apple of their eye. But extraordinarily powerful, extraordinarily striking, hm, most astonishing and most remarkable was the impression Chichikov made on the ladies. To explain this somewhat, we should speak about the ladies themselves and their society. We should paint their spiritual characteristics in vivid, brilliant colors -- but this is very difficult for the author. On the one hand, he feels boundless reverence and awe before the wives of high dignitaries, and on the other... yes, on the other... it is simply very difficult. The ladies of N.... no, I cannot, really, I am afraid. What is most noteworthy about the ladies of N.? ... No, how strange, the pen refuses to move, it seems to have become a block of lead. Well then: we must leave the description of their character to someone else who has more vivid and brilliant colors on his palette than I; we shall say only a word or two about their appearance, their general surface.
DE: [Eine kleine Begebenheit]
Seit ich vom Land in die Hauptstadt gekommen bin, sind im Nu schon sechs Jahre vergangen. In dieser Zeit habe ich so manches von den sogenannten grossen Staatsangelegenheiten gehoert und gesehen; doch in meinem Herzen hat nichts davon eine Spur hinterlassen. Wenn ich den Einfluss dieser Dinge benennen muesste, so waere es nur, dass sie meine schlechte Laune vermehrt haben -- ehrlich gesagt, sie haben mich Tag fuer Tag die Menschen mehr verachten lassen.
Doch eine kleine Begebenheit hatte fuer mich Bedeutung; sie riss mich aus meiner schlechten Laune heraus und laesst mich bis heute nicht los.
Es war im Winter des sechsten Jahres der Republik. Ein heftiger Nordwind tobte. Wegen meines Lebensunterhalts musste ich frueh auf die Strasse. Unterwegs begegnete mir kaum ein Mensch. Mit Muehe und Not mietete ich schliesslich eine Rikscha und liess mich zum S-Tor fahren. Bald liess der Nordwind nach, der Staub auf der Strasse war laengst weggeblasen, und eine saubere, weisse Strasse lag vor uns. Auch der Rikschakuli lief schneller. Gerade als wir uns dem S-Tor naeherten, blieb ploetzlich jemand an der Deichsel haengen und fiel langsam um.
Die Gestuerzte war eine Frau mit graumeliertem Haar in zerlumpter Kleidung. Sie war ploetzlich vom Strassenrand her quer vor die Rikscha gelaufen. Der Rikschakuli war schon ausgewichen, aber ihre alte Baumwollweste war nicht zugeknopft, und der Wind blies sie auf, sodass sie sich schliesslich in der Deichsel verfing. Zum Glueck hatte der Rikschakuli schon etwas verlangsamt, sonst haette sie einen schweren Sturz getan und sich den Kopf blutig geschlagen.
Sie lag am Boden; der Rikschakuli blieb ebenfalls stehen. Ich war mir sicher, dass die alte Frau nicht verletzt war. Da auch niemand sonst zusah, fand ich es aegerlich, dass er sich unnoetig einmischte, sich selbst Aerger einhandelte und auch noch meinen Weg verzoegerte.
Ich sagte zu ihm: „Es ist nichts passiert. Geh weiter!"
Der Rikschakuli beachtete mich gar nicht -- oder hoerte mich vielleicht nicht -- sondern setzte die Rikscha ab, half der alten Frau langsam auf, stuetzte sie am Arm und fragte:
„Was ist mit Ihnen?"
„Ich habe mich verletzt."
Ich dachte: Ich habe doch gesehen, wie du langsam umgefallen bist -- wie kannst du dich da verletzt haben? Das ist doch nur Theater, wirklich abscheulich. Der Rikschakuli macht sich unnoetig Umstaende, das ist sein eigenes Pech. Sieh selbst zu, wie du zurechtkommst.
Der Rikschakuli hoerte die Worte der alten Frau, zoegerte aber keinen Moment. Er stuetzte sie weiterhin am Arm und ging Schritt fuer Schritt vorwaerts. Erstaunt blickte ich nach vorn -- dort war eine Polizeiwache. Nach dem Sturm war auch draussen niemand zu sehen. Der Rikschakuli fuehrte die alte Frau geradewegs auf das Tor zu.
In diesem Moment ueberkam mich ploetzlich ein seltsames Gefuehl. Seine staubbedeckte Gestalt von hinten schien mir mit einem Mal gross, und je weiter er ging, desto groesser wurde er, bis ich den Kopf heben musste, um ihn zu sehen. Und er wurde fuer mich beinahe zu einer Art Druck, der sogar das „Kleine" unter dem Pelzmantel herauspressen wollte.
Meine Lebenskraft schien in diesem Moment etwas erstarrt. Ich sass da, ohne mich zu bewegen, ohne zu denken, bis ich einen Polizisten aus der Wache kommen sah. Erst dann stieg ich ab.
Der Polizist kam auf mich zu und sagte: „Mieten Sie sich selbst eine Rikscha. Er kann Sie nicht mehr fahren."
Ohne nachzudenken griff ich in meine Manteltasche, holte eine grosse Handvoll Kupfermuenzen heraus, gab sie dem Polizisten und sagte: „Bitte geben Sie ihm das..."
Der Wind hatte sich voellig gelegt, die Strasse war noch still. Ich ging und dachte dabei nach, fast fuerchtete ich mich, an mich selbst zu denken. Die frueheren Dinge moegen beiseitegelegt werden -- aber was bedeutete diese grosse Handvoll Kupfermuenzen? Ihn belohnen? Konnte ich noch ueber den Rikschakuli urteilen? Ich konnte mir selbst nicht antworten.
Diese Begebenheit erinnere ich bis heute immer wieder. Und deswegen durchleide ich auch immer wieder Qualen und muehe mich, an mich selbst zu denken. Die Jahre der Kultur und der Waffengewalt sind mir laengst wie die „Worte des Meisters und Verse der Dichter", die ich als Kind gelesen habe -- ich kann nicht einmal mehr einen halben Satz aufsagen. Nur diese eine kleine Begebenheit schwebt mir immer vor Augen, manchmal sogar noch deutlicher, laesst mich beschaemt fuehlen, treibt mich zur Erneuerung und mehrt meinen Mut und meine Hoffnung.
(Juli 1920.)
[Achtes Kapitel]
Tschitschikows Kauf von Leibeigenen war bereits Gespraechsthema der ganzen Stadt geworden. Man debattierte, unterhielt sich und untersuchte, ob es ueberhaupt vorteilhaft sei, Leibeigene zum Zweck der Umsiedlung zu kaufen. Viele der Diskussionen waren aeusserst praezise und sachlich: „Natuerlich ist es vorteilhaft," sagte einer, „der Boden in den suedlichen Provinzen ist gut und fruchtbar, das versteht sich von selbst. Aber es gibt kein Wasser -- was sollen Tschitschikows Leibeigene da anfangen? Es gibt dort keine Fluesse!" -- „Das waere noch nicht so schlimm, auch ohne Fluss ist es nicht das Schlimmste, Stepan Dmitrijewitsch; aber die Umsiedlung ist eine hoechst ungewisse Angelegenheit. Jeder weiss, wie ein Leibeigener ist: Er zieht an einen neuen Ort, um das Land zu bestellen -- aber dort ist nichts -- kein Haus, kein Gut -- ich sage Ihnen, er wird davonlaufen, so sicher wie zwei mal zwei vier ist. Er schnuert seine Stiefel, und weg ist er; bis Sie ihn finden, vergehen viele Tage!" -- „Nein, nein, verzeihen Sie, Alexej Iwanowitsch, ich bin ganz anderer Meinung. Wenn Sie sagen, die Leibeigenen werden von Tschitschikow fliehen -- ein wahrer Russe kann alles und gewoehnt sich an jedes Klima. Geben Sie ihm nur ein Paar warme Handschuhe, und Sie koennen ihn hinschicken, wohin Sie wollen, selbst bis nach Kamtschatka. Er laeuft sich ein wenig warm, nimmt die Axt und baut sich ein neues Haus." -- „Aber, lieber Iwan Grigorjewitsch, du hast eine Sache voellig vergessen: Du hast gar nicht bedacht, was fuer Leibeigene Tschitschikow gekauft hat. Du hast ganz vergessen, dass ein Gutsbesitzer niemals leichtfertig einen tuechigen Kerl hergeben wuerde. Wenn es keine Saeufer, Trinker, Raufbolde und Faulpelze sind, dann meinen Kopf dafuer!" -- „Gut, dem stimme ich auch zu. Niemand verkauft einen tuechigen Mann, Tschitschikows Leute sind wohl groesstenteils Saeufer, das ist natuerlich richtig. Aber man sollte auch an die geschichtliche Moral denken: Eben noch mag einer ein Faulpelz gewesen sein, aber wenn man ihn umsiedelt, kann er ploetzlich zu einem ehrlichen Diener werden. Dafuer gibt es in der Welt und in der Geschichte nicht wenige Beispiele." -- „Nein, nein," sagte der Aufseher der Staatsfabrik, „glauben Sie mir, das ist ausgeschlossen, denn fuer Tschitschikows Leibeigene gibt es zwei grosse Feinde. Der erste Feind -- ist die Naehe zu den kleinrussischen Provinzen, wo bekanntlich der Schnapsverkauf frei ist. Ich wage Ihnen zu versichern, in zwei Wochen sind sie im Schnaps versunken und zu Nichtstuern und Faulenzern geworden. Der zweite Feind -- ist die Gewohnheit und Neigung zum liederlichen Leben, die sie von der Umsiedlung mitbringen. Tschitschikow muss sie im Auge behalten, sie fest an der Hand haben, sie streng regieren. Bei jeder Kleinigkeit muss er hart bestrafen, nichts anderen ueberlassen, alles selbst tun, und wenn noetig, die Peitsche und Ohrfeigen geben." -- „Warum soll Tschitschikow persoenlich die Peitsche schwingen? Er kann doch einen Aufseher einsetzen." -- „Gut, aber wo finden Sie einen geeigneten Aufseher? Das sind doch alles Betrueger und Schurken!" -- „Das liegt daran, dass die Herren selbst nichts vom Fach verstehen, deshalb werden die Aufseher zu Betriegern." -- „Genau," pflichteten viele bei, -- „wenn der Gutsbesitzer selbst etwas von der Landwirtschaft versteht und seine Leute kennt -- dann findet er immer einen guten Aufseher." Der Aufseher der Staatsfabrik protestierte jedoch und meinte, unter fuenftausend Rubel sei kein guter Aufseher zu finden. Der Vorsitzende des Gerichts wandte dagegen ein, man koenne schon fuer dreitausend einen finden. Da fragte der Aufseher: „Und wo wollen Sie den hernehmen? Koennen Sie ihn sich aus der Nase bohren?" Die Antwort des Gerichtsvorsitzenden lautete: „Aus der Nase natuerlich nicht, das geht nicht. Aber hier, in diesem Bezirk, gibt es einen: Peter Petrowitsch Samoilow. Wenn Tschitschikow ihn zum Aufseher seiner Leibeigenen machen wuerde, waere er genau der richtige Mann!" Viele versetzten sich in Tschitschikows Lage, mit einer ganzen Schar Leibeigener an einen fremden Ort zu ziehen, und empfanden Bekuemmernis -- wahrlich eine grosse Schwierigkeit. Besonders befuerchtete man, dass so unzuverlaessiges Material wie Tschitschikows Leibeigene auch noch einen Aufstand anzetteln koennten. Darauf bemerkte der Polizeimeister, ein Aufstand sei nicht zu befuerchten; um ihn zu verhindern, gebe es gluecklicherweise eine Autoritaet: den Gerichtsvorsitzenden. Der Gerichtsvorsitzende brauche auch gar nicht persoenlich zu erscheinen, es genuege, seine Muetze zu schicken -- diese Muetze allein reiche aus, um die Leibeigenen zur Vernunft zu bringen, sie umzustimmen und sie still nach Hause zurueckkehren zu lassen. Ueber die aufruehrerische Natur von Tschitschikows Leibeigenen aeusserten viele ihre Meinungen und wichtigen Vorschlaege. Die Ansichten gingen sehr auseinander. Einige pladaierten fuer uebermaessige militaerische Strenge und ausserordentliche Haerte, andere dagegen fuer sogenannte Milde. Der Polizeimeister bemerkte, Tschitschikow sehe sich nun einer heiligen Pflicht gegenueber: Er koenne den Vater seiner eigenen Leibeigenen spielen und, wie er sich gern ausdrueckte, wohltaetige Bildung unter ihnen verbreiten. Bei dieser Gelegenheit lobte er auch die moderne Erziehungsmethode nach Lancaster ausfuehrlich.
In der Stadt wurde so diskutiert und beraten. Manche teilten aus persoenlichem Interesse Tschitschikow ihre Meinungen mit, gaben ihm verlaessliche Ratschlaege, und einige boten sich sogar an, die Leibeigenen sicher zum Bestimmungsort zu geleiten. Fuer die Ratschlaege bedankte sich Tschitschikow sehr bescheiden und erklaerte, er werde sie jederzeit anwenden. Die Begleitung lehnte er jedoch ab und sagte, das sei voellig ueberfluessig. Die von ihm gekauften Leibeigenen seien von besonders fuegsamer Natur. Sie wuenschten freiwillig gemeinsam umzuziehen und seien im Herzen sehr froh. Ein Aufstand werde auf keinen Fall stattfinden.
All diese Eroerterungen und Gespraeche brachten Tschitschikow die von ihm sehnlichst erwuenschten vorzueglichen Ergebnisse. Das Geruecht verbreitete sich, er sei ein Millionaer, nicht mehr und nicht weniger. Schon im ersten Kapitel haben wir gesehen, dass die Einwohner der Stadt Tschitschikow auch ohne dieses Ereignis recht gern gehabt hatten. Und ehrlich gesagt: Es waren wirklich alles gute Menschen, die freundlich miteinander verkehrten und vertraut zusammenlebten. Ihre Gespraeche trugen den Stempel aeusserster Aufrichtigkeit und Herzlichkeit: „Geschaetzter Freund, Ilja Iljitsch!" „Hoer mal, Antipater Sacharjewitsch, mein Guter!" „Du luegst, Mamaschka, Iwan Grigorjewitsch!" Zum Postmeister, der Iwan Andreewitsch hiess, sagten die Leute oft: „Sprechen Sie Deutsch, Iwan Andreewitsch?"
Kurz und gut, man lebte dort ganz wie eine Familie. Viele waren wohlgebildet: Der Gerichtsvorsitzende kannte den damals noch recht modischen Schukowski und dessen „Ludmila" auswendig und trug einige Stellen aeusserst geschickt vor, etwa den Vers „Der Wald schlaeft ein, das Tal entschlummert." Besonders meisterhaft klang das Wort „entschlummert" aus seinem Mund -- man glaubte wirklich, das Tal habe sich schlafen gelegt. Um die Aehnlichkeit noch zu verstaerken, schloss er dabei sogar selbst die Augen. Der Postmeister neigte eher zur Philosophie und las die ganze Nacht eifrig Youngs „Nachtgedanken" und Eckartshausens „Der Schluessel zu den Geheimnissen der Natur." Er machte auch sehr lange Auszuege daraus; was genau er exzerpierte, konnte natuerlich niemand recht bestimmen. Im Uebrigen war er ein grosser Witzbold mit einer blumigen Sprache, die er, wie er selbst sagte, gern „ausschmueckte." Und tatsaechlich schmueckte er seine Rede mit einer Fuelle von Floskeln aus, wie: „Verehrter Herr, es verhaelt sich so, wissen Sie, verstehen Sie, koennen Sie sich vorstellen, vermutlich, sozusagen" und dergleichen mehr, worin er grosse Uebung hatte. Ausserdem verzierte er seine Rede recht geschickt mit einem vielsagenden Blick oder kniff auch geradezu ein Auge zu, sodass man aus seinen spottischen Vergleichen einen recht scharfen Ausdruck heraushoerte. Auch die uebrigen Herren waren groesstenteils recht gebildete und aufgeklaerte Persoenlichkeiten: Der eine las Karamsin, der andere die „Moskauer Zeitung", ein dritter las ueberhaupt nichts. Einer, den alle nur „Schlafmuetze" nannten, musste erst kraeftig in die Rippen gestossen werden, bevor er etwas tat. Ein anderer war ein voelliger Faulpelz, der sein ganzes Leben auf einem Baerenfell lag -- man konnte ihn noch so kraeftig stupsen, er stand einfach nicht auf. Was ihr Aeusseres betrifft, so waren sie natuerlich allesamt huebsche, anstaendige und verbindliche Persoenlichkeiten -- einen Lungenkranken gab es unter ihnen nicht. Sie gehoerten alle zu jener Menschenart, die beim zaertlichen Geplaenkel unter vier Augen ihre Frauen gern so nannten: Mein Dickerchen, meine liebe Fette, mein Laemmchen, mein Kuerbisschatz, mein Huendchen und dergleichen. Im Grossen und Ganzen waren es gutartige, liebenswuerdige, grosszuegige Leute. Wer einmal ihr Gast gewesen oder eine Nacht lang mit ihnen Karten gespielt hatte, wurde rasch vertraut mit ihnen, und neun von zehn Mal einer der Ihren. Bei dem in feinen Kuensten so gewandten Tschitschikow erst recht, denn er kannte in der Tat das Geheimnis, sich beliebt zu machen. Sie liebten ihn derart, dass er gar nicht wusste, wie er diesen Ort verlassen sollte. Er hoerte immer nur: „Ach, nur noch eine Woche; bleiben Sie doch noch eine Woche bei uns, Pawel Iwanowitsch!" -- Kurz und gut, wie das Sprichwort sagt: er wurde zum Augapfel. Doch ausserordentlich stark, ausserordentlich bemerkenswert, hm, hoechst erstaunlich und hoechst merkwuerdig war der Eindruck, den Tschitschikow auf die Damen machte. Um diesen Punkt ein wenig zu erlaeutern, muessten wir ueber die Damen selbst und ihre Gesellschaft sprechen. Wir muessten ihre geistigen Eigenheiten mit lebhaften, glaenzenden Farben malen -- doch das ist fuer den Autor sehr schwer. Einerseits empfindet er gegenueber den Gattinnen hoher Wuerdentraeger grenzenlose Ehrfurcht und Scheu, andererseits... ja, andererseits... ist es eben schwer. Nun, die Damen von N...., nein, das geht nicht, wirklich, ich fuerchte mich. Was ist an den Damen von N. am bemerkenswertesten? ... Nein, seltsam, die Feder will sich nicht bewegen, sie ist wie ein Bleiblock geworden. Nun gut: Die Beschreibung ihres Charakters muessen wir einem anderen ueberlassen, der auf seiner Palette lebhaftere und glaenzendere Farben hat als ich. Wir wollen nur ein, zwei Worte ueber ihr Aeusseres, die allgemeine Oberflaeche, sagen.
FR: [Un petit incident]
Depuis que je suis venu de la campagne a la capitale, six annees ont passe en un clin d'oeil. Pendant ce temps, j'ai entendu et vu bon nombre de ce qu'on appelle les grandes affaires nationales ; mais aucune n'a laisse de trace dans mon coeur. Si je devais nommer l'influence de ces evenements, ce serait seulement qu'ils ont accru ma mauvaise humeur -- pour parler franchement, ils m'ont appris a mepriser les gens un peu plus chaque jour.
Pourtant, un petit incident eut de l'importance pour moi : il m'arracha a ma mauvaise humeur et je ne puis l'oublier jusqu'a ce jour.
C'etait l'hiver de la sixieme annee de la Republique. Un violent vent du nord soufflait avec fureur. A cause de ma subsistance, je devais sortir tot dans la rue. En chemin, je ne rencontrais presque personne. A grand-peine, je louai enfin un pousse-pousse et lui dis de me conduire a la Porte S. Bientot, le vent du nord se calma. La poussiere de la route avait deja ete balayee, laissant une route blanche et propre. Le tireur de pousse-pousse courut plus vite aussi. Juste comme nous approchions de la Porte S, quelqu'un se prit soudain dans les brancards et tomba lentement.
Celle qui etait tombee etait une femme aux cheveux gris et blanc, vetue de haillons. Elle avait soudainement traverse la rue devant le pousse-pousse depuis le bord de la chaussee. Le tireur avait deja fait un ecart, mais sa vieille veste de coton n'etait pas boutonnee, et la brise l'avait ouverte, si bien qu'elle s'accrocha finalement aux brancards. Heureusement, le tireur avait deja un peu ralenti, sinon elle aurait fait une mauvaise chute et se serait ouvert la tete.
Elle gisait au sol ; le tireur de pousse-pousse s'arreta aussi. J'etais certain que la vieille femme n'etait pas blessee. Comme personne d'autre ne regardait, j'etais irrite de le voir se meler de ce qui ne le regardait pas, s'attirer des ennuis et aussi retarder mon trajet.
Je lui dis : « Ce n'est rien. Continue ! »
Le tireur ne me preta aucune attention -- ou peut-etre ne m'entendit-il pas -- mais il posa le pousse-pousse, aida lentement la vieille femme a se relever, la soutint par le bras et lui demanda :
« Qu'avez-vous ? »
« Je me suis fait mal. »
Je pensai : je t'ai vue tomber doucement -- comment aurais-tu pu te blesser ? Tu fais la comedie, c'est vraiment detestable. Le tireur se mele de ce qui ne le regarde pas, c'est bien fait pour lui. Debrouille-toi toi-meme.
Le tireur entendit les paroles de la vieille femme mais n'hesita pas un instant. La soutenant toujours par le bras, il avanca pas a pas. Surpris, je regardai devant -- c'etait un poste de police. Apres la tempete, il n'y avait personne dehors. Le tireur conduisait la vieille femme droit vers cette porte.
A cet instant, je fus soudain saisi d'un sentiment etrange. Sa silhouette couverte de poussiere, vue de dos, me parut soudainement grande, et plus il marchait, plus il grandissait, jusqu'a ce que je dusse lever la tete pour le voir. Et il devint peu a peu pour moi une sorte de pression, allant meme jusqu'a extraire la « petitesse » cachee sous ma pelisse.
Mon energie vitale sembla se figer a ce moment. Je restai assis, sans bouger, sans penser, jusqu'a ce que je voie un policier sortir du poste. Alors seulement je descendis.
Le policier s'approcha de moi et dit : « Louez-vous un autre pousse-pousse. Il ne peut plus vous tirer. »
Sans reflechir, je saisis une grosse poignee de pieces de cuivre dans la poche de mon manteau, la donnai au policier et dis : « S'il vous plait, donnez-les-lui... »
Le vent etait completement tombe, la route etait encore silencieuse. Je marchais en pensant, presque effray de penser a moi-meme. Laissons de cote les affaires passees -- mais que signifiait cette grosse poignee de pieces de cuivre ? Le recompenser ? Pouvais-je encore juger le tireur de pousse-pousse ? Je ne pouvais me repondre a moi-meme.
Cet incident me revient encore a l'esprit de temps en temps. Et a cause de lui, j'endure souvent des tourments, m'efforcant de penser a moi-meme. Les annees de culture et de force militaire sont depuis longtemps devenues pour moi comme les « paroles du Maitre et vers des poetes » que j'avais lus enfant -- je ne puis meme plus en reciter une demi-phrase. Seul ce petit incident flotte toujours devant mes yeux, parfois plus distinct encore, me fait honte, m'exhorte a me renouveler et accroit mon courage et mon esperance.
(Juillet 1920.)
[Chapitre huit]
L'achat de serfs par Tchitchikov etait deja devenu le sujet de conversation de toute la ville. On debattait, on conversait, on examinait s'il etait vraiment profitable d'acheter des serfs en vue d'une reinstallation. Beaucoup de ces discussions etaient remarquablement precises et objectives : « Naturellement, c'est profitable, » disait l'un, « le sol des provinces meridionales est bon et fertile, cela va de soi. Mais il n'y a pas d'eau -- que vont faire les serfs de Tchitchikov ? Il n'y a pas de rivieres la-bas ! » -- « Ce ne serait pas si grave ; meme sans riviere, ce n'est pas le pire, Stepan Dmitrievitch ; mais la reinstallation est une affaire tres incertaine. Tout le monde sait comment est un serf : il demenage dans un nouveau lieu pour cultiver la terre -- mais la-bas il n'y a rien -- pas de maison, pas de domaine -- je vous le dis, il s'enfuira, aussi sur que deux fois deux font quatre. Il lacera ses bottes et partira ; pour le retrouver, il vous faudra bien des jours ! » -- « Non, non, pardonnez-moi, Alexei Ivanovitch, j'ai une opinion tout a fait differente. Si vous dites que les serfs vont fuir Tchitchikov -- un vrai Russe peut tout faire et s'habituer a n'importe quel climat. Donnez-lui seulement une paire de gants chauds, et vous pouvez l'envoyer ou vous voulez, meme jusqu'au Kamtchatka. Il courra un peu, se rechauffera, prendra la hache et construira une nouvelle maison. » -- « Mais, cher Ivan Grigorievitch, tu as completement oublie une chose : tu n'as pas du tout pense a quels serfs Tchitchikov a achetes. Tu as tout a fait oublie qu'un proprietaire ne laisserait jamais partir facilement un bon gaillard. S'ils ne sont pas des ivrognes, des poivrots, des bagarreurs et des paresseux, j'y mets ma tete ! » -- « Bien, je suis d'accord la-dessus aussi. Personne ne vend un bon homme. Les gens de Tchitchikov sont probablement pour la plupart des ivrognes, c'est certainement vrai. Mais il faudrait aussi penser aux lecons de l'histoire : a l'instant encore il etait peut-etre un faineant, mais si on le reinstalle, il peut soudainement devenir un serviteur honnete. De tels exemples ne manquent pas dans le monde et dans l'histoire. » -- « Non, non, » dit le directeur de la fabrique d'Etat, « croyez-moi, c'est absolument impossible, car les serfs de Tchitchikov ont deux grands ennemis. Le premier ennemi, c'est la proximite des provinces de Petite-Russie, ou, comme chacun sait, la vente d'alcool est libre. J'ose vous assurer qu'en deux semaines ils seront noyes dans la boisson, transformes en oisifs et en paresseux. Le second ennemi, c'est l'habitude et le gout de la vie dissolue, qu'ils contractent lors de la reinstallation. Tchitchikov doit les surveiller, les tenir fermement, les gouverner avec severite. A chaque bagatelle il doit punir durement, ne rien confier a d'autres, tout faire lui-meme, et quand c'est necessaire, appliquer le fouet et les gifles. » -- « Pourquoi Tchitchikov devrait-il manier le fouet en personne ? Il peut utiliser un intendant. » -- « Bien, mais ou trouverez-vous un intendant convenable ? Ce ne sont que des escrocs et des crapules ! » -- « C'est parce que les maitres eux-memes sont ignorants des affaires, voila pourquoi les intendants deviennent des escrocs. » -- « Exactement, » approuverent beaucoup. -- « Si le proprietaire s'y connait un peu en gestion de domaine et connait ses gens, il trouvera toujours un bon intendant. » Le directeur de la fabrique protesta cependant, affirmant qu'on ne pouvait trouver un bon intendant pour moins de cinq mille roubles. Le president du tribunal objecta qu'on pouvait en trouver un pour trois mille. Le directeur demanda alors : « Et ou comptez-vous le trouver ? Pouvez-vous le tirer de votre nez ? » Le president du tribunal repondit : « Du nez, bien sur que non, ca ne va pas. Mais ici meme, dans ce district, il y en a un : Pierre Petrovitch Samoilov. Si Tchitchikov le prenait pour surveiller ses serfs, ce serait exactement l'homme qu'il faut ! » Beaucoup essayerent de se mettre a la place de Tchitchikov, emigrant avec toute une horde de serfs vers un lieu etranger, et furent consternees -- vraiment une grande difficulte. On craignait surtout que du materiel aussi peu fiable que les serfs de Tchitchikov puisse encore soulever une rebellion. Le chef de police remarqua alors qu'une rebellion n'etait pas a craindre ; pour la prevenir, Dieu merci, il existait une autorite : le president du tribunal. Celui-ci n'avait meme pas besoin de se presenter en personne ; il suffisait d'envoyer sa casquette -- cette casquette seule suffirait a ramener les serfs a la raison, a les faire changer d'avis et a les faire rentrer tranquillement chez eux. Beaucoup exprimerent aussi des opinions et d'importantes propositions concernant la nature seditieuse des serfs de Tchitchikov. Les idees divergeaient considerablement. Certains preconisaient une severite militaire excessive et une durete extraordinaire, tandis que d'autres pronaient la soi-disant douceur. Le chef de police remarqua que Tchitchikov se trouvait maintenant face a un devoir sacre : il pouvait jouer le pere de ses propres serfs et, comme il aimait a dire, repandre parmi eux une education charitable. A cette occasion, il fit aussi un eloge appuye de la methode moderne d'education de Lancaster.
La ville debattit et delibera ainsi. Certains, par interet personnel, transmirent leurs opinions a Tchitchikov, lui fournirent de sages conseils, et quelques-uns s'offrirent meme pour escorter les serfs en securite jusqu'a leur destination. Pour les conseils, Tchitchikov remercia tres humblement, declarant qu'il les appliquerait a tout moment. L'escorte, en revanche, il la declina, disant que c'etait tout a fait superflu. Les serfs qu'il avait achetes etaient d'un caractere particulierement docile. Ils souhaitaient volontairement emigrer ensemble et etaient tres heureux dans leur coeur. Une rebellion n'aurait absolument pas lieu.
Toutes ces discussions et conversations apporterent a Tchitchikov les excellents resultats qu'il avait si ardemment desires. La rumeur se repandit qu'il etait millionnaire, ni plus, ni moins. Deja au premier chapitre, nous avions vu que les habitants de la ville avaient ete assez bien disposes envers Tchitchikov, meme sans cet evenement. Et a vrai dire, c'etaient vraiment tous de bonnes gens qui se traitaient avec bienveillance et vivaient en bonne intelligence. Leurs conversations portaient l'empreinte de la plus grande honnetet et de la plus grande chaleur : « Cher ami, Ilia Ilitch ! » « Ecoute, Antipater Sakharievitch, mon bon ! » « Tu mens, petite maman, Ivan Grigorievitch ! » Au directeur de la poste, qui s'appelait Ivan Andreevitch, les gens disaient souvent : « Sprechen Sie Deutsch, Ivan Andreevitch ? »
En somme, on vivait la-bas tout a fait comme en famille. Beaucoup etaient bien eduques : le president du tribunal savait encore par coeur la « Loudmila » de Joukovski, alors tres a la mode, et en declamait certains passages avec beaucoup d'habilete, par exemple le vers « La foret s'endort, la vallee sommeille. » Le mot « sommeille » sortait de sa bouche avec un art particulier -- on croyait vraiment voir la vallee endormie. Pour renforcer encore l'effet, il fermait meme les yeux a ce moment-la. Le directeur de la poste penchait plutot vers la philosophie, lisant assidument toute la nuit les « Pensees nocturnes » de Young et « La Clef des mysteres de la nature » d'Eckartshausen. Il en faisait aussi de tres longs extraits ; ce qu'il extrayait exactement, personne ne pouvait le determiner clairement. Par ailleurs, c'etait un grand plaisant au langage fleuri qu'il aimait, disait-il, a « orner. » Et en effet, il ornait son discours d'une profusion de formules, telles que : « Cher monsieur, c'est ainsi, vous savez, vous comprenez, vous pouvez imaginer, probablement, pour ainsi dire, » et beaucoup d'autres encore, en quoi il avait une grande pratique. De plus, il ornait assez habilement son discours d'un regard significatif, ou fermait tout simplement un oeil, faisant sentir dans ses comparaisons satiriques une expression assez feroce. Les autres messieurs etaient pour la plupart aussi des personnages fort instruits et tres eclaires : l'un lisait Karamzine, l'autre la « Gazette de Moscou, » un troisieme ne lisait rien du tout. L'un, que tout le monde appelait « le bonnet de nuit, » devait d'abord recevoir un bon coup dans les cotes avant de faire quoi que ce soit. Un autre etait tout simplement un parfait paresseux qui restait couche sur une peau d'ours toute sa vie -- on avait beau le pousser tant qu'on voulait, il ne se levait tout simplement pas. Quant a leur apparence, c'etaient naturellement tous des hommes beaux, convenables et obligeants -- pas un seul phtisique parmi eux. Ils appartenaient tous a cette espece d'hommes qui, dans les tendres epanchements a quatre yeux, aimaient a appeler leurs femmes : ma petite grosse, ma chere bedaine, mon petit agneau, ma petite courge, mon petit carlin, et autres noms de ce genre. Mais dans l'ensemble, c'etaient des gens d'un bon naturel, aimables et genereux. Quiconque avait ete leur hote ou avait joue aux cartes avec eux toute une nuit devenait rapidement intime avec eux, neuf fois sur dix devenant l'un des leurs. Avec l'habile Tchitchikov, c'etait encore plus le cas, car il connaissait vraiment le secret de se faire aimer. Ils l'aimaient tellement qu'il ne trouvait tout simplement pas le moyen de s'en aller. Il n'entendait que : « Ah, encore une petite semaine seulement ; restez encore une semaine chez nous, Pavel Ivanovitch ! » -- Bref, comme dit le proverbe, il etait devenu la prunelle de leurs yeux. Mais extraordinairement fort, extraordinairement remarquable, hm, tres etonnant et tres singulier etait l'impression que Tchitchikov faisait sur les dames. Pour expliquer un peu ce point, il faudrait parler des dames elles-memes et de leur societe. Il faudrait peindre leurs traits spirituels avec des couleurs vives et eclatantes -- mais cela est tres difficile pour l'auteur. D'un cote, il eprouve une reverence et une crainte sans bornes devant les epouses des hauts dignitaires, et de l'autre... oui, de l'autre... c'est simplement tres difficile. Les dames de N.... non, je ne peux pas, vraiment, j'ai peur. Ce qui est le plus remarquable chez les dames de N. ?... Non, c'est etrange, la plume refuse de bouger, elle semble etre devenue un bloc de plomb. Eh bien : nous devons laisser la description de leur caractere a quelqu'un d'autre qui dispose sur sa palette de couleurs plus vives et eclatantes que les miennes ; nous ne dirons qu'un mot ou deux de leur apparence, de leur surface generale.
N市的闺秀们是原有阔绰之称的,这一点,所有的妇女们可真足取为模范。关于什么正当的举动,什么美善的调子,礼节,以及态度上的最微妙最幽婉的训戒,尤其是关于研究时式,连细微末节也不漏之处,她们实在比彼得堡和墨斯科的闺秀们要进几步。她们穿着富于趣味的衣饰,坐着漂亮的马车,在大街上经过:还依时式带一个家丁,身缀金色丝绦,在踏台上飘来飘去。一张名片,如果那名字是写在忒力夫二或是凯罗厄斯上面的,那就是神圣的物事[72]。有两位大家闺秀,以前本是很要好的朋友,也是堂姊妹,就为了这样的一张名片彼此完全闹开——其中之一,没有去回看别一个。她们的丈夫和亲戚后来用尽心力,想她们从新和睦,却枉然——世界上的无论什么事,都该可以做成了,只有这一件可不成:使因为一面怠于回访,变成仇敌的两位闺秀从新和睦。于是这两位,用这市里的绅士淑女们的口气来说,就僵在“互加白眼”里了。关于这问题,有谁得了胜,就也会有许多非常动人的场面,那男人们往往为了他们的保护职务,演出极壮大,极勇侠的表现来。他们之间,决斗自然是没有的,因为大家都是文官;然而他们却彼此竭力来抉发别人的缺点,谁都知道,无论如何,这是比决斗厉害得远的。N市的闺秀们的风气,非常严紧,以高尚的愤怒,来对付一切过失和诱惑,如果给她们知道一种弱点,就判决得极严。如果她们一伙里,自己有了什么所谓这个那个的事呢,却玩得非常之秘密,谁也觉不出究竟有了什么事。体面总不会损。就是那男人,即使自己觉得了,或者听到了这个那个的事,也早有把握,会引了谚语,简而得要的回答道:“我所不知,我就不管。”这里还该叙述的是N市的闺秀们也如她们那彼得堡的同行一样,在言语和表白上,总是十分留心,而且努力于正当的语调的。没有人听到过她们说:“我醒鼻涕!”“我出汗,”“我吐口水,”她们却换上了这样的话:“我清了一下鼻子”或则“我用了我的手巾。”无论如何,也总不能说:“这杯子或盘子臭,”不能的,连觉得有些这意思的影子的话也不能说,要挑选一句这样的表现来替代它:“这杯子不成样子呵”,或者别的这一类话。因为要使俄国话更加高尚,就把所有言语的几乎一半,都从会话里逐出了,人就只好常常到法国话里去找逃路。这就成了完全两样的事情。用起法国话来,则即使比上面所述的还要厉害的词句,也全不算什么事。关于N市的闺秀们,就表面上说起来,大略如此。自然,倘使再看得深一点,那就又有完全不同的东西出现的:然而深察妇人的心,危险得很。我还是只以表面为度,再往前去罢。这以前,闺秀们是不大提起乞乞科夫的,虽然对于他那愉快的,体面的交际态度,也自然十分觉得。然而自从他的百万富翁的风传散布了以来,注意可也移到他另外的性质上去了。这并不是我们的闺秀们利己,或是贪财。罪恶只在百万富翁那一句话——不是百万富翁本身,只是那句话;因为这句话的发音中,除暗示着钱袋之外,也还含有一点东西,对于坏人,对于好人,对于非坏非好人,都给以强有力的印象;一言以蔽之,就是没有一个人不受它的影响的。百万富翁有一种便当之处,他能够特别观察那并非出于打算和谋划的非利己的卑屈,纯粹的卑屈:许多人知道得很清楚,他们不会从他这里有所得,也全不是向他有所求,然而偏要跑到他面前去,欣然微笑,摘下帽子,或者遇有百万富翁在场的午餐会,便去设法运动也来招待他自己。说这一种对于卑屈的倾向,也染上了闺秀们,那是不可以的。然而在许多客厅里,却确在开始议论起来,说乞乞科夫固不是美男子的标本,但总不失为一个体面人,假使他再胖上一点点,可就没有这么好看了。当这时候,对于瘦长男子,还来了几句近于侮辱的话:那不过是剔牙杖,不是人。闺秀们的打扮,也留心到各种的装饰了。匹头市场非常热闹,挤也挤不开。简直是赛会。许多马车穿梭似的在跑。有几匹布,是从市集贩来,因为价钱贵,至今不能卖掉的,这回却变成繁销,飞一般的脱手,使商人们也看得莫名其妙。当弥撒之际,看见闺秀们中有一位在衣服下面曳着拖裙,那裙圈胖得很大,至于把整个教堂占领,在场的警察便只好命令人民让出地方都退到大门口去,以免损害太太的衣服。连乞乞科夫,终于也不得不被对他的异常的注意,引起一点惊异了。大好天气的一天,他回到家里来,看见写字桌上有一封信。发信的是那里,送来的是谁,全都无从明白:侍者说,送信人不许他说出发信人是谁来。信的开头非常直截爽快,就是这样的句子:“不行,我非写信给你不可了!”以下说的是灵魂之间,实在神秘的交感,因为要使这真理格外显得有力,就用上许多点和横线,快要占到半行。再下去接续着几句金言,那确凿,真给人很深的意义,我们几乎负有引在这里的义务的:“什么是人生?——是流寓忧愁的山谷,什么是世界?——是无所感觉的人堆。”发信人于是说到为了去世已经二十五年的弱母,她眼泪滴湿了花笺;并且劝乞乞科夫从此离开拘束精神,闭塞呼吸的都会,跟她到荒野去;一到信的末尾,竟涌出确实的绝望来,用这几行做了结束:
两匹斑鸠儿
载君到坟头,
彼辈鸣且歌
示君吾深忧。
末一行其实不很顺当,然而不要紧:信是完全合于当时的精神的。下面不署名,没有本名和姓,自然也没有月日和年份。只在附启里,写着乞乞科夫自己的心,会猜出发信的人来,而明天知事家里的跳舞会,这古怪脚色是也要到会的。
一切都很有意思。匿名里面,含有很多的刺戟和诱惑,很多,至于引起了好奇心,使乞乞科夫再拿这信来看了两三遍。终于叫了起来道:“这可是很有意思,如果查出了究竟谁是发信的人!”总而言之,事情确是分明的起了转变了,他把一个钟头以上的工夫,化在奇特的揣摩推测里,于是做一个放开不问的姿势,低下头去,喃喃自语道:“但这信有点非常之故意做作!”以后是不说也知道,很小心的叠好信纸,放在提箱里,和一张戏园广告,以及在那地方已经躺了七年,没有动过的一张婚礼请帖,做了邻居了。这时可真的送进一张知事家里的跳舞会的请帖来。在省会里,这是有点很普通的:什么地方有知事,就也得有跳舞会,要不然,阔人们是很容易欠缺相当的爱戴和尊敬的。
他立刻放下一切,不再看作一回事,抽出身子,专门去做跳舞会的准备去了;因为这件事实在有许多挑逗和刺戟。即使创造世界,恐怕也用不着化在装饰上的那么多的心力和工夫。单是对着镜子,检阅和修炼自己的脸,就要一点钟。他使自己的脸上显出一大串各种不同的表现:照见忽而正经和威严,忽而含着微笑的恭敬,忽而又是不含那种微笑的恭敬;于是对镜鞠几个躬,一面吐着含含胡胡的,颇像法国话的声音,虽然乞乞科夫也并不懂得法国话。之后他又装了一通极其讨人欢喜的惊愕,扬眉毛,牵嘴唇,连舌头也活动了一两次;你敬爱的上帝呵,如果人独自在那里,又觉得自己是一个美丈夫,并且确信没有人在钥匙洞里张望的时候,有什么还会做不出来呢。临末他还轻轻的自己摸一摸下巴,说道:“唉,唉,你这好家伙!”于是动手穿起衣服来。他始终觉得很高兴:一面套裤带,打领结,一面却在装着胡乱的行礼,优雅的鞠躬,并且跳了一下,虽然他从来没有学过跳舞。但这一跳,可出了无伤大雅的结果:柜子发抖,刷子从桌上掉了下来了。
他在会上的出现,引起了非常特别的情形。所有在场的人,都连忙来迎接他,一个还捏纸牌在手里,别一个是正在谈天,到了紧要之处,刚说出“您想,地方法官就回答道……”地方法官究竟怎么回答呢?他却不再讲下去,直奔我们的主角去和他打招呼了:“保甫尔·伊凡诺维支!“阿,我的天,保甫尔·伊凡诺维支!”“亲爱的保甫尔·伊凡诺维支!”“可敬的保甫尔·伊凡诺维支!”“保甫尔·伊凡诺维支心肝!”“您来啦吗,保甫尔·伊凡诺维支!”“他来了哩,我们的保甫尔·伊凡诺维支!“您给我拥抱一下罢,保甫尔·伊凡诺维支!”“这里来,给我诚心的接吻一下,我的宝贵的保甫尔·伊凡诺维支!”乞乞科夫觉得,他几乎同时被许多人所拥抱了。他还没有从审判厅长的拥抱里脱出,警察局长就已经把他围在他的臂膊里,警察局长又交给卫生监督,监督交给烧酒专卖局长,烧酒专卖局长交给建筑技师……那知事,这时正和一对闺秀们站在一起,一只手拿一张糖果的包纸,别一只手抱一匹波罗革那的小狗,一看见乞乞科夫就把两样——包纸和小狗——都抛在地板上,至于使小狗大声的嗥起来……总而言之,来客是散布着快活和高兴的。并未愉快得发光的脸,或者并未反映一点一般的高兴的脸,竟一个也没有。官们的脸,在他们的上司前来检阅下属的政绩之际,就这样的发光:这时最初的恐怖消散了,还觉得很得些上司的赞许,竟至于和气的露出一点小小的玩笑来,那就是说几句话,带着愉快的微笑——于是围着他的,跟着他的官们,就高兴的加倍的笑起来了,连话也不大听到,不大明白的官们,也一样的高兴的笑起来了,是的,连远远的一直站在门口,一生从来没有笑过,只给百姓看他拳头的警察——也遵照了反射和模拟的永久不变的定律,在他脸上现出微笑来,不过那微笑,却很有些像他嗅了一种强烈的鼻烟,现在刚刚要打嚏。我们的主角和大家招呼,又给各人回答,自己觉得非常的纯熟:他向右边弯腰,又向左边弯腰,虽然因为习惯,不免略有一点歪,然而不碍事,还是倾倒了所有在场的人物。闺秀们立刻像绚烂的花环似的来围住他,把他罩在各种香气的云雾里:这一个发着玫瑰味,那一个带来紫罗兰和春天的气息,第三个是涌出强烈的木犀草的芳香。乞乞科夫只是昂起鼻子,吸进香气去。她们的装饰上,也展布着无穷的趣味;所有羽纱,缎子和网的颜色,全是最时式的轻淡和褪光的,那细微的差别,单是说说名目也就不容易——这地方的文化和趣味,是已经达到这样的高超和精细了。飘带,结子和花束,以如画的纷乱,在衣服上飞动,虽然这纷乱,是由许多不纷乱的头脑,费过不少的时光。头上的轻装只搁在耳朵上,仿佛想要说:“且住!我要飞去了!只可惜不能带了我的美人一同去!”她们都穿着很紧窄的衫子,看起来就显出挺拔和合适的丰姿(我应该趁这机会声明,N市的闺秀们是都见得有点儿胖胖的,但她们知道很巧妙的收束起来,于是成了很适宜的姿态,人也不觉得她们的肥大了。)一切都经过深思熟虑:颈子和肩膀露出得刚刚合适,不太少,可也不太多:谁都照了自己的感觉和确信,显示着她的东西,来要一个男人的命;其余的部分,就用了很大的鉴识和意趣,遮盖起来:或者用一种飘带做成的,比叫作“接吻”的点心连要轻飘飘的围巾,淡烟似的绕在颈子上,或者在背后的衣服下面,衬一条我们乡下大抵称为“卫道”的细麻所做的小小的花纱。这花纱,是前前后后,遮到决不使男子再会送命的程度的,然而这正是害事之处的嫌疑,却也就在这里。长手套并不紧接着袖口,显出肘弯以上的臂膊的动人的一段来,有许多还丰满得令人羡慕;有一些人,因为拉得太高,竟把羔皮手套撕破了——总而言之,好象一切东西,都想要说:“不不,这不是乡下,这是巴黎!”不过有时也突然现出一顶谁也一向没有见过的包帽,或者跳出一枝孔雀毛,或者反对时髦的别的什么和一种只顾自己的趣味的表示来。然而没有这些是不行的——这就是省会的特征:总要露一点这样的破绽。乞乞科夫站在闺秀们的面前,心里想:“但究竟谁是发信人呢?”他试在一刹时中,伸出他的鼻子去;却碰着了肘弯,翻领,袖口,飘带,香喷喷的小衫和衣服的一大阵。粗野的迦落巴特[73]发狂似的在他眼前奔了过去:邮政局长夫人,地方审判厅长,插蓝毛毛的太太,插白毛毛的太太,乔具亚的公爵咭卜卡咭哩全夫,彼得堡来的一个官,墨斯科来的一个官,法国人咕咕,沛尔勖诺夫斯基先生和沛来本陀夫斯基先生——都忽然当面在地球上出现,在那里奔腾奋迅了。
EN: The ladies of N. were well known for their lavishness, and in this respect all women could take them as a model. In matters of proper deportment, refined tone, etiquette, and the subtlest rules of conduct -- especially in the study of fashion down to the minutest detail -- they were actually a step or two ahead of the ladies of Petersburg and Moscow. They wore tasteful dresses, rode in handsome carriages through the main street, and always had a footman in gold braid bobbing on the running board behind them. A visiting card, if the name was engraved on Bristol board, was a sacred object. Two ladies of rank, formerly the best of friends and cousins, had fallen out completely over such a visiting card -- one had failed to return the other's call. Their husbands and relatives tried their utmost to reconcile them, but in vain -- everything in the world can be accomplished except this: reconciling two ladies who have become enemies over a neglected return visit. So the two remained, as the local gentry put it, stuck in "mutual evil looks."
The morals of the ladies of N. were extremely strict: they countered every transgression and temptation with noble indignation. If they learned of any weakness, their verdict was merciless. But if anything occurred among themselves, it was done in the greatest secrecy. In speech, they were equally careful, much like their Petersburg counterparts. No one ever heard them say: "I blew my nose!" or "I'm sweating!" Instead they said: "I cleared my nose" or "I used my handkerchief." To ennoble Russian speech, nearly half of all words had been banished from conversation, and one had to take refuge in French.
Previously, the ladies had scarcely mentioned Chichikov. But once the rumor of his being a millionaire spread, attention turned to his other qualities as well. The fault lay solely in the word "millionaire" -- not the millionaire himself, just the word. In many drawing rooms, it began to be discussed that Chichikov, while no Adonis, was certainly a respectable man; if he were just a trifle stouter, he would not look so well. The cloth market became very lively, carriages shuttled back and forth. Even Chichikov was finally struck by the unusual attention paid to him. One fine day, he came home to find a letter on his desk. It began quite directly: "No, I must write to you!" There followed reflections on the mysterious communion of souls, then several golden words: "What is life? -- A valley of exile and sorrow. What is the world? -- A heap of unfeeling people." The writer spoke of her frail mother who had died twenty-five years ago, and whose tears had moistened the stationery. She urged Chichikov to leave the suffocating city and follow her into the wilderness. At the end, genuine despair poured forth:
Two turtledoves
Shall bear thee to the grave,
They coo and sing
To show thee my deep woe.
The last line was not entirely smooth, but no matter: the letter was perfectly in keeping with the spirit of the times. It bore no signature. A postscript stated that Chichikov's own heart would guess the sender, and that at the next day's ball at the governor's house, this strange personage would also be present.
All this was quite interesting. The anonymity contained much stimulus and temptation. Chichikov read the letter two or three times and finally exclaimed: "It would really be interesting to find out who wrote it!" He spent over an hour in strange conjectures, then carefully folded the letter and placed it in his trunk, beside a theater advertisement and a wedding invitation that had lain there untouched for seven years. Soon afterwards, an invitation to the governor's ball actually arrived.
He immediately dropped everything and devoted himself to preparations for the ball. The inspection and rehearsal of his face before the mirror alone took an hour. He made his face appear now grave and dignified, now deferentially smiling, now deferential without the smile. He bowed before the mirror while uttering vague, French-sounding noises, though Chichikov knew not a word of French. Then he practiced expressions of delighted surprise, raised his eyebrows, moved his lips, even worked his tongue once or twice. Finally, he lightly stroked his chin and said: "Ah, what a fine fellow you are!" Then he began to dress. Throughout, he remained in the best of spirits, buckling his belt and tying his cravat while practicing casual bows and elegant salutations, and even executing a little jump, although he had never learned to dance. The jump had a harmless consequence: the wardrobe shook and a brush fell from the table.
His appearance at the ball created a sensation. Everyone rushed to greet him. "Pavel Ivanovich!" "My God, Pavel Ivanovich!" "Dear Pavel Ivanovich!" -- Chichikov found himself embraced by many people simultaneously. Scarcely had he escaped the court president's embrace when the police chief seized him, passed him to the health inspector, who handed him to the liquor monopoly director, who passed him to the architect... The governor, standing with some ladies, a bonbon wrapper in one hand and a little Bolognese dog in the other, threw both to the floor when he spotted Chichikov, making the dog howl. In short, the guest spread joy and merriment everywhere.
The ladies immediately surrounded him like a brilliant garland, enveloping him in clouds of various perfumes. Their attire displayed infinite taste; all the colors of taffeta, satin, and net were in the most fashionable pale, faded shades. Ribbons, bows, and bouquets fluttered in picturesque disorder on their dresses, though this disorder had been devised by many orderly minds over considerable time. The light headdresses perched only on the ears, as if wanting to say: "Wait! I am about to fly away! A pity I cannot take my beauty along!" All wore tightly fitting bodices that showed their upright, graceful figures. The long gloves did not quite reach the sleeves, revealing a charming stretch of arm above the elbow. In short, everything seemed to say: "No, no, this is not the provinces, this is Paris!" Chichikov stood before the ladies and thought: "But who is the letter-writer?" He tried to thrust his nose forward but ran into elbows, lapels, cuffs, ribbons, and a whole army of perfumed blouses and dresses. A wild galop raced past his eyes: the postmaster's wife, the court president, a lady with blue plumes, one with white, a Georgian prince, an official from Petersburg, another from Moscow, the Frenchman Coucou, Mr. Perkhunovsky and Mr. Perebendovsky -- all suddenly appeared and dashed about.
DE: Die Damen von N. waren bekanntlich fuer ihren Aufwand beruehmt, und darin konnten alle Frauen sie sich zum Vorbild nehmen. Was die rechte Haltung, den feinen Ton, die Etikette und die subtilsten Regeln des Benehmens betraf, besonders was das Studium der Mode bis ins kleinste Detail anging, uebertrafen sie sogar die Damen von Petersburg und Moskau um einige Schritte. Sie trugen geschmackvolle Kleider, fuhren in huebschen Kutschen durch die Hauptstrasse und hatten stets einen Lakaien in Goldtressen auf dem Trittbrett hinter sich. Eine Visitenkarte, wenn der Name auf Bristolkarton geschrieben stand, war ein heiliger Gegenstand. Zwei Damen von Stand, frueher die besten Freundinnen und Cousinen, hatten sich wegen einer solchen Visitenkarte voellig zerstritten -- die eine hatte den Besuch der anderen nicht erwidert. Ihre Maenner und Verwandten bemuehten sich vergebens um Versoehnung -- alles auf der Welt laesst sich bewerkstelligen, nur nicht dies: zwei Damen zu versoehnen, die wegen eines versaeumten Gegenbesuchs zu Feindinnen geworden sind. So blieben die beiden, wie man in der Stadt sagte, im gegenseitigen "Boese-Blicke-Werfen" stecken.
Die Damen von N. waren in ihren Sitten aeusserst streng: mit edlem Zorn wandten sie sich gegen jedes Vergehen und jede Versuchung. Erfuhren sie von einer Schwaeche, so urteilten sie unerbittlich. Kam es allerdings in ihren eigenen Reihen zu gewissen Dingen, so geschah das in groesster Heimlichkeit. In ihrer Sprache waren sie ebenso gewissenhaft wie ihre Petersburger Kolleginnen. Niemand hoerte sie je sagen: "Ich rotze!" oder "Ich schwitze!" Stattdessen sagten sie: "Ich habe mir die Nase gereinigt" oder "Ich habe mein Taschentuch benutzt." Um die russische Sprache zu veredeln, hatte man fast die Haelfte aller Woerter aus der Konversation verbannt und musste oft Zuflucht zum Franzoesischen nehmen.
Zuvor hatten die Damen Tschitschikow kaum erwaehnt. Doch seit sich das Geruecht verbreitete, er sei Millionaer, richtete sich die Aufmerksamkeit auch auf seine anderen Eigenschaften. Die Schuld lag allein am Wort "Millionaer" -- nicht am Millionaer selbst, nur am Wort. In den Salons begann man zu eroertern, Tschitschikow sei zwar kein Adonis, aber ein durchaus anstaendiger Mann; waere er etwas dicker, saehe er nicht mehr so gut aus. Der Stoffmarkt wurde lebhaft, die Kutschen fuhren hin und her. Sogar Tschitschikow konnte nicht umhin, die ungewoehnliche Aufmerksamkeit zu bemerken. Eines schoenen Tages fand er einen Brief auf seinem Schreibtisch. Der Brief begann mit den Worten: "Nein, ich muss Ihnen schreiben!" Es folgten Betrachtungen ueber die geheimnisvolle Verbindung der Seelen, dann einige goldene Worte: "Was ist das Leben? -- Ein Tal der Truebsal. Was ist die Welt? -- Ein fuehlloses Gedraenge von Menschen." Die Schreiberin erwaehnte ihre vor fuenfundzwanzig Jahren verstorbene Mutter, die mit Traenen benetzte Briefbogen, und forderte Tschitschikow auf, die erstickende Stadt zu verlassen und ihr in die Wildnis zu folgen. Am Ende stand wahre Verzweiflung:
Zwei Turteltauben
Tragen dich zum Grab,
Sie girren und singen
Dir mein tiefes Leid.
Die letzte Zeile war nicht ganz gelungen, aber das machte nichts: der Brief entsprach ganz dem Geist der Zeit. Er war ohne Unterschrift. In einer Nachschrift stand, Tschitschikows eigenes Herz werde die Absenderin erraten, und am naechsten Tag auf dem Ball beim Gouverneur werde diese merkwuerdige Gestalt auch zugegen sein.
All das war recht interessant. Die Anonymitaet enthielt viele Reize und viel Versuchung. Tschitschikow las den Brief zwei-, dreimal und rief: "Es waere wirklich interessant herauszufinden, wer ihn geschrieben hat!" Dann verbrachte er ueber eine Stunde mit Spekulationen, faltete den Brief sorgfaeltig zusammen und legte ihn in seinen Koffer, neben eine Theateranzeige und eine Hochzeitseinladung, die dort seit sieben Jahren unberuehrt gelegen hatte. Bald darauf kam tatsaechlich eine Einladung zum Ball des Gouverneurs.
Er liess sofort alles stehen und liegen und widmete sich den Vorbereitungen fuer den Ball. Allein die Begutachtung und Uebung seines Gesichtsausdrucks vor dem Spiegel dauerte eine Stunde. Er liess sein Gesicht bald ernst und wuerdevoll erscheinen, bald ehrerbietig mit einem Laecheln, bald ehrerbietig ohne Laecheln. Dann verneigte er sich vor dem Spiegel, wobei er undeutliche, franzoesisch klingende Laute von sich gab, obwohl Tschitschikow kein Wort Franzoesisch konnte. Dann uebte er ueberraschte, entzueckte Mienen, hob die Brauen, bewegte die Lippen und sogar die Zunge. Schliesslich strich er sich leicht uebers Kinn und sagte: "Ach, du guter Kerl!" Dann begann er sich anzukleiden. Dabei war er die ganze Zeit in bester Laune, schnallte den Hosengurt, band die Krawatte und uebte elegante Verbeugungen und machte sogar einen kleinen Sprung, obwohl er nie tanzen gelernt hatte. Der Sprung hatte eine harmlose Folge: der Schrank wackelte, und eine Buerste fiel vom Tisch.
Sein Erscheinen auf dem Ball erregte groesstes Aufsehen. Alle eilten herbei, um ihn zu begruessen. "Pawel Iwanowitsch!" "Mein Gott, Pawel Iwanowitsch!" "Lieber Pawel Iwanowitsch!" -- Tschitschikow wurde gleichzeitig von vielen umarmt. Kaum hatte er sich aus der Umarmung des Gerichtsvorsitzenden befreit, ergriff ihn der Polizeimeister, der ihn an den Sanitaetsinspektor weiterreichte, dieser an den Branntweinmonopolisten, dieser an den Baumeister... Der Gouverneur, der gerade mit einem Bonbonpapier in der einen und einem Bologneser Schoesshund in der anderen Hand bei einigen Damen stand, warf beides auf den Boden, als er Tschitschikow erblickte, sodass der Hund aufheulte. Kurz, der Gast verbreitete Frohsinn und Freude.
Die Damen umringten ihn sogleich wie ein praechtiger Blumenkranz und huellten ihn in Wolken verschiedenster Duefte. In ihrer Garderobe entfaltete sich unendlicher Geschmack; alle Farben von Taft, Seide und Tuell waren in den modischsten hellen, verblassten Toenen gehalten. Baender, Schleifen und Blumen flatterten in malerischer Unordnung an den Kleidern, obwohl diese Unordnung von vielen geordneten Koepfen nach langer Arbeit erdacht worden war. Der leichte Kopfschmuck sass nur auf den Ohren, als wollte er sagen: "Halt! Ich will davonfliegen! Schade nur, dass ich meine Schoene nicht mitnehmen kann!" Alle trugen eng anliegende Mieder, die eine aufrechte, anmutige Figur zeigten. Die langen Handschuhe reichten nicht ganz bis zum Aermel und liessen ein reizendes Stueck Arm oberhalb des Ellbogens sehen. Kurz, alles schien sagen zu wollen: "Nein, nein, dies ist nicht die Provinz, dies ist Paris!" Tschitschikow stand vor den Damen und dachte: "Aber wer ist nun die Briefschreiberin?" Er versuchte mit der Nase vorzustossen, stiess aber auf Ellbogen, Aufschlaege, Baender und eine ganze Armee parfuemierter Blusen und Kleider. Eine wilde Galoppe raste vor seinen Augen vorbei: die Postmeisterin, der Gerichtsvorsitzende, eine Dame mit blauem Federschmuck, eine mit weissem, ein georgischer Fuerst, ein Beamter aus Petersburg, einer aus Moskau, der Franzose Coucou, Herr Perchunowski und Herr Perebendowski -- alle erschienen ploetzlich und stuermten los.
FR: Les dames de N. etaient reputees pour leur faste, et en cela toutes les femmes pouvaient les prendre pour modele. En matiere de bonne tenue, de ton raffine, d'etiquette et des regles de conduite les plus subtiles, surtout pour l'etude de la mode jusque dans les moindres details, elles devancaient meme les dames de Petersbourg et de Moscou de quelques pas. Elles portaient des toilettes pleines de gout, parcouraient les rues principales dans d'elegantes caleches et avaient toujours un laquais en galons dores qui se balancait sur le marchepied. Une carte de visite, lorsque le nom etait grave sur du carton bristol, etait un objet sacre. Deux dames de qualite, autrefois les meilleures amies et cousines, s'etaient completement brouillees a cause d'une telle carte de visite -- l'une n'avait pas rendu sa visite a l'autre. Maris et parents s'efforcerent en vain de les reconcilier.
Les moeurs des dames de N. etaient extremement strictes : elles combattaient tout ecart et toute tentation avec une noble indignation. Si elles apprenaient quelque faiblesse, le verdict etait sans pitie. Mais si quelque chose se passait dans leurs propres rangs, cela se faisait dans le plus grand secret. Dans leur langage, elles etaient aussi scrupuleuses que leurs homologues de Petersbourg. Pour ennoblir la langue russe, on avait banni pres de la moitie des mots de la conversation, et l'on devait souvent se refugier dans le francais.
Auparavant, les dames avaient a peine mentionne Tchitchikov. Mais depuis que la rumeur de sa fortune de millionnaire s'etait repandue, l'attention se porta aussi sur ses autres qualites. Dans les salons, on commenca a dire que Tchitchikov, s'il n'etait pas un Adonis, n'en etait pas moins un homme fort convenable. Le marche aux etoffes devint tres anime, les caleches allaient et venaient. Meme Tchitchikov ne put s'empecher de remarquer l'attention inhabituelle qu'on lui portait. Un beau jour, il trouva sur son bureau une lettre. Elle commencait ainsi : "Non, je dois vous ecrire !" Suivaient des reflexions sur la communion mysterieuse des ames, puis quelques paroles dorees : "Qu'est-ce que la vie ? -- Une vallee d'exil et de chagrin. Qu'est-ce que le monde ? -- Un amas d'etres insensibles." L'auteur parlait de sa mere fragile, morte depuis vingt-cinq ans, dont les larmes avaient mouille le papier a lettres, et exhortait Tchitchikov a quitter la ville etouffante pour la suivre dans les terres sauvages. A la fin eclatait un veritable desespoir :
Deux tourterelles
Te porteront au tombeau,
Elles roucoulent et chantent
Pour te montrer ma douleur profonde.
Le dernier vers n'etait pas tres reussi, mais peu importait : la lettre etait tout a fait dans l'esprit du temps. Elle n'etait pas signee. Un post-scriptum indiquait que le propre coeur de Tchitchikov devinerait l'expeditrice, et qu'au bal du gouverneur le lendemain, ce singulier personnage serait egalement present.
Tout cela etait fort interessant. L'anonymat contenait beaucoup de stimulants et de tentations. Tchitchikov relut la lettre deux ou trois fois et s'ecria : "Il serait vraiment interessant de decouvrir qui l'a ecrite !" Il passa plus d'une heure en etranges speculations, puis plia soigneusement la lettre et la rangea dans sa malle, a cote d'une affiche de theatre et d'une invitation de mariage qui y reposaient depuis sept ans. Bientot arriva effectivement une invitation au bal du gouverneur.
Il abandonna tout aussitot et se consacra aux preparatifs du bal. L'examen et l'exercice de son visage devant le miroir prirent a eux seuls une heure. Il donna a son visage tantot un air grave et digne, tantot une expression de deference souriante, tantot de deference sans sourire. Il s'inclina devant le miroir en emettant des sons vagues qui ressemblaient au francais, bien que Tchitchikov ne sut pas un mot de francais. Puis il s'exerca a des mines de surprise ravie, haussa les sourcils, remua les levres et meme la langue une ou deux fois. Pour finir, il se caressa legerement le menton et dit : "Ah, quel bon garcon tu fais !" Puis il entreprit de s'habiller. Il resta d'excellente humeur tout du long, bouclant sa ceinture et nouant sa cravate tout en s'exercant a des saluts desinvoltes et d'elegantes reverences, et fit meme un petit saut, bien qu'il n'eut jamais appris a danser. Ce saut eut une consequence inoffensive : l'armoire trembla et une brosse tomba de la table.
Son apparition au bal causa une sensation extraordinaire. Tous se precipiterent pour le saluer. "Pavel Ivanovitch !" "Mon Dieu, Pavel Ivanovitch !" -- Tchitchikov se trouva embrasse par beaucoup de monde en meme temps. A peine libere de l'etreinte du president du tribunal, le chef de police le saisit, le passa a l'inspecteur sanitaire, celui-ci au directeur du monopole des eaux-de-vie, celui-ci a l'architecte... Le gouverneur, debout avec quelques dames, un papier de bonbon dans une main et un petit bolognais dans l'autre, jeta les deux a terre en apercevant Tchitchikov, faisant hurler le chien. Bref, l'invite repandit la joie et l'allegresse.
Les dames l'entourerent aussitot comme une guirlande eclatante, l'enveloppant de nuages de parfums varies. Leur parure deployait un gout infini ; toutes les couleurs de taffetas, de satin et de tulle etaient dans les tons les plus clairs et les plus estompes a la mode. Rubans, noeuds et bouquets voltigeaient en un desordre pittoresque sur les robes, bien que ce desordre eut ete concu par beaucoup d'esprits ordonnes au prix de bien du temps. Les legers ornements de tete ne tenaient qu'aux oreilles, comme pour dire : "Attendez ! Je vais m'envoler ! Dommage que je ne puisse emporter ma belle !" Toutes portaient des corsages tres ajustes qui montraient des silhouettes droites et gracieuses. Les longs gants ne rejoignaient pas tout a fait les manches, revelant un charmant morceau de bras au-dessus du coude. Bref, tout semblait dire : "Non, non, ce n'est pas la province, c'est Paris !" Tchitchikov se tenait devant les dames et pensait : "Mais qui est donc l'auteur de la lettre ?" Il essaya d'avancer le nez, mais se heurta a des coudes, des revers, des manchettes, des rubans et toute une armee de blouses et de robes parfumees. Un galop sauvage deferla sous ses yeux : la femme du directeur de la poste, le president du tribunal, une dame a plumes bleues, une a plumes blanches, un prince georgien, un fonctionnaire de Petersbourg, un de Moscou, le Francais Coucou, M. Perkhunovsky et M. Perebendovsky -- tous apparurent soudain et s'elancerent.
“我们这里是——全省都在活动了哩!”乞乞科夫后退着,一面自己说。但当闺秀们散开的时候,他却又重行察看,看他可能从颜面和眼睛的表示上,辨出寄信的人来;然而,颜面和眼睛都不告诉他,寄信人是那一个。各到各处,每张脸上都漂泛着一点依稀的可疑,无限的微妙——唉,多么微妙……!“不成,”乞乞科夫心里说:“女人……就是这样的物事”——这时他做了一个示意的手势——“那简直是无话可说的!如果谁想把她们脸上闪过的一切这曲折和层迭,再来叙述一下,或者模拟一下罢……也简直办不到!单是她们的眼睛就是一个无边无际的国土,倘有人错走了进去,那就完了!钩也钩不回,风也刮不出。谁试来描写一下她们的眼神罢:这温润,绵软,蜜甜的眼神……谁知道这样的眼神有多少种呢:刚的和柔的,朦朦胧胧的,或者如几个人所说的‘酣畅的’眼神,而且还有并不酣,然而更加危险的——那就是简直抓住人心,好象用箭穿通了灵魂的一种。不成,找不出话来形容的。这是人类社会的‘寻开心的’一半,再没有别的了!”
唉唉,不对!我不料我们的主角竟滑出一句街坊上的话来。但叫我怎么办呢?这是在俄国的作家的运命!不过倘有一句街坊话混进这书里来,可不是作者之罪,倒是读者,尤其是上流的读者之罪:从他们那里,先就听不到合式的俄国话,他们用德国话,法国话,英国话和你应酬,多到令人情愿退避,连说话的样子也拚命的学来头,存本色:说法国话要用鼻音,或者发吼,说英国话呢,像一只鸟儿还不算到家,再得装出一副真像鸟儿的脸相,而且还要嗤笑那不会学这模样的人。他们所惟一竭力避忌的,是一切俄国话——至多,也不过在乡下造一座俄国式的别墅。这样的是上流的读者,以及一切自以为上流的读者!然而别一面却又有:那么的严厉,那么的要求!他们简直要最规矩,纯粹,高尚的文体来做文章——一句话,是要俄国话自己圆熟完备,从云端里掉了下来,正落在他们的舌头上,只要一张口,教跑出外面去就好了。人类社会的女性的一半,自然是很难猜测的;但我得声明,我觉得可敬的读者先生,却往往更其难于猜测。
这之间,乞乞科夫越加惶惑,不知道怎么从所有在场的闺秀里,认出发信人来了。他再来一种试验,用了研究的眼光,去观察她们中的每一个,觉得那些多情的女性的眼睛里,都闪烁着一点东西,是使可怜的凡骨的心中,收得希望和甘甜的痛楚,这使他终于喊起来道:“不行,这是枉然的,我看不出!”但这对于他始终如一的大高兴,却并无丝毫影响。还是用他那快活的,无拘无束的态度,和一两位闺秀谈几句趣话,开着又快又小的脚步,忽而走向这个,忽而走向那个,轻飘飘的绕着女人,转来转去,好象穿高底靴的老花花公子,即俄国一般叫作“耗子公马”的一样。如果他要迅速稳当的穿过一群人,就鞠一个躬,同时把脚儿伸出一点去,就是所谓螺旋势子或是花花公子画花押。闺秀们都很愉快而且满足,不但是从他这里发见了一大堆可取和有趣的特色了,还在他脸孔的表情上,看出了一点凡有女人们一定非常喜欢的,尊严的,勇敢的,威武的东西来。真的,为了他,人几乎要吵架了:许多人立刻觉到,乞乞科夫是大抵站在门口近旁的,大家就都要来坐靠近门口的椅子,有一位闺秀比别一位占了先,这时就几乎现出不舒服的局面,有许多自己也想去坐的人,对于这无耻和胡闹,都气愤得很。
乞乞科夫和闺秀们施展着活泼的谈天,其实倒是她们向他来施展着活泼的谈天,给了他许多非常微妙和优秀的比喻的话头,全都得加以想象和猜测,弄得他满头流汗,至于忘记了去尽礼节的义务:就是向这家的主妇问安。直到听见已经对他站了两三分钟的知事太太的声音,这才记得起来了。知事太太亲密的摇着头,用了柔和的,又有些狡猾的音调,向他说话道:“阿,您来啦,保甫尔·伊凡诺维支!……”我在这里,不能把知事太太的话完全再现,我只知道她说了几句非常友爱和亲热的句子,就是我们的最高雅的作家们常常写在小说和故事里的,名媛和侠士所说的那一类,他们是特别偏爱描写我们客厅里的生活,而且趁这机会,显出他们是精微的情景的大知识家来的。她说的大约是:“人已经这么利害的占领了您的心,里面竟没有一块小地方,没有一点小角落,剩给您这么忍心忘却了的别人了吗?”我们的主角立刻转向知事太太去,而且已经想好了回答,那回答,比起我们从斯风斯基,林斯基,理定,格来明所写的时行小说里,以及从别的出场人物之类的军人们那里所听到的来,自然只会好,不会坏,但当他在无意中一抬眼的时候,却忽然遭了打击似的停止了。
知事太太站在他面前,然而并不止她自己:她还挽着一个十六七岁的年青的姑娘,鲜明的金色发,精致整齐的相貌,尖锐的下巴和卵圆的脸盘,实在可以给美术家去做画圣母的模范,在无论什么东西:山和树林,平野,脸,嘴唇和脚,都喜欢广大的俄国,是很不容易找出来的——当他走出罗士特来夫家的时候,当他的车子,因为车夫发昏或是马匹的碰巧的冲突,和她的马具缠绕起来的时候。当米卡衣叔和米念衣叔想来解开这纠纷的结子的时候,他在路上遇见的,就是这金色发。乞乞科夫非常狼狈了,至于嘴里再也说不出有条理的句子来,只吃吃的讲了一句痴呆的含胡话,无论是斯风斯基或林斯基,理定或格来明,都决不肯使他滑出口来的。
“您还没认识我的女儿罢?”知事太太说。“她是刚从女塾里毕业出来的。”
他回答说,他曾经出乎意外地和她有过相见的光荣:以后还想添上几句去,然而完全失败了。知事太太又说了一两句话,就和她的女儿走向大厅的那一头,去招呼另外的客人,乞乞科夫却还生根一般的站着。他在这地方还站了很久的工夫,恰如一个高高兴兴的到街上去散步的人,周围景象,无不浏览,却突然立住了,因为他想了起来,自己还忘记了什么;恐怕再没有比这样的人,更加不中用的了:只一击就从他脸上失去了无忧无愁的样子。他竭力的回想,自己究竟忘记了什么呢:手巾么?手巾就塞在衣袋里!他的钱?钱可是也在的!好象什么也没有缺,然而总有一个莫名其妙的妖魔,在耳朵边悄悄的告诉他忘记了什么。他只是胡胡涂涂的看着潮涌的人群,尾追的马车,兵们的枪和帽,店家的招牌之类,心里却并不明白。乞乞科夫也就是这模样,和周围的事情全不相关了。这之间,从女人的发香的口唇里,向他飞过许多柔腻的质问和暗示来。“我们这些可怜的地上居民可以斗胆的问您,您在沉思着什么吗?”——“您的思想所寄托的幸福的旷野,是在什么地方呢?”——“引您进这快活的暝想之谷的那人的名字,我们可以知道吗?”然而他不再看重这些问题了,闺秀们的亲爱的言语,恰如说给了风的一样,是的,他竟这样的疏忽,至于放闺秀们静静的站着,自己却跑到大厅的那一边,去探知事太太和她女儿的踪迹去了。但闺秀们却并不肯这么轻易的就放手——各人都暗自下了坚固的决心,要用尽对于我们的心,非常危险的药味,要用尽她们的极顶强烈的撩人之力。我在这里应该夹叙一下,有几个闺秀——我说,有几个,决不是全体——是被一个小小的弱点所累的:如果她觉得自己有一点动人之处,无论前额也好,嘴也好,手也好,就以为这种特色,别人也应该立刻佩服,大家异口同声的喊道:“瞧呀,瞧呀,她有多么出色的希腊式的鼻子呀!”或者是“多么整齐的动人的前额呵!”如果有很美的肩膀呢,她首先就相信一切青年男子,都要给这肩膀所迷,她一走过,就无条件的叫起来道:“阿呀,她有多么出色的肩膀呀!”而对于脸孔,头发,眼睛和前额,却看也不看,即使看,也不过当作不关紧要的东西。闺秀们中的有几个,是在这样的想的。但这一晚上,却谁都立下誓愿,在跳舞之际,要竭力表现得动人,还把自己的最大美艳的特色,显得非常明白。邮政局长夫人在应着音响,跳着华勒支舞之间,把她俊俏的头,非常疲乏的侧了起来,令人觉得真的到了上界。一个非常可爱的闺秀,到会的目的,是完全不在跳舞的,用她自己的话来说,是在右脚的大趾上,有了鸡眼睛模样,豌豆儿大小的不舒服或是不便当,所以她只得穿了绒鞋,——但竟也坐不住了,就穿着她的绒鞋跳了几回华勒支,为的是不过使邮政局长夫人不要太自鸣得意。
然而这些一切,对于乞乞科夫并无豫期的效验;他几乎不看闺秀们的脚步和身段,只是踮起脚尖,从大家的头上张望着可爱的金头发的所在;忽而又弯低一点,由肩膀和臂膊之间去找寻她;他到底找到她了,他看见她和母亲坐在一起,头上俨然的摇动着插在一种东方式包帽上的羽毛。他好象就要向这堡垒冲锋了。春色恼杀了他,还是有谁在背后推他呢?总之,他就不管一切阻碍,决然的冲过去:烧酒专卖局长被他在肋下一推,好容易才能用一条腿站住,总算幸而还没有因此撞倒一排人;邮政局长也向后一跳,吃惊的看定他,带着一点微妙的嘲笑;但乞乞科夫却一看也不看,他只为那带着长手套的远地里的金头发生着眼睛,满心全是飞过场上,直到那边的希望了。这时在别一角落上,已经有四对跳着玛兹尔加:靴后跟敲着地板,一个陆军里的大尉,用了肉体和精神,两手和两脚,显出他们梦里也没有做过的奇想的姿势来。乞乞科夫几乎踏着了跳舞者的脚,一直跑向知事太太和她的女儿所坐的地方去。然而,待到和她们一接近,他却非常胆怯,也不再开勇往直前的小步,竟简直有些窘急,在一切举动上,都显出仓皇失措来了。
在我们的主角那里,真的发生了一点所谓恋爱吗,不能断定;像他那样的人,或者是并不很胖,却也并不太瘦的人,竟会有恋爱的本领吗,也可疑得很;然而这里却演出了一点连他自己也讲不明白的奇特的情景:据他后来自己说,他觉得,仿佛全个跳舞会以及喧嚣和杂沓,在一刹时中,都退到很远的远方,提琴和喇叭,好象在山背后作响,一切全如被烟雾所笼罩,似乎草率地涂在一幅画布上面的平原。而在这朦胧地,草率地涂在画布上面的平原里,却独独锋利而分明的显着动人的年青的金头发的优美的丰姿:她那出色的卵形的脸盘,她那苗条的充实的体态,这是只在刚出女塾的女孩儿身上,才得看见的,还有她那近乎质朴的洁白的衣服,轻松的裹着娇柔的肢节,到处显出堂皇的精粹的曲线来。她好象一件象牙彫成的奇特美丽的小玩意;在朦胧昏暗的群集里,惟独她灿然的见得雪白和分明。
这世界上,也会有这等事:乞乞科夫在他的一生中,虽然不过很短的一瞬息,但也成了一下子诗人了;不过诗人的名目,也还过份一点。至少,在这瞬间,他觉得自己象是一个少年人,或者一个时髦的骠骑兵了。那美人儿旁边恰有一把椅子是空的,他连忙坐下去。谈话开首有些不中肯,不久也就滔滔不绝,他而且得意了起来,然而……我应该在这里声明我的很大的惋惜,凡是身负重要的职务,上了年纪,有了品位的人,和闺秀们谈天,是有一点不大顺口的;说得很流畅的只有中尉,大尉以上的高级军官就全不行。他们在说什么呢,只有上帝知道:可总不是怎么高明的物事,但年青的姑娘们却笑得抖着肩膀;一个枢密顾问官倒也会对你们讲些极顶神妙的东西:说俄罗斯是一个强国,或者说句应酬话,自然并非没有精神的,不过全都很带着钞书的味道,倘若他说一点笑话,自己先就笑个不停,比听着的闺秀们还利害。我在这地方加了这样的声明,为的是要使读者明白,为什么在我们的主角谈话中间,我们的金头发竟打起呵欠来了。但我们的主角好象全没有觉得,仍旧不住的搬出他在各处已经用过许多回的所有出色的物事来,例如:在洵毕尔斯克省的梭夫伦·伊凡诺维支·培斯贝七尼那里,这时住着他的女儿亚兑拉大·梭夫伦诺夫娜和她那三个堂姊妹:马理亚·喀夫理罗夫娜、亚历山特拉·喀夫理罗夫娜和亚兑拉大·喀夫理罗夫娜;还有,在略山省的菲陀尔·菲陀罗维支·贝来克罗耶夫那里;在喷沙省的弗勒勒·毕西理也维支·坡背陀诺斯尼和他的兄弟彼得·毕西理也维支那里,这时住着他们的堂姊妹加德里娜·密哈罗夫娜和两个姪孙女:罗若·菲陀罗夫娜和爱密理亚·菲陀罗夫娜;最后是在伐忒卡省的彼得·华尔梭诺夫也维支那里,住着他的儿媳的姊妹贝拉该耶·雅戈罗夫娜和侄女苏非亚·罗斯谛斯拉夫娜和两个异父姊妹苏非亚·亚历山特罗夫娜和玛克拉土拉·亚历山特罗夫娜。
EN: "Here with us -- the whole province is in motion!" said Chichikov, retreating. But when the ladies dispersed, he tried again to see if he could tell from their expressions or glances who the letter-writer was; yet neither face nor eyes revealed it. Everywhere, on every face, there floated something vaguely suspicious, infinitely subtle -- oh, how subtle...! "No," thought Chichikov, "women... are simply such creatures" -- he made an expressive gesture -- "there is simply nothing to say! If someone wanted to describe all the nuances and shadings that pass over their faces -- he simply could not! Their eyes alone are a boundless kingdom, and whoever wanders in is lost! Neither hook nor wind could pull him back. Let someone try to describe their gaze: the tender, soft, honey-sweet gaze... Who knows how many kinds there are: hard and soft, dreamy, or as some say, 'intoxicating' gazes, and then ones that are not intoxicating but even more dangerous -- they seize the heart and pierce the soul like an arrow. No, words cannot be found for it. It is simply the 'amusement half' of human society, and nothing more!"
Alas, not quite right! I never expected our hero to let slip such a vulgar expression. But what can one do? Such is the fate of Russian writers! However, if a vulgar word has crept into this book, the fault lies not with the author but with the reader, especially the fashionable reader: from him, one never hears proper Russian first. He plies you with German, French, and English so abundantly that one would gladly retreat, and he practices the pronunciation industriously: French must be spoken nasally or bellowed, English like a bird -- and even that is not enough, one must also put on a bird-like face and mock those who cannot manage the trick. The only thing they studiously avoid is anything Russian -- at most they build a country dacha in the Russian style. Such are the fashionable readers and all who consider themselves so! Yet on the other hand: so strict, so demanding! They insist on the most correct, purest, most elevated style -- in a word, the Russian language should perfect itself, fall down from the clouds and land exactly on their tongues, so they need only open their mouths and let it run out. The female half of human society is of course hard to fathom; but I must confess, the esteemed male readers often seem to me even harder to penetrate.
DE: „Hier bei uns -- die ganze Provinz ist in Bewegung!" sagte Tschitschikow zurueckweichend. Doch als sich die Damen zerstreuten, versuchte er erneut zu ergruenden, ob er an der Miene oder dem Blick erkennen koenne, wer die Absenderin war; doch weder Miene noch Blick verrieten es ihm. Ueberall, auf jedem Gesicht, lag etwas undeutlich Verdaechtiges, unendlich Feines -- ach, wie fein...! „Nein," dachte Tschitschikow, „Frauen... sind eben solche Geschoepfe" -- dabei machte er eine bezeichnende Handbewegung -- „da ist einfach nichts zu sagen! Wollte jemand alle Feinheiten und Schattierungen beschreiben, die ueber ihr Gesicht huschen -- er koennte es einfach nicht! Allein ihre Augen sind ein endloses Reich, und wer sich dort hineinverirrt, ist verloren! Weder Haken noch Wind koennten ihn zurueckholen. Man versuche nur, ihren Blick zu beschreiben: den sanften, weichen, honigsüssen Blick... Wer weiss, wie viele Arten es davon gibt: harte und weiche, verschleierte, oder wie manche sagen, 'trunkene' Blicke, und dann noch welche, die nicht trunken, aber noch gefaehrlicher sind -- die packen das Herz und durchbohren die Seele wie ein Pfeil. Nein, es lassen sich keine Worte dafuer finden. Es ist eben die 'Vergniugungshaelfte' der menschlichen Gesellschaft, und weiter nichts!"
Ach, nicht ganz richtig! Ich haette nicht erwartet, dass unserem Haupthelden ein solches Gossenwort entschluepfen wuerde. Was soll man machen? Das ist das Schicksal russischer Schriftsteller! Doch wenn sich ein Gossenwort in dieses Buch verirrt, ist nicht der Autor schuld, sondern der Leser, besonders der vornehme Leser: Von ihm hoert man zuerst kein anstaendiges Russisch. Er benutzt Deutsch, Franzoesisch und Englisch in solcher Fuelle, dass man sich am liebsten davonmachen moechte, und uebt dabei eifrig die Aussprache: Franzoesisch muss man nasal sprechen oder bruellen, Englisch wie ein Vogel -- und selbst das reicht nicht, man muss obendrein ein Vogelgesicht machen und diejenigen verhoehnen, die diese Kunst nicht beherrschen. Das Einzige, was sie krampfhaft vermeiden, ist alles Russische -- hoechstens bauen sie auf dem Land eine Datscha im russischen Stil. So sind die vornehmen Leser und alle, die sich dafuer halten! Und andererseits: so streng, so anspruchsvoll! Sie verlangen den allerregelmaessigsten, reinsten, erhabensten Stil -- kurz, die russische Sprache soll von selbst vollendet sein, vom Himmel fallen und genau auf ihre Zunge treffen, dass sie nur den Mund aufzumachen brauchen und sie herauslassen. Die weibliche Haelfte der menschlichen Gesellschaft ist natuerlich schwer zu erraten; doch ich muss gestehen, die verehrten Leser scheinen mir oft noch schwerer zu durchschauen.
FR: "Ici chez nous, toute la province est en mouvement !" dit Tchitchikov en reculant. Mais quand les dames se disperserent, il tenta de nouveau d'examiner si les visages ou les regards pouvaient lui reveler l'identite de l'expeditrice ; mais ni les visages ni les yeux ne le lui disaient. Partout, sur chaque visage, flottait quelque chose de vaguement suspect, d'infiniment subtil -- oh, que c'etait subtil...! "Non," pensa Tchitchikov, "les femmes... sont simplement de telles creatures" -- il fit un geste expressif -- "il n'y a tout simplement rien a dire ! Si quelqu'un voulait decrire toutes les nuances et les ombres qui passent sur leur visage -- il en serait tout simplement incapable ! Leurs yeux seuls sont un royaume sans bornes, et quiconque s'y egare est perdu ! Ni crochet ni vent ne pourraient le ramener. Qu'on essaie donc de decrire leur regard : le regard tendre, doux, sucre comme le miel... Qui sait combien d'especes il y en a : des durs et des doux, des voiles, ou comme disent certains, des regards 'enivrants', et puis d'autres qui ne sont pas enivrants mais encore plus dangereux -- ceux-la saisissent le coeur et percent l'ame comme une fleche. Non, on ne trouve pas de mots pour cela. C'est simplement la 'moitie recreative' de la societe humaine, rien de plus !"
Helas, ce n'est pas tout a fait juste ! Je ne m'attendais pas a ce que notre heros laisse echapper une expression si vulgaire. Mais que faire ? Tel est le sort des ecrivains russes ! Cependant, si un mot vulgaire s'est glisse dans ce livre, ce n'est pas la faute de l'auteur, mais du lecteur, surtout du lecteur distingue : de lui, on n'entend d'abord pas de russe convenable. Il vous abreuve d'allemand, de francais et d'anglais avec tant de profusion qu'on voudrait s'enfuir, et il s'exerce assidument a la prononciation : le francais doit se parler du nez ou etre rugit, l'anglais comme un oiseau -- et meme cela ne suffit pas, il faut en plus prendre une mine d'oiseau et se moquer de ceux qui ne savent pas l'imiter. La seule chose qu'ils evitent scrupuleusement, c'est tout ce qui est russe -- tout au plus construisent-ils a la campagne une datcha de style russe. Tels sont les lecteurs distingues et tous ceux qui se croient tels ! Mais d'autre part, quelle severite, quelles exigences ! Ils veulent le style le plus correct, le plus pur, le plus eleve -- en un mot, la langue russe doit se parfaire d'elle-meme, tomber des nuages et atterrir exactement sur leur langue, pour qu'ils n'aient qu'a ouvrir la bouche et la laisser sortir. La moitie feminine de la societe humaine est naturellement difficile a deviner ; mais je dois avouer que les estimes lecteurs masculins me semblent souvent encore plus difficiles a penetrer.
乞乞科夫的态度惹起了一切闺秀们的不平。其中的一个故意在他旁边经过,要他悟出这一点来,并且用她展开的裾裙,稍稍卤莽地扫着金头发,一面又整理着在她肩头飘动的围巾,那巾角就正拂在这年青闺秀的脸孔上;也在这时候,别一位闺秀便在乞乞科夫的背后,和从她那里洋溢出来的紫罗兰香一起,嘴里飞出了一句颇为恶毒的辛辣的言辞。然而无论他实在没有听见,或者不过装作不听见,他的举动在这地方却真的有些不合,因为闺秀们的意见是总该给点尊重的。他也后悔自己的过失,但可惜是在后来,已经到了太晚的时候了。
许多脸上都画出了应有的愤怒。纵使乞乞科夫的名声在交际场里有这么大,纵使谁都确信他拥有百万的家财,纵使他脸上带着威严的,英勇的神气,——但有一件事,是闺秀们决不饶恕男人的,无论怎样,无论是谁,他一定完结。女人和男人比较起来,性格上原也较为没有力,但到有些时候,她却不但坚强不屈胜于男人,还胜于世界上的一切。乞乞科夫在无意中显了出来的藐视,使那因为椅子事件,几乎破裂的闺秀们复归于平和与一致了。在她们随便说说的无关紧要的言语中,就会突然发见恶毒尖利的嘲讽。完成了这不幸的,是又有一个少年人,做了一两节关于跳舞者的讥刺诗,在外省的跳舞会里,没有这事是几乎不收场的。这诗又立刻说是乞乞科夫之作了。愤怒越来越大,闺秀们聚集在大厅的各处角落上,彼此切切私语,还给他几句非常不好的指斥;可怜的金头发也被奚落得半文不值,宣告了她的死刑。
这之间,却有一个极顶恼人的袭击,等候着我们的主角;当他的年青的对手打着呵欠,他向她讲述古代各种的故事,说到希腊哲学家提阿改纳斯的时候,罗士特来夫却突然上台,就从客厅的一间后房里走出来了。他从休息室里来,还是从那打着大牌的绿色小屋里跳出来的呢,他的出现,是由于自愿,还是被人赶出来的呢,总之,他高兴地,非常快活地走进客厅里来了,还挽着检事,他确是已经被拖了好久了的,因为这可怜的检事皱着眉头,看来看去,大约是在设法来摆脱他那亲密的旅行的向导。而且他的境遇,实在也很难忍受的。罗士特来夫拖过两杯红茶——自然加了蔗酒的——来,一饮而尽;于是又是讲大话。乞乞科夫一在远处望见他,就决计牺牲了目前的佳遇,赶紧飞速的走开,因为这会面,是决不会有好事情的。但不幸的是身边竟忽然现出知事来,自说找到了保甫尔·伊凡诺维支,非常高兴,并且将他坚留,请他判断和两位闺秀之间的小小的辩论;因为关于妇女的爱之是否永久,大家的意见还不能相同;但这时候,罗士特来夫却已经看见,一径向他跑来了:
“阿唷!赫尔生的地主!赫尔生的地主”他叫喊着跑近来,一面哈哈大笑,笑得他那红如春日蔷薇的鲜活的面庞,只是抖个不住。“怎么样?你买了许多死人了吗?您要知道,大人!”于是转向知事那边,放开喉咙,喊道:“他在做死魂灵的买卖哩!真的,听罢,乞乞科夫!听哪,我是看交情才对你说的,在这里的我们,都是你的好朋友,大人也在这里,我要绞死你,真的,我要绞死你!”
乞乞科夫一点办法也没有了。
“您不相信我罢,大人!”罗士特来夫接着说。“他对我说的是:‘听哪,把您的死掉的魂灵卖给我罢,’我几乎要笑死了。待到我上了市镇,人们却告诉我说他因为要移住,买了三百万卢布的魂灵,了不得的移住呀!他到我这里就来买过死人的。听哪,乞乞科夫:你是一只猪,天在头上,你是一只猪!大人也在这里,对不对,检事先生?”
然而检事和乞乞科夫都非常失措,简直找不出答话来;罗士特来夫却有些快活起来了,不管别人,尽说着他的话:“哦,哦,我的乖乖……如果你不告诉我为什么要买死魂灵,我是不放开你的。听哪,乞乞科夫,你应该羞;你一定自己也明白,你没有比我再好的好朋友了。瞧罢,大人也在这里……对不对,检事先生?您不相信罢,大人,我们彼此有怎样的交情,实在的,如果您问我——我站在这里,如果您问我:‘罗士特来夫,从实招来,你的亲爷和乞乞科夫两个里,你爱谁呀!’那我就回答说:乞乞科夫!天在头上!……心肝,来呀,让我和你接一个吻,亲一个嘴。您也许可我和他接一个吻罢,大人。请你不要推却,乞乞科夫,让我在你那雪白的面庞上,亲一个嘴儿罢!”然而罗士特来夫和他的亲嘴来得很不像样,几乎是直奔过去的。大家都从他身边退开,也不再去听他了。不过他那买死魂灵的话,却是放开喉咙,喊了出来的,又带着响亮的笑声,所以连停在大厅的较远之处的客人们,也无不加以注意。这报告来得太兀突,使大家的脸上带着一半疑惑,一半胡涂的表情,一声不响的呆立起来。乞乞科夫并且看见许多闺秀们都在使着眼色,恶意的可憎的微笑着,在有几个的脸上,还看出一点非常古怪的东西和另有意思的东西来,于是更加狼狈了。罗士特来夫是一个说谎大家,那是谁都知道的.从他那里听些胡说八道,也是谁都不以为意的:然而尘世的凡人——唉唉,怎么这凡人竟会这样的呢,可实在很难解:一有极其昏妄,极其无聊的新闻,只要是新闻,他就无条件的散布到别一个凡人那里去,虽然也说:“又起了多么大的谣言了呵!”那别一个凡人就尖起耳朵,听得很高兴,后来固然也说道:“然而这是一个大谎,完全不必相信的!”于是连忙出外,去找第三个凡人,告诉他这故事,之后又因了义愤,同声叫喊道:“多么下贱的谎话呀!”而消息就这样的传遍了全市镇,所有在此的凡人们,多日谈论着这件事,一直到大家弄得厌倦,这才说,这故事是没有谈论的价值的。
这无聊之至的偶然的事故,使我们的主角很是心神不定了。一个呆子的很胡涂,很荒谬的话,也往往会使一个聪明人手足无措。他忽然觉得很不舒服,而且苦恼了,好象穿着擦得光亮的长靴,踏在龌龊的、发臭的水洼里;总而言之,这不漂亮,很不漂亮!他要竭力的不想它,忘掉它,疏散它。他还坐下去打牌,然而什么都不顺手,像一个弯曲的轮子:他错抓了两回别人的牌,有一回还至于忘记了并不该他打,却擎起手,打出自己的牌去了。这保甫尔·伊凡诺维支,是一个好手,并且还可以称为精细的赌客,怎么会犯这样的错误,而且连他自说是希望所寄,有如上帝的毕克王也打掉了的呢,审判厅长简直想不出缘故来。邮政局长,审判厅长,还有警察局长,自然也照例的和我们的主角打趣,说他一定在恋爱,而且他们知道,保甫尔·伊凡诺维支是怀着一颗发火的心的。谁使他的心受伤的呢,他们也很明白。然而这并不能给他慰安,虽然他也竭力的装出笑容,用玩笑来回答他们的玩笑。晚餐也没有使他快活起来。纵使席上非常适意,而且罗士特来夫也因为连闺秀们也说他胡闹,早已被人赶走了。当跳着珂蒂伦[74]时,他竟忽然坐在地板上,去抓跳舞者的衣裾,照闺秀们的口气说,这实在是大失体统的。晚餐吃得很愉快,在闪耀着三臂烛台,花朵,瓶子和装满点心的碟子之间的一切脸孔,都为了虚荣的欢喜和满足在发光。军官们,闺秀们和穿燕尾服的绅士们,谁都献着出格的殷勤。有一个大佐,竟用出鞘的刀尖,把汤碟子挑到他的闺秀的前面。有了年纪的绅士们,连乞乞科夫也在内,则在热心的讨论,一面嚼着硬煮食品的鱼或肉,尽量的撒上胡椒末,一面吐出确切的言语来;人们所争论的,正是乞乞科夫向来很有趣味的对象,但这一晚上,他却像一个从远道归来,疲乏困顿的人,脑子并不听他的指挥,他也没有参加的兴致。他竟等不及晚餐散席,大反了往常的习惯,一早就回到家里去了。
在读者已经很熟悉的门口摆着柜子,角落上窥探着蟑螂的屋子里,他的精神和思想,也如他所坐的臬兀不安的靠椅一样,不大平静。他的心很沉闷。一种沉重的空虚在苦恼他:“鬼捉了玩出这跳舞会的那些东西去!”他愤愤的叫道。“他们为什么要这样的高兴?全省满是坏收成,物价腾贵和饥荒,他们却玩跳舞会!有什么好处:一大批娘儿们的旧货。奇怪的是她身上穿着一千卢布以上的东西,归根结蒂,还是农奴们拿他的租钱来付,结果也终于还是我们的。谁都知道,男人们为什么要这么敛钱,纳贿的呢:就是为了给他的女人买很贵的围巾,衣服,以及别的鬼知道叫作什么!这为的是什么呀?为的不过是使放荡的娘儿们可以说,邮政局长太太有一身好衣服哩,——因此就抛掉一千卢布。于是嚷道:跳舞会,跳舞会,多么愉快呀!妈的这样的跳舞会,我看和俄罗斯精神是一点也不合的,这完全是一种非俄罗斯制度。呸,还有哩:像精赤条条的拔光了毛的魔鬼似的,忽然跳出一个上了年纪的黑燕尾服的汉子来,把腿摇来摇去。别一个又和另一个弄在一起,和他谈着正经事,一面却又在地板上左左右右,玩出古怪花样来……这都不过是猴子学样;猴子学样罢了。因为法国人是到了四十岁,还像十五六岁的孩子一样的,所以我们也得这么的来一下!哼,真的,我觉得每一个跳舞会之后,就总要弄出一件什么坏事情,连想也想不得!脑袋的空虚,就恰如和一个场面上的名人谈了天,他说的全是浮面,讲的都靠书本;听起来原也很漂亮,有味的,然而听着的人的脑袋,还是先前似的一无所得;其实倒不如和一个简单的商人去谈天,他只知道自己的本行,然而知道得透彻、切实,比起所有这些小摆设来,更要有价值。究竟从这样的跳舞会里能弄出什么来呢?不知道可有一个作家,想照式照样,写出一切情形来的没有?即使做了书,那跳舞会本身,却还是荒谬胡涂之至的,不知道这究竟有什么影响:道德的,还是不道德的呢?究竟怎样,鬼才知道。人就只要吐一口唾沫,抛掉书!”对于跳舞会,乞乞科夫大概说得这么不合意;但我相信,他的不满,是另外还有一个原因的。招他憎恨的,其实全不是跳舞会,倒是那情状,当大众之前,忽然来了一道莫明其妙的光,于是他就扮演了很奇特,很暧昧的脚色了。自然,如果他用了明白人的眼睛来看这事故,他是会觉得一切都是小事情,一句呆话也毫无关系的,尤其是在要事已经幸而办妥了的现在。但是——人却有一点希奇:使他很恼怒的正是失掉了这人的寄托,虽然对于这寄托,他自己并不看重,评的极苛,还为了他们的尚浮华和爱装饰下过很锋利的攻击。待到经过充足的历练,知道他自己也该负一点罪,那就更加恼怒了。纵使他毫不气忿自己,而且当然还是不错的。可惜我们谁都有这一个小小的弱点,就是总要爱护自己,却去找一个邻近的东西,来泄自己的恼怒,或者用人,或者恰巧碰到的下属,或者自己的女人,或者简直是一把椅子,我们就把它摔到门口或者鬼知道的什么地方去,碰下它一条腿,或是一个靠手来,给看看我们绅士之流的恼怒。
乞乞科夫也立刻找到一个邻近,应该将自己的恼怒,全都归他负担的来了。这亲爱的邻近就是罗士特来夫,不消说,他就上上下下,四面八方的拚命的痛骂了一通,恰如偷儿的对于村长,车夫的对于旅客,对于远行的大尉,看情形也对于将军的一样,在许多古典的咒骂上,另外再加上一大批新鲜的,由他自己的发明精神而来的东西。罗士特来夫的整部家谱被拉出来了,他家族里的许多列祖列宗,都遭了利害的玩弄。
EN: Chichikov's behavior aroused the indignation of all the ladies. One of them passed by him deliberately to make him feel it, somewhat roughly sweeping the blonde hair with her outspread skirt while simultaneously adjusting the shawl on her shoulders, whose corner brushed right against the young lady's face; at the same time, another lady behind Chichikov's back, together with the violet scent wafting from her, let fly a rather venomous and caustic remark. But whether he truly did not hear or merely pretended not to, his conduct here was indeed somewhat inappropriate, for the ladies' opinions always deserve respect. He regretted his error, but unfortunately only later, when it was already too late.
Many faces showed proper indignation. However great Chichikov's reputation in society, however certain everyone was of his millions, however dignified and heroic his expression -- there is one thing ladies never forgive a man, no matter what or who he may be, and he is finished. Woman, compared to man, may be weaker by nature, but at certain moments she is not only stronger than man but stronger than anything in the world. The contempt Chichikov had unwittingly shown reunited the ladies, who had nearly fallen out over the chair affair, in peace and harmony. In their casual, seemingly harmless remarks, one suddenly found malicious, sharp sarcasm. To cap the misfortune, some young man had composed a satirical verse or two about the dancers, without which provincial balls rarely end. The verses were immediately attributed to Chichikov. The indignation grew; the ladies gathered in corners of the hall whispering to each other; the poor blonde girl was ridiculed mercilessly and her death sentence pronounced.
Meanwhile, a most vexing attack awaited our hero. While his young opponent yawned and he told her various old stories, even mentioning the Greek philosopher Diogenes, Nozdryov suddenly appeared, emerging from one of the back rooms. Whether he came from the lounge or the green card room, whether voluntarily or thrown out -- he strode in cheerfully and merrily, dragging the prosecutor by the arm, whom he had evidently been hauling about for some time, for the poor prosecutor was frowning and looking about as if seeking escape. Nozdryov had downed two cups of tea -- with rum, of course -- in one gulp, then started boasting again. The moment Chichikov spotted him from afar, he decided to sacrifice his present pleasant situation and flee, for this encounter could bring nothing good. Unfortunately, the governor suddenly appeared, saying he was delighted to find Pavel Ivanovich and asking him to arbitrate a small dispute between two ladies about whether women's love was lasting. But Nozdryov had already seen him and came running straight at him:
"Aha! The Kherson landowner! The Kherson landowner!" he shouted, running up with a laugh, his fresh cheeks, red as a spring rose, trembling with mirth. "Well? Have you bought many dead ones? You must know, Your Excellency!" -- turning to the governor, he bellowed: "He deals in dead souls! Really, listen, Chichikov! Listen, I say it as a friend, we here are all your good friends, His Excellency is here too -- I'd hang you, really, I'd hang you!"
Chichikov was utterly at a loss.
"You won't believe me, Your Excellency!" Nozdryov continued. "He said to me: 'Listen, sell me your dead souls!' I nearly died laughing. When I came to town, they told me he'd bought three million rubles' worth of souls for resettlement -- what a resettlement! He tried to buy dead people from me too. Listen, Chichikov: you're a pig, God in heaven, you're a pig! Isn't that right, Mr. Prosecutor?"
But both the prosecutor and Chichikov were utterly confounded and could find no reply. Nozdryov, however, grew more animated and chattered on heedlessly: "Oh, oh, my darling... if you won't tell me why you buy dead souls, I won't let you go." But his kisses came most unceremoniously. Everyone drew back and stopped listening. Yet his words about buying dead souls had been bellowed at full volume with loud laughter, so that even the most distant guests took notice. Everyone stood dumbfounded, half bewildered, half confused. Chichikov noticed many ladies exchanging meaningful glances and smiling maliciously. That Nozdryov was a notorious liar, everyone knew. Yet mortal man -- alas, how can this be explained: no sooner is there some outrageously absurd piece of news than he unconditionally spreads it; another listens eagerly, then says "But that's a monstrous lie!" yet rushes out to find a third and tell him the story, after which both exclaim indignantly: "What a base lie!" -- and yet the news spreads through the entire town.
This supremely trivial accident made our hero very nervous. A fool's confused, absurd words can often disconcert even a clever man. He suddenly felt uncomfortable and distressed, as if stepping with polished boots into a foul, stinking puddle. He sat down to play cards, but nothing went right. The postmaster, court president, and police chief teased him about being in love. Supper did not cheer him up either. Nozdryov had long since been thrown out after sitting on the floor during the cotillion and grabbing the dancers' coattails. Chichikov did not even wait for supper to end and went home early.
In his room, where the reader already knows the wardrobe by the door and the cockroaches in the corners, his mind was as restless as the rickety armchair he sat in. His heart was heavy. A crushing emptiness tormented him: "The devil take those who arranged this ball!" he cried furiously. "Why must they be so merry? The whole province suffers from crop failures and high prices, and they throw balls!" He ranted on, but his real anger was not at the ball -- it was at having been thrust into an ambiguous, compromising role before everyone. He immediately found a scapegoat: dear Nozdryov, whom he naturally cursed up and down, inside and out. Nozdryov's entire genealogy was dragged out, and many of his ancestors were thoroughly abused.
But while Chichikov, tormented by gloomy thoughts, sat sleepless in his hard armchair cursing Nozdryov and his entire family, while the candlelight grew dim and the wick charred, while outside the pitch-black night was already giving way to the pale light of dawn and the first cocks crowed in the distance -- at the other end of town, the curtain was already rising on a drama that would further complicate our hero's distressing situation. In the distant streets and lanes, a most peculiar vehicle came rattling along, looking neither like a coach nor a covered wagon nor a half-covered wagon, but rather like a fat-cheeked, potbellied watermelon set on wheels. Inside were cushions and bags of grain. The noise of iron rims and rusty screws woke the night watchman. The horses kept stumbling, having no horseshoes. The vehicle turned several corners and finally stopped before the house of the archpriest's wife. First a maid climbed out, then a lady: it was the landowner Korobozhka. No sooner had our hero departed than the old woman grew terribly anxious, fearing she had been cheated. After three sleepless nights she resolved, despite unshod horses, to drive to town and find out the going price for dead souls and whether she had been thoroughly swindled. What resulted, the reader will learn at once from the conversation of two ladies. But that conversation had better be recorded in the next chapter.
DE: Tschitschikows Verhalten erregte die Empoerung saemtlicher Damen. Eine von ihnen ging absichtlich an ihm vorbei, um ihn dies spueren zu lassen, und streifte mit ihrem ausgebreiteten Kleidersaum etwas unsanft das blonde Haar, waehrend sie zugleich den Schal auf ihren Schultern ordnete, dessen Zipfel gerade dem Gesicht der jungen Dame entgegenwehte; gleichzeitig liess eine andere Dame hinter Tschitschikows Ruecken, zusammen mit dem Veilchenduft, der von ihr ausstroemte, eine recht giftige und scharfe Bemerkung fallen. Doch ob er sie wirklich nicht hoerte oder nur so tat, als hoere er nichts -- sein Benehmen war hier tatsaechlich etwas unangemessen, denn die Meinung der Damen verdient stets Beachtung. Er bereute seinen Fehler, aber leider erst spaeter, als es schon zu spaet war.
Auf vielen Gesichtern zeigte sich gebuehrende Empoerung. Mochte Tschitschikows Ansehen in der Gesellschaft noch so gross sein, mochte jeder davon ueberzeugt sein, dass er Millionen besass, mochte sein Gesicht einen wuerdigen, ja heldenhaften Ausdruck tragen -- es gibt eine Sache, die Damen einem Mann niemals verzeihen, gleichgueltig wer er sei, und er ist unweigerlich erledigt. Die Frau ist dem Mann gegenueber von Natur eher kraftloser, doch in gewissen Augenblicken ist sie nicht nur staerker als der Mann, sondern staerker als alles auf der Welt. Die Missachtung, die Tschitschikow unbeabsichtigt gezeigt hatte, brachte die Damen, die wegen der Stuhlaffaere beinahe entzweit gewesen waren, wieder zu Einigkeit und Eintracht. In ihren beilaeufigen, harmlosen Bemerkungen fand man ploetzlich bissige, spitze Ironie. Ein ungluecklicher Junge hatte obendrein ein oder zwei spoettische Verse ueber die Taenzer verfasst, ohne die ein Ball in der Provinz kaum auskam. Diese Verse wurden sogleich Tschitschikow zugeschrieben. Die Empoerung wuchs, die Damen versammelten sich in den Ecken des Saals und fluesterten miteinander, und das arme blonde Maedchen wurde erbarmungslos herabgesetzt und ihr Todesurteil ausgesprochen.
Inzwischen wartete ein aeusserst aergerlicher Angriff auf unseren Helden. Waehrend seine junge Gegnerin gaehnte und er ihr allerlei alte Geschichten erzaehlte, sogar vom griechischen Philosophen Diogenes sprach, trat Nosdrew ploetzlich auf, direkt aus einem der hinteren Raeume des Salons. Ob er aus dem Ruheraum kam oder aus dem gruenen Zimmerchen, wo hoch gespielt wurde, ob er freiwillig erschien oder hinausgeworfen worden war -- jedenfalls trat er frohlich und aeusserst vergnuegt in den Salon, den Staatsanwalt am Arm, den er offenbar schon lange schleppte, denn der arme Staatsanwalt runzelte die Stirn und schaute sich um, als suche er einen Ausweg aus dieser vertraulichen Fuehrung. Nosdrew hatte zwei Tassen Tee -- natuerlich mit Rum -- auf einen Zug geleert; dann fing er wieder an zu prahlen. Kaum erblickte Tschitschikow ihn von weitem, beschloss er, die gegenwaertige schoene Gelegenheit zu opfern und eilends zu verschwinden, denn diese Begegnung konnte nichts Gutes verheissen. Doch das Unglueck wollte es, dass ploetzlich der Gouverneur erschien, der sich freute, Pawel Iwanowitsch gefunden zu haben, und ihn bat, in einem kleinen Streit zwischen zwei Damen als Schiedsrichter zu fungieren; denn ueber die Frage, ob die Liebe der Frauen dauerhaft sei, konnte man sich nicht einigen. Inzwischen hatte Nosdrew ihn schon erblickt und kam geradewegs auf ihn zugelaufen:
"Oho! Der Gutsbesitzer von Cherson! Der Gutsbesitzer von Cherson!" rief er lachend heran, wobei seine frischen Wangen, rot wie eine Fruehlingrose, vor Lachen nur so zitterten. "Na, wie steht's? Hast du viele Tote gekauft? Sie muessen wissen, Exzellenz!" -- damit wandte er sich zum Gouverneur und schrie aus voller Kehle: "Er macht Geschaefte mit toten Seelen! Wirklich, hoeren Sie, Tschitschikow! Hoer mal, ich sage es dir als Freund, wir hier alle sind deine guten Freunde, auch Seine Exzellenz ist hier -- ich wuerde dich aufhaengen, wirklich, ich wuerde dich aufhaengen!"
Tschitschikow wusste sich ueberhaupt nicht mehr zu helfen.
"Sie werden mir nicht glauben, Exzellenz!" fuhr Nosdrew fort. "Er sagte mir: 'Hoer mal, verkauf mir deine toten Seelen!' Ich waere fast vor Lachen gestorben. Als ich in die Stadt kam, erzaehlte man mir, er habe fuer drei Millionen Rubel Seelen gekauft, zwecks Umsiedlung -- was fuer eine Umsiedlung! Bei mir wollte er auch schon Tote kaufen. Hoer mal, Tschitschikow: du bist ein Schwein, bei Gott, du bist ein Schwein! Nicht wahr, Herr Staatsanwalt?"
Doch sowohl der Staatsanwalt als auch Tschitschikow waren voellig fassungslos und fanden keine Antwort. Nosdrew aber wurde immer vergnuegter und redete unbehaerrt weiter: "Oh, oh, mein Herzchen... wenn du mir nicht sagst, warum du tote Seelen kaufst, lasse ich dich nicht los. Hoer mal, Tschitschikow, du solltest dich schaemen; du weisst selbst am besten, dass du keinen besseren Freund hast als mich." Doch seine Kuesse kamen aeusserst ungestuem. Alle wichen zurueck und hoerten nicht mehr hin. Aber seine Worte ueber den Kauf toter Seelen hatte er aus voller Kehle herausgeschrien, mit lautem Gelaechter, sodass selbst die entferntesten Gaeste aufmerksam wurden. Alle standen mit halb verwunderten, halb verdutzten Gesichtern sprachlos da. Tschitschikow bemerkte, dass viele Damen bedeutungsvolle Blicke wechselten und boshaft laechelten. Dass Nosdrew ein notorischer Luegner war, wusste jeder. Doch die irdischen Sterblichen -- ach, wie ist das nur zu erklaeren: kaum gibt es eine noch so unglaubliche Neuigkeit, schon verbreitet man sie; und ein anderer hoert begierig zu, sagt dann zwar "Das ist eine faustdicke Luege!", eilt aber sogleich hinaus, um einem Dritten die Geschichte zu erzaehlen, worauf beide empoert ausrufen: "Was fuer eine gemeine Luege!" -- und doch verbreitet sich die Nachricht durch die ganze Stadt.
Dieser hoeost laecherliche Zufallsvorfall machte unseren Helden ganz nervoes. Die wirren, albernen Worte eines Narren koennen auch einen klugen Mann aus der Fassung bringen. Er fuehlte sich ploetzlich unwohl und geaergert, als waere er mit blank geputzten Stiefeln in eine schmutzige, stinkende Pfuetze getreten. Er setzte sich zum Kartenspiel, aber nichts gelang: er griff zweimal zu den falschen Karten, vergass einmal sogar, dass er nicht an der Reihe war, und spielte eine eigene Karte aus. Der Postmeister, der Gerichtsvorsitzende und der Polizeimeister neckten ihn natuerlich, er muesse verliebt sein. Das Abendessen brachte ihn auch nicht auf andere Gedanken. Nosdrew war laengst hinausgeworfen worden, nachdem er sich beim Cotillon auf den Boden gesetzt und an den Rockschoessen der Taenzer gezogen hatte. Tschitschikow wartete nicht einmal das Ende des Abendessens ab und ging frueh nach Hause.
In seinem Zimmer, wo der Leser bereits die an der Tuer stehende Kommode und die Schaben in den Ecken kennt, waren seine Gedanken ebenso unruhig wie der wackelige Lehnstuhl, auf dem er sass. Sein Herz war schwer. Eine drueckende Leere quaelte ihn: "Der Teufel hole die, die diesen Ball veranstaltet haben!" rief er wuetend. "Warum muessen die so froh sein? Die ganze Provinz leidet unter Missernten und Teuerung, und sie veranstalten Baelle! Was fuer ein Unsinn: lauter Frauenzimmer in alten Fetzen! Merkwuerdig, dass eine fuer tausend Rubel und mehr auf dem Leib traegt, und am Ende zahlen es die Leibeigenen mit ihrer Pacht!" So schimpfte er, doch sein eigentlicher Aerger galt nicht dem Ball, sondern der Tatsache, dass er ploetzlich in ein zweideutiges Licht geraten war. Er fand sofort einen Suendenbock: den lieben Nosdrew, den er natuerlich nach allen Regeln der Kunst verfluchte. Nosdrees gesamter Stammbaum wurde hervorgezogen und saemtliche Vorfahren gruendlich durchgehechelt.
Doch waehrend Tschitschikow, von duesteren Gedanken geplagt, schlaflos in seinem harten Lehnstuhl sass und Nosdrew samt seiner ganzen Familie verwuenschte, waehrend das Kerzenlicht schwaecher wurde und die Dochtkohle laenger, waehrend draussen die pechschwarze Nacht bereits dem fahlen Morgengrauen wich und in der Ferne die ersten Haehne kraehten -- da ging in der anderen Haelfte der Stadt bereits der Vorhang eines Dramas auf, das die bedraengte Lage unseres Helden noch verschlimmern sollte. In den fernen Strassen und Gassen rumpelte ein hoechst seltsames Gefaehrt heran, das weder wie eine Kutsche noch wie ein Planwagen noch wie ein Halbplanwagen aussah, sondern eher wie eine dickbackige, dickbauchige Wassermelone auf Raedern. Darin steckte allerlei: Kissenbezuege und Beutel mit Getreide. Der Laerm der Eisenreifen und rostigen Schrauben weckte den Nachtwaecher. Die Pferde stolperten, da sie nicht beschlagen waren. Das Gefaehrt bog um mehrere Ecken und hielt schliesslich vor dem Haus der Proboschtin. Aus dem Wagen kletterte erst ein Maedchen, dann eine Dame heraus: es war die Gutsbesitzerin Koroboschka. Kaum war unser Held abgereist, hatte die alte Dame Angst bekommen, betrogen worden zu sein. Nach drei schlaflosen Naechten beschloss sie, trotz unbeschlagener Pferde in die Stadt zu fahren und herauszufinden, was tote Seelen wirklich kosteten und ob sie sich nicht einen grossen Baeren hatte aufbinden lassen. Was sich daraus ergab, wird der Leser aus dem Gespraech der beiden Damen sogleich erfahren. Doch dieses Gespraech sei besser im naechsten Kapitel berichtet.
FR: Le comportement de Tchitchikov suscita l'indignation de toutes les dames. L'une d'elles passa deliberement devant lui pour le lui faire sentir, balayant de sa jupe deployee les cheveux blonds avec quelque rudesse, tout en ajustant le chale sur ses epaules dont le bout effleura le visage de la jeune dame ; en meme temps, une autre dame, derriere le dos de Tchitchikov, laissa echapper, avec le parfum de violette qui emanait d'elle, une remarque assez venimeuse et acerbe. Mais qu'il ne l'entendit vraiment pas ou fit seulement semblant, sa conduite etait ici effectivement quelque peu deplacee, car l'opinion des dames merite toujours le respect. Il regretta sa faute, mais malheureusement trop tard.
Beaucoup de visages exprimerent une indignation legitime. Quelle que fut la reputation de Tchitchikov, quelle que fut la certitude de chacun qu'il possedait des millions, quelque digne et heroique que fut son air -- il est une chose que les dames ne pardonnent jamais a un homme, et il est irremediablement perdu. La femme, comparee a l'homme, est peut-etre naturellement plus faible, mais a certains moments elle est non seulement plus forte que l'homme, mais plus forte que tout au monde. Le mepris que Tchitchikov avait montre involontairement reconcilia les dames, qui avaient failli se brouiller a cause de l'affaire des chaises. Dans leurs propos insignifiants, on decouvrait soudain des railleries acerbes et mordantes. Pour comble de malheur, un jeune homme avait compose un ou deux vers satiriques sur les danseurs, sans lesquels les bals de province ne se terminent guere. Ces vers furent aussitot attribues a Tchitchikov. L'indignation grandit ; les dames se rassemblerent dans les coins de la salle en chuchotant ; la pauvre blonde fut ridiculisee sans pitie et sa condamnation a mort prononcee.
Cependant, une attaque des plus facheuses attendait notre heros. Tandis que sa jeune adversaire baillait et qu'il lui racontait diverses histoires anciennes, mentionnant meme le philosophe grec Diogene, Nozdriov apparut soudain, sortant d'une piece du fond du salon. Qu'il vint du salon de repos ou du cabinet vert ou l'on jouait gros jeu, qu'il fut venu de son plein gre ou chasse, il entra joyeusement et tres gaiement, trainant le procureur par le bras, qu'il promenait manifestement depuis longtemps, car le pauvre homme froncait les sourcils et cherchait du regard une echappatoire. Nozdriov avait avale d'un trait deux tasses de the -- au rhum, bien entendu -- puis recommence a se vanter. Des que Tchitchikov l'apercut de loin, il decida de sacrifier la situation agreable du moment et de s'eclipser au plus vite, car cette rencontre ne pouvait rien augurer de bon. Mais par malheur, le gouverneur surgit, se declarant ravi d'avoir trouve Pavel Ivanovitch et le priant d'arbitrer un petit differend entre deux dames sur la question de savoir si l'amour des femmes etait durable. Mais deja Nozdriov l'avait apercu et accourait droit vers lui :
"Oh ! Le proprietaire de Kherson ! Le proprietaire de Kherson !" cria-t-il en approchant en riant, ses joues fraiches, rouges comme une rose de printemps, tremblant de rire. "Alors ? Tu as achete beaucoup de morts ? Vous devez savoir, Excellence !" -- se tournant vers le gouverneur, il beugla : "Il fait le commerce d'ames mortes ! Vraiment, ecoutez, Tchitchikov ! Ecoute, je te le dis en ami, nous sommes tous ici tes bons amis, Son Excellence aussi -- je te pendrais, vraiment, je te pendrais !"
Tchitchikov ne savait plus du tout que faire.
"Vous ne me croirez pas, Excellence !" continua Nozdriov. "Il m'a dit : 'Ecoute, vends-moi tes ames mortes !' J'ai failli mourir de rire. En arrivant en ville, on m'a dit qu'il avait achete pour trois millions de roubles d'ames pour la reinstallation -- quelle reinstallation ! Il a aussi voulu m'acheter des morts. Ecoute, Tchitchikov : tu es un porc, Dieu du ciel, tu es un porc ! N'est-ce pas, monsieur le procureur ?"
Mais tant le procureur que Tchitchikov etaient completement interdits et ne trouvaient rien a repondre. Nozdriov cependant s'animait de plus en plus. Ses baisers furent des plus impetueux. Tout le monde recula et cessa de l'ecouter. Mais ses paroles sur l'achat d'ames mortes avaient ete criees a pleins poumons avec de grands eclats de rire, de sorte que meme les invites les plus eloignes y preterent attention. Tout le monde resta cloue sur place, mi-perplexe, mi-ahuri. Que Nozdriov fut un menteur notoire, chacun le savait. Pourtant, les mortels -- helas, comment expliquer cela : a peine une nouvelle insensee et absurde apparait-elle que chacun la repand ; un autre ecoute avidement, dit ensuite "C'est un mensonge grossier !" mais se precipite dehors pour raconter l'histoire a un troisieme, apres quoi tous deux s'ecrient indignes : "Quel mensonge infame !" -- et pourtant la nouvelle se repand dans toute la ville.
Ce tres trivial incident rendit notre heros fort nerveux. Les paroles confuses et absurdes d'un sot peuvent souvent deconcerter meme un homme d'esprit. Il se sentit soudain mal a l'aise et contrarie, comme s'il avait mis des bottes bien cirees dans une flaque sale et puante. Il s'assit pour jouer aux cartes, mais rien n'allait. Le diner ne le ragaillardit pas non plus. Nozdriov avait ete chasse depuis longtemps apres s'etre assis par terre pendant le cotillon pour attraper les basques des danseurs. Tchitchikov n'attendit meme pas la fin du repas et rentra chez lui de bonne heure.
Dans sa chambre, ou le lecteur connait deja l'armoire pres de la porte et les cafards dans les coins, son esprit etait aussi agite que le fauteuil branlant sur lequel il etait assis. Son coeur etait lourd. Un vide accablant le tourmentait : "Que le diable emporte ceux qui ont organise ce bal !" cria-t-il avec fureur. Il fulminait, mais sa veritable colere ne visait pas le bal -- c'etait d'avoir ete mis dans une situation ambigue et compromettante devant tout le monde. Il trouva immediatement un bouc emissaire : le cher Nozdriov, qu'il maudit naturellement de la tete aux pieds. Toute la genealogie de Nozdriov y passa, et nombre de ses ancetres furent copieusement maltraites.
Mais tandis que Tchitchikov, tourmente par de sombres pensees, restait assis sans dormir dans son dur fauteuil, maudissant Nozdriov et toute sa famille, tandis que la chandelle faiblissait et que la meche charbonnait, tandis qu'au-dehors la nuit noire cedait deja devant la pale lumiere de l'aube et que les premiers coqs chantaient au loin -- a l'autre bout de la ville, le rideau se levait deja sur un drame qui allait aggraver encore la situation penible de notre heros. Dans les rues et ruelles lointaines, un vehicule des plus etranges s'avancait en cahotant, ne ressemblant ni a une berline, ni a un chariot bache, mais plutot a une pasteque a grosses joues et gros ventre posee sur des roues. A l'interieur, des coussins et des sacs de grain. Le bruit des cerclages de fer et des vis rouillees reveilla le veilleur de nuit. Les chevaux trebuchaient, n'etant pas ferres. Le vehicule tourna plusieurs coins et s'arreta enfin devant la maison de la femme de l'archipretre. D'abord une servante en sortit, puis une dame : c'etait la proprietaire Korobotchka. A peine notre heros etait-il parti que la vieille dame, craignant d'avoir ete dupee, avait decide apres trois nuits sans sommeil de se rendre en ville, malgre ses chevaux non ferres, pour s'informer du prix des ames mortes et savoir si elle ne s'etait pas fait rouler. Ce qui en resulta, le lecteur l'apprendra aussitot du bavardage des deux dames. Mais ce bavardage sera mieux rapporte au chapitre suivant.
他回答说,他曾经出乎意外地和她有过相见的光荣:以后还想添上几句去,然而完全失败了。知事太太又说了一两句话,就和她的女儿走向大厅的那一头,去招呼另外的客人,乞乞科夫却还生根一般的站着。他在这地方还站了很久的工夫,恰如一个高高兴兴的到街上去散步的人,周围景象,无不浏览,却突然立住了,因为他想了起来,自己还忘记了什么;恐怕再没有比这样的人,更加不中用的了:只一击就从他脸上失去了无忧无愁的样子。他竭力的回想,自己究竟忘记了什么呢:手巾么?手巾就塞在衣袋里!他的钱?钱可是也在的!好象什么也没有缺,然而总有一个莫名其妙的妖魔,在耳朵边悄悄的告诉他忘记了什么。他只是胡胡涂涂的看着潮涌的人群,尾追的马车,兵们的枪和帽,店家的招牌之类,心里却并不明白。乞乞科夫也就是这模样,和周围的事情全不相关了。这之间,从女人的发香的口唇里,向他飞过许多柔腻的质问和暗示来。“我们这些可怜的地上居民可以斗胆的问您,您在沉思着什么吗?”——“您的思想所寄托的幸福的旷野,是在什么地方呢?”——“引您进这快活的暝想之谷的那人的名字,我们可以知道吗?”然而他不再看重这些问题了,闺秀们的亲爱的言语,恰如说给了风的一样,是的,他竟这样的疏忽,至于放闺秀们静静的站着,自己却跑到大厅的那一边,去探知事太太和她女儿的踪迹去了。但闺秀们却并不肯这么轻易的就放手——各人都暗自下了坚固的决心,要用尽对于我们的心,非常危险的药味,要用尽她们的极顶强烈的撩人之力。我在这里应该夹叙一下,有几个闺秀——我说,有几个,决不是全体——是被一个小小的弱点所累的:如果她觉得自己有一点动人之处,无论前额也好,嘴也好,手也好,就以为这种特色,别人也应该立刻佩服,大家异口同声的喊道:“瞧呀,瞧呀,她有多么出色的希腊式的鼻子呀!”或者是“多么整齐的动人的前额呵!”如果有很美的肩膀呢,她首先就相信一切青年男子,都要给这肩膀所迷,她一走过,就无条件的叫起来道:“阿呀,她有多么出色的肩膀呀!”而对于脸孔,头发,眼睛和前额,却看也不看,即使看,也不过当作不关紧要的东西。闺秀们中的有几个,是在这样的想的。但这一晚上,却谁都立下誓愿,在跳舞之际,要竭力表现得动人,还把自己的最大美艳的特色,显得非常明白。邮政局长夫人在应着音响,跳着华勒支舞之间,把她俊俏的头,非常疲乏的侧了起来,令人觉得真的到了上界。一个非常可爱的闺秀,到会的目的,是完全不在跳舞的,用她自己的话来说,是在右脚的大趾上,有了鸡眼睛模样,豌豆儿大小的不舒服或是不便当,所以她只得穿了绒鞋,——但竟也坐不住了,就穿着她的绒鞋跳了几回华勒支,为的是不过使邮政局长夫人不要太自鸣得意。
然而这些一切,对于乞乞科夫并无豫期的效验;他几乎不看闺秀们的脚步和身段,只是踮起脚尖,从大家的头上张望着可爱的金头发的所在;忽而又弯低一点,由肩膀和臂膊之间去找寻她;他到底找到她了,他看见她和母亲坐在一起,头上俨然的摇动着插在一种东方式包帽上的羽毛。他好象就要向这堡垒冲锋了。春色恼杀了他,还是有谁在背后推他呢?总之,他就不管一切阻碍,决然的冲过去:烧酒专卖局长被他在肋下一推,好容易才能用一条腿站住,总算幸而还没有因此撞倒一排人;邮政局长也向后一跳,吃惊的看定他,带着一点微妙的嘲笑;但乞乞科夫却一看也不看,他只为那带着长手套的远地里的金头发生着眼睛,满心全是飞过场上,直到那边的希望了。这时在别一角落上,已经有四对跳着玛兹尔加:靴后跟敲着地板,一个陆军里的大尉,用了肉体和精神,两手和两脚,显出他们梦里也没有做过的奇想的姿势来。乞乞科夫几乎踏着了跳舞者的脚,一直跑向知事太太和她的女儿所坐的地方去。然而,待到和她们一接近,他却非常胆怯,也不再开勇往直前的小步,竟简直有些窘急,在一切举动上,都显出仓皇失措来了。
在我们的主角那里,真的发生了一点所谓恋爱吗,不能断定;像他那样的人,或者是并不很胖,却也并不太瘦的人,竟会有恋爱的本领吗,也可疑得很;然而这里却演出了一点连他自己也讲不明白的奇特的情景:据他后来自己说,他觉得,仿佛全个跳舞会以及喧嚣和杂沓,在一刹时中,都退到很远的远方,提琴和喇叭,好象在山背后作响,一切全如被烟雾所笼罩,似乎草率地涂在一幅画布上面的平原。而在这朦胧地,草率地涂在画布上面的平原里,却独独锋利而分明的显着动人的年青的金头发的优美的丰姿:她那出色的卵形的脸盘,她那苗条的充实的体态,这是只在刚出女塾的女孩儿身上,才得看见的,还有她那近乎质朴的洁白的衣服,轻松的裹着娇柔的肢节,到处显出堂皇的精粹的曲线来。她好象一件象牙彫成的奇特美丽的小玩意;在朦胧昏暗的群集里,惟独她灿然的见得雪白和分明。
这世界上,也会有这等事:乞乞科夫在他的一生中,虽然不过很短的一瞬息,但也成了一下子诗人了;不过诗人的名目,也还过份一点。至少,在这瞬间,他觉得自己象是一个少年人,或者一个时髦的骠骑兵了。那美人儿旁边恰有一把椅子是空的,他连忙坐下去。谈话开首有些不中肯,不久也就滔滔不绝,他而且得意了起来,然而……我应该在这里声明我的很大的惋惜,凡是身负重要的职务,上了年纪,有了品位的人,和闺秀们谈天,是有一点不大顺口的;说得很流畅的只有中尉,大尉以上的高级军官就全不行。他们在说什么呢,只有上帝知道:可总不是怎么高明的物事,但年青的姑娘们却笑得抖着肩膀;一个枢密顾问官倒也会对你们讲些极顶神妙的东西:说俄罗斯是一个强国,或者说句应酬话,自然并非没有精神的,不过全都很带着钞书的味道,倘若他说一点笑话,自己先就笑个不停,比听着的闺秀们还利害。我在这地方加了这样的声明,为的是要使读者明白,为什么在我们的主角谈话中间,我们的金头发竟打起呵欠来了。但我们的主角好象全没有觉得,仍旧不住的搬出他在各处已经用过许多回的所有出色的物事来,例如:在洵毕尔斯克省的梭夫伦·伊凡诺维支·培斯贝七尼那里,这时住着他的女儿亚兑拉大·梭夫伦诺夫娜和她那三个堂姊妹:马理亚·喀夫理罗夫娜、亚历山特拉·喀夫理罗夫娜和亚兑拉大·喀夫理罗夫娜;还有,在略山省的菲陀尔·菲陀罗维支·贝来克罗耶夫那里;在喷沙省的弗勒勒·毕西理也维支·坡背陀诺斯尼和他的兄弟彼得·毕西理也维支那里,这时住着他们的堂姊妹加德里娜·密哈罗夫娜和两个姪孙女:罗若·菲陀罗夫娜和爱密理亚·菲陀罗夫娜;最后是在伐忒卡省的彼得·华尔梭诺夫也维支那里,住着他的儿媳的姊妹贝拉该耶·雅戈罗夫娜和侄女苏非亚·罗斯谛斯拉夫娜和两个异父姊妹苏非亚·亚历山特罗夫娜和玛克拉土拉·亚历山特罗夫娜。
乞乞科夫的态度惹起了一切闺秀们的不平。其中的一个故意在他旁边经过,要他悟出这一点来,并且用她展开的裾裙,稍稍卤莽地扫着金头发,一面又整理着在她肩头飘动的围巾,那巾角就正拂在这年青闺秀的脸孔上;也在这时候,别一位闺秀便在乞乞科夫的背后,和从她那里洋溢出来的紫罗兰香一起,嘴里飞出了一句颇为恶毒的辛辣的言辞。然而无论他实在没有听见,或者不过装作不听见,他的举动在这地方却真的有些不合,因为闺秀们的意见是总该给点尊重的。他也后悔自己的过失,但可惜是在后来,已经到了太晚的时候了。
许多脸上都画出了应有的愤怒。纵使乞乞科夫的名声在交际场里有这么大,纵使谁都确信他拥有百万的家财,纵使他脸上带着威严的,英勇的神气,——但有一件事,是闺秀们决不饶恕男人的,无论怎样,无论是谁,他一定完结。女人和男人比较起来,性格上原也较为没有力,但到有些时候,她却不但坚强不屈胜于男人,还胜于世界上的一切。乞乞科夫在无意中显了出来的藐视,使那因为椅子事件,几乎破裂的闺秀们复归于平和与一致了。在她们随便说说的无关紧要的言语中,就会突然发见恶毒尖利的嘲讽。完成了这不幸的,是又有一个少年人,做了一两节关于跳舞者的讥刺诗,在外省的跳舞会里,没有这事是几乎不收场的。这诗又立刻说是乞乞科夫之作了。愤怒越来越大,闺秀们聚集在大厅的各处角落上,彼此切切私语,还给他几句非常不好的指斥;可怜的金头发也被奚落得半文不值,宣告了她的死刑。
这之间,却有一个极顶恼人的袭击,等候着我们的主角;当他的年青的对手打着呵欠,他向她讲述古代各种的故事,说到希腊哲学家提阿改纳斯的时候,罗士特来夫却突然上台,就从客厅的一间后房里走出来了。他从休息室里来,还是从那打着大牌的绿色小屋里跳出来的呢,他的出现,是由于自愿,还是被人赶出来的呢,总之,他高兴地,非常快活地走进客厅里来了,还挽着检事,他确是已经被拖了好久了的,因为这可怜的检事皱着眉头,看来看去,大约是在设法来摆脱他那亲密的旅行的向导。而且他的境遇,实在也很难忍受的。罗士特来夫拖过两杯红茶——自然加了蔗酒的——来,一饮而尽;于是又是讲大话。乞乞科夫一在远处望见他,就决计牺牲了目前的佳遇,赶紧飞速的走开,因为这会面,是决不会有好事情的。但不幸的是身边竟忽然现出知事来,自说找到了保甫尔·伊凡诺维支,非常高兴,并且将他坚留,请他判断和两位闺秀之间的小小的辩论;因为关于妇女的爱之是否永久,大家的意见还不能相同;但这时候,罗士特来夫却已经看见,一径向他跑来了:
“阿唷!赫尔生的地主!赫尔生的地主”他叫喊着跑近来,一面哈哈大笑,笑得他那红如春日蔷薇的鲜活的面庞,只是抖个不住。“怎么样?你买了许多死人了吗?您要知道,大人!”于是转向知事那边,放开喉咙,喊道:“他在做死魂灵的买卖哩!真的,听罢,乞乞科夫!听哪,我是看交情才对你说的,在这里的我们,都是你的好朋友,大人也在这里,我要绞死你,真的,我要绞死你!”
乞乞科夫一点办法也没有了。
“您不相信我罢,大人!”罗士特来夫接着说。“他对我说的是:‘听哪,把您的死掉的魂灵卖给我罢,’我几乎要笑死了。待到我上了市镇,人们却告诉我说他因为要移住,买了三百万卢布的魂灵,了不得的移住呀!他到我这里就来买过死人的。听哪,乞乞科夫:你是一只猪,天在头上,你是一只猪!大人也在这里,对不对,检事先生?”
EN: From Gogol's Dead Souls (in Lu Xun's translation), Chapter, Section 5:
This passage from Gogol's satirical masterpiece depicts with inimitable irony the Russian provincial society of the nineteenth century. Chichikov, the ingenious swindler, moves through a world of officials, landowners, and businessmen whose vanity and greed he masterfully exploits for his own purposes. Lu Xun's translation preserves the satirical edge of the original and makes it accessible to the Chinese reader. The section begins: 他回答说,他曾经出乎意外地和她有过相见的光荣:以后还想添上几句去,然而完全失败了。知事太太又说了一两句话,就和她的女儿走向大厅的那一头,去招呼另外的客人,乞乞科夫却还生根一般的站着。他在这地方还站了很久的工夫,恰如一个高高兴兴的到街上去散步的人,周围景象,无不浏览,却突然立住了,因为他想了起来,自己还忘记了什么;恐怕再没有比这样的人,更加不中用的了:只一击就从他脸上失去了无忧无愁的样子。他竭力的回
DE: Aus Gogols Toten Seelen (in Lu Xuns Uebersetzung), Kapitel, Abschnitt 5:
Diese Passage aus Gogols satirischem Meisterwerk schildert mit unnachahmlicher Ironie die russische Provinzgesellschaft des neunzehnten Jahrhunderts. Tschitschikow, der geniale Gauner, bewegt sich durch eine Welt von Beamten, Gutsbesitzern und Geschaeftsleuten, deren Eitelkeit und Habgier er meisterhaft fuer seine Zwecke auszunutzen versteht. Lu Xuns Uebersetzung bewahrt die satirische Schaerfe des Originals und macht sie dem chinesischen Leser zugaenglich. Der Abschnitt beginnt: 他回答说,他曾经出乎意外地和她有过相见的光荣:以后还想添上几句去,然而完全失败了。知事太太又说了一两句话,就和她的女儿走向大厅的那一头,去招呼另外的客人,乞乞科夫却还生根一般的站着。他在这地方还站了很久的工夫,恰如一个高高兴兴的到街上去散步的人,周围景象,无不浏览,却突然立住了,因为他想了起来,自己还忘记了什么;恐怕再没有比这样的人,更加不中用的了:只一击就从他脸上失去了无忧无愁的样子。他竭力的回
FR: Des Ames mortes de Gogol (dans la traduction de Lu Xun), Chapitre, Section 5 :
Ce passage du chef-d'oeuvre satirique de Gogol depeint avec une ironie inimitable la societe provinciale russe du dix-neuvieme siecle. Tchitchikov, l'escroc genial, evolue dans un monde de fonctionnaires, de proprietaires terriens et d'hommes d'affaires dont il exploite magistralement la vanite et la cupidite a ses propres fins. La traduction de Lu Xun preserve le tranchant satirique de l'original et le rend accessible au lecteur chinois. La section commence : 他回答说,他曾经出乎意外地和她有过相见的光荣:以后还想添上几句去,然而完全失败了。知事太太又说了一两句话,就和她的女儿走向大厅的那一头,去招呼另外的客人,乞乞科夫却还生根一般的站着。他在这地方还站了很久的工夫,恰如一个高高兴兴的到街上去散步的人,周围景象,无不浏览,却突然立住了,因为他想了起来,自己还忘记了什么;恐怕再没有比这样的人,更加不中用的了:只一击就从他脸上失去了无忧无愁的样子。他竭力的回
然而检事和乞乞科夫都非常失措,简直找不出答话来;罗士特来夫却有些快活起来了,不管别人,尽说着他的话:“哦,哦,我的乖乖……如果你不告诉我为什么要买死魂灵,我是不放开你的。听哪,乞乞科夫,你应该羞;你一定自己也明白,你没有比我再好的好朋友了。瞧罢,大人也在这里……对不对,检事先生?您不相信罢,大人,我们彼此有怎样的交情,实在的,如果您问我——我站在这里,如果您问我:‘罗士特来夫,从实招来,你的亲爷和乞乞科夫两个里,你爱谁呀!’那我就回答说:乞乞科夫!天在头上!……心肝,来呀,让我和你接一个吻,亲一个嘴。您也许可我和他接一个吻罢,大人。请你不要推却,乞乞科夫,让我在你那雪白的面庞上,亲一个嘴儿罢!”然而罗士特来夫和他的亲嘴来得很不像样,几乎是直奔过去的。大家都从他身边退开,也不再去听他了。不过他那买死魂灵的话,却是放开喉咙,喊了出来的,又带着响亮的笑声,所以连停在大厅的较远之处的客人们,也无不加以注意。这报告来得太兀突,使大家的脸上带着一半疑惑,一半胡涂的表情,一声不响的呆立起来。乞乞科夫并且看见许多闺秀们都在使着眼色,恶意的可憎的微笑着,在有几个的脸上,还看出一点非常古怪的东西和另有意思的东西来,于是更加狼狈了。罗士特来夫是一个说谎大家,那是谁都知道的.从他那里听些胡说八道,也是谁都不以为意的:然而尘世的凡人——唉唉,怎么这凡人竟会这样的呢,可实在很难解:一有极其昏妄,极其无聊的新闻,只要是新闻,他就无条件的散布到别一个凡人那里去,虽然也说:“又起了多么大的谣言了呵!”那别一个凡人就尖起耳朵,听得很高兴,后来固然也说道:“然而这是一个大谎,完全不必相信的!”于是连忙出外,去找第三个凡人,告诉他这故事,之后又因了义愤,同声叫喊道:“多么下贱的谎话呀!”而消息就这样的传遍了全市镇,所有在此的凡人们,多日谈论着这件事,一直到大家弄得厌倦,这才说,这故事是没有谈论的价值的。
这无聊之至的偶然的事故,使我们的主角很是心神不定了。一个呆子的很胡涂,很荒谬的话,也往往会使一个聪明人手足无措。他忽然觉得很不舒服,而且苦恼了,好象穿着擦得光亮的长靴,踏在龌龊的、发臭的水洼里;总而言之,这不漂亮,很不漂亮!他要竭力的不想它,忘掉它,疏散它。他还坐下去打牌,然而什么都不顺手,像一个弯曲的轮子:他错抓了两回别人的牌,有一回还至于忘记了并不该他打,却擎起手,打出自己的牌去了。这保甫尔·伊凡诺维支,是一个好手,并且还可以称为精细的赌客,怎么会犯这样的错误,而且连他自说是希望所寄,有如上帝的毕克王也打掉了的呢,审判厅长简直想不出缘故来。邮政局长,审判厅长,还有警察局长,自然也照例的和我们的主角打趣,说他一定在恋爱,而且他们知道,保甫尔·伊凡诺维支是怀着一颗发火的心的。谁使他的心受伤的呢,他们也很明白。然而这并不能给他慰安,虽然他也竭力的装出笑容,用玩笑来回答他们的玩笑。晚餐也没有使他快活起来。纵使席上非常适意,而且罗士特来夫也因为连闺秀们也说他胡闹,早已被人赶走了。当跳着珂蒂伦[74]时,他竟忽然坐在地板上,去抓跳舞者的衣裾,照闺秀们的口气说,这实在是大失体统的。晚餐吃得很愉快,在闪耀着三臂烛台,花朵,瓶子和装满点心的碟子之间的一切脸孔,都为了虚荣的欢喜和满足在发光。军官们,闺秀们和穿燕尾服的绅士们,谁都献着出格的殷勤。有一个大佐,竟用出鞘的刀尖,把汤碟子挑到他的闺秀的前面。有了年纪的绅士们,连乞乞科夫也在内,则在热心的讨论,一面嚼着硬煮食品的鱼或肉,尽量的撒上胡椒末,一面吐出确切的言语来;人们所争论的,正是乞乞科夫向来很有趣味的对象,但这一晚上,他却像一个从远道归来,疲乏困顿的人,脑子并不听他的指挥,他也没有参加的兴致。他竟等不及晚餐散席,大反了往常的习惯,一早就回到家里去了。
在读者已经很熟悉的门口摆着柜子,角落上窥探着蟑螂的屋子里,他的精神和思想,也如他所坐的臬兀不安的靠椅一样,不大平静。他的心很沉闷。一种沉重的空虚在苦恼他:“鬼捉了玩出这跳舞会的那些东西去!”他愤愤的叫道。“他们为什么要这样的高兴?全省满是坏收成,物价腾贵和饥荒,他们却玩跳舞会!有什么好处:一大批娘儿们的旧货。奇怪的是她身上穿着一千卢布以上的东西,归根结蒂,还是农奴们拿他的租钱来付,结果也终于还是我们的。谁都知道,男人们为什么要这么敛钱,纳贿的呢:就是为了给他的女人买很贵的围巾,衣服,以及别的鬼知道叫作什么!这为的是什么呀?为的不过是使放荡的娘儿们可以说,邮政局长太太有一身好衣服哩,——因此就抛掉一千卢布。于是嚷道:跳舞会,跳舞会,多么愉快呀!妈的这样的跳舞会,我看和俄罗斯精神是一点也不合的,这完全是一种非俄罗斯制度。呸,还有哩:像精赤条条的拔光了毛的魔鬼似的,忽然跳出一个上了年纪的黑燕尾服的汉子来,把腿摇来摇去。别一个又和另一个弄在一起,和他谈着正经事,一面却又在地板上左左右右,玩出古怪花样来……这都不过是猴子学样;猴子学样罢了。因为法国人是到了四十岁,还像十五六岁的孩子一样的,所以我们也得这么的来一下!哼,真的,我觉得每一个跳舞会之后,就总要弄出一件什么坏事情,连想也想不得!脑袋的空虚,就恰如和一个场面上的名人谈了天,他说的全是浮面,讲的都靠书本;听起来原也很漂亮,有味的,然而听着的人的脑袋,还是先前似的一无所得;其实倒不如和一个简单的商人去谈天,他只知道自己的本行,然而知道得透彻、切实,比起所有这些小摆设来,更要有价值。究竟从这样的跳舞会里能弄出什么来呢?不知道可有一个作家,想照式照样,写出一切情形来的没有?即使做了书,那跳舞会本身,却还是荒谬胡涂之至的,不知道这究竟有什么影响:道德的,还是不道德的呢?究竟怎样,鬼才知道。人就只要吐一口唾沫,抛掉书!”对于跳舞会,乞乞科夫大概说得这么不合意;但我相信,他的不满,是另外还有一个原因的。招他憎恨的,其实全不是跳舞会,倒是那情状,当大众之前,忽然来了一道莫明其妙的光,于是他就扮演了很奇特,很暧昧的脚色了。自然,如果他用了明白人的眼睛来看这事故,他是会觉得一切都是小事情,一句呆话也毫无关系的,尤其是在要事已经幸而办妥了的现在。但是——人却有一点希奇:使他很恼怒的正是失掉了这人的寄托,虽然对于这寄托,他自己并不看重,评的极苛,还为了他们的尚浮华和爱装饰下过很锋利的攻击。待到经过充足的历练,知道他自己也该负一点罪,那就更加恼怒了。纵使他毫不气忿自己,而且当然还是不错的。可惜我们谁都有这一个小小的弱点,就是总要爱护自己,却去找一个邻近的东西,来泄自己的恼怒,或者用人,或者恰巧碰到的下属,或者自己的女人,或者简直是一把椅子,我们就把它摔到门口或者鬼知道的什么地方去,碰下它一条腿,或是一个靠手来,给看看我们绅士之流的恼怒。
乞乞科夫也立刻找到一个邻近,应该将自己的恼怒,全都归他负担的来了。这亲爱的邻近就是罗士特来夫,不消说,他就上上下下,四面八方的拚命的痛骂了一通,恰如偷儿的对于村长,车夫的对于旅客,对于远行的大尉,看情形也对于将军的一样,在许多古典的咒骂上,另外再加上一大批新鲜的,由他自己的发明精神而来的东西。罗士特来夫的整部家谱被拉出来了,他家族里的许多列祖列宗,都遭了利害的玩弄。
但当乞乞科夫为阴郁的思想所苦恼,一睡不睡的坐在他那坚硬的靠椅里,痛责着罗士特来夫和他的全家的时候,当烛光渐渐低微,烛心焦了一大段,脂烛随时怕会熄灭的时候,当窗外的漆黑的暗夜,已由熹微的晨光,转成莽苍苍的曙色的时候,当远处已有一二鸡鸣,在睡着的市镇的街道上,悄悄的走着一个只知道一条(可惜只是一条)不可拘束的俄罗斯人民所走的道路的,穿着简单的呢外套的莫辨地位和出身的不幸人的时候——在市镇的那一头,使我们主角的苦恼的地位更加为难的戏剧,却已经在开幕了。这时候,在远处的大街和小巷里,轧轧的走着一件非常奇特的东西,一下子很难叫出名目,既不像客车,也不像篷车,可又不像半篷车,倒仿佛一个胖面颊,大肚子的西瓜,搁在一对轮子上。这西瓜的面颊,就是车门,还剩有黄颜色的痕迹,但是很不容易关,因为闩和锁都不行了,只用几条绳勉强的缚住。西瓜里面,塞满着纱枕头,有像烟袋的,有圆的,也有和普通枕头一样的,还有袋子,装着谷物,白面包,小麦面包,捏粉的咸饼干。上面还露着一只填王瓜的鸡和王瓜馅的包子。马夫台上站着一个人,家丁模样,身穿杂色的手织麻布的背心。他不刮脸,头发是已经花白起来了。这是常见的人物,在我们那里的乡下,普通都叫作“小子”的。这铁轮皮和锈螺钉的喧闹,惊醒了街的那一头的巡丁,抓起钺斧,在睡眼惺忪中放声大叫道:谁呀?待到他觉得并没有人,不过是猛烈的车轮声在远处作响,便伸手在领子上捉住一个小动物,走近街灯去,就在那地方亲手用指甲执行了死刑。于是又放下钺斧,遵照着他的武士品级的规矩,仍旧熟睡了。马匹的前蹄时时打着失,因为没有钉着马掌,而且也分明因为它们还没有熟悉这幽静的市镇的街道。这辆车又转过几个弯,从一条街弯进别一条去,终于通过圣尼古拉区教堂旁边的昏暗的小巷,停在住持太太的门口了。从车子里爬出一个姑娘来,头戴包帕,身穿背心,捏起两个拳头,像男人似的使劲的槌门。(那杂色麻布背心的小子,是因为他睡得像死尸一样,后来被拉着脚,从他的位置上拖开了。)狗儿嗥了起来。接着也开了门,好容易总算吞进了这不像样的车辆。车子拉到堆着柴木,搭着许多鸡棚和别的堆房的狭小的前园里;才从车子里又走出一位太太来;这就是女地主十等官夫人科罗皤契加。我们的主角一走,这位老太太就非常着急,怕自己遭了他的诓骗,在三夜不能睡觉之后,终于决了心,虽然马匹还未钉好马掌,也一定亲赴市镇,去探听一下死魂灵是什么时价,而且她这么便宜的卖掉了,是否归结是上了一个大当。她的到来,会发生什么结果呢,读者从两位闺秀们的谈天里,立刻可以知道了。这谈天……但这谈天,还不如记在下一章里罢。
EN: From Gogol's Dead Souls (in Lu Xun's translation), Chapter, Section 6:
This passage from Gogol's satirical masterpiece depicts with inimitable irony the Russian provincial society of the nineteenth century. Chichikov, the ingenious swindler, moves through a world of officials, landowners, and businessmen whose vanity and greed he masterfully exploits for his own purposes. Lu Xun's translation preserves the satirical edge of the original and makes it accessible to the Chinese reader. The section begins: 然而检事和乞乞科夫都非常失措,简直找不出答话来;罗士特来夫却有些快活起来了,不管别人,尽说着他的话:“哦,哦,我的乖乖……如果你不告诉我为什么要买死魂灵,我是不放开你的。听哪,乞乞科夫,你应该羞;你一定自己也明白,你没有比我再好的好朋友了。瞧罢,大人也在这里……对不对,检事先生?您不相信罢,大人,我们彼此有怎样的交情,实在的,如果您问我——我站在这里,如果您问我:‘罗士特来夫,从实招来,你的亲爷和
DE: Aus Gogols Toten Seelen (in Lu Xuns Uebersetzung), Kapitel, Abschnitt 6:
Diese Passage aus Gogols satirischem Meisterwerk schildert mit unnachahmlicher Ironie die russische Provinzgesellschaft des neunzehnten Jahrhunderts. Tschitschikow, der geniale Gauner, bewegt sich durch eine Welt von Beamten, Gutsbesitzern und Geschaeftsleuten, deren Eitelkeit und Habgier er meisterhaft fuer seine Zwecke auszunutzen versteht. Lu Xuns Uebersetzung bewahrt die satirische Schaerfe des Originals und macht sie dem chinesischen Leser zugaenglich. Der Abschnitt beginnt: 然而检事和乞乞科夫都非常失措,简直找不出答话来;罗士特来夫却有些快活起来了,不管别人,尽说着他的话:“哦,哦,我的乖乖……如果你不告诉我为什么要买死魂灵,我是不放开你的。听哪,乞乞科夫,你应该羞;你一定自己也明白,你没有比我再好的好朋友了。瞧罢,大人也在这里……对不对,检事先生?您不相信罢,大人,我们彼此有怎样的交情,实在的,如果您问我——我站在这里,如果您问我:‘罗士特来夫,从实招来,你的亲爷和
FR: Des Ames mortes de Gogol (dans la traduction de Lu Xun), Chapitre, Section 6 :
Ce passage du chef-d'oeuvre satirique de Gogol depeint avec une ironie inimitable la societe provinciale russe du dix-neuvieme siecle. Tchitchikov, l'escroc genial, evolue dans un monde de fonctionnaires, de proprietaires terriens et d'hommes d'affaires dont il exploite magistralement la vanite et la cupidite a ses propres fins. La traduction de Lu Xun preserve le tranchant satirique de l'original et le rend accessible au lecteur chinois. La section commence : 然而检事和乞乞科夫都非常失措,简直找不出答话来;罗士特来夫却有些快活起来了,不管别人,尽说着他的话:“哦,哦,我的乖乖……如果你不告诉我为什么要买死魂灵,我是不放开你的。听哪,乞乞科夫,你应该羞;你一定自己也明白,你没有比我再好的好朋友了。瞧罢,大人也在这里……对不对,检事先生?您不相信罢,大人,我们彼此有怎样的交情,实在的,如果您问我——我站在这里,如果您问我:‘罗士特来夫,从实招来,你的亲爷和
第九章】
有一天早晨,还在N市的访客时间之前,从一家蓝柱子,黄楼房的大门里,飘出一位穿着豪华的花条衣服的闺秀来了,前面是一个家丁,身穿缀有许多领子的外套,头戴围着金色锦绦的亮晃晃的圆帽。那闺秀急急忙忙的跳下了阶沿,立刻坐进那停在门口的马车里。家丁就赶紧关好车门,跳上踏台,向车夫喝了一声“走。”这位闺秀,是刚刚知道了一件新闻,正要去告诉别人,急得打熬不住。她时时向窗外探望,看到路不过走了一半,就非常之懊恼。她觉得所有房屋,都比平时长了一些,那小窗门的白石造成的救济所,也简直得无穷无尽,终于使她不禁叫了起来道:“这该死的屋子,就总是不会完结的!”车夫也已经受了两回的命令,要他赶快:“再快些,再快些,安特留式加!你今天真是赶的慢得要命!”到底是到了目的地了。车子停在一家深灰色的木造平房的前面,窗上是白色的雕花,外罩高高的木格子;一道狭窄的板墙围住了全家,里面是几株细瘦的树木,蒙着道路上的尘埃,因此就见得雪白。窗里面有一两个花瓶,一只鹦鹉,用嘴咬着干子,在向笼外窥探,还有两只叭儿狗,正在晒太阳。在这屋子里,就住着刚才到来的那位闺秀的好朋友。对于这两位闺秀,作者该怎样地称呼,又不受人们的照例的斥责,却委实是一件大难事。找一个随便什么姓罢——危险得很。纵使他选用了怎样的姓——但在我们这偌大的国度里的那里的角落上,总一定会有姓着这姓的人,他就要真的生气,把作者看成死对头,说他曾经为了探访,暗暗的来旅行,他究竟是何等样人,他穿着怎样的皮外套散步,他和什么亚格拉菲娜·伊凡诺夫娜太太有往来,以及他爱吃的东西是什么;如果说出他的官位和头衔来——那你就更加危险了。上帝保佑保佑!现在的时候,在我们这里,对于官阶和出身,都很神经过敏了,一看见印在书上,就立刻当作人身攻击:现在就成了这样的风气。你只要一说:在什么市镇上,有一个傻家伙——那就是人身攻击,一转眼间,便会跳出一位仪表非凡的绅士来,向人叫喊道:“我也是一个人,可是我也是傻的吗?”总而言之,他总立刻以为说着他自己。为豫防一切这种不愉快的未然之患起见,我们就用N市全部几乎都在这么称呼她的名目,来叫这招待来客的闺秀罢,那就是:通体漂亮的太太。她的得到这名目,是正当的,因为她只要能够显得极漂亮,极可爱,就什么东西都不可惜,虽然从她那可爱里,自然也时时露出一点女性的狡猾和聪明,在她的许多愉快的言语中,有时也藏着极可怕的芒刺!对于用了什么方法,想挤进上流来的人物,先不要用话去伤她的心。但这一切,是穿着一套外省所特有的细心大度的形式的衣裳的。她的一举一动,都很有意思,喜欢抒情诗,而且也懂得,还把头做梦似的歪在肩膀上,一言以蔽之,谁都觉得她确是一位通体漂亮的太太。至于刚才来访的那一位闺秀,性格就没有那么复杂和能干了,所以我们就只叫她也还漂亮的太太罢。她的到来,惊醒了在窗台上晒太阳的叭儿狗:简直埋在自己的毛里面了的狮毛的阿兑来和四条腿特别细长的雄狗坡忒浦儿丽。两匹都卷起尾巴,活泼的嗥着冲到前厅里,那刚到的闺秀正在这里脱掉她的外套,显出最新式样,摩登颜色的衣服和一条绕着颈子的长蛇[75]。一种浓重的素馨花香,散满了一屋子。通体漂亮的太太一知道也还漂亮的太太的来到,就也跑进前厅里来了。两位女朋友握手,接吻,叫喊,恰如两个刚在女塾毕业的年青女孩儿,当她们的母亲还没有告诉她这一个的父亲,比别一个的父亲穷,也不是那么的大官之前,重行遇见了的一样。她们的接吻就有这么响,至于使两匹叭儿狗又嗥起来,因此遭了手帕的很重的一下,——那两位闺秀当然是走进淡蓝的客厅里,其中有一张沙发,一顶卵圆形的桌子,以及几张窗幔,边上绣着藤萝;狮毛的阿兑来和长脚的胖大坡忒浦儿丽,也就哼着跟她们跑进屋子里。“这里来,这里来,到这角落上来呀!”主妇说,一面请客人坐在沙发的一角上。“这才是了,这才对了!您还有一个靠枕在这里呢!”和这句话同时,又在她背后塞进一个绣得很好的垫子去;绣的是一向绣在十字布上的照例的骑士;他的鼻子很像一道楼梯,嘴唇是方的。“我多么高兴呵,一知道您……我听到有谁来了,就自己想,谁会来的这么早呢?派拉沙说恐怕是副知事的太太罢,我还告诉她哩:这蠢才又要来使我讨厌了吗?我已经想回复了……”
那一位闺秀正要说起事情,摊出她的新闻来,然而一声喊,这是恰在这时候,从通体漂亮的太太那里发出来的,就把谈话完全改变了。
“多么出色的,鲜明的细布料子呵!”通体漂亮的太太喊道,她一面注意的检查着也还漂亮的太太的衣服。
“是呀,很鲜明,灵动的料子!但是普拉斯科夫耶·菲陀罗夫娜说,如果那斜方格子再小些,点子不是肉桂色的,倒是亮蓝色的,就见得更加出色了。我给我的妹子买去了一件料子;可真好!我简直说不上来!您想想就是,全是顶细顶细的条纹,在亮蓝的底子上,细到不过才可以看得出,条纹之间可都是圈儿和点儿,圈儿和点儿……一句话,真好!几乎不妨说,在这世界上是还没有什么更好看的。”
“您知道,亲爱的,这可显得太花色了。”
“阿呀,不的,并不花色!”
“唉唉,真是!太花色的利害!”
我应该在这里声明,这位通体漂亮的太太,是有些近乎唯物论者的,很倾于否认和怀疑,把这人生的很多事物都否定了。
但这时也还漂亮的太太却解说着这并不算太花色,而且大声的说道:“阿呀,真的,幸而人们没有再用折迭衣边的了!”
“为什么不用的?”
“现在不用那个,改了花边了!”
“阿唷,花边可不好看!”
“那里,人们都只用花边了,什么也赶不上花边,披肩用花边,袖口用花边,头上用花边,下面用花边,一句话,到处花边。”
“这可不行,苏菲耶·伊凡诺夫娜,花边是不好看的!”
“但是,安娜·格力戈利也夫娜,好看呀,真是出色的很,人们是这么裁缝的:先叠两叠,叠出一条阔缝来,上面……可是您等一等,我就要说给您听了,您会听得出惊,并且说……真的,您看奇不奇:衫子现在是长得多了,正面尖一点,前面的鲸须撑的很开;裙子的周围是收紧的,像古时候的圆裙一样,后面还塞上一点东西,就简直àlabelle femme[76]了。”
“不行,您知道,这撑的太开了!这可是我要说的!”通体漂亮的太太喊了起来,还昂着头一摇,傲然的觉得自己很严正。
“一点不错,这撑的太开了,我也要这么说!”也还漂亮的太太回答道。
“那倒不,敬爱的,您爱怎么着,就怎么着罢,我可不跟着办!”
“我也不……如果知道什么都不过是时行……什么也都要完的!我向我的妹子讨了一个纸样,只是开开玩笑的,您知道。家里的眉兰涅,可已经在做起来了。”
“什么,您有纸样吗?”通体漂亮的太太又喊了起来,显出她心里分明很活动。
“自然。我的妹子送了来的!
“心肝,您给我罢,谢谢您!”
“可惜,我已经答应了普拉斯科夫耶·伊凡诺夫娜的了。等她用过之后?”
“什么普拉斯科夫耶·伊凡诺夫娜穿过之后,谁还要穿呀?如果您不给自己最亲近的朋友,倒先去给了一个外人,我看您实在特别得很!”
“但她是我的叔婆呀!”
“阿唷,那是怎样的叔婆?不过从您的男人那边排起来,她才是您的亲戚……不,苏菲耶·伊凡诺夫娜,我不要听这宗话——您安心要给我下不去,您已经讨厌我,您想不再和我打交道了……”
可怜的苏菲耶·伊凡诺夫娜竟弄得完全手足无措。她很知道,自己是在猛火里面烧。这只为了夸口!她想用针来刺自己的胡涂的舌头。
“可是,我们的花花公子怎么了呢?”这时通体漂亮的太太又接着说。
“阿呀,真的,真的呀。我和您坐了这么一大片工夫。一个出色的故事!您知道么,安娜·格力戈利也夫娜,我给您带了怎样的新闻来了?”这时她才透过气来,言语的奔流,从舌头上涌出,好象鹰群被疾风所驱,要赶快飞上前去的一样。在这地位上说话,是她的极要好的女朋友也属于人情之外的强硬和苛酷的了。
“您称赞他,捧得他上天就是,随您的便,”她非常活泼的说。“可是我告诉您——就是当他的面,我也要说的,他是一个没有价值的人;没有价值的,没有价值的人!”
“对啦,但是您听着罢,我有事情通知您!”
“人家都说他好看,可是一点也不好看,一点也不——他的鼻子——他就生着一个讨厌的鼻子。”
“但是您让我,您让我告诉您,心肝,安娜·格力戈利也夫娜,您让我来说呀。这真是好一个故事,我告诉您,一个“Ss’konapellistoar”[77]的故事,”那女朋友显着完全绝望的神情,并且用了恳求的声音说。——当这时候,写出两位闺秀用了许多外国字,并且在她们的会话里夹进长长的法国话语去,大约也并非过份的。然而作者对于为了我们祖国的利益,爱护着法国话的事,虽然怀着非常的敬畏,对于我们的上等人为了祖国之爱和它的统一,整天用着这种话的美俗,虽然非常之尊敬,却总不能自勉,把一句外国话里的句子,运进这纯粹的俄罗斯诗篇里面去,所以我们也还是用俄国话写下去罢。
“怎样的一个故事呢?”
“唉唉,我的亲爱的安娜·格力戈利也夫娜,您可知道我现在是怎样的一个心情呀!您想想看,今天,住持夫人,那住持的太太,那希理耳神甫的太太,到我这里来了哪,您想是怎么样?我们这文弱的白面书生!您早知道的,那新来的客人您看他怎么样?”
“怎的?他已经爱上了住持太太了吗?”
“那里那里!安娜·格力戈利也夫娜!要是这样,还不算很坏哩!不是的,您听着就是,那住持太太对我怎么说!‘您想想看,’她说,‘女地主科罗皤契加忽然闯到我这里来了,青得像一个死人,还对我说,哦,她对我说什么,您简直不会相信。您听着就是,她对我说的是什么!这简直是小说呀!在半夜里,全家都睡觉了,她忽然听到一个怪声音,这可怕是说也没有法子说,使尽劲道的在敲门,她还听到人声音在叫喊:开门!开门!要不,我就捣毁了……’唔,您以为怎么样?您看我们的花花公子竟怎么样?”
“哦,那么,那科罗皤契加年青,漂亮吗?”
“唉唉,那里!一个老家伙!”
“这倒是一个出色的故事!那么他是爱弄老的?哪,我们的太太们的脾气也真好,人可以说。一下子就着了迷了。”
EN: From Gogol's Dead Souls (in Lu Xun's translation), Chapter, Section 8:
This passage from Gogol's satirical masterpiece depicts with inimitable irony the Russian provincial society of the nineteenth century. Chichikov, the ingenious swindler, moves through a world of officials, landowners, and businessmen whose vanity and greed he masterfully exploits for his own purposes. Lu Xun's translation preserves the satirical edge of the original and makes it accessible to the Chinese reader. The section begins: 第九章】 有一天早晨,还在N市的访客时间之前,从一家蓝柱子,黄楼房的大门里,飘出一位穿着豪华的花条衣服的闺秀来了,前面是一个家丁,身穿缀有许多领子的外套,头戴围着金色锦绦的亮晃晃的圆帽。那闺秀急急忙忙的跳下了阶沿,立刻坐进那停在门口的马车里。家丁就赶紧关好车门,跳上踏台,向车夫喝了一声“走。”这位闺秀,是刚刚知道了一件新闻,正要去告诉别人,急得打熬不住。她时时向窗外探望,看到路不过走了一半,就非常
DE: Aus Gogols Toten Seelen (in Lu Xuns Uebersetzung), Kapitel, Abschnitt 8:
Diese Passage aus Gogols satirischem Meisterwerk schildert mit unnachahmlicher Ironie die russische Provinzgesellschaft des neunzehnten Jahrhunderts. Tschitschikow, der geniale Gauner, bewegt sich durch eine Welt von Beamten, Gutsbesitzern und Geschaeftsleuten, deren Eitelkeit und Habgier er meisterhaft fuer seine Zwecke auszunutzen versteht. Lu Xuns Uebersetzung bewahrt die satirische Schaerfe des Originals und macht sie dem chinesischen Leser zugaenglich. Der Abschnitt beginnt: 第九章】 有一天早晨,还在N市的访客时间之前,从一家蓝柱子,黄楼房的大门里,飘出一位穿着豪华的花条衣服的闺秀来了,前面是一个家丁,身穿缀有许多领子的外套,头戴围着金色锦绦的亮晃晃的圆帽。那闺秀急急忙忙的跳下了阶沿,立刻坐进那停在门口的马车里。家丁就赶紧关好车门,跳上踏台,向车夫喝了一声“走。”这位闺秀,是刚刚知道了一件新闻,正要去告诉别人,急得打熬不住。她时时向窗外探望,看到路不过走了一半,就非常
FR: Des Ames mortes de Gogol (dans la traduction de Lu Xun), Chapitre, Section 8 :
Ce passage du chef-d'oeuvre satirique de Gogol depeint avec une ironie inimitable la societe provinciale russe du dix-neuvieme siecle. Tchitchikov, l'escroc genial, evolue dans un monde de fonctionnaires, de proprietaires terriens et d'hommes d'affaires dont il exploite magistralement la vanite et la cupidite a ses propres fins. La traduction de Lu Xun preserve le tranchant satirique de l'original et le rend accessible au lecteur chinois. La section commence : 第九章】 有一天早晨,还在N市的访客时间之前,从一家蓝柱子,黄楼房的大门里,飘出一位穿着豪华的花条衣服的闺秀来了,前面是一个家丁,身穿缀有许多领子的外套,头戴围着金色锦绦的亮晃晃的圆帽。那闺秀急急忙忙的跳下了阶沿,立刻坐进那停在门口的马车里。家丁就赶紧关好车门,跳上踏台,向车夫喝了一声“走。”这位闺秀,是刚刚知道了一件新闻,正要去告诉别人,急得打熬不住。她时时向窗外探望,看到路不过走了一半,就非常
“这倒并不是的,安娜·格力戈利也夫娜!和您所想象的,完全是另一回事。您想想看,他忽然站在她面前了,连牙齿也武装着,就是一个力那勒陀·力那勒提尼,[78]并且对她吆喝道:‘把灵魂卖给我,那些死掉了的,’他说。科罗皤契加自然是回答得很有理:‘我不能卖给您;他们是已经死掉的了。’——‘不,’他喊道,‘他们没有死。知道他们死没有死,这是我的事,’他说,‘他们是没有死的,没有死的!”他叫喊着。‘他们是没有死的!’总而言之,他闹了一个大乱子,全村都逃了,孩子哭喊起来,大家嚷叫着,谁也不明白谁,一句话,不得了,不得了,不得了!您简直不能知道,安娜·格力戈利也夫娜,当我听了这些一切的时候,我有多么害怕。‘亲爱的太太,’我的玛式加对我说。‘您去照一照镜子罢!您发了青了!’‘唉唉,现在照什么镜,’我说,‘我得赶快上安娜·格力戈利也夫娜那里去,去告诉她哩。’我立刻叫套车。我的车夫安特留式加问我要到什么地方去,我却说不出一句话儿来,只是白痴似的看着他的脸。我相信,他一定以为我发了疯了。唉唉,安娜·格力戈利也夫娜,如果您能够知道一点我怎么兴奋呵!”
“哼!真是奇怪得很!”通体漂亮的太太说。“死魂灵,究竟是什么意思呢?我老实说,这故事我可是一点也不懂,简直一点也不懂。我听说死魂灵,现在已经是
EN: "That is not at all the case, Anna Grigorievna! It is an entirely different matter from what you imagine. Just think, he suddenly appeared before her, armed to the teeth, a regular Rinaldo Rinaldini, and shouted at her: 'Sell me the souls, the dead ones!' Korobozhka naturally replied quite sensibly: 'I cannot sell them to you; they are already dead.' -- 'No,' he cried, 'they are not dead. Whether they are dead or not is my business,' he said, 'they are not dead, not dead!' He shouted: 'They are not dead!' In short, he created a terrible commotion. The whole village fled, children screamed, everyone shouted, nobody understood anyone -- in a word, dreadful, dreadful, dreadful! You simply cannot imagine, Anna Grigorievna, how frightened I was when I heard all this. 'Dear madam,' my Mashka said to me, 'look in the mirror! You have gone quite pale!' -- 'Oh, never mind the mirror now,' I said, 'I must rush to Anna Grigorievna at once to tell her!' I immediately ordered the carriage. My coachman Andrushka asked me where I wanted to go, but I could not utter a word, just stared at him like an idiot. He must surely have thought I had gone mad. Oh, Anna Grigorievna, if you could only imagine how agitated I was!"
"Hm! How very strange!" said the lady who was agreeable in all respects. "What on earth are dead souls supposed to mean? I frankly confess, I do not understand this story at all, not in the least. Now this is already the
DE: „Das stimmt gar nicht, Anna Grigorjewna! Es ist ganz anders, als Sie sich vorstellen. Denken Sie sich nur, er stand ploetzlich vor ihr, bewaffnet bis an die Zaehne, ein wahrer Rinaldo Rinaldini, und schrie sie an: 'Verkaufen Sie mir die Seelen, die toten!' Korobotschka antwortete natuerlich ganz vernuenftig: 'Ich kann sie Ihnen nicht verkaufen; sie sind doch schon tot.' -- 'Nein,' schrie er, 'sie sind nicht tot. Ob sie tot sind oder nicht, das ist meine Sache,' sagte er, 'sie sind nicht tot, nicht tot!' Er schrie: 'Sie sind nicht tot!' Kurz, er richtete ein furchtbares Durcheinander an. Das ganze Dorf floh, die Kinder schrien, alle laermten, keiner verstand den andern -- mit einem Wort, schrecklich, schrecklich, schrecklich! Sie koennen sich gar nicht vorstellen, Anna Grigorjewna, wie mir zumute war, als ich das alles hoerte. 'Verehrte Gnaeidige,' sagte mir meine Maschka, 'schauen Sie doch in den Spiegel! Sie sind ganz blass geworden!' -- 'Ach was, jetzt Spiegel,' sagte ich, 'ich muss sofort zu Anna Grigorjewna, um es ihr zu erzaehlen!' Sofort liess ich anspannen. Mein Kutscher Andruschka fragte mich, wohin ich fahren wolle, doch ich konnte kein Wort herausbringen und starrte ihn nur bloed an. Er muss sicher geglaubt haben, ich sei verrueckt geworden. Ach, Anna Grigorjewna, wenn Sie nur ahnen koennten, wie aufgeregt ich war!"
„Hm! Sehr merkwuerdig!" sagte die durchweg reizende Dame. „Was sollen denn tote Seelen eigentlich bedeuten? Ich gestehe offen, ich verstehe diese Geschichte ueberhaupt nicht, nicht im Geringsten. Ich hoere jetzt schon zum
FR: "Ce n'est pas du tout cela, Anna Grigorievna ! C'est une tout autre affaire que ce que vous imaginez. Pensez donc, il apparut soudain devant elle, arme jusqu'aux dents, un veritable Rinaldo Rinaldini, et lui cria : 'Vendez-moi les ames, les mortes !' Korobotchka repondit naturellement tres raisonnablement : 'Je ne peux pas vous les vendre ; elles sont deja mortes.' -- 'Non,' cria-t-il, 'elles ne sont pas mortes. Savoir si elles sont mortes ou non, c'est mon affaire,' dit-il, 'elles ne sont pas mortes, pas mortes !' Il criait : 'Elles ne sont pas mortes !' Bref, il provoqua un desordre epouvantable. Tout le village s'enfuit, les enfants hurlerent, tout le monde criait, personne ne comprenait personne -- en un mot, affreux, affreux, affreux ! Vous ne pouvez pas savoir, Anna Grigorievna, quelle peur j'ai eue en entendant tout cela. 'Chere madame,' me dit ma Machka, 'regardez-vous dans le miroir ! Vous etes devenue toute pale !' -- 'Oh, un miroir maintenant,' dis-je, 'je dois me precipiter chez Anna Grigorievna pour tout lui raconter !' J'ordonnai aussitot d'atteler. Mon cocher Androuchka me demanda ou je voulais aller, mais je ne pus articuler un seul mot, je ne faisais que le regarder d'un air idiot. Il a surement cru que j'etais devenue folle. Oh, Anna Grigorievna, si vous pouviez seulement savoir combien j'etais agitee !"
"Hm ! Comme c'est etrange !" dit la dame agreable en tout point. "Que signifient donc les ames mortes ? Je l'avoue franchement, je ne comprends pas du tout cette histoire, pas le moins du monde. Voila que j'en entends parler deja pour la"
第二回了。我的男人说,这是罗士特来夫撒谎!但一定还有什么藏在里面的!”
“不不,您就单替我设身处地的来想一想罢,安娜·格力戈利也夫娜,当我听了的时候,我是怎样的心情呵!‘现在呢,’科罗皤契加说,‘我全不知道应该怎么着了!他硬逼我在什么假契据上署名,’她说,‘并且把一张十五卢布的钞票抛在桌子上。我,’她说,‘是一个不通世故的,无依无靠的寡妇,这事情什么也不明白。’就是这样的一个故事呀!阿唷,如果您能够知道一点我怎么的兴奋呵。”
“不不,您要说什么,说您的就是!这并不是为了死魂灵呀!有一点完全别样的东西藏在这里面的。”
“老实说,我也早就这么想的,”也还漂亮的太太说,有一点吃惊。她又立刻非常焦急,要知道究竟藏着什么了,于是漫然的问道:“但从您看来,那里面藏些什么呢?”
“但是,您怎么想呀?”
“我怎么想?……老实说,我好象在猜谜。”
“但我要知道,您究竟是什么意见呢?”
然而,也还漂亮的太太却什么也想不出,所以就不开口。对于事物,她只会兴奋,至于仔细的想象和综合,却并不是她的事,因此她比别人更极需要细腻的朋友,给她忠告和帮忙。
“那就是了,我来告诉您,这死魂灵是有什么意思的,”通体漂亮的太太说,她的女朋友就倾听,而且还尖着耳朵;她的耳朵好象自己尖起来了。她抬起身,几乎要离开了沙发,她虽然有点茁实的,但好象忽然瘦下,轻如羽毛,看来只要有一阵微风,便可以把她吹去似的了。
一样情形的是俄国的贵公子,他是一个爱养狗,爱打猎,也爱游荡的人,当他跑近森林时,从中正跳出一只追得半死的兔子,于是策马扬鞭,赶紧换上弹药,接着就要开火。他的眼睛看穿了昏沉的空气,决不再放松一点这可怜的小动物。纵使当面是雪花旋舞的广野,用了成束的银星,射着嘴巴和眼睛,胡须,眉毛和值钱的獭皮帽,他也还是不住的只管追。
“死魂灵是……”通体漂亮的太太说。
“怎样?什么?”那女朋友很兴奋的夹着追问道。
“死魂灵是……!”
“阿唷,您说呀,看上帝面上!”
“不过一种虚构,也无非是一个假托。其实是为了这件事:他想诱拐知事的女儿。”
这结论实在很出意料之外,而且无论从那一点来看,也都觉得离奇。也还漂亮的太太一听到,就化石似的坐在她的位置上;她失了色,青得像一个死人,这回可真的兴奋了。“阿呀,我的上帝!”她叫起来,还把两手一拍。“这是我梦也没有想到的!”
“我还得说,您刚刚开口,我就已经知道,那为的是什么了,”通体漂亮的太太回答道。
“这一来,那么,对于女塾的教育,人们会怎么说呢?这可爱的天真烂漫的!”
“好个天真烂漫!我听过她讲话了!我就没有这勇气,敢说出这样的话来。”
“您知道,安娜·格力戈利也夫娜,现在的风俗坏到这地步,可真的教人伤心呀。”
“然而先生们还都迷着她哩,我可以说,我是看不出她一点好处来,……她做作得可怕,简直做作得教人受不住。”